हमारा और आपका गुनाह भी कम नहीं

Comments Off

हिमांशु जी ने दफ्तर में पूछा कि आपने कुछ लिखा क्यों नहीं? मैंने उन्हें बताया कि जानकारी जो मुझे मिली है, उसे लिखा नहीं जा सकता। फिर भी लिखूंगा लेकिन पहले मन बना लूं कि क्या लिखते वक्त अपनी भावना, आक्रोश और गुस्से को दबा पाऊंगा। चार-पांच दिनों से उस तस्वीर को जितनी बार देखता हूं, उतनी ही अपनी हिम्मत जवाब देने लगती है। सच कहें तो उस तस्वीर से आंख मिलाने की हिम्मत नहीं होती। ऐसा लगता है जैसे वो दो मासूम आंखें पूछ रही हैं कि क्या इस दुनिया को जी भरकर और सौ साल तक जीने का हक उन्हें नहीं था? क्या उनकी तरफ जिसने बुरी नजर उठायी, उसे उसके किये की सजा दिलाने के लिए लड़ने का अधिकार उसका नहीं था?

उन आंखों और उनसे निकले सवालों से बचकर आप निकल जाइएगा लेकिन उस पिता का विलाप तो पूरे देश से पूरे 16 साल का हिसाब मांग रहा है। 29 दिसंबर 1993 को रुचिका गिरहोत्रा ने खुदकुशी कर ली। तब से सोलह साल में उसके वजूद और आत्मा की लड़ाई उसके घर, उसके बाप और भाई, उसकी दोस्त और इस देश के दिल पर लड़ी जा रही थी लेकिन उस लड़ाई में हर कोई हारा। न्याय हारा, बेबस बाप हारा, अपना सब कुछ गंवा चुका भाई हारा, 19 साल से लड़ रही उसकी दोस्त आराधना हारी, मानवीय संवेदना हारी और सबसे बढ़कर तो उस मासूम बच्ची की आत्मा हारी। उछलकर अपने सपनों को पाने की ख्वाहिश के रीते हुए उन सत्रह वर्षों की जद्दोजहद ने कुछ ऐसे सवाल खड़े कर दिये हैं, जिसका जवाब हमें अपने अंदर खोजना पड़ेगा। Read more

  • Share/Save/Bookmark

यह वहशी दुनिया तुम्हारे लायक नहीं थी रुचिका

Comments Off

अरी बिटिया रुचिका, अच्छा हुआ, तुम सिधार गई. 19 साल बाद आज के इस हालात से तो बेहतर है कि तुम पहले ही चली गई. क्यों कहूं मैं कि तुम समाज से लड़ती रहो, कि समाज के सामने सर उठाकर चलो, कि समाज के डर से डरो मत, कि लोग तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं सकते, कि कानून की नज़रों में सभी एक हैं. ना बिटिया ना. तुम अधिक समझदार थी. सबसे बड़ी समझदारी तो तुमने यही दिखाई कि अपनी दोस्त अनुराधा के साथ मिल कर इस घिनौने खेल का पर्दाफाश किया. लोग फिल्मवाले को गालियां देते हैं. यह कास्टिंग काउच तो हर जगह है. फिल्मवाले तो गरीब की भौजाई की तरह हरेक के मोहरे बनते हैं, मगर तीन “पी” यानी पद, प्रतिष्ठा, पैसेवाले तो ….जो जितना बड़ा ताकतवर, उसकी कास्टिंग काउच उतनी बड़ी , उतनी ताकतवर और उतनी ही घिनौनी. Read more

  • Share/Save/Bookmark

इस ‘सिस्टम’ में बार बार मरेगी रुचिका

टीवी चैनलों पर चंडीगढ़ की विशेष अदालत के बाहर एसपीएस राठौर को हंसते, खिलखिलाते देखा तो लगा सरकार ने हरियाणा के पूर्व डीजीपी को किसी बड़े सम्मान से नवाज़ा हो। ये चेहरा उस शख़्स का चेहरा नहीं था जिसको अदालत ने 14 साल की लड़की रुचिका गिरहोत्रा के साथ छेड़खानी करने के आरोप में दोषी पाया हो। अदालत के फैसले में राठौर को अपनी जीत नज़र आई। जिस अदालत ने दोषी पाते हुए 6 महीने की क़ैद की सज़ा सुनायी उसी अदालत से तुरत फुरत ज़मानत भी मिल गयी। पूर्व डीजीपी सीना फूला कर अपने घर के लिए निकला। मानो वो मीडिया और देश को चिढ़ा रहा हो कि देखो कानून मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। Read more

