आज जनसत्ता पढ़ कर प्रभाष जी की कमी कुछ कम खली

January 10, 2010 by समरेंद्र  
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मैं जनसत्ता रोज नहीं मंगाता। सिर्फ़ संडे के संडे जनसत्ता पढ़ता हूं। लेकिन प्रभाष जोशी के निधन के बाद जनसत्ता बेरंग, बेरस नज़र आ रहा था। दो पुस्तक समीक्षाएं पहले से ही छपती रही हैं और कागद कारे की जगह पर तीसरी पुस्तक समीक्षा को जबरन घुसेड़ना बहुत बेतुका लगता था। कई बार तो मन यही करता था कि संडे को भी जनसत्ता मंगाना बंद कर दूं। आखिरी कुछ हफ़्तों में तो संपादकीय पृष्ठ किसी साहित्यिक गोष्ठी का विज्ञापन लगने लगा। एक पेज पर तीन-तीन पुस्तक समीक्षाएं और उसके बाद अशोक वाजपेयी धारावाहिक की वो कड़ी जो कभी कभार नहीं बल्कि हर रविवार आती है। दूसरे पन्ने पर कुछ लेख पढ़ने लायक जरूर होते हैं लेकिन उनमें प्रभाष जोशी वाली बात नहीं। Read more

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क्या जनसत्ता ने वामपंथ को निपटाने की सुपारी ली है?

आज जनसत्ता के पहले पन्ने पर कुल दस ख़बरें हैं जिनमें से चार वामपंथ की अलग-अलग धाराओं से जुड़ी हैं। अख़बार की पहली लीड है – “माओवादियों पर नकेल के लिए गृह मंत्रालय को हरी झंडी।” इस में बताया गया है कि सरकार ने गृह मंत्रालय को नक्सलियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए हरी झंडी दे दी है। जैसे अब तक नक्सली हमले पर हमले कर रहे थे और सरकार हाथ पर हाथ रख कर बैठी थी। उस ख़बर में यह भी कहा गया है कि वायुसेना को आत्मरक्षा में गोलीबारी की अनुमति मिलेगी। ख़बर बस इतनी सी ही है।

जनसत्ता में वामपंथ से जुड़ी दूसरी ख़बर है – “माओवादियों को मिल रही है विदेशी मदद: डीजीपी।” कोलकाता से फाइल की गई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि छत्रधर महतो और उनके साथियों को विदेशी पूंजी मिली है। ख़बर के मुताबिक “राज्य के पुलिस महानिदेशक भूपिंदर सिंह ने शनिवार को बताया कि आदिवासियों के विकास के नाम पर लालगढ़ में बड़े पैमाने पर (कितने बड़े पैमाने पर – इसका जिक्र नहीं है) विदेशों से रकम भेजी जा रही है। ये रुपये विभिन्न सूत्रों से आते हैं। इसका बड़ा हिस्सा माओवादियों के हाथ भी पहुंचाया गया है। उन्होंने कहा कि इस रकम का काफी बड़ा हिस्सा पुलिस संत्रास विरोधी जनसाधारण कमेटी के नेता छत्रधर महतो को मिला है। माओवादियों ने इस रकम का इस्तेमाल हथियार खरीदने के लिए किया है।” Read more

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“जन”सत्ता में प्रभाष जी की “ब्राह्मण”सत्ता

जनसत्ता के पहले संपादक प्रभाष जोशी को लगभग ढाई दशक पहले जब पत्रकारों की टीम बनाने का पहला मौका मिलता है तो कुछ ऐसी टीम बनती है। ये है जनसत्ता की शुरुआती टीम के टॉप 15 प्लेयर:-

1. प्रभाष जोशी (संपादक)
2. गोपाल मिश्र (न्यूज एडिटर)
3. श्याम आचार्य (दूसरे न्यूज एडिटर)
4. अच्युतानंद मिश्र (तीसरे न्यूज एडिटर)
5. हरिशंकर व्यास (असिस्टेंट एडिटर)
6. सतीश झा (असिस्टेंट एडिटर)
7. बनवारी (असिस्टेंट एडिटर)
8. मंगलेश डबराल (रविवारी के इंचार्ज)
9. ब्रजेंद्र पांडे (खेल डेस्क के इंचार्ज)
10. उमेश जोशी (बिजनेस डेस्क के इंचार्ज)
11. सत्यप्रकाश त्रिपाठी (डेस्क के इंचार्ज)
12. परमानंद पांडे ( डेस्क के इंचार्ज)
13. देवप्रिय अवस्थी (डेस्क इंचार्ज)
14. श्रीश मिश्र (डेस्क इंचार्ज)
15. जगदीश उपासने (डेस्क इंचार्ज)

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जिसकी जैसी मार्केटिंग, उसको वैसा वोट

