हुसैन, तुम धर्म के ठेकेदारों से माफ़ी मत मांगना

मकबूल फ़िदा हुसैन को कतर की नागरिकता दिये जाने पर फिर से उन्हें खोने का एहसास हो रहा। लेकिन राजनीति की बिसात पर हुसैन बस मोहरा बन कर रह जाते हैं। आज सेक्यूलरिज़म की दुहाई देने वाले चुप हैं। ये वही लोग हैं जिन्होने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को सरकारी दस्तावेजों के विशाल डम्पिंग ग्राउंड में दफ्न कर दिया है। ये हिम्मत कौन दिखाएगा कि उस रिपोर्ट को बाहर निकाल कर, उसे झाड़ पोंछ कर उस पर सिरे से अमल किया जाए। हुसैन से अलग जस्टिस सच्चर ने जो देश की अक़लियत के विकास का एक्स-रे निकाला उसमें देश की सेक्यूलर छवि तार-तार दिखी। Read more

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माया का नया मंत्र – विश करो, ज़िद करो

उनके साथ ब्लैक कैट रक्षक क्या कम थे कि मायावती ने अपनी मूर्तियों की सुरक्षा के लिये भी ‘रक्षक’ ढूंढ़ने की ठान ली। स्पेशल ज़ोन सिक्यूरिटी फोर्स बिल विधानसभा में पेश हो चुका है। बीएसपी का दोनों सदनों में बहुमत है। इसलिए बिल आसानी से पास भी हो जाएगा। सदन में बिल पर चर्चा तो बस फॉर्मेलिटी भर है। बिल के दायरे में 13 मॉल एवेन्यू भी है जहां मायावती खुद रहती हैं। मूर्तियों में जान फूंक दी जाए तो वो भगवान का दर्जा पा लेती है। लेकिन माया तो खुद देवी हैं जिनके एक इशारे पर पूरा सरकारी तंत्र उनकी और उनकी मूर्तियों की सेवा में दिन-रात एक कर सकता है। उनका रक्षक बन सकता है। Read more

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पाक के ख़िलाफ़ जेहाद का आगाज़ भारत की ओर से हो!

विशाल भारद्वाज की जल्द रिलीज होने वाली नई फिल्म इश्कियां में पाकिस्तान के मशहूर सूफी गायक मरहूम नुसरत फतेह अली खान के भतीजे राहत फतेह अली खां का गाया गाना इस समय हिंदुस्तान के फिल्म संगीत प्रेमियों का नेशनल ऐंथम हो गया है। गुलज़ार के लिखे इस गीत ‘दिल तो बच्चा है’ को गाकर राहत ने बच्चे, बूढ़े़ सब के दिलों में अपनी जगह बना ली है। संगीत प्रेमियों में राहत कोई नया नाम नहीं हैं। इससे पहले भी वो कई हिंदी फिल्मी हिट गाने गा चुके हैं। राहत पाकिस्तानी हैं और जब वो अपनी आवाज़ का जादू बिखेरते हैं तो सारा हिंदुस्तान उसे सुनता है। राहत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की फरीदा खानम हों या नुसरत, मेहदी हसन हो या गुलाम अली, पाकिस्तान का रॉक बैंड जुनून हो या नए युवा गायक आतिफ असलम। भारत ने पाकिस्तानी टैलेंट की हमेशा कद्र की और सर आंखों पर बिठाया। अमन का कोई भी सिपाही 26\11 हमले के लिए पाकिस्तान की कारस्तानियों को माफ तो नहीं कर सकता। लेकिन इसका गुस्सा फनकारों पर निकालने का इल्ज़ाम भी अपने ऊपर नहीं लेना चाहता। Read more

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अब वो अमर हो जाएंगे

अमर सिंह कहते हैं मैं समाजवादी बनूंगा मुलायमवादी नहीं। मुलायम के नाम से इतनी बेरूखी। वो तो आपके नेताजी हैं। आप उनके राइट हैंड, लेफ्ट हैंड, उनकी नाक, नाक के बाल, कान, उनकी लाज, उनकी साख, उनके धन, उनकी सम्पदा दिल, दिमाग, मन, मस्तिष्क, उनके सैफेई सब कुछ थे। मुलायम तो केवल नाम के मुलायम सिंह यादव रह गए थे असली समाजवादी तो आप थे। पार्टी की साइकिल तो आप ही थे। जिसके आगे अमिताभ और जया बच्चन थे, पीछे कैरियर पर संजय दत्त थे, हैंडल पर जया प्रदा भाभी थीं, अनिल अंबानी की घंटी थी। पीछे मेडगार्ड में गोदरेज की लाइट। आप खुद साइकिल की चेन, उसका पहिया और उसके पहिये में डलने वाले मोबिल ऑयल। वो अलग बात है कि साइकिल मुलायमवादी अमर सिंह की समाजवादी पार्टी का बस चुनाव निशान थी। बाकी … आप तो कभी एसयूवी से नीचे चले नहीं। नेताजी को भी उसकी खूब सवारी करवायी। Read more

