जब ब्रूनो की बेटियां भी पूर्व आईपीएस के हरम में खुश हैं…

शुरुआत नाम की चर्चा से करते हैं। टैगोर पुरस्कार कहने भर से कोई पुरस्कार सम्माननीय नहीं हो जाता। साहित्य अकादेमी-सामसुंग पुरस्कार का रवींद्रनाथ टैगोर या उनके मूल्यों से कोई संबंध नहीं है। यह पुरस्कार की ब्रांडिंग है। हम जानते हैं कि बाजार में गांधी छाप बीड़ी और जवाहर छाप दियासलाई भी मिलती है। कायदे से पुरस्कार देने वाले को अपने ही नाम का इस्तेमाल करना चाहिए। जैसे नोबेल पुरस्कार अल्फे्रड नोबेल के नाम पर है। या भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार दिवंगत कवि के परिवार द्वारा दिया जाता है। साहित्य अकादेमी जो पुरस्कार देती है, वे अकादेमी पुरस्कार कहलाते हैं। सामसुंग और अकादेमी को मिल-जुल कर पुरस्कार देना था, तो उन्हें टैगोर को बीच में नहीं लाना चाहिए था। यह एक महान लेखक के नाम का दुरुपयोग है। Read more

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