जनसत्ता में आज वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शेष का लेख छपा है। बिहार के सीतामढ़ी जिले के रहने वाले अरविंद पटना में लंबे समय तक पत्रकारिता कर चुके हैं और वो बिहार की पत्रकारिता के बारे में काफी गहराई से जानते हैं। जनसत्ता में आज के लेख में उन्होंने बिहार की ज़मीनी हक़ीक़त और मीडिया के जरिये मार्केटिंग के बीच के अंतर को बयां किया है। साथ ही देश में मीडिया की मौजूदा भूमिका का विश्लेषण किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे मीडिया मैनेजमेंट ने आम चुनाव के नतीजों पर असर डाला। हम अरविंद शेष का ये लेख जनसत्ता से साभार जनतंत्र पर छाप रहे हैं। आप भी पढ़ें और अपना नज़रिया पेश करें।
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यह नई पत्रकारिता है जी

वर्तमान में मीडिया के दो चेहरे हैं। मुखौटा हटाने पर नज़र आने वाला असली चेहरा इतना विकृत है कि सिर शर्म से झुक जाता है। इस चुनाव में मीडिया ने ख़ासकर दैनिक जागरण जैसे कुछ संस्थानों ने दलाली का एक नया इतिहास रचा है। लोकतंत्र का सौदा कर उन्होंने अपने कर्म और धर्म दोनों से किनारा कर लिया और पाठकों को धोखा दिया है। इस पर भी उनकी बेशर्मी का आलम ये है कि वो खुलेआम जनता के साथ होने का दम भर रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने इस हफ़्ते जनसत्ता में उनकी इसी बेशर्मी को सामने रखा है। साथ ही सूचना के अधिकार की वकालत करने वाले अरविंद केजरीवाल और अरुणा राय से पूछा है कि आखिर किस सिद्धांत के तहत वो ऐसे अख़बारों के साथ खड़े हैं जिन्होंने सूचना के अधिकार को ताक पर रख दिया। ये विरोधाभास क्यों? ये साठगांठ क्यों? Read more
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चौकीदार का चोर होना

((हिंदी के सबसे बड़े और सम्मानित पत्रकार प्रभाष जोशी हाल में संपन्न आम चुनावों के दौरान खबरों की खरीद-फऱोख्त के शर्मनाक धंधे के खिलाफ खम ठोककर मैदान में उतर पड़े हैं। उन्होंने मांग की है कि खबरें बेचकर पत्रकारिता की पवित्रता को दागदार करने वाले अखबारों का रजिस्ट्रेशन रद्द होना चाहिए। अगर ज़रूरी हो तो इसके लिए नया कानून भी बनाया जाना चाहिए। इस विषय पर उनका पिछला लेख “खबरों के पैकेज का काला धंधा” आप यहां पहले पढ़ चुके हैं। जनसत्ता के अपने मशहूर कॉलम “कागद कारे” में इस बार भी प्रभाष जी ने इसी मुद्दे पर कलम उठायी है। पढ़िए और जनतंत्र के चौथे स्तंभ को बचाने की इस मुहिम में उनका साथ दीजिए।))

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चुनाव की खबरों को बेचने का काला धंधा ऐसा नहीं कि अखबारों ने कोई छुपाते और लजाते हुए किया हो। छोटे-मोटे स्ट्रिंगर से लेकर संपादक और मालिक तक और उधर छुटभैये कार्यकर्ता से लेकर उम्मीदवार, उसकी पार्टी और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तक सब जानते थे कि अखबारों में चुनाव की खबरें पैसे और वह भी काले पैसे से छप रही हैं। राजनीतिक लोगों की बेशर्मी तो फिर भी समझी जा सकती है, क्योंकि उनमें से अधिकतर अखबारों में छपे को अपना प्रचार मानकर ही चलते हैं। लेकिन अखबारों – खासकर हिंदी और अंग्रेजी के राष्ट्रीय दैनिक, जो अपनी गिनती दुनिया के सबसे बड़े अखबारों में और सबसे ज्यादा पाठकों वाले अखबारों में करवाते हैं और अपनी पत्रकारिता की तारीफ करते खुद ही नहीं थकते – वे भी खबरों की अपनी पवित्र जगह बेचते हुए आंखों की शर्म भी नहीं रखते थे।

कई अखबारों ने तो बाकायदा विज्ञापन के रेट कार्ड की तरह चुनाव कवरेज के भी रेट कार्ड छपवाए थे और वे न सिर्फ अपने स्टाफ को दिए थे, बल्कि उम्मीदवारों को भी दिए गए थे। दो राष्ट्रीय दैनिकों के छोटे स्थानीय संस्करणों के रेट कार्ड मेरे पास हैं। एक से पांच लाख तक के पैकेज में रंगीन और सादे कवरेज के रेट अलग-अलग मदों में दिए गए हैं। जैसे प्रचार अभियान के 8 गुणा 12 के रंगीन कवरेज के 6,000 और सादे के 4,800 रुपये। जनसंपर्क के उतने ही कवरेज के तीस और चौबीस हजार। समर्थकों की अपील 9 गुणा 12 के सात और पांच हजार। जनसभा/रैली के 10 गुणा 16 के तीस और चौबीस हजार। प्रायोजित साक्षात्कार 7 गुणा 12 के साढ़े दस और साढ़े आठ हज़ार। मांग पर विशेष कवरेज 25 गुणा 16 के पच्चीस और बीस हज़ार। विशेष फीचर/इनोवेशन 51/33 के दाम मोलभाव से तय होंगे। चुनाव चिह्न के साथ वोट देने की अपील 8 गुणा 12 के अठारह से साढ़े चौदह हजार। प्रमुख मुद्दों पर बयान और प्रतिक्रिया के अलग। फोटो फीचर आदि के अलग।

