बेचैन उम्मीदों के सूरज और आशंकाओं के कुहासे
हुक्मरां जब दबाव में आते हैं तो उनकी दृष्टि बेहद सीमित और संकुचित हो जाती है। उन्हें दूर का दिखना बंद हो जाता है और कभी-कभी वे ऐसे फैसले लेते हैं, जो आगे चलकर विनाशकारी साबित होते हैं। क्या तेलंगाना राज्य के गठन का वायदा भी ऐसा ही साबित होगा? आशंकाओं के बगुले फ़िजाओं में तैरते दीख रहे हैं।
चंद्रशेखर राव का अनशन जब 11वां दिन लांघ रहा था तो तनाव भी चरम पर पहुंच रहा था। अनजानी आंशकाओं को समझते हुए हैदराबाद के स्कूल संचालकों ने अपने दरवाजे बंद कर दिए थे, ताकि किसी आशंकित अनहोनी का असर नन्हे-मुन्नों पर न पड़े। पृथक तेलंगाना आंदोलन के हिंसक दिन भले ही चार दशक पुराने हो गए हों, पर फिर भी जागरूक लोगों के जेहन में उनकी यादों की तपिश से सुलग उठे थे। पता नहीं कब के विस्मृतियों में खो चुके पोट्टि श्रीरामुलू की शहादत का जिन्न नई दिल्ली से नागपट्टम की सड़कों पर विचरने लगा था। कौन थे ये पोट्टि श्रीरामुलू? लोग उन्हें भूल गए हैं, पर ये एक ऐसे समाजसेवी थे जिन्होंने अपना जीवन आंध्र प्रदेश के लिए गंवा दिया था। वे मद्रास से आंध्र को अलग करने की मांग को लेकर जब अनशन पर बैठे, तो भले ही मन ही मन कितने दृढ़ रहे हों, सरकार उन्हें लेकर गंभीर नहीं थी। भूख और प्यास से उपजी मौत से श्रीरामुलू 58 दिन तक जूझते रहे। अंतत: उनकी जिंदगी हार गई। इसके बाद तो ऐसा हंगामा बरपा हुआ कि जवाहरलाल नेहरू को जिद छोड़नी पड़ी। पृथक आंध्र प्रदेश पोट्टि की मौत के साथ ही जन्मने लगा था। Read more
जागरण नंबर वन, भास्कर कमजोर, हिंदुस्तान मजबूत
November 23, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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दैनिक जागरण और टाइम्स ऑफ इंडिया की बादशाहत बरकरार है। दैनिक जागरण ने इस साल राउंड वन की तुलना में हल्की बढ़त हासिल की है। लेकिन उसके लिए बुरी ख़बर पिछले साल की तुलना में उसके पाठकों की संख्या में करीब दस लाख की कमी आई है। जबकि सबसे अधिक बढ़त हासिल की है दैनिक हिंदुस्तान ने।
आईआरएस 2009 राउंड टू के नतीजों के मुताबिक दैनिक जागरण के पाठकों की संख्या 547.9 लाख रही है। हालांकि यह संख्या इसी साल राउंड वन (545.8 लाख) की तुलना में थोड़ी अधिक है, लेकिन 2008 राउंड टू की तुलना में काफी कम। तब पाठकों की संख्या 557.4 लाख थी। इसका मतलब यह निकला की दैनिक जागरण के करीब दस लाख पाठक कम हुए हैं। Read more
तो “हिंदुस्तान” को चाहिए अलग “रुहेलखंड”
October 10, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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आज से हिंदुस्तान का बरेली संस्करण शुरू हो गया है। आज के दौर में अख़बारों से आंदोलन की उम्मीद नहीं की जाती। वो सूचना देने से अधिक मनोरंजन के साधन हैं। कोई भी अख़बार अपना नया संस्करण विस्तार की योजना और मुनाफ़े को ध्यान में रख कर शुरू करता है। लेकिन हिंदुस्तान के प्रधान संपादक की माने तो बरेली संस्करण को लॉन्च करने के पीछे एक और लक्ष्य है। उत्तर प्रदेश में अलग रुहेलखंड के स्वरों को मजबूती देने का लक्ष्य। हो सकता है कि मार्केटिंग स्ट्रेटेजी के तहत पाठकों की संवेदनाओं के साथ खुद को जोड़ने के लिए यह नारा बुलंद किया गया हो, लेकिन इससे कई सवाल उठते हैं। आप हिंदुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर का लेख पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। - मॉडरेटर Read more
