कुछ पत्रकारों को किसानों का दर्द नहीं दिखता, दारू दिखती है
November 28, 2009 by विकास वशिष्ठ
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19 नवंबर को गन्ना किसानों ने सड़क से संसद तक अपना रोष ज़ाहिर किया। वे दिल्ली पहुंचे क्योंकि हमारी सरकार को ऊंचा सुनने की बीमारी हो गई है। उनका मकसद केवल सरकार के कानों में अपनी बात को डालना था। वे डालकर गए भी, लेकिन अगले दिन अखबारों ने बड़ा चौंकाने वाला काम किया। इस घटना को अंग्रेजी और हिंदी के बड़े अखबारों ने जाने किस चश्मे से देखा।
घटना एक ही थी लेकिन उसे देखने का तरीका अलग अलग। कैसे कोई एक रिपोर्टर अपने ख़ास एंगल की वजह से आगे बढ़ता जाता है। लेकिन गन्ना किसानों के इस मामले में मुझे कहीं से अखबारों का कोई अलग एंगल नज़र नहीं आया। नज़र आया तो सिर्फ ये कि उन्होंने किसी दूसरे चशमे से उस घटना को देखा। Read more




