चलो लिख लो, एक भी दलित नियुक्ति याद नहीं : विभूति

जहां मजबूरी नहीं हो वहां विभूति नारायण राय ने एक भी दलित नियुक्ति नहीं की। या यूं कहें कि उन्हें एक भी दलित नियुक्ति याद नहीं। बावजूद इसके विभूति दंभ भरते हैं कि वो दलित हितों के रक्षक हैं। वो यह भी कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था पर उन्होंने जो काम किया है वो अपने आप में एक मिसाल है। विभूति के मुताबिक एक्जीक्यूटिव काउंसिल में यूनिवर्सिटी की तरफ से सिर्फ दो ही बंदे थे- एक वो खुद और दूसरा उनके द्वारा नियुक्त प्रो वाइस चांसलर। अब वही दोनों किसी एक शिक्षक के ख़िलाफ़ हो जाएं तो फिर उसे कौन बचाएगा? इस सवाल के जवाब में विभूति का कहना है कि अगर किसी को शिकायत हो तो वो अदालत जाए। अनिल चमड़िया अदालत जाएं। आप वी एन राय के इंटरव्यू के दो हिस्से पढ़ चुके हैं। पहले हिस्से में उन्होंने कहा था कि अनिल चमड़िया को निकाल कर ग़लती सुधार ली। दूसरे हिस्से में उन्होंने कहा कि दलितों के मुद्दे पर उन्हें किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं। और अब आप इस इंटरव्यू का तीसरा हिस्सा पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए – मॉडरेटर

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दबाव में झुके वीएन राय, अंकित के ख़िलाफ़ जांच का आदेश

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर अनिल राय अंकित के ख़िलाफ़ जांच का आदेश दे दिया गया है। अनिल राय अंकित पर आरोप है कि उन्होंने दूसरों की किताबों से कंटेंट चुरा कर अपनी किताबें प्रकाशित करवाई हैं। जांच का काम प्रोफेसर सुरेंद्र सिंह कुशवाहा को सौंपा गया है। सुरेंद्र सिंह कुशवाहा रांची युनिवर्सिटी और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति रह चुके हैं। Read more

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महात्मा गांधी के नाम पर यह हिंदी की अंतरराष्ट्रीय ऐशगाह है

कुछ समय पहले की बात है। संसद में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि सरकार के पास एक भी केंद्रीय विद्यालय खोलने के लिए पैसे नहीं हैं। उनके इस बयान में यह बात छिपी थी कि शिक्षा पर देश का बजट बहुत ही कम है और उतने में कोई क्रांतिकारी बदलावों की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।

अब हम आपके सामने इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू पेश करने जा रहे हैं। महात्मा गांधी हिंदी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुछ आंकड़े प्रस्तुत करने जा रहे हैं जो आपको चौंका सकते हैं। यहां हर एक छात्र पर करीब-करीब एक कर्मचारी तैनात है। आप इस यूनिवर्सिटी के आंकड़ों पर गौर कीजिए और सोचिए कि जिस देश के पास एक भी केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने के पैसे नहीं हों, उस देश में शिक्षा के नाम पर इस फिजूलखर्ची को क्या कहना चाहिए? Read more

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मुझे तुम्हारे किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं: विभूति

विभूति नारायण राय दलित विरोधी नहीं हैं। अंकित चोर गुरू नहीं हैं। उनके ख़िलाफ़ यह दुश्मनों की साज़िश है। दलित छात्र राहुल कांबले को नियमों के आधार पर दाखिला नहीं मिला। दलित प्रोफेसर लैला कारुण्यकारा को नोटिस ब्राह्मणों को मां-बहन की गालियां देने की वजह से भेजा गया। विभूति को दलित वादी और धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में चल रही गड़बड़ियों पर उसके कुलपति विभूति नारायण राय के इंटरव्यू का आज दूसरा हिस्सा।  इस हिस्से में और भी बहुत कुछ बातें और कुछ बौखहालटें हैं। आप इस इंटरव्यू को पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। – मॉडरेटर

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अनिल चमड़िया मामले में निष्पक्ष जज नहीं थीं मृणाल पांडे

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महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति वी एन राय बार-बार ये कह रहे हैं कि मैंने तो अनिल चमड़िया को रखा था, ईसी यानी एक्जिक्यूटिव कौंसिल ने हटा दिया तो मैं क्या कर सकता हूं। जिस ईसी ने अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का फैसला किया, उसकी एक सदस्य थीं पत्रकार मृणाल पांडे। मृणाल पांडे कुछ समय पहले तक दैनिक हिंदुस्तान की संपादक थीं।

