प्रेस की आज़ादी के नाम पर सवर्णों का क्रूर खेल
October 1, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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मीडिया सामाजिक बदलावों का नहीं बल्कि यथास्थिति बनाए रखने का हथियार है। ऐसा हथियार जिसके ज़रिए अगड़ी जातियों के लोग अवर्णों का हक़ मार रहे हैं। यह एक बहुत ही महीन खेल है। इसे समझना आसान नहीं। सवर्णों की इसी साज़िश पर से पर्दा उठा रहे हैं पत्रकार प्रमोद रंजन। जनतंत्र के पाठक प्रमोद रंजन से परिचित होंगे। उनके ही लेख पर वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी बौखला उठे थे और होश खो बैठे थे। आज आप प्रमोद रंजन के इस शोधपत्र को पढ़िए और एक बार मीडिया पर काबिज सवर्णों की चालों को उनके नज़रिए से देखने की कोशिश कीजिए। यह शोधपत्र आपको थोड़ा लंबा लग सकता है। लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी और स्वतंत्र प्रेस जैसे जुलमों की आड़ में चल रही घिनौनी साज़िश को समझने के लिए थोड़ा धैर्य तो दिखाना ही चाहिए। - मॉडरेटर
“हम” टिके हैं और टिके रहेंगे प्रभाष जोशी
September 7, 2009 by समरेंद्र
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कुछ दिन पहले एक पत्रकार साथी ने सरसरी तौर पर एक बात कही। उन्होंने बताया कि “बिहार और झारखंड के मीडिया सर्किल के एक ख़ास तबके के बीच एक चर्चा चल रही है। वो यह कि हरिवंश और प्रभाष जोशी की नीतियों पर जो लोग सवाल उठा रहे हैं वो बड़े मीडिया संस्थानों के हाथों में खेल रहे हैं। उन मीडिया संस्थानों के हाथों में जिनके ख़िलाफ़ प्रभाष जोशी ने नाम लेकर लिखा। इसके पीछे पैसे का भी बड़ा खेल है।” तब यह बात आई-गई हो गई। लेकिन प्रभाष जोशी का ताज़ा लेख पढ़ने से संदेह के बादल छंट गए हैं। अब समझ में आने लगा है कि यह बातें किन लोगों ने और किस मकसद से उड़ाई होंगी।
यह एक बहुत महीन रणनीति है। जिसका लक्ष्य है ख़बरों की काली कमाई से जुड़े मुद्दे के नीचे प्रभाष जोशी की ब्राह्मणवादी मानसिकता पर उठे सवालों को दफ़्न कर दो। जिसका लक्ष्य है प्रभाष जोशी की अवर्ण, स्त्री और मुसलमान विरोधी विचारधारा पर सवाल उठाने वालों को बड़े मीडिया संस्थानों की कठपुतली के तौर पर प्रोजेक्ट करके, उनके नैतिक बल को समाप्त कर दो। हम प्रभाष जोशी और उनके गिरोह की इस साज़िश का पुरजोर विरोध करेंगे। हम उन्हें यह हक़ नहीं देंगे कि वो हमारे पैरों से असहमति के नैतिक धरातल को खींच लें। प्रश्नों का उत्तर देने की बजाए प्रश्न करने की नीयत पर सवाल उठाएं। Read more
प्रमोद रंजन के इसी लेख पर बिफरे हैं प्रभाष जोशी
September 6, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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प्रभाष जोशी ने प्रमोद रंजन के जिस लेख का जवाब दिया है वो लेख एक व्यापक नज़रिए से लिखा गया है। इसमें प्रमोद रंजन ने कहीं नहीं कहा है कि ख़बरों के काले धंधे के ख़िलाफ़ प्रभाष जोशी और हरिवंश जैसे वरिष्ठ पत्रकारों की मुहिम ग़लत है। इसमें तो उसी मुहिम को और व्यापक बनाने की मांग की गई है। लेकिन अहंकार में डूबे प्रभाष जोशी ने प्रमोद रंजन के उठाए सवालों पर गौर करने के जगह उन्हें ही कठघरे में खड़ा कर लिया है। यहां हम आपको एक और बात बता देना जरूरी समझते हैं। प्रमोद रंजन ने जनसत्ता को लेख भेजने के साथ एक चिच्ठी भी लिखी थी। उस चिट्ठी में उन्होंने कहा था कि उनके लेख को प्रभाष जोशी के लेखों का जवाब नहीं समझा जाए। वो प्रभाष जोशी की मुहिम का पूरा समर्थन करते हैं और यह चाहते हैं कि मुहिम के दायरे को और बढ़ाया जाए। आप प्रमोद रंजन का पूरा लेख पढ़िए। बॉक्स में वो चिट्ठी भी दी गई है जो उन्होंने जनसत्ता के संपादक ओम थानवी को लिखी थी। – मॉडरेटर
“मनुवादी” प्रभाष जोशी का प्रवचन सुनिए!
