ख़बर चाहिए तो पैसे दो
October 10, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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न्यूज़ कॉर्प के मालिक रुपर्ट मर्डोक और एसोसिएटेड प्रेस के चीफ टॉम कर्ले ने इंटरनेट पर कंटेंट के लिए पैसे वसूलने की मुहिम तेज कर दी है। इसके लिए उन्होंने गूगल जैसे सर्च इंजनों पर दबाव बढ़ा दिया है। बीजिंग में वर्ल्ड मीडिया सम्मेलन में उन्होंने आक्रामक ढंग से अपनी बात रखी। ख़बरों के मुताबिक सम्मेलन में रुपर्ट मर्डोक और एसोसिएटेड प्रेस के चीफ टॉम कर्ले ने कहा कि गूगल जैसे एग्रीगेटरों और उनके कंटेंट की नकल करने वाली कंपनियों को जल्दी ही उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
रुपर्ट मर्डोक ने सम्मेलन में मौजूद सभी लोगों से कहा कि वक़्त आ गया है जब इंटरनेट पर मौजूद कंटेंट के लिए पैसे वसूले जाएं। अगर यह तय नहीं किया गया तो इसकी कीमत न्यूज़ कॉर्प जैसी कंपनियां चुकाएंगी जबकि चोर मौज करेंगे। एसोसिएटेड प्रेस के चीफ टॉम कर्ले ने कहा कि अब यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता कि वो पैसे लगा कर और मेहनत के जरिए लोगों के लिए सूचना जमा करे और दूसरे उनकी मेहनत और पैसे के बल पर मुनाफा कमाएं। Read more
आप मीडिया मुगल मर्डोक की तरह रहना चाहते हैं?
August 16, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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अगर आप मीडिया में काम करते हैं तो रुपर्ट मर्डोक को ज़रूर जानते होंगे। वो दुनिया की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी न्यूज़ कॉरपोरेशन के मालिक हैं और इस कंपनी का कारोबार दुनिया के कई देशों में फैला हुआ है। भारत में भी स्टार इंडिया उन्हीं की कंपनी है। रुपर्ट मर्डोक के बारे में ये ब्योरा देने का मकसद सिर्फ़ इतना है कि अगर आप उनकी तरह एक हफ़्ते के लिए रहना चाहते हैं तो रह सकते हैं, लेकिन इसके लिए आपको 373580 डॉलर खर्च करने होंगे। यानी करीब एक करोड़ 87 लाख रुपये खर्च करने होंगे। Read more
इंटरनेट पर भी ख़बरों के लिए चुकाने पड़ेंगे पैसे!
August 8, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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पैसा दो, ख़बर लो
फाइनेंशियल टाइम्स ने एलान किया है कि उसकी वेबसाइट पर अगले साल की गर्मियों तक पे-पर-व्यू (हर ख़बर के लिए कीमत) की योजना पूरी तरह से लागू हो जाएगी। कंपनी के मुताबिक इस पर विचार किया जा रहा है कि क्या ग्राहकों को कोई भी कंटेंट मुफ़्त दिया जाए या नहीं। अभी फाइनेंशियल टाइम्स के रजिस्टर्ड यूजर हर महीने 20 ख़बरों को मुफ़्त में हासिल कर सकते हैं। ऐसे रजिस्टर्ड यूजर्स की संख्या करीब 14 लाख है। अगर कोई बीस ख़बरों से अधिक जानकारी चाहता है तो उसके लिए उसे पैसे चुकाने पड़ते हैं। अभी अख़बार पर दो दरें लागू हैं। सालाना 150 डॉलर और 199 डॉलर। 199 डॉलर चुकाने वाले ग्राहकों को कुछ ऐसी एक्सक्लूसिव जानकारियां दी जाती हैं जो उनका निवेश और कारोबार बढ़ा सकें। Read more
मीडिया मुगल मर्डोक का अख़बार जांच के घेरे में
July 10, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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ख़बर के लिए आपराधिक हथकंडे
मीडिया मुगल रुपर्ट मर्डोक का अख़बार न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड जांच के घेरे में है। रुपर्ट मर्डोक स्टार टीवी के भी मालिक हैं। उनके अख़बार न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड के ख़िलाफ ख़बरों के लिए आपराधिक हथकंडे अपनाने का आरोप है। अब मेट्रोपोलिटन पुलिस इस मामले की जांच करेगी। Read more
मीडिया कंपनियों और गूगल में घमासान
April 10, 2009 by Samrendra
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इन दिनों सूचना के बाज़ार में बड़ी लड़ाई चल रही है। ये लड़ाई है मीडिया संस्थाओं और सर्च इंजनों के बीच। करीब चार दिन पहले इस लड़ाई का बिगुल बजाया न्यूज़ कॉर्प के मालिक रुपर्ट मर्डोक ने। उन्होंने गूगल का नाम लिये बगैर कहा कि मीडिया संस्थाओं का कंटेंट चुरा कर सर्च इंजन मुनाफा कमा रहे हैं।
दो दिन एसोसिएट प्रेस (एपी) ने भी सर्च इंजनों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद किया। मर्डोक से एक कदम आगे बढ़ते हुए एपी ने ऐलान किया कि वो अपने 6700 सदस्यों के कंटेंट की रक्षा के लिए गूगल पर मुकदमा करने का विचार कर रहा है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि झगड़ा इतना बढ़ गया? क्यों मीडिया संस्थान सर्च इंजनों को दोषी ठहराने लगे? क्यों कहने लगे कि गूगल जैसे सर्च इंजन उनकी कीमत पर फलते-फूलते जा रहे हैं?