रुहेलखंड में कल से हिंदुस्तान, आज छपेगी पहली प्रति
October 9, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदुस्तान का नया संस्करण शनिवार को लॉन्च हो रहा है। मतलब आज रात इसकी पहली प्रति छापी जाएगी। इसके लिए टीम पूरी तरह तैयार है। समूह संपादक शशि शेखर बरेली पहुंच चुके हैं। हिंदुस्तान का ये संस्करण रुहेलखंड इलाके के पांच जिलों – बरेली, पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखिमपुर और बदायूं, को ध्यान में रख कर शुरू किया जा रहा है।
हिंदुस्तान के इस संस्करण की छपाई बरेली में होगी और शुरू में अस्सी हज़ार प्रतियां छापी जाएंगी। दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और अमर उजाला के बाद हिंदुस्तान इस वक़्त देश का चौथा सबसे बड़ा अख़बार है। आईआरएस सर्वे के मुताबिक उसके पाठकों की संख्या करीब 2.68 करोड़ है। और नए संस्करण के बाद उसी स्थिति और मजबूत होगी। Read more
पहले पन्ने से गोल नरसंहार, पुलिस से 10 हाथ आगे अख़बार
October 4, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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बिहार में फिर जातीय नरसंहार हुआ है। खगड़िया में अमोसी गांव के करीब 16 लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी है। मारे गए लोगों में पांच किशोर हैं। इस हत्याकांड से सभी सकते में हैं। कई साल बाद बिहार में जातीय नरसंहार की वारदात हुई है। तो हड़कंप मचेगा ही। इस घटना को लेकर मीडिया में भी तीखी प्रतिक्रिया है। अमूमन सभी अख़बारों ने इस ख़बर को प्राथमिकता से छापा है। सिवाय हिंदी के हिंदुस्तान के।
हिंदुस्तान के दिल्ली संस्करण में यह ख़बर पहले पन्ने पर नहीं है। यह जानते हुए भी कि दिल्ली की आबादी में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों की अच्छी खासी आबादी है। हिंदुस्तान के इस रवैये से थोड़ी हैरानी होती है, लेकिन उससे भी ज़्यादा हैरानी इसलिए कि बिहार की एक ख़बर को पहले पन्ने पर जगह मिली है। वो ख़बर है कि “मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सुरक्षा दोगुनी की गई” उस ख़बर के मुताबिक – Read more
हिंदुस्तान के पहले पन्ने से ग़ायब रही क्वात्रोकी की ख़बर?
October 1, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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बोफोर्स घोटाले के बारे में इस देश का हर जागरुक शख़्स जानता है। वो यह भी जानता है कि उस घोटाले का आरोपी कौन है और कहां का रहने वाला है? ऐसे में यह ख़बर आए कि मनमोहन सरकार ने बोफोर्स घोटाले में इटली के ओट्टावियो क्वात्रोकी के ख़िलाफ़ मुक़दमे को बंद कराने का अंतिम फ़ैसला ले लिया है तो उस पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी? आप सोच में पड़ जाइएगा। यह जानते हुए भी कि क्वात्रोकी को सज़ा दिलाने की औकात भारतीय जांच एजेंसियों में नहीं है – केंद्र सरकार का यह फ़ैसला सोचने पर मजबूर करता है। ख़ासतौर पर… जब देश की कमान कांग्रेस के हाथ में है और कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथों में। Read more