September 6, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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चलिए प्रभाष जोशी ने जवाब तो दिया वरना हमें तो लगने लगा था कि उम्र की इस दहलीज पर आ कर उन्हें सुनाई और दिखाई कम देने लगा है। तभी तो उनके इंटरव्यू पर घमासान छिड़ा है और वो हैं कि कान में रुई ठूंस कर मस्त घूम रहे हैं। पश्चिम बंगाल की सरकार के ख़िलाफ़ “खास मकसद” से लिखी गई एक पुस्तक का विमोचन करते फिर रहे हैं। बात अटपटी लगती है। नक्सलियों की आड़ में संघियों और कांग्रेसियों का यह गठजोड़ अजीब लगता है। लेकिन इस पर बात फिर कभी। जैसा कि प्रभाष जोशी कहते हैं कि यह बताऊंगा तो बहस पटरी से उतर जाएगी। इसलिए हम इस अजीब से दिखने वाले गठजोड़ पर चर्चा करेंगे और सिर्फ इसी पर क्यों? चर्चा “मनुवादी” प्रभाष जोशी के दंभ पर होगी। उनकी साज़िशों पर होगी। उनकी तथ्यात्मक ग़लतियों पर होगी। और बहुसंख्य आबादी के प्रति उनकी घृणित सोच पर होगी। लेकिन उससे पहले आप प्रभाष जोशी का लेख पढ़िए और हर शब्द में छिपे अर्थ को समझने की कोशिश कीजिए।- मॉडरेटर
चलो, कोई तो मैदान में उतरा। न सही लोकसभा चुनाव जैसे नाजुक और निर्णायक मौके पर काला धन लेकर चुनावी विज्ञापन को खबर बना कर बेचने वाला अखबार मालिक, उसका संपादक या जनरल मैनेजर। कोई प्रमोद रंजन ही सही, जिनका मानना है कि विज्ञापन को खबर बना कर बेचने से ज्यादा बुरा और खतरनाक तो पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म का निर्वाह है। क्योंकि इससे मूल्यों में ऐसे भयावह क्षरण से नुकसान दलित-पिछड़ों की राजनीतिक ताकतों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की उन शक्तियों का भी हुआ है जो इसके प्रगतिशील तबके से नैतिक और वैचारिक समर्थन की उम्मीद करते हैं। मीडिया के ब्राह्मणवादी पूंजीवाद ने इन्हें उपेक्षित, अपमानित और दिग्भ्रमित भी किया है।
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साधु की जात, मीडिया की बात यानी मृणाल-योगेंद्र संवाद
September 3, 2009 by दिलीप मंडल
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“बेशक साधु की जाति न पूछें। लेकिन साधु के भेष में आने वाले हर व्यक्ति के बारे में इतनी जांच तो जरूर कर लें कि वह साधु है भी या नहीं, वह अपने जन्म के संयोग से ऊपर उठ पाया है या नहीं। अगर साधु के भेष में कोई गृहस्थ मिले तो उसके ज्ञान, कर्म और चरित्र पर निगाह रखें। अगर उसमें कोई खोट या पूर्वाग्रह पाएं और उसका कोई कारण न समझ आए तो फिर उसकी जात भी पूछ लें।”
- योगेंद्र यादव, दैनिक हिंदुस्तान, 11 जुलाई, 2006