  • Share/Save/Bookmark

राठौर आदरणीय क्यों? मीडिया के भाषाई संस्कार पर सवाल

रुचिका के साथ छेड़खानी और उसकी आत्महत्या के मामले में भारतीय न्यायव्यवस्था ने कुछ नया या अजूबा नहीं किया है। न्यायप्रक्रिया में धन और रुतबे के महत्व के बारे में ये केस कोई नई बात नहीं कहता। देश के राष्ट्रपति रहे के आर नारायणन ने जब ये कहा था कि आजादी के बाद जिन लोगों को फांसी की सजा हुई है उनमें से कोई भी अमीर नहीं था, तो वो इसी सच को उद्धाटित कर रहे थे। हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी.एस. राठौर के साथ जो होने वाला है उसका अंदाजा हम इस मुकदमे की सुस्त रफ्तार से लगा सकते हैं। 19 साल में ये केस स्थानीय न्यायालय की सीमा को ही पार कर पाया है। इस रफ्तार से केस चला तो राठौर को जीवन का एक भी दिन शायद ही जेल में काटना होगा। Read more

  • Share/Save/Bookmark

मीडिया की मुहिम के बाद अब राठौर की खाल नहीं बचेगी

इस मामले (रुचिका के साथ हुई छेड़खानी और उसके बात पुलिसिया जुल्मों के जरिए उसे आत्महत्या के मुंह में ढकेलने और इस संगीन मामले में अदालत के बेतुके फैसले) को मीडिया ने पूरी जिम्मेदारी और गंभीरता के साथ उठाया है। आज तीसरे दिन भी अखबारों और न्यूज चैनलों पर रूचिका से साथ हुई नाइंसाफी का मामला छाया है। कोर्ट के फैसले के बाद हंसते हुए पूर्व डीजीपी राठौर की बेशर्मी और कानून को अपने ठेंगे पर रखने की उनकी हिमाकत को मीडिया ने खूब उछाला है। कई न्यूज चैनलों ने राठौर को मिली मामूली सज़ा के ख़िलाफ़ लगातार मुहिम चला रखी है। अब क्या चाहते हैं ? मीडिया इससे ज़्यादा क्या कर सकता है ? सच तो ये है कि आज से करीब 19 साल पहले जब ये मामला हुआ था, तब टीवी तो था नहीं, अखबार भी इतने नहीं थे या कहें कि राष्ट्रीय फलक पर फैले हुए नहीं थे. मैं कह नहीं सकता उस समय मीडिया ने इस मामले को कितना उठाया था, लेकिन आज तो मैं कह सकता हूं कि मीडिया की भूमिका यकीनन सराहनीय है। Read more

  • Share/Save/Bookmark

अपराधी ताक़तवर हो तो मीडिया करता है सलाम

अपराधियों को लेकर भी मीडिया का चरित्र दोहरा है। अगर किसी साधारण शख़्स के ख़िलाफ़ अपराध साबित नहीं हुआ हो तो भी पत्रकार उसके लिए सख़्त भाषा का इस्तेमाल करते हैं। एक तरीके से अपराधी घोषित कर देते हैं। लेकिन अगर वही शख़्स ताक़तवर हो तो पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की भाषा बदल जाती है। चाहे उस शख़्स का जुर्म साबित ही क्यों न हो गया हो। चाहे अदालत ने उसे गुनहगार ठहरा कर सज़ा ही क्यों न सुना दी हो।

ताज़ा मामला हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर से जुड़ा है। राठौर ने 19 साल पहले एक 14 साल की नाबालिग लड़की रुचिका गेहरोत्रा से छेड़खानी की थी। और मामला दर्ज होने के बाद इस वहशी दरिंदे ने रुचिका और उसके घरवालों को मानसिक यंत्रणा दी। अपने पुलिसिया ताक़त के जोर पर उनकी ज़िंदगी नर्क बना दी। आखिर में रुचिका ने 17 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली। राठौर के कुकर्मों की वजह से एक परिवार बर्बाद हो गया जबकि राठौर की तरक्की होती चली गई। सत्ता और नेताओं से गठजोड़ का फायदा उठा कर वह हरियाणा का डीजीपी बना और 2002 में सेवानिवृत हुआ। Read more

  • Share/Save/Bookmark

मीडिया एक भीड़ तंत्र है ((पार्ट- 1))

Comments Off

देश के जाने माने पत्रकार कुलदीप नैयर एक किस्सा सुनाते हैं। गोविंद बल्लभ पंत देश के गृह मंत्री और कुलदीप नैयर उनके प्रेस सचिव थे। संसद की भाषाओं के संबंध में एक समिति थी। उस समिति के अधीन एक खैर समिति थी। उस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि संसद को हर पांच वर्ष के बाद यह बताना होगा कि किस हद का हिन्दी के प्रचार प्रसार हुआ हैं और क्या ऐसा वक्त आ गया है कि हिन्दी में सारे काम काज किए जा सकें। सभी को पता है कि देश में भाषाओं को लेकर विवाद रहा है। उस समय भी दो खेमे थे। पृष्ठभूमि में देश में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन था। जब ये समिति काम कर रही थी उस समय भाषा का विवाद फिर से गरमाने लगा। Read more