“हिंदुस्तान” की कोशिश के बावजूद लुट गई लाज
September 27, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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हिंदुस्तान के पहले पन्ने पर छपी तस्वीर
दैनिक जागरण और टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक बार फिर साबित किया है कि वो सर्कुलेशन में नंबर वन ऐसे ही नहीं बन गए हैं। आज आप इन दोनों अख़बारों के दिल्ली संस्करण के पहले पन्ने को देखेंगे तो आपको वहां भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच से जुड़ी एक-एक तस्वीर मिलेगी। टाइम्स ऑफ इंडिया में वो तस्वीर गौतम गंभीर की है, जबकि दैनिक जागरण में राहुल द्रविड़ की। तस्वीर के हेडर में भारत और पाकिस्तान के बीच देर रात तक चले मुकाबले का नतीजा दिया हुआ है। बताया गया है कि भारत यह मैच हार गया है। नीचे कैप्शन में लिखा है कि गंभीर और द्रविड़ की शानदार पारियां किसी काम नहीं आईं और पाकिस्तान ने भारत को 54 रन से हरा दिया।
इस देश में क्रिकेट जुनून है। यही वजह है कि हर अख़बार में खेल के दो-तीन पन्ने होते हैं और उनमें ज़्यादातर क्रिकेट से ही जुड़ी जानकारियां होती हैं। लेकिन कुछ अख़बारों का रवैया क्रिकेट को लेकर बहुत लापरवाह है। इनमें हिंदी में सबसे आगे है हिंदुस्तान। हमने जनतंत्र के पाठकों को बताया था कि कैसे 20-20 विश्व कप के दौरान जिस बेहद अहम मैच में हार से भारत टूर्नामेंट से बाहर हो गया था, उसमें भी अख़बार को पढ़ने से लगता था कि भारत मैच जीत गया है। ठीक उसी तरह आज भी यही लग रहा है कि भारत मैच जीत गया है। पहले पन्ने पर नेहरा और रैना की तस्वीर है और उसका हेडर है दिल्ली के छोरे ने रखी लाज। इस हेडर को देख कर पहली नज़र में यही लगता है कि भारत मैच जीत गया है और दिल्ली के नेहरा की वजह से मैच जीता है। लेकिन दैनिक जागरण पर नज़र डालते ही पता चलता है कि अरे लाज तो लुट गई है। फिर हिंदुस्तान कौन सी लाज को बचाने की बात कर रहा है। Read more
हिंदुस्तान छोड़, लोकमत चले वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त
September 25, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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हिंदुस्तान से वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने इस्तीफा दे दिया है। वो अब लोकमत समाचार, नागपुर में एक्जीक्यूटिव एडिटर का कार्यभार संभालेंगे। जयशंकर गुप्त काफी सीनियर पत्रकार हैं और हिंदुस्तान से पहले रविवार, नवभारत टाइम्स और इंडिया टुडे जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। जनतंत्र से बातचीत में जयशंकर गुप्त ने इस्तीफ़ा देने की पुष्टि कर दी।
जयशंकर गुप्त ने यह भी साफ किया कि उनके इस्तीफे को हिंदुस्तान में नए समूह संपादक शशि शेखर की नियुक्ति से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि “लोकमत समाचार ज्वाइन करने का फैसला एक महीने पहले ही हो गया था। लेकिन तभी हिंदुस्तान से मृणाल पांडे को जाना पड़ा। उस सूरत में अगर मैं भी इस्तीफ़ा देता तो उसे मृणाल पांडे की विदाई और शशि शेखर की नियुक्ति से जोड़ कर देखा जाता। इसलिए मैंने इस फ़ैसले को एक महीने के लिए टाल दिया।” जयशंकर गुप्त ने यह जानकारी हिंदुस्तान के संपादक शशि शेखर को भी दी। जिसके बाद शशि शेखर ने उन्हें इस बड़ी जिम्मेदारी के लिए बधाई देन के साथ भविष्य की चुनौतियों के लिए शुभकामनाएं भी दीं। Read more
