कंपनियों को खजाना और जनता को मौत बांटती सरकार

ख़तरनाक खेल शुरू हो चुका है। एक तरफ़ सरकार है… आधुनिक हथियारों से लैस सुरक्षाबल हैं और दूसरी तरफ माओवादी और करोड़ों की संख्या में वो आदिवासी जिन्हें कभी भी माओवादी साबित किया जा सकता है। यह खेल कितना घिनौना है। क्रूर है। और विभत्स। इसका अंदाजा शहरों में रहने वाले और अघोषित युद्ध क्षेत्र से दूर रहने वाले लोग नहीं लगा सकते हैं। लेकिन वो लोग जो छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा या फिर अघोषित युद्ध क्षेत्रों से लौटे हैं उन्हें “ऑपरेशन ग्रीन हंट” का सच पता है। मशहूर लेखिका अरुंधती रॉय उन्हीं में से एक हैं। आउटलुक के ताज़ा अंक में उनका लेख छपा है। हम उस लेख का हिंदी अनुवाद आपसे साझा कर रहे हैं। यह लेख थोड़ा लंबा है, लेकिन युद्ध के दंश को समझने के लिए थोड़ा धैर्य तो रखना ही होगा। हमें उम्मीद है कि आप इसे पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर देंगे। उससे बहस, आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। - मॉडरेटर

दक्षिणी उड़ीसा की हल्की ऊंची और सपाट चोटी वाली पहाड़ियां डोंगरिया कोंध आदिवासियों के घर हैं। तब से जब उड़ीसा नाम के किसी राज्य और भारत नाम के किसी देश का अस्तित्व भी नहीं था। उन पहाड़ियों ने कोंधों का खयाल रखा। कोंधों ने उन पहाड़ियों को सहेजे रखा। उनकी पूजा की। एक जीवित भगवान की तरह। लेकिन अब बॉक्साइट के कारण उन पहाड़ियों को बेच दिया गया है। कोंध आदिवासियों को लगता है कि उनका भगवान बेच दिया गया है। वो पूछ रहे हैं कि अगर उनके देवता की जगह राम, अल्ला या ईसा मसीह होते तो क्या उन्हें बेचा जाता?

शायद, कोंधों से अहसानमंद रहने की उम्मीद की जाती है। इसलिए कि नियामगीरी पहाड़ी जो कि उनके देवता नियाम राजा (यूनिवर्सल लॉ के भगवान) का घर है, एक ऐसी कंपनी को बेची गई है जिसका नाम है वेदांता। वेदांता मतलब हिंदू दर्शनशास्त्र की वो शाखा जो ज्ञान की सर्वोच्च प्रवृति सिखाती है। वेदांता दुनिया की सर्वाधिक बड़ी खनन कंपनियों में से एक है और इसके मालिक हैं अनिल अग्रवाल। भारतीय मूल के अरबपति जो लंदन के एक महल में रहते हैं। वह महल एक जमाने में ईरान के शाह का हुआ करता था। वेदांता उन ढेरों बहुराष्ट्रीय कंपनियों में से महज एक नाम है, जिन्होंने उड़ीसा की तरफ़ रुख किया है। Read more

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विकास तो बहाना है, ज़मीन हथियाना है

देश में नक्सली गतिविधियों के विस्तार को तीन तरह के आंकड़ों के साथ पेश किया जा सकता है। अगर नक्सली गतिविधियों के बारे में आंकड़े इस तरह पेश किए जाएं कि कितने राज्यों में नक्सलवाद का प्रभाव है तो वह देश के पचहत्तर प्रतिशत हिस्से में दिखाई देगा। अगर नक्सली गतिविधियों को जिलों की संख्या के आधार पर देखें तो वह आंकड़ा पहले के मुकाबले आधा दिखाई देने लगेगा। लेकिन अगर गांवों की संख्या के आधार पर देखें तो देश के कुल महज दो या तीन प्रतिशत हिस्से में नक्सलवाद का प्रभाव दिखाई देता है। क्या सचमुच देश के दो-तीन प्रतिशत हिस्से में अपना प्रभाव रखने वाली कोई राजनीतिक विचारधारा आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हो सकती है? इस सवाल को दूसरे तरीके से भी उठाया जा सकता है कि देश के लगभग सभी हिस्सों में सरकार और राजनीतिक पार्टियों पर लोगों का विश्वास लगातार कम होता जा रहा है। आंतरिक सुरक्षा के लिए राजनीतिक चिंता का सबसे प्रमुख पहलू यह होना चाहिए या फिर कोई अन्य? क्या ऐसा संभव है कि सरकार और राजनीतिक पार्टियों के प्रति लोगों का भरोसा मजबूत हो और फिर भी उनकी विरोधी कोई राजनीतिक विचारधारा अपने पांव जमा ले? Read more

