आंध्र प्रदेश और मीडिया की विभाजनकारी भूमिका
December 14, 2009 by जगदीश्वर चतुर्वेदी
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ग्लोबल टेलीविजन ने विभाजनकारी भूमिका आरंभ कर दी है। तेलंगाना के सवाल पर जिस तरह का कवरेज आया है वह चिंता की बात है। उससे तीन सवाल पैदा हुए हैं। पहला – क्या तेलंगाना आंदोलन पर जिम्मेदार टीवी कवरेज आया ? दूसरा – कांग्रेस और बीजेपी टेलीविजन के दबाव में आकर राजनीतिक फैसले क्यों लेते हैं? और तीसरा सवाल यह कि राजनीतिक फैसले, खासकर विभाजनकारी मसलों को प्रभावित करने में ग्बोबल मीडिया किस तरह की भूमिका निभाता है?
टीवी कवरेज ने विभाजनकारी तेलंगाना विवाद को वैध बनाया। तेलंगाना के आंदोलन में निहित अतार्किक समझ को वैध बनाया। यह भ्रम पैदा किया तुरंत फैसला करो। बगैर सोचे फैसला करो। केन्द्र सरकार ने अपनी राजनीतिक समझ को चैनलों के कवरेज के आधार वैध बनाया। सच यह है कि तेलंगाना राज्य बन नहीं सकता। यह मसला वर्चुअल मीडिया ने बनाया और इसके ही आधार पर कांग्रेस और भाजपा ने इसके पक्ष में फैसला लिया। ग्लोबल मीडिया आमतौर पर इस तरह के मसलों पर सारी दुनिया में विभाजनकारी भूमिका अदा करता रहा है। भारत में भी वह यही कर रहा है। Read more
कुछ पत्रकारों को किसानों का दर्द नहीं दिखता, दारू दिखती है
November 28, 2009 by विकास वशिष्ठ
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19 नवंबर को गन्ना किसानों ने सड़क से संसद तक अपना रोष ज़ाहिर किया। वे दिल्ली पहुंचे क्योंकि हमारी सरकार को ऊंचा सुनने की बीमारी हो गई है। उनका मकसद केवल सरकार के कानों में अपनी बात को डालना था। वे डालकर गए भी, लेकिन अगले दिन अखबारों ने बड़ा चौंकाने वाला काम किया। इस घटना को अंग्रेजी और हिंदी के बड़े अखबारों ने जाने किस चश्मे से देखा।
घटना एक ही थी लेकिन उसे देखने का तरीका अलग अलग। कैसे कोई एक रिपोर्टर अपने ख़ास एंगल की वजह से आगे बढ़ता जाता है। लेकिन गन्ना किसानों के इस मामले में मुझे कहीं से अखबारों का कोई अलग एंगल नज़र नहीं आया। नज़र आया तो सिर्फ ये कि उन्होंने किसी दूसरे चशमे से उस घटना को देखा। Read more
मीडिया के सहारे हिंसक भीड़ तैयार कर रही है सरकार?
