पुरुष पंडितों ने सभा की, पंडित प्रभाष जोशी को याद किया

January 29, 2010 by समरेंद्र  
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दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में प्रभाष जोशी पर लिखी गयी पुस्तक का लोकार्पण हुआ (लोकार्पण समारोह की रपट के लिए यहां क्लिक करें : “दिग्गजों की मौजूदगी में प्रभाष जोशी पर पुस्तक का लोकार्पण”)। इसे आप महज संयोग कहेंगे या क्‍या कहेंगे कि उस लोकार्पण में जितने लोगों ने प्रभाष जोशी के बारे में अपनी राय रखी, उनमें से एक को छोड़ कर कोई भी गैर ब्राह्मण नहीं था। जो अकेला शख्‍स गैरब्राह्मण था, वो भी एक ऐसी जाति से ताल्लुक रखता था जो खुद को ब्राह्मण होने का दावा करती रही है। यहां तक कि हद से अनहद गये का प्रकाशक भी ब्राह्मण ही है। इसे भी आप महज संयोग कहेंगे या फिर क्‍या कहेंगे कि मंच पर आकर प्रभाष जोशी को महान बताने वालों में एक भी महिला नहीं थी। Read more

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दिग्गजों की मौजूदगी में प्रभाष जोशी पर पुस्तक का लोकार्पण

January 29, 2010 by सुशांत झा  
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गुरुवार को दिल्ली ने हिंदी पत्रकारिता के युगपुरुष प्रभाष जोशी को एक बार फिर दिल से याद किया। मौका था प्रभाष जोशी पर लिखे गए किताब हद से अनहद गए के लोकार्पण का और जगह थी गांधी शांति प्रतिष्ठान का सभागार। इस किताब का लोकार्पण कुलदीप नैय्यर ने किया जबकि समारोह की अध्यक्षता की जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने। इस मौके पर नित्यानंद तिवारी, मंगलेश डबराल, अशोक वाजपेयी, अनुपम मिश्र, पुण्य प्रसून वाजपेयी, पुष्पराज और प्रभाष जोशी के बेटे सोपान जोशी ने प्रभाष जोशी के बारे में अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन किया रवीन्द्र त्रिपाठी ने। Read more

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आज जनसत्ता पढ़ कर प्रभाष जी की कमी कुछ कम खली

January 10, 2010 by समरेंद्र  
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मैं जनसत्ता रोज नहीं मंगाता। सिर्फ़ संडे के संडे जनसत्ता पढ़ता हूं। लेकिन प्रभाष जोशी के निधन के बाद जनसत्ता बेरंग, बेरस नज़र आ रहा था। दो पुस्तक समीक्षाएं पहले से ही छपती रही हैं और कागद कारे की जगह पर तीसरी पुस्तक समीक्षा को जबरन घुसेड़ना बहुत बेतुका लगता था। कई बार तो मन यही करता था कि संडे को भी जनसत्ता मंगाना बंद कर दूं। आखिरी कुछ हफ़्तों में तो संपादकीय पृष्ठ किसी साहित्यिक गोष्ठी का विज्ञापन लगने लगा। एक पेज पर तीन-तीन पुस्तक समीक्षाएं और उसके बाद अशोक वाजपेयी धारावाहिक की वो कड़ी जो कभी कभार नहीं बल्कि हर रविवार आती है। दूसरे पन्ने पर कुछ लेख पढ़ने लायक जरूर होते हैं लेकिन उनमें प्रभाष जोशी वाली बात नहीं। Read more

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महाराष्ट्र में कई अख़बारों ने मीडिया को किया शर्मसार

प्रभाष जोशी की लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं पी साईनाथ

आप सोचते होंगे कि अख़बारों में सिर्फ़ एक पेज 3 होता है? लेकिन महाराष्ट्र के अख़बार ऐसा नहीं मानते। हाल के चुनाव में उनके पास कई पेज 3 थे, जिन्हें वो लगातार कई दिनों तक छापते रहे। उन्होंने सप्लिमेंट के भीतर सप्लिमेंट छापे। इस तरह मुख्य अख़बार में भी आपको पेज 3 पढ़ने को मिले। फिर उन्होंने मेन सप्लिमेंट में अलग से पेज थ्री छापा। उसके बाद एक और सप्लिमेंट जिसके ऊपर रोमन में पेज थ्री लिखा था।

यह मतदान से ठीक पहले के दिनों में बहुत ज़्यादा हुआ क्योंकि व्यग्र उम्मीदवार “ख़बरों” को खरीदने के लिए हर क़ीमत चुकाने को तैयार थे। एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि “टेलीविजनों पर बुलेटिन्स की संख्या बढ़ गई और प्रिंट में पन्नों की संख्या।” मांगें पूरी करनी थीं। कई बार तो आखिरी पलों में अतिरिक्त पैकेज आए और उन्हें भी जगह देनी थी। उन्हें वापस लौटाने का कोई कारण नहीं था? Read more

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सैकड़ों लोगों ने दी प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि

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मशहूर पत्रकार प्रभाष जोशी को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। उनका निधन पांच नवंबर को गाज़ियाबाद में हुआ था। इस श्रद्धांजलि सभा में सैकड़ों लोग शामिल हुए। पत्रकार, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, सियासतदान और छात्र – हर क्षेत्र के लोगों ने प्रभाष जोशी को नम आंखों से याद किया।

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने किया। इस मौके पर जिन वक्ताओं ने अपने विचार रखे उनमें पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र, जनसत्ता के संपादक ओम थाणवी, वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय, हिंदी आलोचक नामवर सिंह, समाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय, सीपीआई महासचिव एबी बर्धन, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, मोतीलाल वोरा और एनसीपी नेता डीपी त्रिपाठी प्रमुख हैं। प्रभाष जोशी के भाई सुभाष जोशी और दोनों बेटों ने भी अपनी बात रखी। Read more

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श्रद्धांजलि सभा की तस्वीरें (1)

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दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में प्रभाष जोशी की याद में हुई श्रद्धांजलि सभा की तस्वीरें।

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श्रद्धांजलि सभा की तस्वीरें (2)

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दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में प्रभाष जोशी की याद में हुई श्रद्धांजलि सभा की कुछ और तस्वीरें।

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इतनी जल्दी क्यों कर दी, प्रभाष जी?

कागद तो आगे भी कारे होंगे लेकिन वैसे नहीं जैसे प्रभाष जी किया करते थे। लिखना चलता रहेगा। लिखने वाले दूसरे आ जाएंगे लेकिन कभी खुशियों की अंतहीन ऊंचाई पर ले जाने वाली तो कभी आंसुओं में डुबोने वाली लेखनी तो बंद हो गयी ना! अब पत्रकारिता में शायद ही वैसे नए अनगढ़ शब्द आएं और देसी अंदाज में भाषा प्रवाह दिखे। शब्द शायद ही भावनाओं के सारथी बन पाएं क्योंकि उन शब्दों को सही मूल्य देने वाला नहीं रहा। यह कमी ना जाने कितने अरसे तक एक टीस पैदा करेगी। कब तक एक विचलन मन में समाया रहेगा कि अब इतवार को नींद खुलते ही जनसत्ता का छठा पेज देखने की आकुलता बेमानी हो गयी है। जिस कारेपन से कागद खुद को धन्य मान लेता होगा, कागद का वह टुकड़ा भी बहुत दिनों तक अपने कलमघसीट की याद में रोता रहेगा और उसके आंसू हर इतवार को पाठकों के आंखों में जब्त होते रहेंगे। Read more

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“हमें दुख है कि इंदौर ने आपको मान नहीं दिया”

इंदौर की माटी में रचे-बसे व बड़े होने के बाद भी बहुत दुख के साथ यह इसलिए लिखना पड़ रहा है कि जब पत्रकारिता के पुरोधा प्रभाष जोशी का शव राज्य सरकार के विशेष विमान से शुक्रवार शाम इंदौर विमानतल पर लाया गया तब वहां गिने हुए चार पत्रकार, एक फोटोग्राफर व एक लोकल चैनल के कैमरामैन के अलावा पत्रकार बिरादरी से कोई मौजूद नहीं था। जो दूसरे शख्स वहां मौजूद थे उनमें सांसद सज्जनसिंह वर्मा व उद्योगपति किशोर वाधवानी के अलावा कांग्रेस के आधा दर्जन नेता, चार-छह रिश्तेदार, चचेरे भाई महेंद्र जोशी व सुख-दुख के साथी सुरेंद्र संघवी शामिल हैं। जिन प्रभाष जोशी को दिल्ली से अंतिम विदाई देने के लिए उनके वसुंधरा स्थित निवास से गांधी प्रतिष्ठान व दिल्ली विमानतल तक पत्रकार बिरादरी के सैकड़ों साथ रहे हों वहीं उनके प्रिय इंदौर में ऐसा क्यों हुआ, यह समझ से परे है। Read more

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पत्रकारिता के एक कबीर का जाना

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कोई चालीस साल पहले, गांधी शताब्दी वर्ष के दौरान, तब बत्तीस-तैंतीस वर्ष के प्रभाष जोशी इंदौर के निकट स्थित कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट के कार्यकारी मंत्री स्व. श्यामलालजी की एक सिफारिशी चिट्ठी गांधी स्मारक निधि, राजघाट के सचिव देवेंद्र कुमार गुप्ता के नाम लेकर महानगर दिल्ली पहुंचे थे। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपने दिल्ली आने पर कभी अफसोस भी जाहिर नहीं किया। बस अपनी मेहनत और असीमित ऊर्जा के दम पर मालवा की संस्कृति, उसकी जुबान और उसके मुहावरे को किसी की भी कद्र नहीं करने वाली दिल्ली की छाती पर स्थापित कर दिया। वर्ष 1991 में राजेंद्र माथुर के असामयिक निधन के कोई अट्ठारह सालों के बाद प्रभाष जोशी का यूं चुपचाप चले जाना हिंदी पत्रकारिता के लिए दूसरा बड़ा अभाव है। Read more

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