जागरण नंबर वन, भास्कर कमजोर, हिंदुस्तान मजबूत

दैनिक जागरण और टाइम्स ऑफ इंडिया की बादशाहत बरकरार है। दैनिक जागरण ने इस साल राउंड वन की तुलना में हल्की बढ़त हासिल की है। लेकिन उसके लिए बुरी ख़बर पिछले साल की तुलना में उसके पाठकों की संख्या में करीब दस लाख की कमी आई है। जबकि सबसे अधिक बढ़त हासिल की है दैनिक हिंदुस्तान ने।

आईआरएस 2009 राउंड टू के नतीजों के मुताबिक दैनिक जागरण के पाठकों की संख्या 547.9 लाख रही है। हालांकि यह संख्या इसी साल राउंड वन (545.8 लाख) की तुलना में थोड़ी अधिक है, लेकिन 2008 राउंड टू की तुलना में काफी कम। तब पाठकों की संख्या 557.4 लाख थी। इसका मतलब यह निकला की दैनिक जागरण के करीब दस लाख पाठक कम हुए हैं। Read more

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“हिंदुस्तान” की कोशिश के बावजूद लुट गई लाज

हिंदुस्तान के पहले पन्ने पर छपी तस्वीर

हिंदुस्तान के पहले पन्ने पर छपी तस्वीर


दैनिक जागरण और टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक बार फिर साबित किया है कि वो सर्कुलेशन में नंबर वन ऐसे ही नहीं बन गए हैं। आज आप इन दोनों अख़बारों के दिल्ली संस्करण के पहले पन्ने को देखेंगे तो आपको वहां भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच से जुड़ी एक-एक तस्वीर मिलेगी। टाइम्स ऑफ इंडिया में वो तस्वीर गौतम गंभीर की है, जबकि दैनिक जागरण में राहुल द्रविड़ की। तस्वीर के हेडर में भारत और पाकिस्तान के बीच देर रात तक चले मुकाबले का नतीजा दिया हुआ है। बताया गया है कि भारत यह मैच हार गया है। नीचे कैप्शन में लिखा है कि गंभीर और द्रविड़ की शानदार पारियां किसी काम नहीं आईं और पाकिस्तान ने भारत को 54 रन से हरा दिया।

इस देश में क्रिकेट जुनून है। यही वजह है कि हर अख़बार में खेल के दो-तीन पन्ने होते हैं और उनमें ज़्यादातर क्रिकेट से ही जुड़ी जानकारियां होती हैं। लेकिन कुछ अख़बारों का रवैया क्रिकेट को लेकर बहुत लापरवाह है। इनमें हिंदी में सबसे आगे है हिंदुस्तान। हमने जनतंत्र के पाठकों को बताया था कि कैसे 20-20 विश्व कप के दौरान जिस बेहद अहम मैच में हार से भारत टूर्नामेंट से बाहर हो गया था, उसमें भी अख़बार को पढ़ने से लगता था कि भारत मैच जीत गया है। ठीक उसी तरह आज भी यही लग रहा है कि भारत मैच जीत गया है। पहले पन्ने पर नेहरा और रैना की तस्वीर है और उसका हेडर है दिल्ली के छोरे ने रखी लाज। इस हेडर को देख कर पहली नज़र में यही लगता है कि भारत मैच जीत गया है और दिल्ली के नेहरा की वजह से मैच जीता है। लेकिन दैनिक जागरण पर नज़र डालते ही पता चलता है कि अरे लाज तो लुट गई है। फिर हिंदुस्तान कौन सी लाज को बचाने की बात कर रहा है। Read more

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छह से सात रुपये में बिकेंगे अख़बार!

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अगले दो से तीन साल के भीतर अख़बारों की कीमत छह से सात रुपये हो सकती है। दिल्ली में दो दिन पहले साउथ एशिया न्यूज़ पेपर कॉन्फ्रेंस हुई। जिसमें न्यूज़पेपर इंडस्ट्री के दिग्गजों ने हिस्सा लिया इस कॉन्फ्रेंस में द हिंदू के प्रबंध निदेशक एन मुरली ने कहा कि अख़बारों की लागत को कम करने के लिए दाम बढ़ाने की ज़रूरत है। उनके मुताबिक अब तक प्रिंट मीडिया का विज्ञापन रेवेन्यू बीस फीसदी प्रति वर्ष की रफ़्तार से बढ़ रहा था। लेकिन अब बढ़ोतरी की रफ़्तार दस फीसदी से कम रहने का अनुमान है। ऐसे में अख़बारों की लागत को कम करने के उपायों पर गौर करना होगा। Read more