यहां एक बात गौर करने की है कि न्यायपालिका में ये परंपरा है कि अगर किसी जज का किसी केस में हितों का टकराव यानी कॉन्फ्लिक्ट ऑफ होता है, तो जज ऐसे मामलों से खुद को अलग कर लेता है। हाल के दिनों में ऐसे कई मामले हुए हैं, जब जजों ने खुद ही मामलों की सुनवाई से अलग होने का फैसला किया। Read more

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अनिल चमड़िया को निकाल कर ग़लती सुधार दी: विभूति

विभूति नारायण राय। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति। एक सीनियर आईपीएस अफ़सर। सेकुलर साहित्यकार और जनवादी लेखक। लेकिन अब ये सारी छवियां टूटती नज़र आ रही हैं। बीते कुछ महीनों में उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय में जो कुछ भी घटित हुआ, उससे विभूति नारायण राय पर दलित विरोधी होने का आरोप लगा। एक ईमानदार प्रोफेसर को साज़िशन हटाने और एक दलित प्रोफेसर को मानसिक यंत्रण देने का आरोप लगा। साथ ही जातिवादी ज़हर फैलाने का आरोप भी लगा।

इन सभी आरोपों पर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल, मोहल्लालाइव के संपादक अविनाश और जनतंत्र की तरफ़ से समरेंद्र ने उनसे बात की। विभूति नारायण राय ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में तीनों को इंटरव्यू दिया। सभी सवालों का उन्होंने कभी शांत भाव से तो कभी गुस्से में जवाब दिया। बीच-बीच में वो यह भी जताते रहे कि वो किसी को जवाब देना ज़रूरी नहीं समझते हैं। वो दलित विरोधी नहीं हैं। और यह साबित करने के लिए उन्हें किसी के सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं। मगर यह पूछने पर कि उनके कार्यकाल में जितनी भी अस्थाई नियुक्तियां हुईं हैं, क्या उनमें एक भी दलित है… वो कहते हैं कि उन्हें याद नहीं।

इसी बातचीत में उन्होंने बताया कि अनिल चमड़िया बेहद अनैतिक प्रोफेसर हैं। यह भी कि अनिल राय अंकित को चोर गुरू के तौर पर उनके दुश्मनों ने प्रचारित किया है। यह पूछने पर कि क्या अंकित अनैतिक नहीं? वह कहते हैं कि जांच के बाद ही तस्वीर साफ़ होगी। इसी इंटरव्यू में वो यह वादा भी करते हैं कि अगले कुछ दिनों में अंकित की जालसाजियों पर फैसला आ जाएगा। मगर कुछ पलों बाद यह भी दोहराते हैं कि फैसला जांच कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही होगा और कमेटी अभी तक गठित नहीं हुई है।

विभूति नारायण राय का दावा है कि अनिल चमड़िया को हटाने में उनका कोई हाथ नहीं। मगर वह यह भी कबूल करते हैं कि उन्होंने ईसी के मेम्बरों से कहा था कि यूनिवर्सिटी से एक ग़लती (अनिल चमड़िया की नियुक्ति) हो गई है और वो इस ग़लती को दुरुस्त करना चाहते हैं। विभूति नारायण राय से यह बातचीत काफी लंबी है। करीब 36 मिनट लंबी। उसी के एक हिस्से को हम आज प्रकाशित कर रहे हैं। बाकी हिस्से अगले कुछ दिनों में आपके सामने रख दिए जाएंगे। ताकि आप सही ग़लत का फ़ैसला खुद कर सकें। – मॉडरेटर

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सारे नोटिस दलित शिक्षकों को, जवाब दो विभूति

अब तक आपने पढ़ा कि किस तरह विभूति नारायण राय ने जब प्रोफेसर डॉक्टर एल करुण्यकारा को डॉ. अंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस कार्यक्रम में शामिल होने और नारे लगाने के आरोप में सामंती अंदाज में धमकी दी तो उन्होंने इसका करारा जवाब दिया। उन्होंने विभूति राय को सिखाया कि 6 दिसंबर का क्या मतलब है और साथ ही ये भी बताया कि सेकुलर होकर भी जातिवादी, सामंती और अलोकतात्रिक हुआ जा सकता है बल्कि सेकुलर होकर ये सब होना ज्यादा आसान होता है और ऐसे लोगों के छल को तोड़ना मुश्किल। उन्होंने ग्राम्शी को उद्धृत करते हुए बताया कि दलितों को आंदोलन के लिए क्यों बाध्य होना पड़ता है। अब आगे पढ़िए, जब वो बताते हैं कि जिन नारों को विभूति जातिवादी मानते हैं, वो नारे दरअसल हैं क्या? (अनुवाद: दिलीप मंडल)…

