कंपनियों को खजाना और जनता को मौत बांटती सरकार
November 2, 2009 by अरुंधती रॉय
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ख़तरनाक खेल शुरू हो चुका है। एक तरफ़ सरकार है… आधुनिक हथियारों से लैस सुरक्षाबल हैं और दूसरी तरफ माओवादी और करोड़ों की संख्या में वो आदिवासी जिन्हें कभी भी माओवादी साबित किया जा सकता है। यह खेल कितना घिनौना है। क्रूर है। और विभत्स। इसका अंदाजा शहरों में रहने वाले और अघोषित युद्ध क्षेत्र से दूर रहने वाले लोग नहीं लगा सकते हैं। लेकिन वो लोग जो छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा या फिर अघोषित युद्ध क्षेत्रों से लौटे हैं उन्हें “ऑपरेशन ग्रीन हंट” का सच पता है। मशहूर लेखिका अरुंधती रॉय उन्हीं में से एक हैं। आउटलुक के ताज़ा अंक में उनका लेख छपा है। हम उस लेख का हिंदी अनुवाद आपसे साझा कर रहे हैं। यह लेख थोड़ा लंबा है, लेकिन युद्ध के दंश को समझने के लिए थोड़ा धैर्य तो रखना ही होगा। हमें उम्मीद है कि आप इसे पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर देंगे। उससे बहस, आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। - मॉडरेटर ।
दक्षिणी उड़ीसा की हल्की ऊंची और सपाट चोटी वाली पहाड़ियां डोंगरिया कोंध आदिवासियों के घर हैं। तब से जब उड़ीसा नाम के किसी राज्य और भारत नाम के किसी देश का अस्तित्व भी नहीं था। उन पहाड़ियों ने कोंधों का खयाल रखा। कोंधों ने उन पहाड़ियों को सहेजे रखा। उनकी पूजा की। एक जीवित भगवान की तरह। लेकिन अब बॉक्साइट के कारण उन पहाड़ियों को बेच दिया गया है। कोंध आदिवासियों को लगता है कि उनका भगवान बेच दिया गया है। वो पूछ रहे हैं कि अगर उनके देवता की जगह राम, अल्ला या ईसा मसीह होते तो क्या उन्हें बेचा जाता?
शायद, कोंधों से अहसानमंद रहने की उम्मीद की जाती है। इसलिए कि नियामगीरी पहाड़ी जो कि उनके देवता नियाम राजा (यूनिवर्सल लॉ के भगवान) का घर है, एक ऐसी कंपनी को बेची गई है जिसका नाम है वेदांता। वेदांता मतलब हिंदू दर्शनशास्त्र की वो शाखा जो ज्ञान की सर्वोच्च प्रवृति सिखाती है। वेदांता दुनिया की सर्वाधिक बड़ी खनन कंपनियों में से एक है और इसके मालिक हैं अनिल अग्रवाल। भारतीय मूल के अरबपति जो लंदन के एक महल में रहते हैं। वह महल एक जमाने में ईरान के शाह का हुआ करता था। वेदांता उन ढेरों बहुराष्ट्रीय कंपनियों में से महज एक नाम है, जिन्होंने उड़ीसा की तरफ़ रुख किया है। Read more
इंदिरा गांधी के लहू का हर कतरा कुछ कहता है
November 1, 2009 by प्रभात शुंगलू
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कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं को रंगों से खासा लगाव है। जब किसी मेनस्ट्रीम से भटके गुट या आंदोलन को कुचलना होता है तो उसके खिलाफ सैन्य या अन्य कार्रवाई छेड़ देते हैं और उस ऑपरेशन को अमूमन किसी रंग से जोड़ कर नाम दे देते हैं। 1984 में इंदिरा गांधी ने सिख आतंकवाद के खिलाफ पंजाब में सैन्य कार्रवाई की तो उसे ऑपरेशन ब्लू स्टार नाम दिया। उसके बाद राजीव गांधी ने ऑपरेशन ब्लैक थंडर छेड़ा। और अब गृहमंत्री पी चिदंबरम ने नक्सली आंदोलन को कुचलने के लिये राज्य सरकारों के साथ मिलकर ‘रेड कॉरीडेर’ में ऑपरेशन ग्रीन हंट छेड़ दिया है। इंदिरा गांधी की 25वीं पुण्यतिथि के साल में कांग्रेसी नेता अपनी स्वर्गीय नेता को इससे सुंदर पुष्पांजलि और कैसे दे सकते थे?