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हिंदुस्तान और नई दुनिया का “सरकार राग”

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उधार - टीओआई

उधार - टीओआई

शनिवार को “हिंदुस्तान” पर नज़र डालने से लगा कि “स्वाइन फ्लू” का असर ख़त्म हो गया है। स्वाइन फ्लू ने भारत से पलायन कर लिया है। क्योंकि हिंदी-अंग्रेजी के तमाम अख़बारों में “अकेला” हिंदुस्तान ही एक ऐसा अख़बार था जिसके “फ्रंट पेज” पर से स्वाइन फ्लू की ख़बर “गायब” थी। “दैनिक जागरण” ने स्वाइन फ्लू को पहली ख़बर के तौर पर पेश किया। “दैनिक भास्कर” की पहली ख़बर बीजेपी में वसुंधरा की बगावत रही। और दूसरी ख़बर प्रतिभा पाटिल का भाषण रहा। जिसमें उन्होंने देशवासियों से स्वाइन फ्लू और सूखे से निपटने के लिए सरकारी प्रयासों में सहयोग की अपील की। भास्कर में तीसरी ख़बर के तौर पर स्वाइन फ्लू है। हालांकि इन दिनों सरकार राग में “नई दुनिया” भी सराबोर है। लेकिन उसने भी स्वाइन फ्लू को पहले पन्ने पर जगह दी है। बस हिंदुस्तान ही इकलौता अख़बार है जिसके पहले पन्ने पर स्वाइन फ्लू की कोई गंभीर ख़बर नहीं है। बहुत छोटे में ये जरूर मिलेगा कि मुंबई में गोविंदा की टोलियों ने एहतियात के साथ मटकियां फोड़ीं। मास्क पहन कर। बाकी ख़बरों में सरकारी घोषणाओं और सदइच्छा के अलावा कुछ नहीं झलकता। मतलब आज़ादी का सरकारी गान जारी है। Read more

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“आपसे आग्रह है कि ये बहस यहीं बंद कर दें”

दैनिक जागरण के वरिष्ठ फोटोग्राफर अजीत कुमार ने जनतंत्र को एक चिट्ठी भेजी है। इस चिट्ठी में भोले शंकर की तरह उन्होंने विष का प्याला पीते हुए कबूल किया है कि प्रकाश कुमार का फोटो उन्होंने ही जानबूझ कर ब्लर किया था और इसके लिए दैनिक जागरण के संपादक शैलेंद्र दीक्षित और ब्यूरो चीफ सुभाष पांडे को दोष देना सही नहीं है। उन्होंने ऐसा क्यों किया, इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं। उन तर्कों से आप सहमत हो सकते हैं और असहमत भी। लेकिन हम उनके इस साहस का सम्मान करते हुए दैनिक जागरण के फोटो प्रकरण पर चली बहस को यहीं रोकना चाहते हैं। वैसे भी इस बहस में अब कुछ बचा नहीं है। बातचीत मुद्दे से भटक कर निजी आरोप-प्रत्यारोप की तरफ मुड़ चुकी है। इसलिए हम अजीत कुमार की इस स्वीकारोक्ति को आपने सामने रख रहे हैं… इस उम्मीद में कि आप भी इस बहस को यहीं ख़त्म समझेंगे और मामले को ज़्यादा तूल नहीं देंगे। Read more

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चुप्पी टूटेगी और टूटेंगे मीडिया के सभी मठ

किसी भी अख़बार को उठाइए और तमाम ख़बरों को पढ़िए। संपादकीय पृष्ठ पर मौजूद लेखों को भी पढ़िए। आप पाएंगे कि अख़बारों में आमतौर पर किसी शख़्स की आलोचना होती और किसी की तारीफ़। वो शख़्स कोई भी हो सकता है। मंत्री, नेता, अधिकारी, अभिनेता या फिर कारोबारी… कोई भी हो सकता है। आलोचना सभी की होती है। सवाल सभी पर खड़े किए जाते हैं। किसी न किसी मुद्दे पर और किसी न किसी वक़्त पर। यहां सवाल उठता है कि आखिर दूसरों की आलोचना करने वाले पत्रकारों का खुद की आलोचना को लेकर क्या रवैया रहता है? Read more

