शेयर बाज़ार में दैनिक भास्कर की छलांग
December 3, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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दैनिक भास्कर के प्रकाशक डीबी कॉर्प अब शेयर बाज़ार में दाखिल हो रहे हैं। इसी महीने कंपनी इनिसियल पब्लिक ऑफर लॉन्च करेगी। ख़बरों के मुताबिक दिसंबर के दूसरे सप्ताह में आईपीओ लाने की तैयारी है। बाज़ार में माहौल बनाने और निवेशकों की नज़र में आने के लिए दैनिक भास्कर पिंक अख़बारों में ताबड़तोड़ विज्ञापन छपवा रहा है। बुधवार को इकॉनोमिक टाइम्स में आधे पन्ने का विज्ञापन छपवाया गया था।
आईपीओ की कीमत क्या होगी अभी यह तय नहीं हुआ है। लेकिन ख़बरों के मुताबिक आईपीओ के ज़रिए डीबी कॉर्प की योजना बाज़ार से 450 करोड़ रुपये उठाने की है। इस पैसे से डीबी कॉर्प उन तमाम राज्यों में दाखिल होने की योजना पर काम कर रहा है जहां अभी उसके कदम नहीं हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में दाखिल होना उसी योजना का हिस्सा है। हिंदी, अंग्रेजी और गुजराती में डीबी कॉर्प के कुल सात अख़बार हैं और 48 संस्करण।
“दैनिक भास्कर पर दया कीजिए”
October 6, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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दैनिक भास्कर की ग़लती पर पाठकों ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीते 24 घंटों में 500 से अधिक लोग इसे पढ़ चुके हैं। पढ़ने वालों की संख्या की तुलना में प्रतिक्रियाएं कम आयी हैं लेकिन जो भी आयी हैं उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह सही है कि पोर्न पढ़ने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है। यह भी सही है कि अश्लील साहित्य के पाठक भी बहुत हैं। लेकिन समाचार पत्रों को ही अश्लील बना दिया जाए और आधी आबादी को उपभोग की वस्तु यह कहीं से भी सही नहीं है। इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। बहुत से पाठकों ने हमें फोन करके यह भी कहा कि अगर कोई गाली तो क्या आप भी उसे गाली दीजिएगा। उन्हें एतराज हमारे शीर्षक पर था। “लौंडागीरी” शब्द के इस्तेमाल पर था। उनकी बात सही है। कोई बड़ा अख़बार, कोई बड़ा मीडिया संस्थान लाख नंगई करे हमें शालीन बने रहना चाहिए। आगे से हम कोशिश करेंगे कि बहुत गुस्सा आने पर भी अपनी भाषा संतुलित रखें। बहरहाल, दैनिक भास्कर की ग़लती पर आई टिप्पणियों में से चंद पर आप भी नज़र डालें। - मॉडरेटर Read more
दैनिक भास्कर की “लौंडागीरी”
October 5, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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दैनिक भास्कर की एक ख़बर उल्लेखनीय है। इस ख़बर से पता चलता है कि जहां कहीं भी न्यूज़रूम में सही अनुपात में महिलाएं नहीं होती हैं वहां आधी आबादी से जुड़ी ख़बरों को किस घटिये नज़रिए से प्रस्तुत किया जा सकता है। इस ख़बर से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दैनिक भास्कर के न्यूज़रूम में भी महिलाएं नाम मात्र की होंगी और शायद ऊंचे पदों पर तो नहीं के बराबर। आगे बढ़ने से पहले आप उस ख़बर पर एक नज़र डालें जिसकी चर्चा हो रही है। – Read more
हिंदुस्तान और नई दुनिया का “सरकार राग”
August 15, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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उधार - टीओआई
खजुराहो क्या हमारे पर्यटन उद्योग का अश्लील पैकेज है?
