क्या हमारे नेता बेशर्म हो गए हैं?
November 27, 2009 by संदीपन देब
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क्या कभी हमारे देश का राजनीतिक माहौल ऐसी शर्मनाक स्थिति में रहा है, जैसा की अभी है? अख़बारों के पहले पन्ने पर जिस तरह की ख़बरें रोज़ आ रही हैं, उससे आपको उबकाई आती होगी।
बात कुछ दिन पहले से शुरू करते हैं, जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाइ राजशेखर रेड्डी का निधन एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में हुआ। रातों-रात वाइएसआर देवतुल्य हो गये। यह सुन कर कि उनके प्रिय नेता वाइएसआर नहीं रहे, लोगों के बीच से आत्महत्या की ख़बरें आने लगीं। लेकिन इस बीच एक और बात हुई, जिस पर कम ग़ौर किया गया। वाइएसआर के बेटे जगन मोहन रेड्डी देखते ही देखते राष्ट्रीय स्तर पर चमकते सितारे की तरह छा गये? तीस वर्ष से भी कम उम्र में ही उनके द्वारा हजारों करोड़ से अधिक की जायदाद बटोरने ने उन्हें चरचा में ला दिया? पता नहीं यह सच है कि झूठ, लेकिन उसी दिन एक और ख़बर आयी कि जिसने वाइएसआर के वियोग में आत्महत्या की, उसके परिवार को आर्थिक मुआवजा यह कहते हुए दिया गया कि वाइएसआर के बिना परिवार का जीवनयापन-भरणपोषण मुश्किल है। अगर यह सच है, तो यह कह सकते हैं कि हमारे नेता मानवीय मूल्यों को खोने की आख़िरी राह पर चल रहे हैं। Read more
संघर्ष कहां, आदर्श कहां… चारण और सूबेदारों का राज है
November 27, 2009 by हरिवंश
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पहले चरण में वोट फ़ीसदी घटा है. झारखंड विधानसभा चुनावों में. एक स्रोत का मानना है, बीस वर्षों में सबसे कम मत पड़े. खासतौर से शहरों में. इससे क्या संकेत मिलते हैं? यह क्या राजनीति के प्रति नफ़रत का प्रतिफल है? इस घटते वोट फ़ीसदी के संकेत गहरे हैं. समाजशास्त्रियों के लिए भी. राजनीतिज्ञों के लिए भी. लोकतंत्र के प्रेमियों के लिए भी.
एक विश्लेषण यह भी है कि यह ग्लोबल विलेज की नयी दुनिया में उभरे आत्मकेंद्रित समाज का रुझान है. इक्कीसवीं सदी की यह दुनिया, गांव मानी जा रही है. एक सूत्र में बंधी. यह दुनिया, बाजार के विचारों से संचालित है. अब दुनिया पलटने और बदलनेवाले राजनीतिक विचार प्रभावी नहीं हैं. राजनीति, विचारविहीन है. पहले ‘वाद’ थे. पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद, अराजकतावाद. अब है… बाजारवाद. इस बाजारवाद के विचारस्रोत है, ‘मैनेजमेंट थाट’ या ‘मैनेजमेंट गुरु’ या ‘मैनेजमेंट आइडियालाग’ (प्रबंधन के भाष्यकार). अभी दुनिया ने मैनेजमेंट गुरु पीटर ड्रकर की शताब्दी मनायी. उनके मरे चार वर्ष हुए. वह जीते तो सौ वर्ष के हुए होते. वह अर्थशास्त्री जेएम किंस और जोसेफ़ शुंपीटर स्तर के थे. इन दोनों से वह प्रबंधन के अपने विचार लेकर मंथन भी करते रहे. प्रबंधन में आज वही पीटर ड्रकर आइडियालाग माने जाते हैं. प्रबंधन शास्त्र की शुरुआत का श्रेय उन्हें है. कहते हैं, इस वर्ष ‘मैनेजमेंट कंसलटिंग इंडस्ट्री’ को 300 बिलियन डॉलर (13.88 लाख करोड़ रुपये) की आय होगी. इसका श्रेय उन्हें दिया गया है. जब राजनीतिकवाद थे, अर्थशास्त्र के सिद्धांत समाज को गढ़ते थे, तब प्रबंधन का शास्त्र नहीं था. आज एक प्रबंधन गुरु अपने एक व्याख्यान के लिए 60000 डॉलर (28 लाख रुपये) कमा सकता है. प्रबंधन कला को इस स्तर तक पहुंचाने का श्रेय पीटर ड्रकर को दिया जाता है. वह बाजार, प्रबंधन और उद्योग के मौलिक विचारक माने गये. वह ‘द फ़ादर ऑफ़ माडर्न मैनेजमेंट’ (आधुनिक प्रबंधन के पिता) और ‘वर्ल्ड्स ग्रेटेस्ट मैनेजमेंट थिंकर’ (विश्व के सबसे बड़े प्रबंधन विचारक) माने जाते हैं. उन्होंने ही भविष्यवाणी की थी कि भविष्य में नालेज वर्कर (ज्ञानसंपन्न मजदूर) होंगे. Read more