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सुनो विभूति, तुम सेकुलर जातिवादी हो…

ऐसे समय में जब कई बार छवियों का महत्व वास्तविकता से ज्यादा हो जाता हो, तब ऐसे बच्चे की जरूरत होती है जो कहे कि अरे राजा तू तो नंगा है। ऐसे समय में जब सच कहना सबसे साहसिक कामों में गिना जाता हो, जब हम सलाम करते हैं वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर (डॉ) एल करुण्यकारा को। प्रोफेसर को 11 दिसंबर को विभूति नारायण राय का साइन किया हुआ एक नोटिस मिलता है, जिसमें उन पर आरोप लगाया जाता है कि 6 दिसंबर की शाम उन्होंने भड़काऊ जातिवादी नारेबाजी की थी और वो जुलूस में शामिल हुए थे। उन पर ये आरोप भी लगाया गया कि उनके ऐसा करने से कैंपस की शांति और समरसता को खतरा पैदा हुआ। विभूति ने नोटिस में ये धमकी दी कि 7 दिनों में नोटिस का जवाब मुझे नहीं मिला तो एकतरफा कार्रवाई की जाएगी। मवालियों की भाषा में जारी इस नोटिस का जो जवाब प्रोफेसर करुण्यकारा ने दिया है वो प्रतिरोध का शानदार दस्तावेज है। वीसी को भेजी गई चिट्ठी का अनुवाद दिलीप मंडल ने किया है।

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राजेंद्र, अरुंधती, उदित राज… बुलंद होती इंसाफ़ की आवाज़

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय की तानाशाही के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद होने लगी है। प्रोफेसर अनिल चमड़िया को क्रूर तरीके से हटाए जाने के ख़िलाफ़ हस्ताक्षर अभियान तेज़ हो गया है। अब तक इस पर बड़ी संख्या में पत्रकारों, साहित्यकारों और प्रबुद्ध लोगों ने अपने हस्ताक्षर किए हैं। इसी कड़ी में जानी-मानी लेखिका, कार्यकर्ता और मानवाधिकारों की पक्षधर अरुंधती रॉय ने भी अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं। मशहूर साहित्यकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव और फिल्मकार संजय काक ने दस्तख़त किए हैं। दलितों के हक़ के लिए लड़ने वाले उदित राज ने भी अनिल चमड़िया की बर्खास्तगी का विरोध किया है। ख़बरें यह भी आ रही हैं कि बजट सत्र के दौरान संसद में यह मुद्दा उठाने की तैयारी है। न केवल प्रोफेसर अनिल चमड़िया की बर्खास्तगी का मसला बल्कि महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में दलित छात्रों के उत्पीड़न का मसला भी उठाने की तैयारी है। अगर ऐसा हुआ तो यह एक बड़ी कोशिश होगी। Read more

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‘ये तुम्हारे गले में किसकी आवाज है …….’*

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से प्रोफेसर अनिल चमड़िया को “क्रूर तरीके” से हटाए जाने के मुद्दे पर इन दिनों ढेरों ई-मेल पहुंच रहे हैं। ऐसी ही एक चिट्टी तीन दिन पहले हमारे पास पहुंची। लिखने वाले ने नाम-पता गोपनीय रखने की गुजारिश की है। उनकी मजबूरी को समझते हुए, हम इस अपील को मान रहे हैं और उनकी बातों को आपसे साझा कर रहे हैं। इसलिए कि इसमें दो ऐसे व्यक्तियों का जिक्र है जिनके बारे में हम और आप बहुत से लोग जानते हैं। उन दोनों व्यक्तियों में एक शख़्स हैं कृष्ण कुमार। बहुचर्चित शिक्षाविद कृष्ण कुमार इन दिनों एनसीईआरटी के कर्ता-धर्ता हैं। दस-बारह साल पहले उनकी एक पुस्तक आई थी “विचार का डर”। वह पुस्तक लाजवाब है। उससे कृष्ण कुमार की गहराई का पता चलता है। लेकिन ताज़ा प्रकरण से उनकी चतुराई का भी पता चल रहा है। वह भी उन दिग्गजों में से एक हैं जिन्होंने मिल कर अनिल चमड़िया को यूनिवर्सिटी से बाहर किया है। कृष्ण कुमार भी विभूति नारायण राय की इस साज़िश में बराबर के गुनहगार हैं। इसलिए जरूरत है कि अब बहस का दायरा बढ़ाया जाए। हर उस व्यक्ति से सवाल किया जाए जो विभूति नारायण राय का या तो समर्थन कर रहा है या फिर विरोध करने से बच रहा है। – मॉडरेटर

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