यानी चुनाव प्रचार को अलग-अलग मदों में बांटकर हर एक के रेट तय किए गए थे। मालिकों और संपादकों को ऐसा करते हुए कहीं भी यह अपराध-बोध नहीं था कि अपने अखबार की खबरों की पवित्र जगह इस तरह बेचते हुए वे कोई अनैतिक और पत्रकारिता की आचार संहिता के उल्लंघन का पाप कर रहे हैं। पूछने पर वे उसे तरह-तरह से उचित ठहराते थे। जैसे तेरह साल पहले मध्य प्रदेश के एक बड़े प्रकाशन केंद्र में एक पुराने और प्रतिष्ठित अखबार के एक संवाददाता ने एक उम्मीदवार से एक लाख रुपया ले लिया और पूरे चुनाव भर उसकी अच्छी खबरें छापीं। सन अठानवे के चुनाव में उसी केंद्र में गया तो पता चला कि उस संवाददाता की तो छुट्टी हो गयी, लेकिन अब अखबार ने ही उम्मीदवारों से डील कर लिए हैं। उसके मालिक/संपादक अपने पुराने मित्र हैं। उनसे पूछा कि यह क्या हो रहा है? क्या करें प्रभाष जी – सब रिपोर्टर बाला-बाला पैसा लेकर चुनाव प्रचार छापते थे। हमने तय किया कि हमारा अखबार है तो हमीं छापेंगे और पैसा लेंगे। रिपोर्टरों को कमीशन दे देंगे।

खबरों पर भ्रष्टाचार करने के पत्रकारों के धतकरम से ऐसी सीख मध्य प्रदेश के हिंदी दैनिक के मालिक/संपादक ने ही नहीं ली। ऐसे मामलों में पत्रकारिता के मूल्यों और आचार संहिता को उद्दंडता से तोड़ने में अगुआई करने वाले टाइम्स ग्रुप ने भी अपने खाऊ-कमाऊ पत्रकारों से सीख लेकर मीडियानेट नाम का जंजाल बनाया और उसके जरिये पैसे लेकर खबरें छापने लगे। दावा किया कि भ्रष्टाचार को रोकने का यह कारगर तरीका है क्योंकि इसमें खबरें बेचने का काम पारदर्शिता और ईमानदारी से किया जाता है। भ्रष्टाचार को सदाचार बनाने की इस दलील को अपन बाद में देखेंगे। अभी तो यह देखें कि रिपोर्टरों के पैसे लेने के उदाहरण से मालिकों ने यह चलन क्यों चलाया।

जैसे कोई-कोई पत्रकार रिश्वत खा लेते हैं वैसे ही ज्यादातर पत्रकार पत्रकारिता का अपना काम समर्पण और सच्चाई और ईमानदारी से भी करते हैं। बल्कि भारत में पत्रकारिता को सम्मान इसीलिए मिला कि संपादकों/पत्रकारों ने बलिदान, तपस्या और लोकहित में समर्पण से काम किया। यहां बात महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी और माखललाल चतुर्वेदी जैसे महान नेता और संपादकों की नहीं है। ‘स्वदेश’ के एक के बाद एक पंद्रह पत्रकारों ने अंडमान में काला पानी काटना मंजूर किया, पर न तो अंग्रेजों का लगाया जुर्माना भरा, न उनका कहा छापा। वे कोई प्रसिद्ध और महान नेता नहीं थे। हम उनके नाम तक नहीं जानते ऐसे मामूली लोग थे वे। और ऐसा नहीं कि आजादी के आंदोलन के कारण ऐसे पत्रकार पैदा हुए। सन पचहत्तर में इंदिरा गांधी ने इमरजंसी सेंसरशिप लगाई तो उसका भी विरोध मालिकों, संपादकों, पत्रकारों ने किया। कुलदीप नैयर जेल गए, मुलगावकर और इस कलम घसीट ने इस्तीफे दिए और कितने पत्रकारों ने अखबार बंद किए या भूमिगत पत्रकारिता की। आज भी अपने काम पर अड़ जाने वाले पत्रकार आपको मिल जाएंगे।