July 24, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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जनतंत्र पर साथी कबीर ने दो दिन पहले एक लेख लिखा। नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर की वेबसाइट पर ख़बरों के रूप में अश्लील साहित्य परोसने का आरोप लगाते हुए कबीर ने सविता भाभी की तरह उन पर प्रतिबंध लगाने का मांग की। आज वरिष्ठ पत्रकार अविनाश ने कबीर के लेख का जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि ये मांग बेतुकी है। साइबर स्पेस में हर किसी का अपना कोना है। दूसरे का कोना छेकने का हक़ किसी को नहीं होना चाहिए। कानून को भी नहीं। आप उनका लेख पढ़िए और उतनी ही बेबाकी से अपनी राय रखिए जितनी बेबाकी से अविनाश ने लिखा है।
जिन्ने “हिंदुस्तान” नई वेख्या …
July 22, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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हिलेरी क्लिंटन और मनमोहन
अमेरिका से एंड यूजर मॉनीटरिंग एग्रीमेंट (एयूएमए) से जुड़ी ख़बर अंग्रेजी अख़बारों में तो पहले पन्ने पर है ही, हिंदी के ज़्यादातर अख़बारों ने भी इसे पहले पन्ने पर छापा है। विपक्ष के आरोप और उन पर सरकार की सफाई दोनों छापी गई है। कुछ ने तो कांग्रेस के भीतर उभर रहे विरोध के सुरों को भी जगह दी है। Read more
“सविता भाभी” की तरह इन पर भी लगे प्रतिबंध
July 21, 2009 by कबीर
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सविता भाभी। जी हां… हाल ही में सविता भाभी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ये एक पोर्न कार्टून साइट है, जिसके चरित्र का नाम है सविता भाभी। कुछ ही दिन में ये वेबसाइट भारत में काफी लोकप्रिय हो गई थी। इतनी कि दुनिया के सबसे अधिक “नैतिक राष्ट्र” में नैतिकता का सवाल उठ खड़ा हुआ। इंटरनेट पर ऐसी हज़ारों पोर्न वेबसाइट भारत में धड़ल्ले से खुलती हैं। साइबर कैफे में लोग घंटों ऐसी वेबसाइटों पर चिपके रहते हैं। लेकिन नैतिकता का सवाल सिर्फ़ और सिर्फ़ सविता भाभी नाम की साइट पर उठा। सरकार भी तुरंत हरकत में आई और उसने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। अब ये साइट भारत में नहीं खुलती है। Read more
अगर वेब मीडिया भविष्य है तो ये और ख़ौफ़नाक है
July 20, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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भविष्य की पत्रकारिता का माध्यम क्या होगा? अख़बार, टेलीविजन या फिर इंटरनेट। भारतीय संदर्भ में फिलहाल यह कहा जा सकता है कि अगले 40-50 साल तक तो ये तीनों ही माध्यम बने रहेंगे। बस अंतर इतना आएगा कि कुछ साल बाद अख़बारों का फैलाव कम होगा और इंटरनेट की पहुंच में विस्तार होगा। पहली दुनिया के कुछ देशों में ऐसा होने लगा है और तीसरी दुनिया के देशों में भी ऐसा ही कुछ होगा। फिर वो वक़्त भी आएगा जब इंटरनेट पत्रकारिता का सबसे ताक़तर माध्यम होगा। ये करीब-करीब तय है। इसमें वक़्त भले ही लग जाए, लेकिन इस बदलाव को रोका नहीं जा सकता। Read more
दैनिक भास्कर की चोरी, ऊपर से सीनाजोरी
June 20, 2009 by Samrendra
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आज दैनिक भास्कर के राष्ट्रीय संस्करण में भी अभिलाष खांडेकर के महान विचार छप गए। मध्य प्रदेश के एडिशन में की गई उनकी विशेष टिप्पणी (भोपाल को बिहार होने से बचाएं) को राष्ट्रीय संस्करण में हू-ब-हू छाप दिया गया है। कहीं कोई संशोधन नहीं। कहीं कोई भूल सुधार नहीं। अख़बार में पृष्ठ संख्या सात पर आप खांडेकर की ये विशेष टिप्पणी पढ़ सकते हैं।
अभिलाष खांडेकर के संकीर्ण नज़रिये पर सवाल उठने के बाद से दैनिक भास्कर का रवैया बेहद हैरान करने वाला है। कल वेब एडिशन के संपादक राजेंद्र तिवारी ने पाठकों की भावनाओं का खयाल रखते हुए खांडेकर के लेख पर खेद जताया और आपत्तिजनक पंक्तियों को हटा दिया। मगर खेद जताने का तरीका बड़ा अजीब था। कायदे से होना तो ये चाहिये था कि लेख अभिलाष खांडेकर ने लिखा है तो माफी भी वही मांगते। अगर अभिलाष खांडेकर में अहंकार इतना अधिक है कि उन्हें अपनी ग़लत बात को वापस लेने में शर्म आ रही हो तो संस्था में उनका कोई वरिष्ठ माफी मांगता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वेब संस्करण के संपादक राजेंद्र तिवारी ने मामले को टालने के अंदाज में पाटकों की प्रतिक्रिया के लिए दी गई जगह पर खेद भरी टिप्पणी चिपका दी। अब इसे आप क्या कहियेगा?