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ये महाभारत अनंत है… आप अपना रोल चुनिए

चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ अब ध्यान नहीं खींचती। लेकिन शुक्रवार को तिरुनेलवेल्ली शहर से जो ब्रेकिंग न्यूज़ के साथ विजुअल्स चले उसने दिल दहला दिया। ख़ून में सना एक वर्दीदार पुलिसकर्मी सड़क पर पड़ा था। वो तड़प रहा था। बार-बार उठने की कोशिश कर रहा था। हाथ के इशारे से आने-जाने वालों से मदद की गुहार कर रहा था। मगर कोई भी उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया। उसी सड़क से दो- दो मंत्रियों की कारों का काफिला गुजरा। भीड़ ने तमाशा देखा। मगर उस पुलिसकर्मी की मदद को कोई हाथ आगे नहीं बढ़ा। उस पुलिसवाले को बदमाशों ने बम मार कर लहू-लुहान कर दिया था। उसके शरीर के अंग में गहरे घाव हो चुके थे। एक बार तो हिम्मत करके उसने बैठने की कोशिश की मगर हिम्मत जवाब दे गयी। वो फिर सड़क पर गिरा मानो बिजली का तार टूट के गिरा हो। उस विजुअल को देखकर शरीर में करंट दौड़ गयी। उसकी लाचारी पर आंसू भर आए। जनता की नपुंसकता पर गुस्सा आया। करीब आधे घंटे बाद जब वो अपनी आखिरी सांसे ले रहा था तब किसी ने उसके पास जाकर उसे उठाया और गाड़ी में लेकर अस्पताल पहुंचाया। क्या पता वो उस पुलिसकर्मी को नहीं उसकी लाश को अस्पताल ले जा रहे थे? क्योंकि सब-इंस्पेक्टर आर वेत्रीवल अस्पताल ज़िंदा नहीं पहुंचे। Read more

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ये सिस्टम ही सबसे बड़ा इडियट है

फिल्म 3 इडियट्स में स्वानंद किरकिरे का ये गीत हमारे बचपन की याद ताजा कर देता है।

कंधों को किताबों के बोझ ने झुकाया
रिश्वत देना खुद पापा ने सिखाया
99 परसेन्ट मार्क्स लाओगे तो घड़ी
वर्ना छड़ी

बचपन में तो हमें पता भी नहीं लग पाया कि रिश्वत के कितने रूप होते हैं। जो हम नहीं पूछ पाए आज के नौजवान ज़रूर पूछते होंगे। मुंबई के तीन अलग-अलग इलाकों में रहने वाली नेहा सावंत, भजनप्रीत और सुशांत ने भी खुदकुशी करने से पहले अपने मां-पापा से जरूर पूछा होगा कि पढ़ाई में अच्छे नंबर नहीं आए तो क्या वो उन्हें अपनी बेटी या बेटा मानना छोड़ देंगे। तो क्या आप मेरा तिरस्कार कर देंगे। इनके अभिभावक अपने बच्चों को शायद तर्कसंगत जवाब नहीं दे पाए। मां-पापा उनका तिरस्कार करते इससे पहले बच्चों ने ही ज़िंदगी का तिरस्कार कर दिया। Read more

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मेरा भारत महान! होप 2010

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फिरोजशाह कोटला मैदान में श्रीलंकाई बल्लेबाज़ों पर बॉल बिल्कुल बॉडीलाइन सीरीज के अंदाज में आ रही थी। बस डगलस जार्डीन कहीं नहीं दिख रहा था। थोड़ी देर बाद राज़ खुला। कोटला की पिच ने जार्डीन के खूंखार तेवर अपनाए हुए थे। पिच इतनी ऊबड़-खाबड़ थी कि गेंद कभी दस-दस फिट उछलती, कभी सुर्री होकर बल्लेबाज और विकेटकीपर धोनी को चकमा देकर निकल जाती। यही कारण था कि 400 रन बनाने वाले श्रीलंकाई खिलाड़ी तड़ातड़ आउट होते चले गए। 85 रन पर पांच विकेट हो चुके थे जब संदेह गहराता देख मैच रेफरी ने वनडे सीरीज का पांचवा और आखिरी मैच रद्द कर दिया।

इसी पिच पर 13 महीने बाद वर्ल्ड कप खेला जाना है। बात इतनी छोटी नहीं थी। ये अंतर्राष्ट्रीय मैच था। ये मैच विश्व क्रिकेट की सबसे ताकतवर और सबसे अमीर बॉडी यानी बीसीसीआई के झंडे तले हुआ था। और होस्ट कंट्री विश्व की नम्बर वन टेस्ट टीम है। ये हिंदुस्तान में ही हो सकता है। जिस कोटला मैदान में गावस्कर ने सर डॉन ब्रैडमैन के 29 शतक की बराबरी की थी वो आज अपनी कमेंट्री में ये कहे बिना नहीं रह पाए कि पिच का हाल ऐसा था मानो गंजी खोपड़ी पर किसी ने कृत्रिम रूप से जगह जगह बाल उगवा लिए हों। जिस पिच पर कुंबले ने परफेक्ट टेन लेकर विश्व रिकॉर्ड बनाया था वहां मैच इसलिए नहीं खेला जा सका क्योंकि पिच ठीक से बनायी ही नहीं गयी थी। Read more

