बिन मुद्दों की सूनी सियासत
November 30, 2009 by हरिवंश
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मुद्दे, राजनीति के सुहाग हैं. बिन मुद्दे राजनीति उजड़ी, सूनी और अर्थहीन है. प्रसंग था, अर्थनीति, महंगाई और देश के गरीब. लोकसभा में डॉ राममनोहर लोहिया ने पहले ही भाषण में कहा, इस देश के एक नागरिक की आमद साढ़े तीन आने रोजाना है. इसके पहले वह संसद के बाहर कह चुके थे. प्रधानमंत्री पर रोज पच्चीस हजार खर्च होते हैं. यह बहस ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया. राजनीति में भ्रष्टाचार पर संसद में पहली आवाज फ़िरोज़ गांधी ने उठायी. मशहर कानूनविद ए जी नूरानी की चर्चित पुस्तक आयी थी. शायद नेहरूजी के कार्यकाल के अंतिम दौर में. नाम था मिनिस्टर्स मिसकंडक्ट. इससे समाजवादी सुरेंद्रनाथ द्विवेदी ने सवाल उठाया. मामला कुल साढ़े बारह हज़ार का था. केशवदेव मालवीय जैसे तपे नेता को मंत्री पद छोड़ना पड़ा. Read more
क्या हमारे नेता बेशर्म हो गए हैं?
November 27, 2009 by संदीपन देब
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क्या कभी हमारे देश का राजनीतिक माहौल ऐसी शर्मनाक स्थिति में रहा है, जैसा की अभी है? अख़बारों के पहले पन्ने पर जिस तरह की ख़बरें रोज़ आ रही हैं, उससे आपको उबकाई आती होगी।
बात कुछ दिन पहले से शुरू करते हैं, जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाइ राजशेखर रेड्डी का निधन एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में हुआ। रातों-रात वाइएसआर देवतुल्य हो गये। यह सुन कर कि उनके प्रिय नेता वाइएसआर नहीं रहे, लोगों के बीच से आत्महत्या की ख़बरें आने लगीं। लेकिन इस बीच एक और बात हुई, जिस पर कम ग़ौर किया गया। वाइएसआर के बेटे जगन मोहन रेड्डी देखते ही देखते राष्ट्रीय स्तर पर चमकते सितारे की तरह छा गये? तीस वर्ष से भी कम उम्र में ही उनके द्वारा हजारों करोड़ से अधिक की जायदाद बटोरने ने उन्हें चरचा में ला दिया? पता नहीं यह सच है कि झूठ, लेकिन उसी दिन एक और ख़बर आयी कि जिसने वाइएसआर के वियोग में आत्महत्या की, उसके परिवार को आर्थिक मुआवजा यह कहते हुए दिया गया कि वाइएसआर के बिना परिवार का जीवनयापन-भरणपोषण मुश्किल है। अगर यह सच है, तो यह कह सकते हैं कि हमारे नेता मानवीय मूल्यों को खोने की आख़िरी राह पर चल रहे हैं। Read more
संघर्ष कहां, आदर्श कहां… चारण और सूबेदारों का राज है
November 27, 2009 by हरिवंश
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पहले चरण में वोट फ़ीसदी घटा है. झारखंड विधानसभा चुनावों में. एक स्रोत का मानना है, बीस वर्षों में सबसे कम मत पड़े. खासतौर से शहरों में. इससे क्या संकेत मिलते हैं? यह क्या राजनीति के प्रति नफ़रत का प्रतिफल है? इस घटते वोट फ़ीसदी के संकेत गहरे हैं. समाजशास्त्रियों के लिए भी. राजनीतिज्ञों के लिए भी. लोकतंत्र के प्रेमियों के लिए भी.
एक विश्लेषण यह भी है कि यह ग्लोबल विलेज की नयी दुनिया में उभरे आत्मकेंद्रित समाज का रुझान है. इक्कीसवीं सदी की यह दुनिया, गांव मानी जा रही है. एक सूत्र में बंधी. यह दुनिया, बाजार के विचारों से संचालित है. अब दुनिया पलटने और बदलनेवाले राजनीतिक विचार प्रभावी नहीं हैं. राजनीति, विचारविहीन है. पहले ‘वाद’ थे. पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद, अराजकतावाद. अब है… बाजारवाद. इस बाजारवाद के विचारस्रोत है, ‘मैनेजमेंट थाट’ या ‘मैनेजमेंट गुरु’ या ‘मैनेजमेंट आइडियालाग’ (प्रबंधन के भाष्यकार). अभी दुनिया ने मैनेजमेंट गुरु पीटर ड्रकर की शताब्दी मनायी. उनके मरे चार वर्ष हुए. वह जीते तो सौ वर्ष के हुए होते. वह अर्थशास्त्री जेएम किंस और जोसेफ़ शुंपीटर स्तर के थे. इन दोनों से वह प्रबंधन के अपने विचार लेकर मंथन भी करते रहे. प्रबंधन में आज वही पीटर ड्रकर आइडियालाग माने जाते हैं. प्रबंधन शास्त्र की शुरुआत का श्रेय उन्हें है. कहते हैं, इस वर्ष ‘मैनेजमेंट कंसलटिंग इंडस्ट्री’ को 300 बिलियन डॉलर (13.88 लाख करोड़ रुपये) की आय होगी. इसका श्रेय उन्हें दिया गया है. जब राजनीतिकवाद थे, अर्थशास्त्र के सिद्धांत समाज को गढ़ते थे, तब प्रबंधन का शास्त्र नहीं था. आज एक प्रबंधन गुरु अपने एक व्याख्यान के लिए 60000 डॉलर (28 लाख रुपये) कमा सकता है. प्रबंधन कला को इस स्तर तक पहुंचाने का श्रेय पीटर ड्रकर को दिया जाता है. वह बाजार, प्रबंधन और उद्योग के मौलिक विचारक माने गये. वह ‘द फ़ादर ऑफ़ माडर्न मैनेजमेंट’ (आधुनिक प्रबंधन के पिता) और ‘वर्ल्ड्स ग्रेटेस्ट मैनेजमेंट थिंकर’ (विश्व के सबसे बड़े प्रबंधन विचारक) माने जाते हैं. उन्होंने ही भविष्यवाणी की थी कि भविष्य में नालेज वर्कर (ज्ञानसंपन्न मजदूर) होंगे. Read more
आखिर कब नेताओं से हिसाब मांगेंगे झारखंड के लोग?