लगभग तीन साल पहले जब देश में मंडल-2 लागू करने को लेकर हंगामा मचा हुआ था तो नोएडा फिल्म सिटी में CNBC TV18 के स्टूडियो में एक चर्चा हुई। एंकर करण थापर थे और चर्चा में शामिल थीं हिंदुस्तान टाइम्स की मालकिन शोभना भरतीया, पॉयोनियर के मालिक चंदन मित्रा और सीएसडीएस के फेलो प्रोफेसर योगेंद्र यादव। रिकॉर्डिंग के दौरान योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि शोभना भरतीया के संस्थान से निकलने वाले हिंदी अखबार में ऊपर के सभी दस पदों पर एक ही जाति के लोग हैं। जाहिर है शोभना भरतीया ने इसका विरोध किया।
इसके चंद दिनों बाद हिंदुस्तान की तत्कालीन प्रधान संपादक मृणाल पांडे ने 16 जून 2006 को अखबार में एक लेख अपने नाम से लिखा। शीर्षक था जात न पूछो मीडिया की, पूछ लीजिए ज्ञान। इसके कुछ दिनों बाद (11 जुलाई 2006 को) हिंदुस्तान में योगेंद्र यादव का जवाब एक लेख की शक्ल में छपा। पेश है उस लेख के कुछ अंश-
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कहीं प्रभाष जोशी को निपटा तो नहीं रहे आलोक तोमर?
August 30, 2009 by कबीर
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बचपन में एक किस्सा सुनते थे कि एक राजा ने बंदर पाल रखा था। एक दिन सोते वक़्त उसने बंदर से कहा कि किसी को पास मत फटकने देना। आज्ञाकारी बंदर राजा के पैर के पास बैठ कर पंखा हांकने लगा। तभी एक मक्खी भिनभिनाती हुई वहां पहुंच गई और राजा के शरीर पर बैठ गई। आज्ञाकारी बंदर उसे उड़ाने लगा। वो उड़ती और फिर राजा के शरीर पर बैठ जाती। बंदर का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। उसी गुस्से में उसने तलवार उठा ली। मक्खी फिर राजा के शरीर पर बैठी और मक्खी को मारने के इरादे से बंदर ने तलवार भांज दी। मक्खी का तो कुछ नहीं बिगड़ा, राजा हलाल हो गया। Read more
सच में बहुत जातिवादी है मीडिया
August 29, 2009 by सुशांत झा
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एसपी का साक्षात्कार जब छपा था (13 साल पहले) तबसे लेकर अब तक हालात में कोई बड़ी तब्दीली नहीं आई है। मुझे याद है साल 2004 में आईआईएमसी के मेरे बैच में – जब सिर्फ एससी-एसटी को ही आरक्षण मिला हुआ था – बमुश्किल एक ओबीसी लड़का (यादव) जेनेरल कैटेगरी में चुना गया था। ये तब के हालत थे जब देश के कई सूबों में दशक भर से ज्यादा से पिछड़ों की सरकार थी। मुझे आश्चर्य इस बात का था कि दक्षिण के कई सूबों में जहां समाजिक सशक्तिकरण कई दशक पुराना है – वहां के पिछड़े-दलित भी नहीं आ पाए थे। हमने देखा था कि 30 के हमारे बैच में 6 सीटें एससी-एसटी के लिए थी और बचे 24 सीटों पर लगभग 18 ब्राह्मण थे। इसका सीधा मतलब ये था कि महज सत्ता में भागीदारी से किसी समुदाय का सर्वांगीण विकास तत्काल नहीं दिख सकता-खासकर तब जब हजारों सालों की वंचना पृष्ठभूमि में हो। जाहिर है, बीमारी गंभीर है। Read more
“प्रभाष जोशी पर सवाल उठाने वाले लफंगे हैं”