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ये दिल्ली सब की है

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शीला दीक्षित ने दिल्ली में काम अच्छा किया होगा कि जनता ने सर आंखो पर बिठाया। और बतौर मुख्यमंत्री उनकी हैट्रिक हुई। मेट्रो रेल, फ्लाईओवर, सबवे, फुटब्रिज, लो फ्लोर बसें सब का बड़ा श्रेय शीला दीक्षित सरकार को जाता है। कॉमनवेल्थ गेम्स करवाना फिलहाल उनकी बड़ी जिम्मदारी होगी। अपनी तीसरी पारी में शीला दिल्ली – एनसीआर के विकास की ओर ध्यान देंगी ऐसी अपेक्षा उनसे जरूर की जा रही थी। लेकिन प्राइवेट मोटर गाड़ियों पर एंट्री टैक्स लगाने का प्रस्ताव देकर एनसीआर के रोडमैप में दिशा-भ्रम पैदा कर दिया।

प्रशासनिक तौर पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में काम करने का शीला का सबसे लंबा एक्सपीरियेंस है। वो इस क्षेत्र को एनसीआर सदस्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बेहतर समझती हैं। अब तो दिल्ली का विकास एनसीआर के विकास से जुड़ गया है। अगर एनसीआर में क्राइम रेट बढ़ेगा तो ये तय है कि उसका असर दिल्ली पर भी पड़ता है। नोएडा या फरीदाबाद में बसों या ऑटोवालों की हड़ताल होती है तो दिल्ली में सरकारी और गैर-सरकारी दफ्तरों में कर्मचारियों की हाजिरी देर से लगती है। दिल्ली के 37 ऐसे प्वाइंट्स हैं जहां से प्राइवेट गाड़ियां दिल्ली में घुसती हैं या दिल्ली से बाहर जाती हैं। कहां कहां टोल नाके बिठवायेंगी। और क्या गारंटी की दूसरे राज्य यानी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान भी दिल्ली की देखा देखी मोटर वाहन चालकों पर नया टैक्स न थोप दें। Read more

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गुप्त कैमरे ने गेम कर दिया… नारायण नारायण

बिल क्लिंटन की जितनी उम्र है उससे कहीं पहले से नारायण दत्त तिवारी राजनीति में हैं। कई बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। नये उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी बने। प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए। आंध्र प्रदेश का गवर्नर पद उनके उसी गरिमामय राजनीतिक सफर का वो चरम था जहां पहुंच कर तिवारी सरीखा राजनेता राजनीति से संन्यास लेना चाहता है। उनका वानप्रस्थ ही चल रहा था कि अचानक उन्हें गृहस्थ जीवन की फिर याद सताने लगी। हरकारे बुलवाए और गुपचुप गुपचुप वो कर डाला जिसे सुन के बिल क्लिंटन क्या खजुराहो की मूर्तियां भी शर्मा जाएं। किसी को शैतानी सूझी होगी कि जो व्हाइट हाउस में नहीं देख पाया उसका सारा मज़ा उसने गवर्नर हाउस के प्राइवेट चैंबर के भीतर चल रही रासलीला को कैमरे में कैद कर के लिया। नारायण..नारायण..। Read more

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क्या “नागपुर ब्रदर्स” बीजेपी की दिशा और दशा बदल पायेंगे?

‘आई एम कमिटेड टू कन्स्ट्रक्शन..’ बीजेपी के नए अध्यक्ष नितिन गडकरी के ये शब्द सुनकर मीडियाकर्मी एक पल के लिए अवाक रह गए। अध्यक्ष बनने के बाद अपनी पहली प्रेस वार्ता में गडकरी से पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल पूछा गया था। इस सवाल के पूछे जाने से पहले गडकरी कई बार अपनी पीठ ठोंक चुके थे कि वो जब महाराष्ट्र के पीडब्लूडी मिनिस्टर थे तो उन्होंने कितने झंडे गाड़े थे। गडकरी के ‘स्लिप ऑफ द टंग’ से मंच पर उनके साथ बैठे पार्टी सहयोगी रवि शंकर प्रसाद और प्रकाश जावड़ेकर भावहीन, शून्य में ताकते रहे। क्योंकि गडकरी के साथ वो भी टीवी चैनलों के कैमरे के फ्रेम में थे। इसलिए चेहरे की हर क्रीज पर कैमरे की नज़र थी। बहरहाल गडकरी ने अपने आप को संभाला और पत्रकार का जवाब दिया। Read more

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