इस युद्ध में नक्सलियों का सफाया ज़रूरी है

युद्ध की परिभाषा क्या होनी चाहिए? क्या कोई माई का लाल हमारी सरकार को ये समझा सकता है? देश के सामने आज यही सवाल खड़ा है। हम युद्धरत हैं। हमारी सरकार को ये समझ में नहीं आ रहा है। विपक्षी पार्टियां भी उसे समझा नहीं पा रही हैं। कुछ अपनी सरकारों की नाकामी को छिपाने के लिए तो कुछ इसलिए कि हम्माम में सारे नंगे हैं। लोकतंत्र में सरकार भले ही गूंगी-बहरी और निकम्मी हो जाए लेकिन अगर विपक्ष का हाल भी ऐसा हो तो कैसे जागेगी सरकार? कैसे समझेगी और कौन समझाएगा? जनता की बारी तो पांच साल पर आती है। Read more

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“.. तबतक नक्सलवाद से लड़ने का नैतिक आधार नहीं”

राजेंद्र धोड़पकर को हम सभी जानते हैं। वो हिंदुस्तान के एसोसिएट एडिटर हैं। लाजवाब कार्टूनिस्ट हैं। एक उम्दा पत्रकार हैं और जानने वाले बताते हैं कि एक बेतरीन व्यक्ति हैं। उन्होंने आज हिंदुस्तान में एक लेख लिखा है – नक्सली हिंसा में “पुलिसवाले ही क्यों बनते हैं शिकार”। इस लेख में उन्होंने एक मानवीय नज़रिया पेश किया है। आप उनके नज़रिये से सहमत हो सकते हैं और असहमत भी। लेकिन हम चाहते हैं कि आप इसे पढ़ें। इसलिए भी क्योंकि हाल के दिनों में मीडिया ने सरकार के सुर में सुर मिलाकर नक्सलियों को आतंकी बताते हुए उनके सामूहिक नरसंहार का जो नारा बुलंद किया है, उसे किसी भी तरह का नैतिक समर्थन नहीं दिया जा सकता है। किसी भी “गुमराह” राज्य को अपने ही “गुमराह” नागरिकों के नरसंहार की सुपारी नहीं दी जा सकती है। राजेंद्र धोड़पकर का यह लेख इस मुद्दे पर सकारात्मक बहस की मांग करता है। – मॉडरेटर

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अब गूगल की खैर नहीं!

याहू और माइक्रोसॉफ्ट की यारी

साइबर स्पेस में अब लड़ाई और रोमांचक हो गई है। गूगल को चुनौती देने के लिए दो धुरंधरों माइक्रोसॉफ्ट और याहू ने हाथ मिला लिया है। बुधवार को हुए करार के मुताबिक दोनों मिल कर ऑनलाइन सर्च में गूगल को टक्कर देंगे।

दस साल के लिए हुए इस समझौते में याहू.कॉम अब माइक्रोसॉफ्ट के नए सर्च इंजन बिंग का इस्तेमाल करेगा। दोनों को उम्मीद है कि इससे याहू पर विज्ञापन क्षेत्र की बड़ी कंपनियां आकर्षित होंगी। इस करार से जो भी आमदनी होगी माइक्रोसॉफ्ट उसमें से 88 फीसदी याहू को दे देगा। Read more

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मीडिया कंपनियों और गूगल में घमासान

April 10, 2009 by Samrendra  
Filed under स्पेशल रिपोर्ट

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google-200इन दिनों सूचना के बाज़ार में बड़ी लड़ाई चल रही है। ये लड़ाई है मीडिया संस्थाओं और सर्च इंजनों के बीच। करीब चार दिन पहले इस लड़ाई का बिगुल बजाया न्यूज़ कॉर्प के मालिक रुपर्ट मर्डोक ने। उन्होंने गूगल का नाम लिये बगैर कहा कि मीडिया संस्थाओं का कंटेंट चुरा कर सर्च इंजन मुनाफा कमा रहे हैं।

दो दिन एसोसिएट प्रेस (एपी) ने भी सर्च इंजनों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद किया। मर्डोक से एक कदम आगे बढ़ते हुए एपी ने ऐलान किया कि वो अपने 6700 सदस्यों के कंटेंट की रक्षा के लिए गूगल पर मुकदमा करने का विचार कर रहा है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि झगड़ा इतना बढ़ गया? क्यों मीडिया संस्थान सर्च इंजनों को दोषी ठहराने लगे? क्यों कहने लगे कि गूगल जैसे सर्च इंजन उनकी कीमत पर फलते-फूलते जा रहे हैं?