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दैनिक जागरण और उसकी “फोटो कलाकारी”

अख़बार में छपी तस्वीर

अख़बार में छपी तस्वीर

दैनिक जागरण के हल्द्वानी संस्करण के 16वें पेज पर एक रंगीन तस्वीर छपी है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी खादी पहने, गांधी टोपी लगाए नमस्कार कर रहे हैं और बगल में दीया मिर्जा खड़ी हैं। नीचे कैप्शन दिया गया है “दिलकश दीया मिर्या ने राहुल गांधी के बारे में राय पूछे जाने पर कहा, मैं उन्हें पसंद करती हूं।”

उसी अख़बार में पृष्ठ संख्या 13 पर राहुल गांधी की एक और फोटो है। ये ब्लैक एंड व्हाइट है। इसमें भी राहुल ठीक उसी लिबास में और उसी मुद्रा में हाथ जोड़े खड़े हैं। उनके पीछे मौजूद व्यक्ति भी वही है। बस यहां पर राहुल गांधी के बगल में हैं कांग्रेस नेता रीता बहुगुणा और सामने है एक कांग्रेस कार्यकर्ता – जो उन्हें सैल्यूट कर रहा है। Read more

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“जिम्मेदारी तो संपादक को ही लेनी पड़ती है”

आज का मीडिया

आज का मीडिया

बिहार में दैनिक जागरण और उसके संपादक पर उठाए गए सवाल पर बहस अब तेज़ हो रही है। बहस का मुद्दा है कि अगर किसी अख़बार से कोई ग़लती हो गई हो तो उसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाए? क्या किसी संपादक को यह हक़ है कि वह अख़बार की अच्छाइयों को कबूल करे लेकिन बुराइयों के लिए व्यवस्था को दोषी ठहरा कर पल्ला झाड़ ले? यहां बात किसी एक अख़बार या फिर किसी एक संपादक की नहीं है। बात पूरे मीडिया जगत की है। संकट विश्वास का है। जनतंत्र पर जारी इसी बहस को आगे बढ़ाने के लिए हमने बिहार के दो वरिष्ठ पत्रकारों से कुछ सवाल पूछे। उनके जवाब आपके सामने हैं। आप पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। Read more

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जिन्ने “हिंदुस्तान” नई वेख्या …

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हिलेरी क्लिंटन और मनमोहन

हिलेरी क्लिंटन और मनमोहन


अमेरिका से एंड यूजर मॉनीटरिंग एग्रीमेंट (एयूएमए) से जुड़ी ख़बर अंग्रेजी अख़बारों में तो पहले पन्ने पर है ही, हिंदी के ज़्यादातर अख़बारों ने भी इसे पहले पन्ने पर छापा है। विपक्ष के आरोप और उन पर सरकार की सफाई दोनों छापी गई है। कुछ ने तो कांग्रेस के भीतर उभर रहे विरोध के सुरों को भी जगह दी है। Read more

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Jarnail Singh Sacked

Dainik Jagran journalist Jarnail Singh was sacked about three months after he threw a shoe at Union home minister P Chidambaram. He had thrown his shoe at Chidambaram at a press conference at the Congress headquarters.
Jarnail Singh was a defence correspondent with Dainik Jagran for nearly a decade. According to Jarnail Singh his services with the newspaper were terminated following a show-cause notice issued about 3 months ago. “I have been victimised for raising a genuine issue concerning the 1984 anti-Sikh riots,” he said.

Jarnail Singh, was attending a press conference of Mr. Chidambaram in the run-up to the Lok Sabha elections on April 7 when he posed questions to the Minister on the “clean chit” given by CBI to Congress leader Jagdish Tytler, who is an accused in the anti-Sikh riots case following then Prime Minister Indira Gandhi’s assassination.

Not satisfied with Mr. Chidambaram’s reply, Jarnail flung his sneakers at Chidambaram. The shoe failed to hit the target but it set the Congress rethinking on giving tickets to Tytler and Sajjan Kumar, whose name had also cropped up in the riots. The two were denied tickets to contest Lok Sabha elections.

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