इनके हाथ में विकास की लकीर नहीं, सिर्फ़ बदहाली है

बात साल के आखिरी महीने के आखिरी दिन की है, जब मेरी ड्यूटी उत्तर प्रदेश में लखीमपुर खीरी के एक गाँव में लगाई गयी। मसला एक प्राइवेट बीमा कम्पनी और भारत सरकार के साझे का था। तमाम अप्रशिक्षित नव-युवकों को ठेकेदारों ने तैनात किया था। सभी को एक-एक पाइरेटेड माइक्रोसाफ़्ट विन्डोज वाले लैपटाप दिए गए थे, ताकि वे बीपीएल आबादी की अंगुलियों के निशान स्कैन कर कम्प्यूटर के डेटावेस में सुरक्षित रख सके। इस काम के बदले प्रत्येक गरीब से तीस रुपये की वसूली करने की भी इजाजत थी। एक मास्टर कार्ड मुझे भी दिया गया जिसमें मेरे अगूंठे का निशान सुरक्षित था और प्रत्येक व्यक्ति की अंगुलियों का निशान लेने के बाद मुझे अपना अंगूठा स्कैनर पर रखना पड़ता, ताकि उस व्यक्ति पहचान सुनिश्चित की जा सके। ये एक तरह का वेरीफ़िकेशन था। Read more

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