September 24, 2009 by समरेंद्र
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रविवार को देश के सभी बड़े अंग्रेजी अख़बारों में एक विज्ञापन छपा। यह विज्ञापन केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ़ से जारी हुआ था। उसमें नक्सली हिंसा में मारे गए सात लोगों की तस्वीरें छापी गई हैं। पहली तस्वीर है छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले की जत्ति पुरुषोत्तम की। तस्वीर के नीचे नाम और पता के साथ क़त्ल की तारीख़ छपी है। तीसरी तस्वीर चार साल के एक मासूम की है। दो तस्वीरें नवयुवक और युवती हैं। बाकी तीन तस्वीरें 35 से 45 साल की उम्र के लोगों की हैं। इन तस्वीरों के साथ संदेश लिखा है कि नक्सली हिंसा में बेकसूर मारे जा रहे हैं और नक्सली उन क्रूर क़ातिलों के समान हैं जो सोची समझी साज़िश के तहत क़त्ल करते हैं।
नक्सली हिंसा को किसी भी लिहाज से जायज नहीं ठहराया जा सकता। उसका विरोध होना चाहिए। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ़ से जारी इस विज्ञापन से कई सवाल उठते हैं। पहला सवाल कि अपने देश की जनता को नक्सली बनाने के लिए जिम्मेदार कौन है? दूसरा सवाल, छत्तीसगढ़ में सलवा जुडुम और सुरक्षाबलों के जुल्मों को किस श्रेणी में रखा जाए? क्या उसे भी सरकार सोची समझी साज़िश के तहत किए गए क़त्ल मानेगी या नहीं? तीसरा सवाल, क्या इस तरह अख़बारों में विज्ञापन से नक्सली हिंसा पर रोकथाम लग सकती है? चौथा और आखिरी सवाल, कहीं ऐसा तो नहीं कि मारे गए लोगों के क्षत-विक्षत शवों को छाप कर सरकार, छत्तीसगढ़ और नक्सल प्रभावित दूसरे इलाकों में नरसंहार के लिए जनमत तैयार करना चाहती है? सरकार की तरफ़ से प्रायोजित हिंसा में मीडिया को भागीदार बनाना चाहती है? Read more
“मीडिया से हुए नुकसान की भरपाई नामुमकिन”
September 24, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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दो दिन पहले ख़बरें छपी कि पश्चिम बंगाल का लालगढ़ एक बार फिर लहू से लाल हो गया है। नक्सलवादियों और सीपीएम कैडर के बीच हुए संघर्ष में दस लोगों के मारे जाने की ख़बर है। इस ख़बर से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। अब ख़बर आ रही है कि झड़प तो हुई थी लेकिन कोई भी मारा नहीं गया है। छह लोग जख़्मी हुए हैं। इलाके के पुलिस सुपरिंटेंडेंट मनोज कुमार वर्मा ने द हिंदू से कहा है कि मीडिया ने जो नुकसान पहुंचाया है उसकी भरपाई नहीं की जा सकती।
मनोज कुमार वर्मा के मुताबिक सोमवार की शाम 6.30 बजे के करीब झड़प शुरू हुई। उस झड़प में छह लोग घायल हुए। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया जा चुका है। ख़बर मिलने के बाद पुलिस मौके पर 9 बजे के करीब पहुंची। उसके बाद से हमलावरों की तलाश की जा रही है। Read more
हिंदुस्तान और नई दुनिया का “सरकार राग”
August 15, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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उधार - टीओआई
पाठकों को धोखा दे रहा है “हिंदुस्तान”
July 18, 2009 by समरेंद्र
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हिंदुस्तान (17 और 18 जुलाई)
प्रणब का बजट और मीडिया की तल्खी
July 7, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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प्रणब मुखर्जी के बजट को मीडिया ने आड़े हाथों लिया है। कुछ अख़बारों ने बड़ी तीखी प्रतिक्रिया दी है। बजट की आलोचना में कुछ पत्रकार तो व्यक्तिगत हो गए हैं। देश के बड़े-बड़े कारोबारी, जिन्हें धंधा करना है, वो बजट की आलोचना संतुलित तरीके से कर रहे हैं लेकिन पत्रकार कुछ ज़्यादा ही इमोशनल हो गए। आगे बढ़ने से पहले एक नज़र कुछ उदाहरणों पर।
दैनिक हिंदुस्तान ((पृष्ट संख्या – एक))
हेडर – बाबू मोशाय का इंद्रजाल
सब हेडर – वित्त मंत्री ने नापा नौ गज, फाड़ा दो गज
इंट्रो – यूपीए सरकार की दूसरी पारी का पहला बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कमाल कर दिया। उन्होंने बंगाल के विश्वप्रसिद्ध जादूगर पी सी सरकार जैसी बाजीगरी दिखाई। चुनावी वादों और सरकार के 100 दिन के अजेंडा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने वोटर को हंसाया तो जरूर, लेकिन थमाया कुछ खास नहीं। गुड़ कम दिया, गुड़ सी मीठी बातें ज़्यादा कीं। बजट भाषण में बजट कम था भाषण ज्यादा। घोषणाएं ज़्यादा थीं, क्रियान्वयन की ठोस योजनाएं कम। Read more