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“.. तबतक नक्सलवाद से लड़ने का नैतिक आधार नहीं”

राजेंद्र धोड़पकर को हम सभी जानते हैं। वो हिंदुस्तान के एसोसिएट एडिटर हैं। लाजवाब कार्टूनिस्ट हैं। एक उम्दा पत्रकार हैं और जानने वाले बताते हैं कि एक बेतरीन व्यक्ति हैं। उन्होंने आज हिंदुस्तान में एक लेख लिखा है – नक्सली हिंसा में “पुलिसवाले ही क्यों बनते हैं शिकार”। इस लेख में उन्होंने एक मानवीय नज़रिया पेश किया है। आप उनके नज़रिये से सहमत हो सकते हैं और असहमत भी। लेकिन हम चाहते हैं कि आप इसे पढ़ें। इसलिए भी क्योंकि हाल के दिनों में मीडिया ने सरकार के सुर में सुर मिलाकर नक्सलियों को आतंकी बताते हुए उनके सामूहिक नरसंहार का जो नारा बुलंद किया है, उसे किसी भी तरह का नैतिक समर्थन नहीं दिया जा सकता है। किसी भी “गुमराह” राज्य को अपने ही “गुमराह” नागरिकों के नरसंहार की सुपारी नहीं दी जा सकती है। राजेंद्र धोड़पकर का यह लेख इस मुद्दे पर सकारात्मक बहस की मांग करता है। – मॉडरेटर

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बड़ी ग़लतियों पर भी माफ़ी नहीं मांगते हिंदी अख़बार

इन दिनों हिंदी अख़बारों में सामूहिक ब्लंडर की बड़ी चर्चा है। मोहल्ला लाइव पर आबकारी बिल के तथ्यों को किस तरह तोड़ मरोड़ कर हिंदी अख़बारों ने पेश किया है। उन्होंने बताया है कि सार्वजनिक जगह पर दारू पीते पकड़े जाने पर 50 हज़ार रुपये का जुर्माना भरना पड़ेगा। जबकि ऐसा है नहीं। यह ग़लती हिंदी के ज़्यादातर बड़े अख़बारों ने की है, जैसे उनके संवाददाताओं ने एक ही जगह बैठ कर रिपोर्ट लिखी हो और बाद में शाब्दिक हेर-फेर के बाद सभी जगह छाप दी गई हो।

यह कोई पहला मौका नहीं है जब हिंदी के बड़े अख़बारों ने सामूहिक ग़लती की हो। इस महीने जनतंत्र पर हमने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। हिंदुस्तान के पहले पन्ने से गोल नरसंहार, पुलिस से 10 हाथ आगे अख़बारयह रिपोर्ट खगड़िया में अमौसी नरसंहार के अगले दिन हिंदी अख़बारों की कवरेज पर आधारित थी। उसमें बताया गया था कि किस तरह पुलिस की तीन दलीलों में सिर्फ़ एक दलील को अख़बारों ने पकड़ कर रिपोर्टिंग की। दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान समेत ज़्यादातर अख़बारों ने पांच किशोरों समेत 16 लोगों की हत्या के लिए सीधे और सीधे तौर पर नक्सलियों को ज़िम्मेदार ठहरा दिया। दैनिक जागरण ने तो यहां तक लिखा कि “अमौसी की धरती को नक्सलियों ने 16 निर्दोष लोगों के लहू से लाल कर दिया है।” Read more

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पहले पन्ने से गोल नरसंहार, पुलिस से 10 हाथ आगे अख़बार

बिहार में फिर जातीय नरसंहार हुआ है। खगड़िया में अमोसी गांव के करीब 16 लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी है। मारे गए लोगों में पांच किशोर हैं। इस हत्याकांड से सभी सकते में हैं। कई साल बाद बिहार में जातीय नरसंहार की वारदात हुई है। तो हड़कंप मचेगा ही। इस घटना को लेकर मीडिया में भी तीखी प्रतिक्रिया है। अमूमन सभी अख़बारों ने इस ख़बर को प्राथमिकता से छापा है। सिवाय हिंदी के हिंदुस्तान के।