इस पूरे प्रकरण में कुछ लोग बड़े बेतुके तर्क दे रहे हैं। ऐसे लोगों की एक दलील तो ये है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी को जाति, धर्म, प्रांत जैसी सीमाओं में नहीं बांधना चाहिये। अरे भई, अभिव्यक्ति की आज़ादी में ये कहीं नहीं है कि आप किसी दूसरे की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करें। सोचिये अगर ऐसा हो जाए तो अंजाम कितना बुरा होगा। तब तो हर तरफ अराजकता होगी और नफ़रत की सियासत करने वाले चांदी काटेंगे। एक धर्म के कट्टरपंथी दूसरे धर्म को गाली देंगे। हिंसा भड़केगी और कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं होगी। इसलिए अभिव्यक्ति की आज़ादी ही नहीं, किसी भी तरह की आज़ादी के साथ जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों तत्व जुड़े हुए हैं। वैसे आपको ये भी बता दें कि सत्ता की तानाशाही के ख़िलाफ़ जब आवाज़ उठाने की बात होती है तो यही लोग ये तर्क देने लगते हैं कि राष्ट्र के ख़िलाफ़ कुछ लिखने पर राजद्रोह का मुक़दमा चलाना चाहिये। मतलब जिन मुद्दों पर अभिव्यक्ति की आज़ादी का सही इस्तेमाल होना चाहिये वहां पर ये भोकुस दलाल लोग उसका गला घोंटने लगते हैं और जब इस आज़ादी के ग़लत इस्तेमाल का विरोध करने की बात हो तो उसके समर्थन में नारा बुलंद करने लगते हैं।
अगर अभिलाष खांडेकर को भोपाल में बढ़ते अपराध पर कुछ लिखना था तो इसके लिए उन्हें बिहार को नीचा दिखाने की जरूरत नहीं थी। वो चाहते तो भोपाल के ही लोगों से बात करके बहुत कुछ लिख सकते थे। इसलिए ये मुद्दा संकीर्ण और बीमार सोच का मुद्दा है। इस सोच से अभिलाष खांडेकर जैसे लोग निजी फायदा भले ही उठा लें, पत्रकारिता को बहुत बड़ी क्षति पहुंचा देते हैं। इसलिए ऐसे लेख और लेखकों का जितना हो सके, उतना विरोध करना चाहिये।
पूरे देश से माफी मांगें अभिलाष खांडेकर
June 19, 2009 by Samrendra
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अभी मोहल्ला लाइव पर मौजूद एक ख़बर पर मेरी नज़र पड़ी। सोच कर हैरानी हुई। क्या किसी अख़बार का संपादक इतनी संकीर्ण सोच रख सकता है? और सपाट शब्दों में कहें तो क्या इतनी संकीर्ण सोच रखने वाले किसी भी शख़्स को हक़ है कि वो संपादक बने? दैनिक भास्कर के संपादक अभिलाष खांडेकर ने अपने विशेष संपादकीय “भोपाल को बिहार होने से बचाएं” में अपनी सोच का जो परिचय दिया है उसकी जितनी निंदा की जाए वो कम है।
दैनिक भास्कर ने इंटरनेट से अभिलाष का लेख हटाया
अभिलाष खांडेकर के लेख पर सवाल उठने के तुरंत बाद दैनिक भास्कर ने इंटरनेट पर मौजूद उनके लेख को हटा दिया है। अब उसकी जगह आपको कोई और ख़बर मिलेगी। लेकिन इससे सवाल ख़त्म नहीं हुआ है। अभिलाष खांडेकर और दैनिक भास्कर दोनों को इस ग़लती के लिए पूरे देश से माफी मांगनी चाहिये। चूंकि अभिलाष का लेख इंटरनेट के पाठकों के लिए भी उपलब्ध था इसलिए सिर्फ अख़बार ही नहीं इंटरनेट पर भी माफी मांगनी चाहिये।
अभिलाष खांडेकर ने संपादकीय में लिखा है कि “कभी-कभी लगता है हम बिहार के किसी शहर में रह रहे हैं, शांत, कानूनप्रिय भोपाल में नहीं। पुलिस महानिदेशक संतोष राऊत भले अफसर की छवि रखते हैं पर उनसे यदि लूट, बलात्कार, चोरी-डकैती नहीं रुकती तो उस छवि का क्या फायदा? सख्त उन्हें भी होना है और मुख्यमंत्री को भी। भोपाल को पटना बनाने से रोकना हो तो।” अभिलाष से ये पूछना चाहिये कि क्या वो कभी बिहार गए हैं? अगर नहीं, तो फिर किस आधार पर उन्होंने ये ज़हर उगला है। अगर हां, तो क्या बिहार में कदम रखने पर किसी ने उनकी इज्जत तार-तार कर दी थी कि वो पूरे राज्य की जनता को अपमानित करने पर आमादा हो गए?
