श्श्श्श् आलोक जी जनता देख रही है
January 5, 2010 by जनतंत्र डेस्क
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मीडिया संस्थानों की आय का मुख्य स्रोत विज्ञापन हैं। विज्ञापनों का स्तर कैसा हो यह फैसला अख़बार या मीडिया संस्थान का होता है। बड़े अख़बारों में विज्ञापन लेते वक़्त एक खास ख्याल रखा जाता है कि उस विज्ञापन से मीडिया संस्थान के अपने ब्रांड पर कोई बुरा असर नहीं पड़े। इस लिहाज से देखा जाए तो विज्ञापनों के स्तर से आप अख़बार की नीति, स्थिति और स्तर का अंदाजा लगा सकते हैं।
हम आपके सामने दो विज्ञापन रख रहे हैं जो एक राष्ट्रीय डेली में पहली जनवरी को यानी नए साल के पहले दिन छापे गए। इन विज्ञापनों को देख कर आप बताएं कि क्या इन्हें किसी भी अख़बार में छापा जाना चाहिए या नहीं? Read more
क्या मीडिया का एक धड़ा एन डी तिवारी का चेला है?
December 31, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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आंध्र प्रदेश में पोल सिर्फ नारायण दत्त तिवारी की ही नहीं खुली बल्कि मीडिया ने भी अपना बहुत कुछ गंवा दिया है। इस मामले में कुछ मीडिया संस्थानों ने जिस तरह की रिपोर्टिंग की है उससे एक बार फिर साफ हुआ है कि अगर किसी के पास ताक़त है और जातिगत औरा है तो बड़े से बड़े अपराध और घिनौने मामले में भी उसके पक्ष में माहौल तैयार किया जा सकता है। यही नहीं ऐसा माहौल भी बनाया जा सकता है कि जिससे उस ताक़तवर शख़्स के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले शख़्स या संस्था को उस दुस्साहस की क़ीमत चुकानी पड़े। Read more
नई दुनिया की “ईमानदार” मुहिम
December 10, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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नई दुनिया में अनिल अंबानी की कंपनियों के ख़िलाफ़ चल रही “ईमानदार” मुहिम की कुछ झलकियां। यहां विनोद अग्निहोत्री की दो रिपोर्ट पेश की जा रही हैं। पहली रिपोर्ट 11 अक्टूबर को छापी गई थी। यहां मौजूद दूसरी रिपोर्ट 17 अक्टूबर को छापी गई थी। Read more
अंबानी बंधुओं की लड़ाई में नई दुनिया के हिस्से मलाई!
December 10, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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नई दुनिया ने एक बार फिर अनिल अंबानी की कंपनियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। 11 अक्टूबर से 17 अक्टूबर तक एडीएजी (अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप) की धांधली से पर्दा उठाने के बाद नई दुनिया ने अब फिर से अपनी स्टोरी को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। छह दिसंबर से अमूमन हर रोज़ अख़बार में एडीएजी पर कार्रवाई के लिए बढ़ते दबाव की स्टोरी छापी गई है। स्टोरी में कुछ भी ऐसा नहीं है जिस पर आपत्ति जताई जा सके। यह एक सहारनीय कदम है बशर्ते मंशा सही हो। जैसा की नई दुनिया के संपादक ने एक बार कहा था कि अगर कोई “ईमानदार” पत्रकार और अख़बार कॉरपोरेट घरानों की धांधली पर कोई मुहिम चलाता है तो भी लोगों को दिक्कत होने लगती है। हम उन लोगों में शामिल नहीं होना चाहते जिन्हें दिक्कत होती है। लेकिन यहां पर कुछ बातें हैं जो साफ़ कर देनी चाहिए। पहली बात नई दुनिया की मंशा से जुड़ी है। Read more
अंग्रेजी मुखौटों के विरुद्ध, आलोक मेहता का युद्ध
November 8, 2009 by आलोक मेहता
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आलोक मेहता। कुछ समय पहले तक आउटलुक हिंदी के संपादक। अब नई दुनिया के प्रधान संपादक। बतौर साहित्यकार पद्म सम्मान हासिल करने वाले पत्रकार। सत्ताधारी यूपीए के बेहद करीबी कलमबाज। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के भक्त। अरुंधती रॉय के घोर विरोधी। नक्सलियों के ख़िलाफ़ चल रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट के हिमायती। उन्होंने संडे नई दुनिया में आज संपादकीय लिखा है। “अंग्रेजी दा मुखौटों के आंसू”। निशाना अरुंधती रॉय पर है। और उन तमाम लोगों पर जिन्हें अरुंधती का लिखा पसंद है। लेकिन नाम लिए बगैर। जाहिर है अरुंधती रॉय और उनके प्रशंसकों से वो बेहद दुखी हैं। आलोक मेहता दुखी इसलिए भी हैं कि रिलायंस गैस विवाद में नई दुनिया के स्कूप का सच सामने आ गया है। हम चाहते हैं कि अपने “एजेंडे” में पूरी तरह से “ईमानदार” पत्रकार आलोक मेहता का ये छायावादी लेख जनतंत्र के पाठक भी पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। - मॉडरेटर