दरअसल, इस झगड़े की सबसे बड़ी वजह है मीडिया संस्थानों का बढ़ता घाटा और गूगल की बढ़ती कमाई। मंदी के इस दौर में कई मीडिया संस्थान बंद हो गये हैं। कई मीडिया संस्थान बंद होने की कगार पर हैं। गार्डियन में छपि एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले अमेरिका में 70 अख़बार या फिर पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं। साल भर के भीतर वहां करीब छह हज़ार लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। ब्रिटेन में 12 अखबार बंद हो चुके हैं। एक सर्वे के मुताबिक अगले एक साल में हर 10 में एक टाइटल के बंद हो जाने की आशंका है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसा हाल पूरी दुनिया का है। भारत में भी हजारों पत्रकारों की छंटनी हो चुकी है। यहां अख़बारों के साथ इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का भी हाल बुरा है। ज़्यादातर जगह नई भर्तियों पर रोक लगी है। इस साल इंक्रिमेंट भी रोक दिये गए हैं और एनडीटीवी और टाइम्स ऑफ इंडिया समेत कई जगहों पर तो कर्मचारियों की तनख्वाह में कटौती की गई है।
जाहिर है ये संकेत मीडिया संस्थानों के लिए काफी ख़तरनाक हैं और मंदी लंबी खिची तो कई संस्थान बंद हो जाएंगे। मीडिया में क़त्लेआम के बीच गूगल का बाज़ार चमक रहा है। जनवरी में जारी हुए नतीजों के मुताबिक अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही में गूगल का राजस्व 5.7 अरब डॉलर की आमदनी हुई। ये पिछले साल की मुकाबले 18 फ़ीसदी ज़्यादा है। यही नहीं गूगल ने कई बड़े सौदे भी किये हैं। कई कंपनियों को टेकओवर किया है। गूगल की यही कामयाबी न्यूज़ कॉर्प और एपी जैसे मीडिया संस्थानों को खटक रही है। रुपर्ट मर्डोक के मुताबिक सर्च इंजनों पर कंटेंट तो उनके जैसे मीडिया संस्थान मुहैया कराते हैं जबकि मुनाफे में उनकी हिस्सेदारी नहीं के बराबर है। इसीलिये अब इंटरनेट पर मौजूद मीडिया हाउस कंटेंट के इस्तेमाल के लिए पैसे वसूलने का मन बना रहे हैं। अगर ये हुआ तो इंटरनेट पर हमको और आपको जानकारी हासिल करने के लिए कीमत चुकानी होगी। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल ये है कि क्या ऐसा करने से मीडिया कंपनियों को कोई आर्थिक लाभ होगा या नहीं? इसका जवाब ढूंढने के लिए हमें कुछ साल पीछे जाना होगा।
अगर आप इंटरनेट का इस्तेमाल लंबे समय से कर रहे हैं तो आपको याद होगा कि चार-पांच साल पहले तक कुछ संस्थान कंटेंट के लिए पैसे वसूलते थे। लेकिन बाद में उनमें से कुछ कंपनियों ने गूगल के साथ करार किया। तब ये तय हुआ कि वो अख़बार अपनी वेबसाइट का कंटेंट मुफ़्त रखेंगे और इसके बदले गूगल उन्हें विज्ञापन मुहैया कराएगा। इससे वेबसाइट्स पर हिट्स बढेंगे और सबको पहले से कहीं ज्यादा फायदा होगा। वक़्त के साथ गूगल से करार करने वाले मीडिया संस्थानों की संख्या बढ़ती गई। गूगल के एक्जीक्यूटिव चेयरमैन के मुताबिक “खुद एसोसिएटेड प्रेस का 2010 तक गूगल के साथ करार है। आज अख़बारों को सोचना चाहिये कि उनके पाठक आखिर चाहते क्या हैं? अगर मीडिया संस्थान पाठकों से ज्यादा निचोड़ने का लालच करेंगे तो उनके हाथ कुछ नहीं आएगा ”। जाहिर है कि रुपर्ट मर्डोक और एपी ने जो बहस शुरू की है, मंदी गहराने पर वो बहस और तीखी होगी। अगर अखबारों ने इंटरनेट संस्करण के लिए पैसे वसूलने शुरू किये तो उससे गूगल और उन अखबारों के साथ पाठकों की जेब पर भी असर पड़ेगा। इंटरनेट पर अखबारों के पाठकों की संख्या तेजी से घटेगी। ऐसा होने की वजह साफ है। ग्राहक इंटरनेट के लिए 300-700 रुपये हर महीने खर्च करता है। उस पर कंटेंट के लिए हर कंपनी को अलग-अलग पैसा देना ज्यादातर ग्राहकों के बस की बात नहीं होगी।