“नारे उन्होंने ही लगाए, जिन्होंने मैनेजरों से फायदे उठाए”
September 14, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर के इंटरव्यू का यह दूसरा हिस्सा है। जनतंत्र को उन्होंने यह इंटरव्यू हिंदुस्तान में समूह संपादक की जिम्मेदारी संभालने से ठीक एक दिन पहले यानी तीन सितंबर को दिया। तब वो अमर उजाला के समूह संपादक थे। इस इंटरव्यू का पहला हिस्सा जनतंत्र के पाठक पढ़ चुके हैं। उसमें हिंदुस्तान को लेकर उनकी योजनाओं के बारे में बात की गई थी। आज के हिस्से में अमर उजाला में उनके अनुभवों का जिक्र है। अमर उजाला के मालिकों से उनके संबंधों का जिक्र है। उनके अलावा शशि शेखर ने कुछ सामाजिक मुद्दों पर भी अपना नज़रिया साझा किया है। संपत्ति की घोषणा पर बात की। साथ ही पत्रकारिता और सत्ता के बीच गठजोड़ पर भी अपनी राय जाहिर की। आप उनका यह इंटरव्यू पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। - मॉडरेटर
समरेंद्र - अमर उजाला का अनुभव कैसा रहा? आप वहां मेरठ के संपादक बन कर गए। फिर ग्रुप एडिटर बने।
शशि शेखर – (बीच में टोकते हुए) यह ग़लत बात है। यह उड़ाई हुई बात है कि मैं स्थानीय संपादक बन कर गया था। यह बिल्कुल ग़लत है। मैं “आज तक” में काम करता था। यहां आने से पहले श्री अतुल माहेश्वरी और श्री अशोक अग्रवाल से मेरी कई महीने बात होती रही। दोनों के समान स्नेह का मैं भागीदार हूं। अजब सी बातें होती रहती हैं। कुछ ऐसे लोग हैं जो फैला देते है। उस समय सोच रहा था कि मैं किसी अख़बार को ज्वाइन करूं या टेलिविजन में रह जाऊं। मैंने इनसे बात की। बात होती रही… होती रही। फिर मैंने इनको डीसेंट्रलाइजेशन की थ्योरी बताई। मेरा मानना है कि अक्सर संपादक आते हैं और वो अपने को लाद देते हैं। मेरा तो कोई एजेंडा नहीं है तो क्यों नहीं चंदौली के जिला संवाददाता को प्रेरित करूं कि वो हमको विचार दे और कठुवा या जम्मू या श्रीनगर में भी उसका उपयोग हो सके। हम विचारशील लोगों का समूह हैं। इस लेटेस्ट सिस्टम में जब संचार के साधन जोरदार हो गए हैं तो हमें उनका प्रयोग करना चाहिए। जब मैंने कहा तो उन्होंने कहा कि ये तो संभव ही नहीं है। अतुल जी हंस कर बोले कि देखो शशि तुम्हारे बारे में और तुम्हारी क्षमता के बारे में किसी से कुछ पूछना नहीं है। तुमने जो काम किया है, उससे सबसे ज़्यादा प्रभावित मैं हूं। लेकिन यार संपादक लोग बातें बहुत करते हैं काम नहीं करते। तो मैंने कहा कि एक बार हो जाए। तय ये हुआ कि पूरा ग्रुप चलाने से पहले एक बार मेरठ और देहरादून चला कर देखो।
आपको जान कर आश्चर्य होगा कि बीस किलोमीटर से कम के दायरे वाले मेरठ में हमने कंप्यूटर लगाए। संवाददाताओं को सिखाया कि वो आठ बजे घर चले जाएं। मैंने कहा कि शिक्षा विभाग के संवाददाता को रात के एक बजे तक काम करने की क्या जरूरत है। मैंने कहा कि आप घर जाइए और क्वालिटी टाइम एन्ज्वॉय कीजिए। मैंने उन्हें एक भाई की तरह समझाने की कोशिश की। सोच के स्तर पर बदलाव की कोशिश हुई। मैं आपको बताऊं कि मुझे अख़बार के मालिकों ने जो दिया वो दिया। मेरे सहयोगियों ने जो दिया वो मेरे लिए अतुलनीय है। मैं अपने सहयोगियों का बहुत आभारी हूं। उन्होंने जो दिया उसे भूला नहीं जा सकता। मैं गदगद, भावुक और कृतज्ञ तीनों हूं।