क्या बात है कि इनको मालिक और प्रबंधन उदाहरण नहीं बनाते लेकिन एक रिपोर्टर या एक आर्थिक पत्रकार पैसे खा लेता है तो वे उससे सीख लेकर वही करने लगते हैं जो रिश्वतखोर पत्रकार ने किया था। भला और ईमानदार पत्रकार मालिकों के सम्मान और गर्व का पालन किया जाने वाला उदाहरण क्यों नहीं बनता और रिश्वतखोर पत्रकार से सबक वे क्यों ले लेते हैं? जिस रिपोर्टर ने उम्मीदवार से पैसे लेकर उसकी खबरें छापीं उसे हमारे मालिक/संपादक ने अखबार और पत्रकारिता से बाहर करके अपने पूरे स्टाफ के सामने सख्त उदाहरण क्यों नहीं रखा? इकनॉमिक टाइम्स ने अपने रिश्वतखोर पत्रकारों को निकालकर मिसाल क्यों नहीं बनाई कि ऐसा जो करेगा वह पत्रकारिता में टिक नहीं सकेगा? क्योंकि हम उसी के रास्ते पर चलते हैं जिसका रास्ता हमें अच्छा लगता है। अपने मालिक और प्रबंधन भ्रष्ट और रिश्वतखोर पत्रकारों का उदाहरण लेते हैं क्योंकि वे भी वही करना चाहते हैं जो उनके मुलाजिम ने पैसे बनाने के लिए किया।

भ्रष्टाचार को सदाचार बनाने की टाइम्स की दलील का मतलब है कि बलात्कार करना और उसकी इच्छा रखना स्वाभाविक है और हर आदमी चाहता है। इसलिए आपके घर की किसी मां, बेटी, बहन, भाभी आदि से कोई बलात्कार कर जाए तो नाहक हो हल्ला और पाखंड मत करो। बलात्कार को कानूनी रूप से मंजूर कर लो। उसके खिलाफ दंड और वर्जना मत बढ़ाओ। बलात्कार से पैदा हुए बच्चे/बच्ची का तिलक करो और वैध उत्तराधिकारी मान लो। इससे बलात्कार भ्रष्टाचार नहीं रहेगा और सदाचार हो जाएगा। आखिर बलात्कार आदमी की सजह प्रवृत्ति है और स्वस्थ और सभ्य समाज सहज प्रवृत्तियों को मानकर ही विकास करता है। जैसे नवउदार पूंजीवाद लालच, सट्टाखोरी और धोखाधड़ी को आर्थिक विकास की प्रेरणाएं मानता है। और पंद्रह सितंबर दो हजार आठ के दिन वॉल स्ट्रीट के दिवाले के बाद भी वित्तीय पूंजीवाद को अमर और बाजार को स्वयंभू मानता है।

अब दिक्कत यह है कि खुले से खुले आदिवासी समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों में स्वतंत्रता और उदारता होती है। लेकिन एक बार विवाह हो जाए और बना रहे तो व्यभिचार बर्दाश्त नहीं होता। हत्याएं हो जाती हैं और स्त्री-पुरुष अलग हो जाते हैं क्योंकि गृहस्थ जीवन वफादारी और एक-दूसरे में विश्वास के बिना नहीं चल सकता। दरअसल मनुष्य का कोई भी कार्य व्यापार संबंध और विश्वास के बिना नहीं टिक सकता। व्यापार-व्यवसाय और उद्योग भी बिना विश्वास के नहीं चल सकता। पूंजीवाद में भी सबसे महत्वपूर्ण तो ‘कांट्रेक्ट’ करार ही है। पत्रकारिता अखबार और पाठक में विश्वास और मालिक, संपादक और पत्रकार में आपसी विश्वास से ही होती है। विज्ञापन को खबर बनाकर छापना, बिना बताए कि यह पैसा लेकर छापी गयी है, पाठक के विश्वास को तोड़ना और उसके साथ खेल करना है। खबर को अखबार की पवित्र जगह इसीलिए कहा जाता है कि वह पाठक के विश्वास की जगह है। दुनिया में कहीं भी पाठक खबर के लिए अखबार लेता है, विज्ञापन के लिए नहीं। विज्ञापन देने वाले जानते हैं कि पाठक विज्ञापन पर उतना भरोसा नहीं करता जितना खबर पर करता है, इसीलिए तो वे विज्ञापन की खबर बनवाकर छपवाना चाहते हैं।