November 20, 2009 by हरिवंश
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दिग्गज वोट मांगते घूम रहे हैं. जिनके दर्शन दुर्लभ हैं, जो सुरक्षा प्राचीरों में घिरे हैं, या जिनके जीवन का महत्वपूर्ण भाग पांच सितारा सुविधाओं में कटता है, वे गली-गांव भटक रहे हैं. सड़क छान रहे हैं. यह भ्रम हम दूर कर लें कि उन्हें हम मतदाताओं की चिंता है. नहीं, वे अपने लिए, अपने दल के लिए कवायद कर रहे हैं. हर दल झोली फैला चुका है. निर्दल भी याचक हैं.पर इनकी झोली में क्या है? किसलिए ये सत्ता चाहते हैं? यह पूछिए. पग-पग पर पूछिए. क्योंकि पूछने का मौका पांच वर्ष में एक बार आता है. अपना मत देकर पांच वर्षो के लिए अपना भविष्य आप गिरवी रखते हैं, इसलिए सोच-समझ लीजिए, झांसे में मत आइए. न जाति के, न धर्म के, न क्षेत्र के, न समुदाय के. न भावना में बहिए. ठोक-पीट कर फैसला कीजिए, क्योंकि आप अपना भविष्य तय करने जा रहे हैं, इसलिए जनता भी अपना एजेंडा बनाए. जहां और जब भी मौका मिले, दलों से पूछिए, प्रत्याशियों से बार-बार पूछिए कि गरीबों के लिए आपके पास कौन सी समयबद्ध योजनाएं हैं? Read more
चुप्पी की यह भाषा बहुत खतरनाक है दोस्तों
August 30, 2009 by प्रेमरंजन
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इस देश में एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे। नाम था पीवी नरसिंह राव। सुना है बड़े विद्वान थे। कई भाषाओं पर उनका अधिकार था। हिंदी तो वे बोलते ही थे, अंग्रेजी सहित कई और भाषाएं थीं, जिन पर अधिकार होने की मुनादी अक्सर उनके भक्तगण मुदित होकर किया करते थे। वे कई लोगों के लिए बहुत अच्छे प्रधानमंत्री थे। और अच्छे प्रधानमंत्री इसलिए थे क्योंकि वे ब्राह्मण थे। हालांकि विद्वान थे, तो ब्राह्मण होना लाजिमी ही है।
चलिए, यह तो आर्य संस्कृति का शाश्वत सत्य है कि नरसिंह जी इसलिए विद्वान थे क्योंकि ब्राह्मण थे। और तो और, कई भाषाओं के प्रकांड पंडित भी थे। (दोहराव जैसा लग रहा होगा। यह पाठकों पर अत्याचार होता है। लेकिन बात जब प्रकांड पंडितों की हो रही हो, तो धैर्य से सुनना-देखना चाहिए। कोई न कोई बात निकल के आती ही है।) तो उन सभी भाषाओं को उंगली पर गिनाते हुए उनके भक्तों को उस एक भाषा को भी गिना डालने का ध्यान ही नहीं रहता था, जो उनकी विद्वत्ता का असली कारण थी। और सच कहें तो वही एक भाषा उनके विद्वान और धीर-गंभीर होने का सबसे बड़ा सबूत और कारण थी। Read more
जो हरिवंश जी को नहीं जानते, उनके लिए
August 25, 2009 by अविनाश दास
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आदरणीय मॉडरेटर,
मैं आपकी थोड़े दिनों में मशहूर हो गयी वेबसाइट पर लगातार तथागत के लिखे को पढ़ रहा हूं। उनकी राइटिंग इस बात की ओर इशारा करती है कि वे मीडिया के प्रबुद्ध नागरिक हैं – लेकिन उनकी चेतना एकांगी है और ये भी तय है कि वे समग्रता में हमारे दौर को देखने से परहेज़ कर रहे हैं।
ख़ैर, प्रभात ख़बर और हरिवंश जी की बात बाद में। पहले मैं आपको एक ख़बर सुना रहा हूं। संजय यादव रांची में बरसों से पत्रकारिता कर रहे हैं। पहले टीवी और फिर अख़बार। मैं उन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं। संजय जी के पास दुर्लभ ईमानदारी है, जिसकी हमारे समय में घनघोर कमी है। रांची से आठ किलोमीटर दूर टाटीसिल्वे में रहते हैं। वहां पानी की बेतरह परेशानी है। रोज़ दफ़्तर आने से पहले बाल्टी-बाल्टी पानी ढोकर घर वालों की मदद करते हैं। इस एक जिक्र से आप ये न समझें कि उनकी माली हालत ठीक नहीं है। दरअसल वे कर्मठ स्वभाव के शख्स हैं और जहां तक मैंने उनको वॉच किया है, श्रमदान उनका प्रिय प्रसंग है। Read more