दरअसल, इस झगड़े की सबसे बड़ी वजह है मीडिया संस्थानों का बढ़ता घाटा और गूगल की बढ़ती कमाई। मंदी के इस दौर में कई मीडिया संस्थान बंद हो गये हैं। कई मीडिया संस्थान बंद होने की कगार पर हैं। गार्डियन में छपि एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले अमेरिका में 70 अख़बार या फिर पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं। साल भर के भीतर वहां करीब छह हज़ार लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। ब्रिटेन में 12 अखबार बंद हो चुके हैं। एक सर्वे के मुताबिक अगले एक साल में हर 10 में एक टाइटल के बंद हो जाने की आशंका है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसा हाल पूरी दुनिया का है। भारत में भी हजारों पत्रकारों की छंटनी हो चुकी है। यहां अख़बारों के साथ इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का भी हाल बुरा है। ज़्यादातर जगह नई भर्तियों पर रोक लगी है। इस साल इंक्रिमेंट भी रोक दिये गए हैं और एनडीटीवी और टाइम्स ऑफ इंडिया समेत कई जगहों पर तो कर्मचारियों की तनख्वाह में कटौती की गई है।

जाहिर है ये संकेत मीडिया संस्थानों के लिए काफी ख़तरनाक हैं और मंदी लंबी खिची तो कई संस्थान बंद हो जाएंगे। मीडिया में क़त्लेआम के बीच गूगल का बाज़ार चमक रहा है। जनवरी में जारी हुए नतीजों के मुताबिक अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही में गूगल का राजस्व 5.7 अरब डॉलर की आमदनी हुई। ये पिछले साल की मुकाबले 18 फ़ीसदी ज़्यादा है। यही नहीं गूगल ने कई बड़े सौदे भी किये हैं। कई कंपनियों को टेकओवर किया है। गूगल की यही कामयाबी न्यूज़ कॉर्प और एपी जैसे मीडिया संस्थानों को खटक रही है। रुपर्ट मर्डोक के मुताबिक सर्च इंजनों पर कंटेंट तो उनके जैसे मीडिया संस्थान मुहैया कराते हैं जबकि मुनाफे में उनकी हिस्सेदारी नहीं के बराबर है। इसीलिये अब इंटरनेट पर मौजूद मीडिया हाउस कंटेंट के इस्तेमाल के लिए पैसे वसूलने का मन बना रहे हैं। अगर ये हुआ तो इंटरनेट पर हमको और आपको जानकारी हासिल करने के लिए कीमत चुकानी होगी। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल ये है कि क्या ऐसा करने से मीडिया कंपनियों को कोई आर्थिक लाभ होगा या नहीं? इसका जवाब ढूंढने के लिए हमें कुछ साल पीछे जाना होगा।

अगर आप इंटरनेट का इस्तेमाल लंबे समय से कर रहे हैं तो आपको याद होगा कि चार-पांच साल पहले तक कुछ संस्थान कंटेंट के लिए पैसे वसूलते थे। लेकिन बाद में उनमें से कुछ कंपनियों ने गूगल के साथ करार किया। तब ये तय हुआ कि वो अख़बार अपनी वेबसाइट का कंटेंट मुफ़्त रखेंगे और इसके बदले गूगल उन्हें विज्ञापन मुहैया कराएगा। इससे वेबसाइट्स पर हिट्स बढेंगे और सबको पहले से कहीं ज्यादा फायदा होगा। वक़्त के साथ गूगल से करार करने वाले मीडिया संस्थानों की संख्या बढ़ती गई। गूगल के एक्जीक्यूटिव चेयरमैन के मुताबिक “खुद एसोसिएटेड प्रेस का 2010 तक गूगल के साथ करार है। आज अख़बारों को सोचना चाहिये कि उनके पाठक आखिर चाहते क्या हैं? अगर मीडिया संस्थान पाठकों से ज्यादा निचोड़ने का लालच करेंगे तो उनके हाथ कुछ नहीं आएगा ”। जाहिर है कि रुपर्ट मर्डोक और एपी ने जो बहस शुरू की है, मंदी गहराने पर वो बहस और तीखी होगी। अगर अखबारों ने इंटरनेट संस्करण के लिए पैसे वसूलने शुरू किये तो उससे गूगल और उन अखबारों के साथ पाठकों की जेब पर भी असर पड़ेगा। इंटरनेट पर अखबारों के पाठकों की संख्या तेजी से घटेगी। ऐसा होने की वजह साफ है। ग्राहक इंटरनेट के लिए 300-700 रुपये हर महीने खर्च करता है। उस पर कंटेंट के लिए हर कंपनी को अलग-अलग पैसा देना ज्यादातर ग्राहकों के बस की बात नहीं होगी।

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