राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र शशि भूषण की डेंगू से मौत
November 5, 2009 by अविनाश दास
Filed under हक़ की आवाज़
शशि। हम सब उन्हें इसी नाम से पुकारते थे। उस दिन एनएसडी कैंपस में उन्हें क्रिकेट खेलते देखा था। लड़के-लड़कियां चिल्ला रहे थे, अंकल। जबकि इसी बार उनका सलेक्शन हुआ था। फर्स्ट ईयर के किसी छात्र के लिए ये संबोधन भले ही एक मज़ाक़ हो, लेकिन इसके पीछे की हकीकत ये है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिले से पहले शशिभूषण रंगमंच की दुनिया के लिए पुराने हो चले थे। पंद्रह सालों के अपने रंग इतिहास में ढोलक की बेशुमार थापों और मंच पर अपनी खिलखिलाती अदाओं से उन्होंने रंग दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ रखी थी। आज उनके बारे में इतनी औपचारिकता से लिखने का प्रसंग सिर्फ इतना है कि एक निहायत ही मामूली बीमारी और एक निहायत ही गंभीर लापरवाही ने शशिभूषण को हमसे छीन लिया है।
शशिभूषण की पूरी ट्रेनिंग अभियानों और आंदोलनों से जुड़ी रंग-प्रक्रियाओं के बीच हुई थी। जनसंस्कृति मंच की पटना ईकाई हिरावल के साथ उनका रंग सफर शुरू हुआ अनिल अंशुमन, जो सीपीआईएमएल के सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं, ने ही उन्हें नाटकों की पगडंडी दिखायी थी। लिहाजा वे आंदोलनी गीतों के साथ बहुत सहज थे। ऊंचे आलाप के साथ सुनाते थे, सृष्टिबीज का नाश न हो हर मौसम की तैयारी है, कल का गीत लिये होंठों पर आज लड़ाई जारी है। या फिरसमाजवाद बबुआ धीरे धीरे आयी और समय का पहिया चले रे साथी, समय का पहिया चले। थिएटर में धन-धान्य से भरे करियर के पीछे भागते हुए रंगकर्मियों पर उन्हें हमने कबीरी ठाठ से हंसते हुए देखा था, जबकि वे रंगीन कपड़े पहनने के शौकीन थे। झक लाल या बेहद काली कमीज़ पर गूगल्स लगा कर वे अपने अंदर की सादगी से बदला लेने की कोशिश करते थे। Read more