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अंग्रेजी दा मुखौटों के आंसू
अंग्रेजी भाषा पर उनका अच्छा अधिकार है। अच्छी शिक्षा-दीक्षा मिली है। बैंक में लाखों ही नहीं, कुछ करोड़ रुपये जमा हो जाते हैं। मेग्सायसाय, बुकर, नोबेल पुरस्कार की सिफारिश करने वाले प्रशंसकों से घिरी रहती हैं। कहानी, उपन्यास के अलावा अंग्रेजी की समाचार पत्रिकाओं में 25 से 30 पृष्ठों के बड़े-बड़े लेख छप जाते हैं। इतने बड़े लेख उस पत्रिका या देश के किसी अन्य संपादक के नहीं छप सकते। जिन पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-छपने पर उन्हें हजारों रुपये मिलते हैं, उन प्रकाशनों के प्रबंधक वही पूंजीपति हैं, जो जंगल काट कर उद्योग लगाते हैं, झुग्गियां तोड़ कर बहुमंज़िली इमारतें बनाते हैं। अंग्रेजी में लिखी जिन पुस्तकों की रॉयल्टी से उन्हें लाखों रुपये मिलते हैं, वे पुस्तकें वही वर्ग खरीदता है, जिसे झोंपड़ियों के प्रति दर्द का अहसास नहीं होता। हां, अंग्रेजी में भारत के आदिवासियों की दुर्दशा, खूनी हिंसा की मानसिकता वाले नक्सली अतिवादियों के बारे में पढ़-सुनकर भारत विरोधी षड्यंत्र करने वाले परदेसी बहुत अधिक प्रसन्न होते हैं। वह भारत में झोला लटका कर चलती हैं और हवाई यात्रा महंगे बिजनेस क्लास में करती हैं। पांच सितारा होटलों की पार्टियों में आनंद लेती हैं लेकिन प्रशंसकों के रूप में दूर खड़े फटेहाल लोगों को देखना चाहती हैं। आखिर जयकार वही कर सकते हैं। Read more
नई दुनिया की नीयत पर सवाल, मैनेजमेंट दे सफाई
October 31, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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नई दुनिया में अक्टूबर में एक सीरीज छापी गई। आमतौर पर मीडिया संस्थान किसी भी बड़ी कंपनी को चुनौती देने से बचते हैं। ऐसे वाकये एक-दो ही होंगे जब किसी मीडिया संस्थान ने देश की किसी ताक़तवर कंपनी के काले कारनामों का खुलासा करने के लिए सीधी मुहिम चलाई हो। नई दुनिया ने यह कारनामा किया है। अनिल अंबानी की कंपनी के ख़िलाफ़ उसके संवाददाता विनोद अग्निहोत्री की रिपोर्ट कई किस्त में छापी गई। इस कवरेज के लिए नई दुनिया के मैनेजमेंट को साधुवाद दिया जाना चाहिए। लेकिन अब जो ख़बरें छन-छन कर सामने आ रही है, वह इस पूरे मसले पर नई रोशनी डालती हैं।
जिन दिनों नई दुनिया में अनिल अंबानी की पोल खोली जा रही थी, उन्हीं दिनों न्यूज़ चैनल न्यूज़ एक्स पर केजी बेसिन गैर विवाद से जुड़ी ख़बरें एक खास अंदाज में प्रसारित की जा रही थीं। देश की एक सम्मानित मीडिया वेबसाइट ने बताया कि जहां दूसरे न्यूज़ चैनल विवाद से जुड़ी ख़बरों को संतुलित तरीके से दिखा रहे हैं न्यूज़ एक्स का झुकाव मुकेश अंबानी की तरफ़ था। Read more
नई दुनिया के भरोसे संवर रही है रद्दी वालों की किस्मत
October 23, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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दिल्ली और एनसीआर में नई दुनिया की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा है। अख़बार का सर्कुलेशन बढ़ाने की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हो रही हैं। कुछ दिन पहले अख़बार ने बेडशीट स्कीम लॉन्च की। इस उम्मीद में कि बेडशीट कंटेंट के बूते न सही बेडशीट के भरोसे ही सही पाठक अख़बार खरीदने लगें। लेकिन पाठकों ने वो स्कीम पूरी तरह ठुकरा दी। अख़बार के साथ बेडशीट भी पसंद नहीं आई।
उसके बाद इसी महीने नई दुनिया के मैनेजमेंट ने एक नई योजना शुरू की। हिंदुस्तान टाइम्स प्रिटिंग प्रेस के सूत्रों के मुताबिक 11 अक्टूबर से 17 अक्टूबर तक नई दुनिया की पचास हज़ार प्रतियां अधिक छपवाई गईं। हॉकरों से कहा गया कि वो इन प्रतियों को मुफ़्त में बांटे। लेकिन हॉकरों ने नई दुनिया के बंडलों को उठाने से मना कर दिया। आखिरकार वो बंडल रद्दी की दुकानों पर नज़र आए। उनकी कुछ तस्वीरें आप नीचे देख सकते हैं। ये तस्वीरें एक रद्दी की दुकान से खीचीं गई हैं। Read more
एक अख़बार जिसमें हर रोज छपती है राष्ट्रपति की तस्वीर!