हिंदुस्तान के दिल्ली संस्करण में यह ख़बर पहले पन्ने पर नहीं है। यह जानते हुए भी कि दिल्ली की आबादी में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों की अच्छी खासी आबादी है। हिंदुस्तान के इस रवैये से थोड़ी हैरानी होती है, लेकिन उससे भी ज़्यादा हैरानी इसलिए कि बिहार की एक ख़बर को पहले पन्ने पर जगह मिली है। वो ख़बर है कि “मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सुरक्षा दोगुनी की गई” उस ख़बर के मुताबिक – Read more

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यह नुकसान तो पत्रकारों को ही उठाना होगा

September 29, 2009 by कबीर  
Filed under ब्लॉग, हक़ की आवाज़

बचपन में बाबा भारती और डाकू खड़ग सिंह की कहानी बहुतों ने पढ़ी होगी। बाबा भारती के पास एक शानदार घोड़ा था। जिसे देख कर डाकू खड़ग सिंह की नीयत डोल गई थी। वो एक दिन दीन-हीन बन कर बाबा भारती को मिला। जिसके बाद बाबा भारती खुद घोड़े ने उतर गए और उस पर उन्होंने डाकू खड़ग सिंह को बिठा दिया। मौका मिलते ही खड़ग सिंह ने हांक लगाई और घोड़े को ले भागा। तब बाबा ने उससे कहा कि घोड़ा ले जाना है ले जाओ लेकिन एक बात सुनते जाओ। बाबा भारती ने कहा कि खड़ग सिंह किसी को यह मत बताना कि तुमने घोड़ा कैसे चुराया है। लोग सुनेंगे तो किसी गरीब और जरूरतमंद को मदद देना बंद कर देंगे। उसके बाद डाकू खड़ग सिंह वहां से चला गया। लेकिन बाबा भारती की यह बात उसके जेहन में कौंधती रही। कुछ समय बाद उसका जमीर जाग गया और उसने घोड़ा बाबा भारती को लौटा दिया।

इस कहानी का सबक यही है कि कभी किसी के भरोसे का क़त्ल नहीं करना चाहिए। लेकिन सरकार ने लालगढ़ में पत्रकारों के भरोसे का ख़ून कर दिया है। वहां स्थानीय पत्रकारों के साथ जो छल किया गया है उसने एक ख़तरनाक खेल की ज़मीन तैयार कर दी है। नक्सली संगठनों को पत्रकारों का दुश्मन बना दिया है। नक्सली ही क्यों जितने भी आंदोलनकारी या फिर अलगाववादी ताक़तें हैं पत्रकार उनके निशाने पर होंगे। जब भी कोई पत्रकार उनसे ख़बर के लिए संपर्क करेगा वो उसे शक़ की नज़र से देखेंगे। इससे हो सकता है कि पत्रकारों पर हमले और बढ़ें। अगर ऐसा कुछ भी हुआ तो उसके लिए सीधे तौर पर सरकार जिम्मेदार होगी और वह पुलिस भी – जिसने पत्रकार बन कर लालगढ़ से छ्त्रधर महतो को गिरफ़्तार किया है। Read more

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अपने-अपने गांधी, अपने-अपने राम

गांधी टाइटल लगाकर कितने लोग घूमते हैं लेकिन गांधी सुनकर तो जेहन में एक ही नाम घूमता है- मोहनदास करमचंद गांधी। इन्हें हिंदुस्तान अपना राष्ट्रपिता और दुनिया महात्मा मानती है। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, सोनिया गांधी, मेनका गांधी, राहुल गांधी, वरुण गांधी वगैरह तक गांधियों की लंबी कतार है लेकिन गांधी अगर संज्ञा के बजाय किसी नाम से जुड़कर विशेषण बन गया तो वह नाम है मोहनदास। वह गांधी पर्याय बन गया सत्य और अहिंसा के पुजारी का। 23 सितंबर की सुबह हर अखबार में एक गांधी और छाया था। ना तो वह मोहनदास गांधी के खानदान का है, ना ही नेहरु गांधी परिवार का कोई वारिस। उसका नाम है खोबाद गांधी। एक बार तो कोई गांधी शब्द सुनकर यही सोचेगा कि खोबाद गांधी भी कोई गांधीवादी, अहिंसावादी, सविनय अवज्ञावादी होंगे। लेकिन इस गांधी का परिचय अलग निकला।