समरेंद्र – अतुल माहेश्वरी का आपने बार-बार जिक्र किया है। उनके बारे में कुछ बताएं।
शशि शेखर – अतुल माहेश्वरी जी का वैल्यू सिस्टम बहुत जोरदार है। इसका श्रेय आप मुझे दे सकते हैं कि अमर उजाला में हमने समाचार की शक्ल में विज्ञापन नहीं छापे। लेकिन अतुल जी के बगैर यह संभव था क्या? और पूरे निदेशक मंडल के बिना यह संभव था क्या? अतुल जी का मानना है कि अमर उजाला की विश्वसनीयता से हम कोई समझौता नहीं करेंगे। आज जान लीजिए कि हिंदुस्तान के मालिक भी इस मामले में दृढ़ हैं। दिक्कत वहां होती है जब हम दृढ़ता से अपनी बात नहीं रखते। मुझे नहीं लगता कि कोई भी अख़बार मालिक अपनी विश्वनीयता से समझौता करना चाहता है। और हिंदुस्तान टाइम्स वो ग्रुप है जिसने कभी पेज थ्री को मौका नहीं दिया। उस अंधड़ में भी जब एक ग्रुप करोड़ों-अरबों रुपये कमा रहा था, उन्होंने पेज थ्री को जगह नहीं दी। दिक्कत यही हो गई है कि मीडिया में हम लोग कभी-कभी एकांगी बात करते हैं। मेरा मानना है कि एक अच्छे मालिक का दिल नहीं तोड़ना चाहिए। चाहे वो प्रणव रॉय हों, चाहे वो अतुल माहेश्वरी हों, चाहे वो शोभना भरतीया हों या कोई भी हो। हमें उनका सहयोग करना चाहिए। हम अक्सर मान लेते हैं कि वो हमारे शत्रु हैं।
मैं चाहूंगा कि आप एक वाकये का जिक्र करें। जब मैं आज अख़बार में सब-एडिटर था। तो एक दिन यूनियन के लोग मेरे पास चंदा मांगने आए। उन्होंने कहा कि बीस रुपये चंदा दीजिए। मैंने कहा कि क्या करेंगे बीस रुपये लेकर। उन्होंने कहा कि हम मुकदमा लड़ेंगे। मैंने कहा कि मुकदमा लड़ कर क्या करेंगे। उन्होंने कहा कि हम इस अख़बार को बंद करा देंगे। तो मैंने कहा कि भगवन आप अख़बार बंद करा देंगे? उसके लिए आप बीस रुपये मुझसे चाहते हैं। अरे आप किसी का भला करें तो बीस की जगह दो सौ रुपये ले जाइए। इस पर वो आग बबूला हो गए। एक सज्जन बहुत बड़े थे… गालियां देने लगे। मैंने कहा कि गालियां दीजिएगा तो उठा कर पटक दूंगा। गाली वाली नहीं सुनूंगा।
उस दिन मैंने सोचा कि झंडा और डंडा लेकर मालिक से लड़ना जरूरी हो गया तो लड़ेंगे, लेकिन उससे पहले एक बार उसे ठंडे दिमाग से समझाना चाहिए। कहना चाहिए कि हम आपको व्यापार चलाने में मदद करेंगे। उसके बदले में आप मुनाफे का कुछ हिस्सा हमें दीजिए।
अतुल माहेश्वरी ने इसी अख़बार में जूनियर सब-एडिटर का पद समाप्त किया। मुझे नहीं मालूम कि इसकी चर्चा क्यों नहीं होती है। एक अवैधानिक पद था जूनियर सब-एडिटर का। अमर उजाला में हमने ख़त्म किया। हमने सब-एडिटर की सैलरी अवार्ड से कहीं अधिक तय की। 12 हज़ार रुपये। हमने तीन साल पहले कैल्कुलेट किया कि बुलंदशहर जैसे शहर में क्लास टू ऑफिसर की सैलरी जितनी होती है उतना हम अपने जिला संवाददाता को दें तो अच्छा है। लेकिन आप गौर करिए कि क्लास टू ऑफिसर लोक सेवा आयोग के जरिए आता है। अभी पत्रकारों में प्रशिक्षण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। फिर भी हमने एक परंपरा की शुरुआत की। अगर हम झंडा और डंडा लेकर लड़ते तो जो आज अख़बार का हाल हुआ है शायद वही हाल यहां होता। इसलिए मैं यह मानता हूं कि अगर हम अच्छी बात करें। साथियों को अच्छी तरह प्रेरित करें। तो ज़्यादातर मौकों पर बिना लड़ाई के अच्छे नतीजे निकल सकते हैं।
