जनसत्ता में क्यों नहीं चहकती थीं लड़कियां
August 26, 2009 by चार्वाक सत्य
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दिल्ली में हिंदी पत्रकारिता के दो बड़े संस्थान। इंच टेप से नापें तो दोनों के बीच की दूरी ढाई सौ मीटर से ज्यादा न होगी। लेकिन दोनों के माहौल में जमीन-आसमान का अंतर था। ये बात लगभग 20 साल पुरानी है। पहले संस्थान में थी सिर्फ एक लड़की। डेस्क पर काम करती थी। और दूसरे संस्थान में लगभग एक दर्जन। हंसती-बतियाती और अखबार निकालती। जी नहीं, वो सिर्फ महिलाओं के पन्ने नहीं निकाल रही थीं। वो शिफ्ट संभाल रही थीं। हार्ड न्यूज से निबट रही थी। अखबार का पहला पन्ना निकाल रही थीं। इस संस्थान में कई बार महिला इंचार्ज के अंडर में कई पुरुष काम करते होते। Read more
“जन”सत्ता में प्रभाष जी की “ब्राह्मण”सत्ता
August 24, 2009 by चार्वाक सत्य
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जनसत्ता के पहले संपादक प्रभाष जोशी को लगभग ढाई दशक पहले जब पत्रकारों की टीम बनाने का पहला मौका मिलता है तो कुछ ऐसी टीम बनती है। ये है जनसत्ता की शुरुआती टीम के टॉप 15 प्लेयर:-
1. प्रभाष जोशी (संपादक)
2. गोपाल मिश्र (न्यूज एडिटर)
3. श्याम आचार्य (दूसरे न्यूज एडिटर)
4. अच्युतानंद मिश्र (तीसरे न्यूज एडिटर)
5. हरिशंकर व्यास (असिस्टेंट एडिटर)
6. सतीश झा (असिस्टेंट एडिटर)
7. बनवारी (असिस्टेंट एडिटर)
8. मंगलेश डबराल (रविवारी के इंचार्ज)
9. ब्रजेंद्र पांडे (खेल डेस्क के इंचार्ज)
10. उमेश जोशी (बिजनेस डेस्क के इंचार्ज)
11. सत्यप्रकाश त्रिपाठी (डेस्क के इंचार्ज)
12. परमानंद पांडे ( डेस्क के इंचार्ज)
13. देवप्रिय अवस्थी (डेस्क इंचार्ज)
14. श्रीश मिश्र (डेस्क इंचार्ज)
15. जगदीश उपासने (डेस्क इंचार्ज)
प्रभाष जी की पंडिताई में तथ्यों की ऐसी-तैसी
August 21, 2009 by चार्वाक सत्य
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प्रभाष जोशी बड़े पत्रकार हैं। बहुत बड़े पत्रकार। इसलिए इतनी उम्मीद की जाती है कि उनके विचार चाहे जो भी हों, लेकिन उन्हें स्थापित करने के लिए वो सही तथ्य लेकर आएंगे। लेकिन रविवार डॉट कॉम में दिए इंटरव्यू में अपनी बातों को साबित करने के लिए वो बेहद बेतुकी बातें कर गए हैं। एक दो नहीं बल्कि कई ग़लत तथ्यों को प्रस्तुत किया। लगता है कि सुनी सुनाई बातों को वो सच मान बैठे हैं। फैक्ट्स के मामले में ऐसी असावधानी अक्षम्य है क्योंकि आप प्रभाष जोशी हैं, शलाका पुरुष।
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ब्रह्म से संवाद करते पंडित प्रभाष जोशी का विराट रूप
August 19, 2009 by चार्वाक सत्य
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“सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता. दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है. क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारीरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं. इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ. आईटी में वो इतने सफल हुए.”
ये कौन बोल रहा है और इस समय ऐसा क्यों बोल रहा है। राज्यसभा के लिए राष्ट्रपति की तरफ से मनोनित लोगों की सूची जारी होने से ठीक पहले ये कौन है जो अपने ब्राह्मण रूप का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहा है। इस खास समय में एक साथ हिंदुत्ववादियों -आरएसएस और कम्युनिस्टों को आजादी की लड़ाई का गद्दार कहते हुए वो क्या हासिल करना चाहता है? Read more