जिन मालिकों और अखबारों ने आम चुनाव में चुनाव की खबरों के साथ यह धोखाधड़ी की है उनने तो उस लोकतंत्र से ही खिलवाड़ किया है जो प्रेस की स्वतंत्रता की गारंटी करता है। लोकतंत्र में पत्रकारिता का धर्म है कि वह चुनाव के समय वोटरों को सच्ची और प्रामाणिक खबरें दे और उन्हें अपना ठीक फैसला करने में मदद करे। हमने देखा कि अखबारों ने काला पैसा बनाने के लिए पत्रकारीय धर्म छोड़ा और पाठकों से धोखाधड़ी की। यह प्रेस की स्वतंत्रता, विश्वसनीयता और लोकतंत्र में प्रेस की भूमिका को नष्ट करने का निर्लज्ज धतकरम है। आप यह भी देखेंगे कि जिन अखबारों ने पत्रकारीय कर्तव्य और धर्म छोड़कर ऐसे काले धंधे से कमाई की वही मतदाता जागरण के अभियान चला रहे थे। बिल्कुल अपने जमाखोर, मुनाफाखोर व्यापारियों की तरह, जो काली कमाई से दान-पुण्य करके गंगा में डुबकी लगाते हैं। इन लोगों ने समाचार पत्र का काम छोड़कर छापेखाने का काम किया है। इसलिए इनका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाना चाहिए और इनको प्रिंटिंग प्रेस का लाइसेंस लेना चाहिए। इसी तरह जिस उम्मीदवार की जितनी खबरें छपी हैं वे सब विज्ञापन की दर से उसके चुनाव खर्च में शामिल की जानी चाहिए। कानून न हो तो अगली संसद को बनाना चाहिए।

वे कहते हैं कि पत्रकारिता तो व्यापार भी है और व्यापार में तो कमाई का कोई तरीका कोई आजमाता है तो सभी उसे अपनाते हैं। इस देश में व्यापार में खुली होड़ और कमाई करने की छूट और आजादी है। इसलिए सभी अखबार पैसे लेकर खबरें छापने लगे हैं और इस चलन से कोई बच नहीं सकता। यह सरासर झूठ है। हमारे मित्र हरिवंश ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक ही नहीं हैं, वे उसका पूरा प्रबंधन देखते हैं और वित्तीय व्यवस्था भी करते हैं। उनने पैसे लेकर खबरें छापने के काले धंधे के खिलाफ अपने अखबार में अभियान तो चलाया ही, पहले पेज पर ‘खबरों का धंधा’ शीर्षक से लेख भी लिखा। उनने अपनी आचार संहिता छापी। साफ कहा कि प्रेस विज्ञप्ति, इंटरव्यू, विश्लेषण, फोटो, उम्मीदवारों के साथ दौरे जैसे पत्रकारीय कर्तव्य को हम हमेशा अपने धर्म की तरह निबाहेंगे। हमारा कोई भी पत्रकार इसका उल्लंघन करे तो इस नंबर और पते पर शिकायत कीजिए, हम तत्काल कार्रवाई करेंगे। उनने इस काले धंधे के खिलाफ दूसरे पत्रकारों के लेख और पाठकों के पत्र भी छापे। हरिवंश को विज्ञापन चाहिए, लेकिन उनने कहा, हम खबरों की अपनी पवित्र जगह नहीं बेचेंगे। ‘प्रभात खबर’ फल-फूल रहा है।

तो साफ है कि जिन अखबारों ने काला पैसा लेकर पाठकों को बिना बताए विज्ञापन को खबर बनाकर छापा है उनने पत्रकारिता और व्यवसाय दोनों के साथ धोखाधड़ी की है। सावधान हो जाइए, जिसे आपने अपने लोकतंत्र और सभ्य समाज की निगरानी के लिए चौकीदार बनाया था वही चोर हो गया है। और इसकी सजा तो पाठक समाज को ही देनी होगी। ढिलाई पत्रकारिता को खत्म कर देगी।

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ख़बरों के पैकेज का काला धंधा

ख़बरों का सौदा होता है। ये हम ही नहीं, हिंदी के सबसे बड़े पत्रकार प्रभाष जोशी भी कह रहे हैं। 10 मई को “जनसत्ता” में उन्होंने इस डरावने सच को बयां किया। उनके लेख से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आज प्रेस कितना स्वतंत्र है और कितना बिकाऊ। ये भी अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस देश में अख़बार और न्यूज़ चैनल पैसों के लिए ईमान-धर्म बेच चुके हों वहां आम आदमी की आवाज़ सत्ता के गलियारों तक कैसे पहुंचेगी? प्रभाष जी का ये लेख आप भी पढ़िये और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की मौत पर दो मिनट का मौन रखिये।
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उनका कुछ नाम भी है और काम भी। बरसों से हमारे दोस्त हैं। लेखक और समाजसेवी पिता के कारण बचपन से पत्रकारिता करने लगे। समाज को बदलने और बनाने की तलवार मान कर। पिछले आठ-दस साल से कोई अख़बार उन्हें नहीं रखता। सब इज्जत करते हैं। अपनी रोजी चलाने और रुचि बनाए रखने के लिए तरह-तरह के काम करते हैं। जैसे इस बार उनके एक दोस्त लोकसभा का चुनाव लड़े तो उनका मीडिया प्रबंधन किया। वह सब अपनी आंखों से देखा और महसूस करते हुए विचलित हुए जो आजकल हमारे अख़बार और टीवी चैनल कर रहे हैं। उनने डायरी लिखी। उसके कुछ पन्ने यहां देकर अपनी बात कह रहा हूं। आगे की कार्रवाई की रणनीति के तहत न उनका नाम दे रहा हूं न उनकी डायरी में आए नाम।