समरेंद्र – अमर उजाला छोड़ने की कोई और वजह है या फिर सिर्फ यही कि एक नई जिम्मेदारी मिली है।
शशि शेखर – (मुस्कुराते हुए, मजाक के लहजे में) ज्योतिषी लोग एक वजह बताते हैं। मुझे बहुत ज़्यादा यकीन नहीं है। पहले शनि की महादशा थी जब आज अख़बार में मैं काम करता था। कहते हैं कि शनि मेरे लिए एक स्थिर ग्रह है। शनि की महादशा में मैंने बीस साल आज अख़बार में काम किया। अत्यंत प्रलोभन मिले। 93 में नवभारत टाइम्स पटना का रेजिडेंट एडिटर बन रहा था। आलोक मेहता जी के बाद। तब मैं कुल 32-33 का था, लेकिन नहीं गया। फिर जब बुध की दशा आई तो एक ज्योतिषी ने कहा (मैं फिर कह रहा हूं कि मेरा ज्योतिषी में विश्वास नहीं है। लेकिन अपने यहां ज्योतिष छापता हूं और ज्योतिषियों से साबका पड़ता है।) कि अब चंचल ग्रह आ रहा है तुम्हारा, तुम एक जगह टिक कर नहीं बैठोगे। फिर मैं “आज तक” गया। एक साल पांच महीने में मन उखड़ गया। यहां सात साल रहा हूं। (यकीन मानिए कई रातों से सोया नहीं हूं। अतुल जी के साथ आगे काम नहीं कर पाने की कसक है।) कहीं वो ज्योतिषी सही तो नहीं कह रहा था कि मैं चंचल हो गया हूं। (हंसते हुए)
समरेंद्र – अब कुछ सामाजिक मुद्दों पर बात। अब जजों की भी संपत्ति सार्वजनिक होगी। यहां यह बात भी उठ रही है कि पत्रकारों को और मीडिया संस्थानों को भी अपनी आय के स्रोत सार्वजनिक करने चाहिए।
शशि शेखर – बहुत अच्छी बात है। सिर्फ पत्रकारों को ही क्यों? सबको करना चाहिए। यदि इस बारे में कोई फैसला लिया जाए तो सबसे पहले मैं घोषणा करने को तैयार हूं। एक-एक पाई की घोषणा। इसमें क्या बुरी बात है। वैसे भी जो लोग इनकम टैक्स देते हैं… एक तरह से उनका ब्योरा तो जमा होता ही है।
लेकिन मुझे लगता है कि संपत्ति की घोषणा भी हाथी के दांत की तरह है। मसलन नोएडा में किसी की कोठी है तो स्टांप रेट के हिसाब से उसकी कीमत होगी 28 लाख रुपये। बेचने चलिए तो हो सकता है कि तीन करोड़ रुपये मिलें। पर हाथी के दांत ही सही। कुछ रंग-रूप तो सामने आती ही है। मुझे लगता है कि इसका स्वागत किया जाना चाहिए
।
समरेंद्र – सत्ता और पत्रकारिता के बीच एक गठजोड़ है। उदाहरण के तौर पर राज्य सभा के लिए पत्रकारों के मनोनयन को देखिए। मनोनीत होने की पहली शर्त बुनियादी योग्यता नहीं यही गठजोड़ है।
शशि शेखर – बात ठीक कह रहे हैं। जब कोई किसी को देता है तो उसके बदले में कुछ चाहता भी है। गठजोड़ है और लाइकिंग-डिसलाइकिंग है तभी तो देना और लेना चल रहा है। लेकिन मुझ जैसे पत्रकार भी हैं जो किसी नेता के सत्ता में आने पर दुश्मन हो जाते हैं और वैसे घर के सदस्य रहते हैं। एक बड़े कद्दावर नेता हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कई बार रह चुके हैं। प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। मेरे गांव के पास के हैं। जब वो मुख्यमंत्री होते हैं तो नाराज़ हो जाते हैं और जब वो मुख्यमंत्री पद से हटते हैं तो मैं उनका भतीजा हो जाता हूं। मेरा अलग तरह का भाई भतीजावाद है, जो चलता रहता है। आमतौर पर तभी चलता है, जब लोग सत्ता में नहीं रहते हैं।
समरेंद्र – तो क्या सत्ता और पत्रकारिता के गठजोड़ को आप सही मानते हैं?