खोबाद गांधी सीपीआई (माओवादी) के पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं। सीपीआई (माओवादी) वह संगठन है जो चीनी अधिनायकवादी माओत्सो तुंग के इस बयान से चलायमान होता है कि सत्ता तो बंदूक की नली से निकलती है। खोबाद गांधी भी ऐसा ही मानते हैं। दून स्कूल में पढ़े और लंदन से चार्टर्ड एकाउंटेसी में डिग्री हासिल करने वाले खोबाद ने सर्वहारा की तानाशाही के लिए अपनी परंपरागत दुनिया छोड़ दी। वह अपनी पत्नी अनुराधा के साथ हिसाब-किताब की गली छोड़ बंदूक की नली से समाज बदलने निकल पड़े। 22 सितंबर को दिल्ली में वह गिरफ्तार हो गये। Read more

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मीडिया के सहारे हिंसक भीड़ तैयार कर रही है सरकार?

रविवार को देश के सभी बड़े अंग्रेजी अख़बारों में एक विज्ञापन छपा। यह विज्ञापन केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ़ से जारी हुआ था। उसमें नक्सली हिंसा में मारे गए सात लोगों की तस्वीरें छापी गई हैं। पहली तस्वीर है छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले की जत्ति पुरुषोत्तम की। तस्वीर के नीचे नाम और पता के साथ क़त्ल की तारीख़ छपी है। तीसरी तस्वीर चार साल के एक मासूम की है। दो तस्वीरें नवयुवक और युवती हैं। बाकी तीन तस्वीरें 35 से 45 साल की उम्र के लोगों की हैं। इन तस्वीरों के साथ संदेश लिखा है कि नक्सली हिंसा में बेकसूर मारे जा रहे हैं और नक्सली उन क्रूर क़ातिलों के समान हैं जो सोची समझी साज़िश के तहत क़त्ल करते हैं।

नक्सली हिंसा को किसी भी लिहाज से जायज नहीं ठहराया जा सकता। उसका विरोध होना चाहिए। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ़ से जारी इस विज्ञापन से कई सवाल उठते हैं। पहला सवाल कि अपने देश की जनता को नक्सली बनाने के लिए जिम्मेदार कौन है? दूसरा सवाल, छत्तीसगढ़ में सलवा जुडुम और सुरक्षाबलों के जुल्मों को किस श्रेणी में रखा जाए? क्या उसे भी सरकार सोची समझी साज़िश के तहत किए गए क़त्ल मानेगी या नहीं? तीसरा सवाल, क्या इस तरह अख़बारों में विज्ञापन से नक्सली हिंसा पर रोकथाम लग सकती है? चौथा और आखिरी सवाल, कहीं ऐसा तो नहीं कि मारे गए लोगों के क्षत-विक्षत शवों को छाप कर सरकार, छत्तीसगढ़ और नक्सल प्रभावित दूसरे इलाकों में नरसंहार के लिए जनमत तैयार करना चाहती है? सरकार की तरफ़ से प्रायोजित हिंसा में मीडिया को भागीदार बनाना चाहती है? Read more

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“मीडिया से हुए नुकसान की भरपाई नामुमकिन”

दो दिन पहले ख़बरें छपी कि पश्चिम बंगाल का लालगढ़ एक बार फिर लहू से लाल हो गया है। नक्सलवादियों और सीपीएम कैडर के बीच हुए संघर्ष में दस लोगों के मारे जाने की ख़बर है। इस ख़बर से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। अब ख़बर आ रही है कि झड़प तो हुई थी लेकिन कोई भी मारा नहीं गया है। छह लोग जख़्मी हुए हैं। इलाके के पुलिस सुपरिंटेंडेंट मनोज कुमार वर्मा ने द हिंदू से  कहा है कि मीडिया ने जो नुकसान पहुंचाया है उसकी भरपाई नहीं की जा सकती।

मनोज कुमार वर्मा के मुताबिक सोमवार की शाम 6.30 बजे के करीब झड़प शुरू हुई। उस झड़प में छह लोग घायल हुए। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया जा चुका है। ख़बर मिलने के बाद पुलिस मौके पर 9 बजे के करीब पहुंची। उसके बाद से हमलावरों की तलाश की जा रही है। Read more

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