नई दुनिया का मतलब राष्ट्रपति भवन का भोंपू !
September 25, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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संबंध निजी होते हैं और संबंधों को हर कोई निभाता है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति किसी संस्थान के शीर्ष पर बैठा हो और वो उस संस्थान को निजी संबंधों को साधने का जरिया मात्र बना दे तो यह किसी के लिए अच्छा नहीं। न खुद उस व्यक्ति के लिए और न ही संस्थान के लिए। लेकिन लगता है कि नई दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता इन दिनों कुछ ऐसी ही मुहिम में जुटे हैं, जिससे उनके प्रति सम्मान पूरी तरह ख़त्म हो रहा है। उन्होंने नई दुनिया को राष्ट्रपति भवन का भोंपू जैसा बना दिया है। अमूमन हर दूसरे दिन पहले पन्ने पर राष्ट्रपति और उनके परिवार से जुड़ी कोई न कोई ख़बर या फिर तस्वीर ज़रूर होती है। Read more




