नीतीश कुमार के सुशासन का एक ख़ौफ़नाक सच

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इस बार जनसत्ता के रविवारी में प्रसून लतांत की रिपोर्ट छपी है। इस रिपोर्ट से बिहार में नीतीश कुमार के सुशासन का दूसरा पहलू सामने आता है। पता चलता है कि मुखिया भले ही पिछड़ी जाति का है लेकिन राज दबंगों का चल रहा है। यह भी कि बिहार में सुशासन का गुणगान एक छलावा है। कुछ समय पहले जब केंद्र में लालू यादव रेल मंत्री थे तो दिल्ली के कुछ पत्रकारों ने उन्हें मैनेजमेंट गुरू घोषित कर दिया था। इन दिनों मीडिया लालू के सियासी दुश्मन नीतीश पर मेहरबान है। बिहार में उनका राज है। करोड़ों अरबों रुपये विज्ञापनों पर खर्च हो रहे हैं और शायद ही किसी अख़बार में इतना साहस है कि नीतीश को सच्चाई का आईना दिखाए। लेकिन जनसत्ता की यह रिपोर्ट पढ़ने लायक है। हम जनसत्ता से साभार प्रसून लतांत की यह रिपोर्ट आपसे साझा कर रहे हैं। इस उम्मीद में कि आप पढ़ेंगे, सोचेंगे और खुलकर अपनी प्रतिक्रिया देंगे। – मॉडरेटर

एक जमाने में लाखों भूमिहीनों को भूस्वामी बनाने वाले भूदान आंदोलन की ज़मीन खिसक रही है। बिहार के करीब साढ़े चार लाख भूदान किसान अब गांधी-विनोबा का रास्ता छोड़ खूनखराबे वाली विचारधारा के करीब जाने को मजबूर हैं। इन किसानों को भूदान आंदोलन के दौरान बड़े-बड़े भूपतियों से विनोबाजी को दान में मिली ज़मीन से एक-एक टुकड़ा आजीविका के लिए मिला था, जिस पर अब दबंगों की आंखें लग गई हैं। वे हर तरह के हथकंडे अपना कर निर्बल भूदान किसानों की ज़मीन हड़पने में जुटे हैं। इसके बाद किसान असहाय हो जा रहे हैं। सरकार भी दबंगों से भूदान किसानों की ज़मीन बचाने में विफल नज़र आ रही है। ये वे किसान हैं, जो सबसे छोटे किसानों में शुमार किए जाते हैं। अब उनकी ज़मीन का यह छोटा-सा टुकड़ा भी उनके पास नहीं बच पा रहा है। सरकारी रसीद नहीं दिखाने पर भूदान किसानों को उनकी ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है, क्योंकि सरकार का रसीद-दाता विभाग नियमित रसीद नहीं दे रहा है। रसीद के लिए भूदान किसान अंचल कार्यालय के चक्कर लगाकर थक चुके हैं। वे अपने इस जीवन-धन को बचाने के लिए माओवादियों की शरण में जाने की तैयारी में हैं। Read more

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