अभिलाष खांडेकर ने अपने इस संपादकीय से पत्रकारिता के पवित्र पेशे को कलंकित कर दिया है। पत्रकार का सिर्फ़ एक कर्म है। उसे जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, निजी राजनीतिक और आर्थिक हितों से ऊपर उठ कर देश और देश की जनता के बारे में सोचना चाहिये। जहां कहीं भी अन्याय हो रहा है तो वो पीड़ितों के हक़ में अपनी कलम को हथियार की तरह इस्तेमाल करे। उसकी ताक़त सताए हुए लोगों के पक्ष में खड़े होने से बनती है। लेकिन लगता है कि निचले पायदान से संपादक जैसे ऊंचे पद पर पहुंचने के दौरान अभिलाष के भीतर इतना अहंकार पैदा हो गया है कि उनके सोचने की सारी शक्ति समाप्त हो गई है। तभी वो एक राज्य विशेष को अपमानित कर बैठे।
दैनिक भास्कर के मध्य प्रदेश स्टेट हेड से ये भी पूछना चाहिये कि कहीं उनकी मंशा सियासत में जाने की तो नहीं है। अगर हां, तो उन्हें हमेशा ये याद रखना चाहिये कि वो नफ़रत की इस ओछी सियासत से बाल ठाकरे और राज ठाकरे तो बन सकते हैं लेकिन उनसे ऊपर नहीं उठ सकते। बाल ठाकरे और राज ठाकरे सारे धतकर्म करने के बाद भी महाराष्ट्र में बीस फ़ीसदी से अधिक आबादी अपने साथ नहीं जोड़ सके हैं। इसलिए सबको समझ लेना चाहिये कि इस तरह की राजनीति से कोई तात्कालिक फायदा ज़रूर उठा सकता है लेकिन लंबे दौर में उसे घाटा ही होगा।
जहां तक बिहार और मध्य प्रदेश के बीच तुलना की बात है तो यकीनन सड़क और बिजली जैसे कुछ मामलों में मध्य प्रदेश आगे है। लेकिन अपराध के मामले में मध्य प्रदेश का दामन ज़्यादा दागदार है। शहरों में होने वाले अपराध के मामले में मध्य प्रदेश के तीन शहर … इंदौर, भोपाल और जबलपुर बिहार की राजधानी पटना से काफी आगे हैं। अगर आप अपराध दर (आबादी और अपराध का अनुपात) की बात करें तो उसमें भी मध्य प्रदेश बिहार से काफी आगे है। यही नहीं महिलाओं से जुड़े अपराध में तो मध्य प्रदेश देश भर में पहले स्थान पर है। मध्य प्रदेश में सबसे ज़्यादा बलात्कार के मामले सामने आए हैं। छेड़खानी के मामले भी सबसे ज़्यादा वहीं दर्ज हुए हैं। बाल विवाह आज भी वहां पर संस्थागत रूप से होता है। ये आंकड़े नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की वेबसाइट पर दर्ज हैं। इसलिए अभिलाष खांडेकर को चाहिये था कि ऐसा कुछ भी लिखने से पहले एक बार उन आंकड़ों पर तो गौर कर लेते। लेकिन लगता है कि उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया।
मैं यह नहीं कहता कि किसी को अपने क्षेत्र पर नाज नहीं होना चाहिये। होना चाहिये और सबको होना चाहिये। मुझे भी अपने उत्तर प्रदेश पर नाज हैं। वहां हो रही गड़बड़ियों से मेरा भी मन खिन्न होता है। अपराधियों के वर्चस्व पर मुझे भी गुस्सा आता है। मैं भी राज्य की सरकार को कोसता हूं… उसकी निंदा करता हूं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि ऐसा करते वक़्त मैं किसी भी राज्य, क्षेत्र, धर्म, जाति या फिर बोली का मजाक उड़ाऊं। किसी समुदाय की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करूं। उसे हिकारत भरी नज़र से देखूं। अगर मैंने ऐसा किया तो ये सिर्फ उस खास तबके के लोगों का अपमान नहीं होगा बल्कि ये पत्रकारिता के पेशे का अपमान होगा … देश के संविधान का अपमान होगा और पूरे देश का अपमान होगा। इसलिए अभिलाष खांडेकर को बिना किसी देरी के सार्वजनिक तौर पर अपने लिखे के लिए माफी मांगनी चाहिये। ऐसा करने में वो जितनी देर करेंगे उनका गुनाह उतना बड़ा होता जाएगा।