गैर-सवर्ण अस्मिताओं के लिए प्रभात ख़बर में जगह नहीं

हरिवंश, संपादक, प्रभात ख़बर
भरोसे की नींव पहले हिली, हरिभाई बाद में अलग हुए
August 20, 2009 by तथागत
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मुझे साइट मॉडरेटर ने बताया कि लोगों की दिलचस्पी इस बात में है कि तथागत कौन है। ये एक स्वाभाविक सवाल है। इसलिए भी, क्योंकि लोगों की दिलचस्पी इस बात में होगी कि जो प्रभात खबर के इतने सारे मसलों को व्यक्तिगत रूप से जानता है – वो जरूर निरपेक्ष आदमी नहीं होगा। इनके बीच का ही आदमी होगा। हां, मैं पत्रकारिता के झारखंडी (हरिवंश) स्कूल का ही छात्र हूं। अब भी उनके आसपास काम करता हूं। सच से प्यार है और सच कहना चाहता हूं। लेकिन कोई सज़ा पाना नहीं चाहता, इसलिए सच कहने के लिए अपना एक नाम रखा – तथागत। हो सकता है, मेरे सच में किसी तक़लीफ़ या पर्सनल खुन्नस की गंध आये – तो ये जायज़ है। लेकिन जहां तक कोशिश होगी, मैं ईमानदार बना रहूंगा। बहरहाल, वादे के मुताबिक मैं हरिनारायण सिंह की कहानी पर आता हूं। Read more
खबर की राजनीति का दूसरा नाम प्रभात खबर
August 18, 2009 by तथागत
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मुद्दे प्रभात खबर के लिए जरूरत भर होते हैं। ये अखबार बड़ी पार्टियों के एजेंट की तरह काम करता है। कहा जा सकता है कि छोटी और अल्पकालिक पार्टियों की अराजकता के बहाने आक्रामक तेवर अख्तियार कर पाठकों को भरमाने वाले इस अखबार ने मधु कोड़ा के एक खास आदमी विनोद सिन्हा के बारे में दो साल पहले बैनर खबर छापी थी। मधु कोड़ा उस वक्त मुख्यमंत्री थे और और विनोद सिन्हा उनके निकट के आदमियों में से एक। विनोद सिन्हा को हम राष्ट्रीय राजनीति में उभरे अमर सिंह जैसों का झारखंडी संस्करण कह सकते हैं। Read more
ये किस तरह की पैकेजिंग है प्रभाष जी?
August 3, 2009 by अनिल चमड़िया
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जनतंत्र डॉट कॉम पर रांची के एक जागरुक पाठक ने लिखा है कि हिन्दी के बड़े पत्रकार प्रभाष जोशी हाल ही में संपन्न आम चुनाव के दौरान खबरों की खरीद फरोख़्त के शर्मनाक धंधे के ख़िलाफ़ खम ठोंककर मैदान में उतर पड़े हैं लेकिन अफ़सोस है कि प्रभाष जी ने एक अखबार प्रभात ख़बर को इस धंधे से अलग बताने का हास्यास्पद प्रयास किया है जबकि प्रभात ख़बर ने भी ख़बरों के धंधे में बढ़ चढ़कर हिस्सा बटोरा है। पाठक ने इसके उदाहरण भी बताए हैं। प्रभाष जोशी के चुनाव पैकेज के ख़िलाफ़ अभियान का मसला हो या फिर मीडिया के भीतर कई दूसरे गंभीर सवाल हो। उसकी धार तब कमजोर हो जाती है जब कुछ को कठधरे में खड़ा करके और कुछ को देवता के रूप में पेश करने का प्रयास शुरू हो जाता है। दरअसल किसी भी सवाल के उसके पूरे आकार में नहीं आने के ऐसे ही ख़तरे होते हैं। क्या प्रभाष जी चुनावी पैकेज के मामले में प्रभात ख़बर को पाक साफ घोषित नहीं करते तो उनका यह अभियान शुरू नहीं हो सकता था? Read more