इंदिरा गांधी यदि ज़िंदा होतीं और प्रधानमंत्री बनी रहतीं तो पता नहीं वो कैसे टैकेल करती नकसली समस्या को? क्या वो इस समस्या का वैसे ही संकीर्ण राजनीति का चश्मा पहन कर हल निकालने की कोशिश करती जैसा उन्होंने पंजाब के आतंकवाद से जूझने में किया। या फिर इमरजेंसी लगा कर विपक्षी नेताओं की धर पकड़ कर और उन्हें जेल में ठूंस कर किया ताकि उनकी सरकार पर आवाम के जायज गुस्से को कुचला जा सके। क्या इंदिरा गांधी नक्सली समस्या को उस समझदारी और कुशलता से हल करने की कोशिश करतीं, जैसा उन्होंने मुक्ति बाहिनी को समर्थन देकर और बांग्लादेश बनवा कर किया था? आज इंदिरा गांधी तो नहीं रहीं। मगर उनकी भरी-पूरी विरासत जरूर है। आज सोनिया गांधी हैं, राहुल गांधी हैं और गांधी परिवार के आशीर्वाद पर चलती मनमोहन सरकार और उसके गृहमंत्री चिदंबरम हैं। इसलिये रंगों कि विरासत को ध्यान में रखते हुये चिदंबरम साहब ने ऑपरेशन ग्रीन हंट छेड़ा हुया है। Read more
विकास तो बहाना है, ज़मीन हथियाना है
October 22, 2009 by अनिल चमड़िया
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देश में नक्सली गतिविधियों के विस्तार को तीन तरह के आंकड़ों के साथ पेश किया जा सकता है। अगर नक्सली गतिविधियों के बारे में आंकड़े इस तरह पेश किए जाएं कि कितने राज्यों में नक्सलवाद का प्रभाव है तो वह देश के पचहत्तर प्रतिशत हिस्से में दिखाई देगा। अगर नक्सली गतिविधियों को जिलों की संख्या के आधार पर देखें तो वह आंकड़ा पहले के मुकाबले आधा दिखाई देने लगेगा। लेकिन अगर गांवों की संख्या के आधार पर देखें तो देश के कुल महज दो या तीन प्रतिशत हिस्से में नक्सलवाद का प्रभाव दिखाई देता है। क्या सचमुच देश के दो-तीन प्रतिशत हिस्से में अपना प्रभाव रखने वाली कोई राजनीतिक विचारधारा आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हो सकती है? इस सवाल को दूसरे तरीके से भी उठाया जा सकता है कि देश के लगभग सभी हिस्सों में सरकार और राजनीतिक पार्टियों पर लोगों का विश्वास लगातार कम होता जा रहा है। आंतरिक सुरक्षा के लिए राजनीतिक चिंता का सबसे प्रमुख पहलू यह होना चाहिए या फिर कोई अन्य? क्या ऐसा संभव है कि सरकार और राजनीतिक पार्टियों के प्रति लोगों का भरोसा मजबूत हो और फिर भी उनकी विरोधी कोई राजनीतिक विचारधारा अपने पांव जमा ले? Read more
“.. तबतक नक्सलवाद से लड़ने का नैतिक आधार नहीं”
October 21, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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राजेंद्र धोड़पकर को हम सभी जानते हैं। वो हिंदुस्तान के एसोसिएट एडिटर हैं। लाजवाब कार्टूनिस्ट हैं। एक उम्दा पत्रकार हैं और जानने वाले बताते हैं कि एक बेतरीन व्यक्ति हैं। उन्होंने आज हिंदुस्तान में एक लेख लिखा है – नक्सली हिंसा में “पुलिसवाले ही क्यों बनते हैं शिकार”। इस लेख में उन्होंने एक मानवीय नज़रिया पेश किया है। आप उनके नज़रिये से सहमत हो सकते हैं और असहमत भी। लेकिन हम चाहते हैं कि आप इसे पढ़ें। इसलिए भी क्योंकि हाल के दिनों में मीडिया ने सरकार के सुर में सुर मिलाकर नक्सलियों को आतंकी बताते हुए उनके सामूहिक नरसंहार का जो नारा बुलंद किया है, उसे किसी भी तरह का नैतिक समर्थन नहीं दिया जा सकता है। किसी भी “गुमराह” राज्य को अपने ही “गुमराह” नागरिकों के नरसंहार की सुपारी नहीं दी जा सकती है। राजेंद्र धोड़पकर का यह लेख इस मुद्दे पर सकारात्मक बहस की मांग करता है। – मॉडरेटर