October 8, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक तरह से नई दुनिया ने अपना ब्रांड एम्बेडसर बना लिया है। शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता है जब उनकी तस्वीर नई दुनिया के किसी न किसी पन्ने को शोभा नहीं बढ़ाती हो। बीते एक हफ़्ते में दो दिन को छोड़ कर हर रोज उनकी तस्वीर नई दुनिया में छापी गई है। आमतौर पर चार कॉलम में मगर एक बार तीन कॉलम में। जिन दो दिन उनकी तस्वीर नहीं छपी है उनमें से एक दिन यानी चार अक्टूबर को पहले पन्ने पर उनकी ख़बर है और उसी दिन अपने कॉलम में अख़बार के समूह संपादक आलोक मेहता ने प्रतिभा पाटिल के बेटे को केंद्र में रख कर वंशवाद के समर्थन में एक लेख लिखा है।
नई दुनिया में किस दिन और कौन से पन्ने पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की तस्वीर छपी है या फिर रिपोर्ट या लेख – उसका ब्योरा नीचे दिया जा रहा है। आप एक नज़र डालिए। Read more
एक साल बाद ख़बरों की जगह बेडशीट के भरोसे नई दुनिया
October 3, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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नई दुनिया के दिल्ली संस्करण ने एक साल पूरा कर लिया है। पिछले साल दो अक्टूबर को ही यह अख़बार पूरे ताम-झाम के साथ लॉन्च हुआ था। राजधानी के एक पांच सितारा होटल में बड़े-बड़े नेताओं को अख़बार की पहली प्रति बांटी गई और जश्न मनाया गया। बड़े-बड़े वादे और दावे किए गए हैं। लेकिन एक साल बाद सारे वादे धरे रह गए हैं और दावे झूठे साबित हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक बाहर के लोगों की बात क्या करें? अख़बार में काम करने वालों के बीच ही अख़बार की विश्वसनीयता घटती चली गई है। तभी एक साल पूरा होने पर संपादक आलोक मेहता को अपनी टीम से यह कहना पड़ा कि आप सभी चिंता मत करें… यह एक लड़ाई है… इसमें कभी हम आगे निकल जाते हैं और कभी पीछे। Read more
राष्ट्रपति के बेटे के समर्थन में नई दुनिया की मुहिम
September 26, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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नई दुनिया ने प्रतिभा पाटिल के बेटे राजेंद्र सिंह शेखावत के बारे में माहौल बनाने के लिए सभी घोड़े खोल दिये हैं। शुक्रवार को भी नई दुनिया में एक ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित की गई है जिसमें अमरावती से राजेंद्र सिंह शेखावत को टिकट दिये जाने के फैसले को सही ठहराया गया है। राजेंद्र को टिकट देने के लिए कांग्रेस ने सुनील देशमुख का पत्ता काटा है। सुनील देशमुख अमरावती से लगातार दो बार से कांग्रेस के विधायक हैं। महाराष्ट्र में वित्त राज्य मंत्री और अमरावती के प्रभारी मंत्री हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सुनील देशमुख जब से अमरावती पहुंचे हैं वहां कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है। रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने वहां नेता बदलने की मांग की थी। यह रिपोर्ट नई दुनिया ब्यूरो के नाम से प्रकाशित की गई है। Read more



