“भूस्वामियों को छेड़ोगे तो बर्बाद हो जाओगे नीतीश”

October 3, 2009 by दिलीप मंडल  
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नीतीश कुमार का गठबंधन क्या बिहार का पिछला उपचुनाव इसलिए हार गया कि बिहार के भूस्वामी उनसे नाराज हैं? मीडिया में चुनाव को लेकर जातीय गोलबंदियों के संदर्भ में जिस भाषा का इस्तेमाल होता है उसके मुताबिक क्या बिहार के सवर्ण नीतीश कुमार से नाराज हैं? क्या बिहार में कांग्रेस की वापसी नीतीश कुमार को अगले विधानसभा चुनाव में ले डूबेगी?

बिहार की संसदीय राजनीति के इस समय ये कुछ सबसे बड़े सवाल हैं। इन सवालों को लेकर बिहार का मीडिया क्या सोच रहा है, ये जानने के लिए हमने 19 सितंबर को पटना से छपे वाले हिंदी के कुछ अखबारों को खंगालने की कोशिश की। यही वो तारीख है जब विधानसभा उपचुनाव के बाद पटना में अखबार छपे। 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा की वजह से पटना में सभी प्रेस बंद होते हैं और 18 सितंबर का अखबार नहीं आता। Read more

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शिक्षक नशेड़ी, गंजेड़ी हैं तो क्या पत्रकार संत हैं?

राजू रंजन प्रसाद प्रगतिशील विचारों वाले बेहद शालीन और सज्जन शख़्स हैं। इतिहास और समाजशास्त्र में गहरी पैठ है। पटना से उन्होंने पीएचडी की है। कुछ खास मसलों पर समझौता नहीं कर सके, इसलिए किसी कॉलेज में प्रोफेसर नहीं बन पाए। फिलहाल राज्य सरकार के एक स्कूल में नवनियुक्त शिक्षक हैं और पूरी ईमानदारी से बच्चों को पढ़ाते हैं। साहित्य और आलोचना में भी इन्होंने काफी काम किया है। हाल ही में पटना में जब अस्थाई शिक्षकों ने अपनी मांगों के साथ विरोध प्रदर्शन किया तो पुलिस ने शिक्षकों को दौड़ा-दौड़ा पीटा। उसके बाद कुछ पत्रकारों ने शिक्षकों की आलोचना शुरू की। आलोचना की एक मर्यादा होती है। लेकिन कई पत्रकार ये मर्यादा भी लांघ गए। राजू रंजन प्रसाद ऐसे तमाम पत्रकारों से पूछ रहे हैं कि गिरावट कहां नहीं आई है? क्या पत्रकारिता का स्तर नहीं गिरा है? क्या पत्रकारों की भाषा नहीं बिगड़ी है? आप उनका ये लेख पढ़िये और हो सके तो उनके सवालों का अपने स्तर पर ही सही जवाब दीजिए।

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