शशि शेखर – मैं सही क्यों मानूंगा। जहां लेना-देना है। वो एक व्यापार है। व्यापार को मैं सही कहूं या नहीं कहूं वो चल रहा है। मैं किसी की निंदा या आलोचना नहीं करना चाहता। पर मैं निजी तौर पर राज्यसभा में नहीं जाना चाहता। मैं निजी तौर पर कभी किसी भी सरकारी संस्था का सदस्य नहीं बना। मैंने कभी किसी राजनीतिक पार्टी से चुनाव लड़ने के बारे में नहीं सोचा।
समरेंद्र – आजकल कहा जा रहा है कि संपादक मैनेजर हो गया है। उसका काम ख़बरों से ज्यादा कंपनी के कारोबार को बढ़ाना है।
शशि शेखर – परसों तक अमर उजाला में छपने वाली हर प्रमुख ख़बर, संख्या में 100-125, मुझको मालूम थी। परसों तक आज़मगढ़ में हादसे की ख़बर मुझे पता थी। मुझे मालूम था कि लीड ख़बर का शीर्षक क्या होगा। मुझे मालूम था कि पहले पन्ने का डिजाइन कैसा होगा। मुझे मालूम था कि पांच प्रदेशों के अलग-अलग संस्करणों में पहली हेडलाइन क्या होगी। अब अगर इसके बाद भी कोई मुझे मैनेजर कहे … तो मुझे उससे फर्क नहीं पड़ता।
मैं अपनी बात जानता हूं। पता नहीं कौन खुद को मैनेजर कहता है? कौन मैनेजर पत्रकार कहता है? लेकिन परसों तक तो मैं अपना काम कर रहा था। कल अलबत्ता ख़बर आई कि राजशेखर रेड्डी (आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री) लापता हो गए हैं तो मैं थोड़ा भावुक हो गया था। मैंने कहा कि आज मैं ख़बर नहीं जानना चाहता। तीस साल के करियर में यह पहली बार था जब मैंने अख़बार को फोन नहीं किया। सोचा जो अख़बार निकाल रहे हैं उन्हें निकालने दिया जाए। अगर मैं दफ़्तर में होता तो यह हेडिंग नहीं जाती कि हवा में लापता सीएम। क्योंकि मैं मैनपुरी के गांव में रहने वालों के लिए भी अख़बार निकालता हूं। उत्तरकाशी के गांव के लिए भी अख़बार निकालता हूं। कठुवा के लिए भी निकालता हूं। इसलिए परसों तक मैं पत्रकारिता कर रहा था और कल से फिर पत्रकारिता ही करूंगा। कोई मुझे मैनेजर कहे तो यह उसकी श्रद्धा है।
समरेंद्र – मैनेजमेंट से आपका कोई टकराव हुआ है। कभी कोई झगड़ा। कोई तीखी बहस।
शशि शेखर – यह भी बहुत स्वार्थी और चालाक लोगों की उड़ाई हुई चीज है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब तक संपादक जी की कुर्सी सुरक्षित रहती है तो कोई टकराव की बात सामने नहीं आती। जैसे ही कुर्सी हिलने लगती है तो वो और उनके साथी हल्ला मचाना शुरू कर देते हैं। मैं किसी बड़े का नाम नहीं लेना चाहता। एक हादसा तो अभी ही हुआ है। उससे पहले एक आदरणीय पुरुष थे। उनके बारे में बोल दिया तो बड़ी दिक्कत होगी। अब वो रह ही नहीं गए हैं। मेरे बहनोई उनके मित्र थे। हम लोग बैठा करते थे उनके साथ। हमसे वो बात कुछ करते थे और मंच पर जाते ही कुछ और कहने लगते थे। एक पूरा का पूरा कबिला उनके साथ चलता था। तो जय-जय भी होती रहती थी। हम जैसे लोगों की दिक्कत यह है कि हमारे पास कोई कबिला नहीं है। तो बुराई करने वाले तो खुल कर बुराई कर देते हैं। तारीफ़ करने वाले सोचते हैं कि यार पता नहीं ये आदमी कुछ देगा या नहीं देगा तो बोल कर दूसरों का दुश्मन न बन जाऊं। नारे आज तक उन्होंने ही लगाए हैं जिन्होंने मैनेजरों से फायदे उठाए हैं।
शशि शेखर के तेवर से हिंदुस्तान में हलचल
September 5, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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हिंदुस्तान में शशि शेखर का पहला दिन काफी व्यस्त रहा। सबसे पहले शोभना भरतीया के साथ बैठक हुई और फिर एचटी मीडिया लिमिटेड के सीईओ राजीव वर्मा के साथ बातचीत और उसके बाद सभी यूनिट हेड्स के साथ बैठक।
यूनिट हेड्स के साथ बैठक में शशि शेखर ने अपने काम करने के तरीके की पहली झलक दी। उन्होंने पूछा कि ख़बरों पर रिपोर्टरों के साथ बैठक कितने बजे होती है? यूनिट हेड्स ने बताया कि बैठक करीब तीन बजे होती है। जिसके बाद उन्होंने कहा कि तीन बजे तक आप लोगों को यह मालूम नहीं होता कि कौन सा रिपोर्टर किस स्टोरी पर काम कर रहा है? यूनिट हेड्स ने बताया कि कुछ रिपोर्टर फोन पर बता देते हैं और कुछ न्यूज़ चैनलों के जरिये पता चल जाता है। Read more