  • Share/Save/Bookmark

4 साल पूरे होने पर नीतीश सरकार ने अख़बारों पर लुटाया खजाना

बिहार में एनडीए सरकार ने चार साल पूरे कर लिए हैं। नीतीश कुमार की अगुवाई में चल रही सरकार अब चार साल पूरे होने का जश्न मनाया जा रहा है। इस जश्न में सरकारी खजाना पानी की तरह बहाया जा रहा है। बड़े-बड़े विज्ञापन छापे और छपवाए जा रहे हैं। इस जश्न का सबसे अधिक फायदा मीडिया कंपनियों को हुआ है। अख़बारों की तो चांदी ही चांदी है। कहीं आठ, कहीं नौ तो कहीं दस पन्नों का विज्ञापन छपा है। नीतीश सरकार के मुताबिक बीते चार साल में उसने बिहार की सूरत बदल दी है। कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल-कूद… सभी क्षेत्रों में अभूतपूर्व क्रांति हुई है। अपराध का खात्मा हो गया है। निवेश बढ़ा है। रोजगार के नए-नए अवसर खुले हैं। और तमाम उपलब्धियों के लिए विज्ञापन छपवाए गए हैं। हर ख़बार में विज्ञापन की भाषा अलग-अलग है। कहीं-कहीं मुद्दे भी अलग-अलग हैं। लेकिन लक्ष्य सिर्फ़ एक। नीतीश कुमार और एनडीए का गुणगान करना। Read more

  • Share/Save/Bookmark

हमले की ख़बर सब जगह, छंटनी की ख़बर कहीं नहीं

ये दो घटनाएं एक ही दिन की हैं और इन दोनों घटनाओं से मीडिया का चरित्र सामने आ जाता है। ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन जैसे संगठनों की असलियत भी जाहिर हो जाती है। पहली घटना आईबीएन 7 और लोकमत पर शिव सैनिकों के हमले से जुड़ी है। मुंबई और पुणे में हुआ हमला लोकतंत्र पर हमले के बराबर था। ख़बर बड़ी थी और सभी चैनलों ने, अख़बारों ने उस ख़बर को जोरशोर से प्रसारित किया और प्रकाशित किया।

जनतंत्र की टीम भी उस हमले के लिए शिव सैनिकों की निंदा करती है और यह उम्मीद भी कि महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार शिवसैनिकों से सख्ती से निपटेगी। हालांकि यह उम्मीद पहले भी कई बार की गई लेकिन भोकुस दलाल किस्म की सरकारें गरीबों पर गोली चलाने का फैसला तो ले लेती हैं लेकिन शिव सैनिकों और एमएनएस के गुर्गों पर हाथ डालने से डरती हैं। Read more

  • Share/Save/Bookmark

श्रद्धांजलि और सम्मान पर उनका भी हक है

आचार्य नरेंद्र देव

आचार्य नरेंद्र देव

चाहे अखबार हों या न्यूज चैनल, हर जगह इंदिरा गांधी छायी रहीं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। वह 17 साल तक देश की प्रधानमंत्री रहीं और विवादों के साये में ही सही, जब उनकी हत्या हुई, तब वह प्रधानमंत्री थीं। हत्या के साथ खुद अपने अंगरक्षकों का ही भक्षक हो जाना मामले को और गरमाने वाला बन गया। उस पर से अंगरक्षक सिख थे, जो इंदिरा गांधी के ऑपरेशन ब्लू स्टार से खफा थे। समुदाय की गुस्सायी मानसिकता को अपने जेहन में उन्होंने इस कदर बिठा लिया था कि उनके लिए धर्म की आहत भावना अपने कर्तव्य पर भारी पड़ गयी। अखबारों और न्यूज चैनलों में इंदिरा गांधी का बखान भरा रहा। उनका साहस, उनकी दूरदर्शिता, उनकी राष्ट्रभक्ति, उनकी दृढ़ता, विकास को लेकर उनकी सोच से लेकर उनके व्यक्तिगत पहलुओं पर बहुत कुछ लिखा गया। उनमें तारीफ के तमाम लक्षण थे भी। उस गूंगी गुड़िया की मुखर आवाज जमाने को सुनायी पड़ी। बड़े-बड़े आर्थिक दार्शनिकों के प्रवचनों को दरकिनार कर बैंको का राष्ट्रीयकरण किया। बांग्लादेश बनाकर पाकिस्तान को उसकी हैसियत बता दी। समाजवादी नहीं थीं लेकिन राजे-रजवाड़ों के सरकारी पेंशन बंद कर उन्हें भी साफ इशारा कर दिया कि अब यह देश तुम्हारे बाप की जागीर नहीं है। पोखरण में परमाणु विस्फोट करके सुपर पावर देशों को बता दिया कि विनाश के पटाखे फोड़ना सिर्फ उन्हें ही नहीं आता। इस लिहाज से उनकी हत्या के 25 साल बाद उन्हें याद किया जाना चाहिए। Read more

  • Share/Save/Bookmark

Next Page »