गूगल के “G” बन गए गांधी

आज दो अक्टूबर है और आधी रात से गूगल पर महात्मा गांधी नज़र आने लगे हैं। गूगल ने उन्हें अपना “जी” (google – का पहला g) बना दिया है। टेलीविजन चैनलों पर भी आज महात्मा गांधी को सजाया और बेचा जाएगा। कहीं गांधी पर फिल्में दिखाई जाएंगी। तो न्यूज़ चैनलों उनके जीवन पर विशेष बनाएंगे। अख़बारों में तो एक दिन पहले से ही उन्हें याद किया जाने लगा है। एक दिन के लिए बुजुर्ग गांधीवादियों की डिमांड बढ़ गई है। मेरे पास भी एक दो फोन आ चुके हैं कि कोई गांधीवादी जान-पहचान का हो तो बताना। उन्हें स्टूडियो बुलाना है। भोर होने के साथ ही देखिएगा नेता लोग राजघाट जाकर उनकी समाधि पर फूल चढ़ा आएंगे। इस रस्मअदायगी में कोई भी पीछे नहीं रहेगा। Read more

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अपने-अपने गांधी, अपने-अपने राम

गांधी टाइटल लगाकर कितने लोग घूमते हैं लेकिन गांधी सुनकर तो जेहन में एक ही नाम घूमता है- मोहनदास करमचंद गांधी। इन्हें हिंदुस्तान अपना राष्ट्रपिता और दुनिया महात्मा मानती है। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, सोनिया गांधी, मेनका गांधी, राहुल गांधी, वरुण गांधी वगैरह तक गांधियों की लंबी कतार है लेकिन गांधी अगर संज्ञा के बजाय किसी नाम से जुड़कर विशेषण बन गया तो वह नाम है मोहनदास। वह गांधी पर्याय बन गया सत्य और अहिंसा के पुजारी का। 23 सितंबर की सुबह हर अखबार में एक गांधी और छाया था। ना तो वह मोहनदास गांधी के खानदान का है, ना ही नेहरु गांधी परिवार का कोई वारिस। उसका नाम है खोबाद गांधी। एक बार तो कोई गांधी शब्द सुनकर यही सोचेगा कि खोबाद गांधी भी कोई गांधीवादी, अहिंसावादी, सविनय अवज्ञावादी होंगे। लेकिन इस गांधी का परिचय अलग निकला।

खोबाद गांधी सीपीआई (माओवादी) के पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं। सीपीआई (माओवादी) वह संगठन है जो चीनी अधिनायकवादी माओत्सो तुंग के इस बयान से चलायमान होता है कि सत्ता तो बंदूक की नली से निकलती है। खोबाद गांधी भी ऐसा ही मानते हैं। दून स्कूल में पढ़े और लंदन से चार्टर्ड एकाउंटेसी में डिग्री हासिल करने वाले खोबाद ने सर्वहारा की तानाशाही के लिए अपनी परंपरागत दुनिया छोड़ दी। वह अपनी पत्नी अनुराधा के साथ हिसाब-किताब की गली छोड़ बंदूक की नली से समाज बदलने निकल पड़े। 22 सितंबर को दिल्ली में वह गिरफ्तार हो गये। Read more

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