“बहुत सवेरे …. के संवाददाता का फोन आया। हालचाल पूछे। मैंने जानना चाहा अचानक …. के तीन तीन फोटो कैसे आ रहे हैं? वे बोले – उनने महंगा पैकेज लिया है। …. जी ने दो लाख दिए हैं। वहां से उनकी ख़बरें आप देखते हैं? उनने सबसे महंगा पैकेज लिया है, पांच लाख का। यह फोन इसलिए किया कि आप लोगों का पैकेज पूरा हो रहा है। आज आपके …. आने वाले हैं। रिचार्ज करवा लीजिए तभी हम कवर कर पाएंगे। दस दिन की ही तो बात है। बड़ा पैकेज ले लीजिए, सब कवर हो जाएगा।

रात में …. …. के किसान से दिखते एक सज्जन कैप लगाए आए। उनने अपने अख़बार को यह कह कर बेचने की कोशिश की कि नामांकन तक तो हमने फ्री ख़बरें देने का निर्णय लिया था। अब पैकेज जे लीजिए। कैसा पैकेज? तभी उनके पास …. …. से फोन आने लगे। न्यूज़ इंचार्ज और विज्ञापन मैनेजर के। हमारा उम्मीदवार उन्हें मोटी मुर्गी लग रहा था। उनसे बात पक्की करने के बाद नींद उड़ गई। कभी हम भी चुनाव कवर करने जाते थे। लेकिन अब इन पत्रकारों को देख कर तो मेरे होश उड़ रहे हैं। सबसे होशियार … … के संवाददाता हैं। कह रहे थे कि … … के कॉलम पढ़-पढ़ कर पत्रकारिता सीखे हैं। कैसे उनके पिता अदालत में काम करते हुए भी सदा ईमानदार बने रहे। उनने हर उम्मीदवार से पचास-पचास हजार लिये हैं। पैकेज वाले अख़बारों का पैसा तो पटना, लखनऊ और दिल्ली गया होगा। लेकिन इनका पैसा तो यहीं के बैंक में जमा हुआ होगा ना!

यहां कांशीराम जी सिद्धांत काम कर रहा है। जिसकी जितनी संख्या भारी उतनी उसकी भागीदारी। यहां दो पार्टियों वाला मॉडल काम कर रहा है। …. …. का इतना सर्क्युलेशन है और …. … इतना। …. … तो ढूंढे भी नहीं मिलता। अलबत्ता चैनलों की भीड़ है। कुछ संवाददाता तो दो-दो माइक लिये घूम रहे हैं। फोटोग्राफरों की भी चांदी है। पैसों के मुताबिक वे सभी उम्मीदवारों की तस्वीरें खींचते हैं।

20-04-09
आज एक प्रमुख दैनिक के स्थानीय प्रतिनिधि अपने विज्ञापन इंचार्ज के साथ आए। उनके अख़बार ने सभी उम्मीदवारों की तस्वीरें छापी थीं। निर्दलीय उम्मीदवार की तस्वीर गायब थी। शायद कहना था विज्ञापन दो वरना तस्वीर के लिए तरसो। संवाददाता कह रहे थे – मैंने ख़बर भेजी थी पर वहां एक जाति विशेष के संपादक हैं। छापेंगे नहीं। यानी पैकेज के बिना अख़बार में खिड़की-दरवाजे नहीं खुलेंगे।

21-04-09
एक स्थानीय पत्रकार ने पैकेज, रिचार्ज, विज्ञापनों के जरिये अख़बार को मनाने जैसे सभी प्रस्तावों पर पलीता लगा दिया। बेहद विनम्र और आने पर हर बार पैर छूने वाले …. …. ने स्थानीय संपादक को एक फूटी कौड़ी नहीं दी। उसकी अपनी जेब ही फूलती जा रही है। स्थानीय संपादक एक जाति विशेष का है और एक दबंग उम्मीदवार भी उसी जाति का। इस पत्रकार ने संपादक को समझाया कि हमने उससे डील की तो जाति समीकरण बिगड़ सकता है। दूसरे उम्मीदवार जो मंत्री हैं उनके बारे में कहा कि वे सरकारी विज्ञापन दिलवाते रहेंगे, उनसे क्या लेन-देन करना। दिल्ली में जाने-माने और खूब पहचान रखने वाले एक उम्मीदवार के बारे में कहा कि जब उनसे मिलने गया तो वे फोन पर शोभना भरतिया से बात कर रहे थे। उनसे क्या पैकेज लिया जाए।
असलियत यह है कि इन चतुर सुजान पत्रकार ने सबसे पैसा लिया। वह न संपादक को गया न अख़बार को। बाद में कहा जाने लगा कि धन तो दिया गया है। किसके पास कितना गया कौन जानता है। हिसाब-किताब तो होता नहीं। ‘पैकेज’ चूंकि काले धन का धंधा है, उम्मीदवारों का काला धन ही अख़बारों को मिल रहा है। बहुत जोर देने पर किसी के भी नाम पर किसी से भी रसीद दिलवा देते हैं। लेने देने वाले दोनों ही हिसाब-किताब से और आयकर से भी मुक्त हैं। पैकेज के बहाने अख़बारों और चैनलों में काला अर्थशास्त्र चल रहा है।
आग्रह करने पर यह रसीद मिली।
प्रायोजित ख़बर व विज्ञापन मद 1 लाख 90 हजार (एक लाख नब्बे हजार रुपये) प्राप्त किया।
_ _ _ दैनिक _ _ _ 25-4-09