August 27, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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प्रभाष जोशी चुप हैं। चुप्पी एक हथियार है। वो हथियार जिससे सत्ता बड़े से बड़े आंदोलन को दबाती है। प्रभाष जोशी पत्रकारिता के शलाका पुरुष हैं। वो इस हथियार से न केवल वाकिफ हैं। बल्कि इसकी मारक क्षमता के परिचित भी हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने कागद कारे में लिखा कि बड़ी बेशर्मी है कोई जवाब भी नहीं देता। वो आहत थे। आहत इसलिए कि उन्होंने पैसे लेकर ख़बरें छापने का काला धंधा उजागर किया था उस पर कोई संस्थान जवाब नहीं दे रहा था। ठीक वैसे ही प्रभाष जोशी भी अपने इंटरव्यू से उठे सवालों पर जवाब नहीं दे रहे हैं। लेकिन अब उनके बदले कई लोग प्रतिक्रिया दे रहे हैं। अंबरीश कुमार, आलोक, संजय कुमार सिंह, गणेश प्रसाद झा, शमशेर सिंह… सभी के “नामों” से प्रतिक्रिया आई है। यहां हम उन सभी की प्रतिक्रिया छाप रहे हैं। उनकी ई-मेल आईडी भी। कोई खुद को प्रभाष जोशी का “लठैत” बता रहा है। कोई “पहलवान” तो कोई प्रभाष जोशी के इंटरव्यू पर सवाल उठाने वालों को “लफंगा” कह रहा है। अब आप इनकी भाषा पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। – मॉडरेटर Read more
“प्रभाष जोशी” के जातिवाद पर बहस बंद नहीं होगी
August 27, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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प्रभाष जोशी के इंटरव्यू पर जो बहस शुरू हुई है – उस पर कुछ “जनसत्ताइयों” की प्रतिक्रया आई है। उन सभी का एक ही दर्द है कि प्रभाष जोशी के बहाने जनसत्ता के माहौल पर चर्चा क्यों हो रही है? जनसत्ता के माहौल को ब्राह्मणवादी क्यों बताया जा रहा है? और भी ग़म हैं ज़माने में .. की तर्ज पर उनका यह भी कहना है कि मान लेते हैं कि प्रभाष जोशी जातिवादी हैं। अब इस बहस को यहीं ख़त्म कर दिया जाए। दूसरे मुद्दों पर ध्यान दिया जाए। कुछ पुराने जनसत्ताई व्यंगात्मक लहजे में बहस को खारिज करने में जुटे हैं तो कुछ चुनौती दे रहे हैं कि “प्रभाष जोशी का समय जा चुका है आप लोगों के दिशानिर्देशन में ही हम लोग कुछ सीख लेंगे।” Read more
जिसकी जितनी जातीय औकात, उतना उसका प्राप्य
August 25, 2009 by रंगनाथ सिंह
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“……..अपने यहां मुसलमान कौन हुए? मुसलमान वो हुए, जो हाथ से काम करने वाले लोग थे. जुलाहे, लोहार, कुम्हार जो-जो भी हाथ से काम करने वाले लोग थे और जिनको आप के समाज में इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता था, वो लोग मुसलमान हुए. वे स्वाभाविक रूप से हाथ को, उंगलियों को हैंडल करने वाले लोग थे. उनकी स्किल हमसे और आप से बेहतर है क्योंकि वो हाथ से ही काम करने वाले लोग थे. हम दिमाग से काम करने वाले लोग है….” - प्रभाष जोशी Read more