डायरी पढ़ने के बाद इन दोस्त से मैंने कवरेज का तरीका पूछा। उनने कहा – सवेरे वे सब हमारे दफ़्तर आते। उनके लिए गाड़ी, रास्ते में पीने का पानी, नाश्ता आदि तैयार किया जाता। भोजन का पैसा नकद देना पड़ता। तय रेट के हिसाब से रोज का खर्चा-पानी अलग होता। चैनल वालों में छठे वेतन आयोग का वेतन पाने वाले दूरदर्शन के लोग भी होते। हमारी गाड़ियों में निकलने के पहले वे दूसरे उम्मीदवारों से भी प्रबंध करते। किसी से पेट्रोल के पैसे लेते, किसी से गाड़ी के। खर्चा-पानी की रकम बाद में वसूल करते। एक संवाददाता तो बेचारा पैकेज के पैसे लेने के लिए रात को दो बजे तक दरवाजे के बाहर बैठा रहा। इस बीच उसके मोबाइल पर जगह-जगह से फोन आए। पैसे मिलने तक उसका तनाव देखने और दया करने लायक था। सच, वहां कोई पत्रकार नहीं था। सब एजंट थे। उन्हें अपने अखबारों और चैनलों से कमीशन मिलता था। फिर भी अपना काम करने के पूरे से भी ज्यादा पैसे वे उम्मीदवार से वसूल करते थे। उनके भुगतान पर बारगेनिंग तो हो सकती थी लेकिन पैसे तो देने ही पड़ते हैं। चुनाव प्रचार का काम ही ऐसा है कि उसमें न हिसाब रखा जा सकता है, न ना की जा सकती है।

सब सुन कर और भयभीत होकर मैंने पूछा कि इसका मतलब यह कि आपके चुनाव क्षेत्र की चुनाव से संबंधित कोई भी ख़बर, फोटू, विश्लेषण किसी न किसी उम्मीदवार से पैसा लिये बिना नहीं छपी है। उनने कहा- एकाध अपवाद होगा। नहीं तो चुनाव का सारा कवरेज सभी अख़बारों में पैसा लेकर किया गया है। इसमें पत्रकारिता और पाठक को सूचना और राय देने की कोई जिम्मेदारी नहीं है। यह सरासर पैकेज का धंधा है और पाठक/वोटर को सरासर बुद्धू मान कर किया गया है। जिसने पैकेज नहीं लिया या छोटा लिया, लगातार रिचार्ज नहीं करवाया उसका नाम और फोटू अख़बारों से गायब रहा।

जरूरत नहीं थी कि अपने दोस्त की बात पर विश्वास न करूं। लेकिन “वॉल स्ट्रीट जरनल” की वेबसाइट पर उसके नई दिल्ली ब्यूरो चीफ पॉल बेकेट का लेख छपा है “प्रेस कवरेज चाहिए? मुझे कुछ पैसा दो”। पॉल ने चंडीगढ़ के निर्दलीय उम्मीदवार अजय गोयल का अख़बारों में नाम तक न छपने का कारण बताया है- कवरेज चाहिए? पैसा देना पड़ेगा। गोयल ने पॉल बेकेट को बताया – अख़बार मालिकों, संपादकों और संवाददाताओं की तरफ से कोई दस दलाल और जनसंपर्क अधिकारी उनसे मिल चुके हैं। ख़बरें छपवानी हैं तो फीस दो। एक ने तीन सप्ताह के कवरेज के दस लाख मांगे। एक संवाददाता और फोटोग्राफर ने दो सप्ताह तक पांच अख़बारों में कवरेज के उनके लिए डेढ़ लाख और बाकी के रिपोर्टरों के लिए तीन लाख मांगे। परखने के लिए अजय गोयल ने झूठ के पुलिंदों की ख़बर बना कर दी। वह अख़बारों में हूबहू छप गई। अपने अभियान में उनने कवर करने वाला एक भी रिपोर्टर नहीं देखा। साक्षरता और शिक्षा का क्या मतलब है, अगर लोग सच्ची ख़बर, ईमानदार छानबीन, शंकालु और सवाल पूछने वाला रिपोर्टर तक पा नहीं सकते- अजय गोयल ने पॉल बेकेट से पूछा।

बनारस से हमारे एक मित्र ने चंदौली- मुगलसराय और वाराणसी के ‘हिंदुस्तान’ के 15 अप्रैल 2009 और 16 अप्रैल 2009 के नगर संस्करण की फोटो कॉपियां भेजी हैं। 15 अप्रैल के इस ‘हिंदुस्तान’ के पहले पेज का ले-आउट, उनने लिखा है, रोजाना की तरह था। ऊपर तीन कॉलम में फोटू, लीड, सेकेंड लीड, डबल कॉलम और तीन कॉलम ख़बरें, बॉटम न्यूज़। लेकिन अंतर बस इतना था कि इन सभी ख़बरों और तस्वीरों के केंद्र में थे माननीय तुलसी। ये तुलसी एक प्रत्याशी हैं। इन्हीं को समर्पित इस प्रथम पेज की कुछ हेडिंग इस प्रकार हैं – केवल वादा नहीं कर्म करने में करते हैं विश्वास : तुलसी (लीड न्यूज़), जाति-धर्म नहीं सिर्फ विकास के लिए लड़ना है : तुलसी (सेकेंड लीड), पूर्वांचल राज्य बनाकर विकास कराएंगे : तुलसी (तीन कॉलम न्यूज़), किसानों की खुशहाली को सर्वोच्च प्राथमिकता (बॉटम न्यूज़)। चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए तुलसी की ही तीन कॉलम की तस्वीर सबसे ऊपर छपी है।

मित्र लिखते हैं कि इस अख़बार के पहले पेज को देख कर पाठकों, प्रत्याशियों और आम लोगों ने हल्ला किया। दूसरे दिन यानी 16 अप्रैल को हिंदुस्तान के पहले पेज पर स्पष्टीकरण छपा। स्पष्टीकरण : “हिंदुस्तान के चंदौली, मुगलसराय एवं वाराणसी नगर संस्करणों में बुधवार 15 अप्रैल 2009 को प्रकाशित पहला पृष्ठ वास्तव में एक राजनीतिक दल के प्रत्याशी का चुनावी विज्ञापन है। उसमें प्रकाशित सामाग्री का हिंदुस्तान के संपादकीय विचारों से किसी प्रकार का तादात्म्य नहीं है – प्रमुख संपादक।”

मित्र ने दोनों दिनों के अख़बार के पहले पेट की फोटो कॉपी भेजते हुए पूछा है – “जिस दिन पहले पेज पर यह सामाग्री छपी उसी दिन पाठकों को बताया क्यों नहीं गया कि यह विज्ञापन है, हमारी ख़बरों का पहला पेज नहीं, और हिंदुस्तान के संपादकीय विचारों से इनका कोई तादात्म्य नहीं है। क्या यह पहला पेज संपादकीय जानकारी और अनुमति के बिना छप गया? और जिस दिन स्पष्टीकरण छपा उसी दिन वाराणसी में वोट पड़े थे।”

पटना से हमारे एक और पाठक ने 16 अप्रैल 2009 के ‘हिंदुस्तान’ के पटना नगर संस्करण के पहले पेज की फोटोकॉपी भेजी है। इसमें आठ कॉलम का बैनर शीर्षक है – कांग्रेस बिहार में इतिहास रचने को तैयार। पहले पेज की किसी भी ख़बर से इस बैनर लाइन का कोई लेना-देना नहीं है। यानी यह किसी ख़बर का शीर्षक नहीं है। मित्र ने पूछा है पाठक बूझे तो जाने, लीड की यह हेडिंग टिकाऊ है या बिकाऊ?

और आखिर में दिल्ली के एक संपादक ने यह सत्यकथा सुनाई। दिल्ली से लगे एक राज्य के मुख्यमंत्री यह देखकर हैरान रह गए कि एक चुनाव क्षेत्र के एक उम्मीदवार की एक सभा की ख़बर छप जाने के बाद उसी अख़बार के पहले पेज पर तीन दिन बाद बहुत महत्व के साथ बॉक्स में फिर छपी। इसमें बताया गया कि लाखों की भीड़ थी। मुख्यमंत्री ने उस अख़बार के मालिक को फोन किया कि यह क्या हो रहा है? मालिक ने कहा कि मालूम करके बताता हूं। दस मिनट बाद उनका फोन आया – हां, वह विज्ञापन है। ऐसे विज्ञापन हम छापते हैं।

मुख्यमंत्री ने अख़बार मालिक को कहा – तो ठीक है। कल मेरी तरफ से पहले पेज पर विज्ञापन छापिये कि यह अख़बार झूठा है। पैसे लेकर विज्ञापन को ख़बर बना कर छापता है।
पता नहीं उस विज्ञापन का क्या हुआ। अब तक किसी अख़बार के पहले पेज पर दिखा तो नहीं।

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