बिहार में हिंदुस्तान का जलवा

रोशनी की झालर में नहाया दानापुर के शिवाला स्थित हिंदुस्तान का नया परिसर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और अन्य गणमान्य लोगों की मौजूदगी से गुलजार हो गया। सोमवार की शाम मुख्यमंत्री ने यहां आते ही बटन दबाकर नई प्रिंटिंग मशीन का उद्घाटन किया। इसके बाद धड़ाधड़ दौड़ने लगीं मशीनें और नए कलेवर व आकर्षक रंगों के साथ छपने लगा आपका प्रिय व शुभचिंतक अख़बार हिंदुस्तान।

यह अत्याधुनिक मशीन 42 हज़ार वर्गफीट इलाके में स्थापित की गई है। यूरोप में प्रयोग में आ रही अत्याधुनिक तकनीक वाली इन मशीनों को हिंदुस्तान के छह एकड़ के नए और विशाल परिसर में बैठाया गया है। यहां दो प्रिंटिंग मशीनें आई हैं जो 90 हज़ार कापी प्रति घंटे छापेंगी। बिहार के लिए हिंदुस्तान का यह योगदान है क्योंकि 100 करोड़ का निवेश करने वाली कुछ कंपनियों में हिंदुस्तान मीडिया वेंचर लिमिटेड (एचएमवीएल) भी शामिल है। हिंदुस्तान की नई मशीन अथ्याधुनिक और अपने आप में स्टेट ऑफ आर्ट है। यह बिहार की सबसे बड़ी प्रेस है। Read more

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बिहार में तेज़ी से पनप रहा है तेलंगाना

नीतीश राज में 11 फीसदी विकास के डंके का शोर अब कर्कश लगने लगा है। कर्कश सिर्फ़ इसलिए नहीं कि राज्य और नेशनल मीडिया उसे करीने से छाप रहा है, कर्कश इसलिए कि इस विकास में ख़तरनाक किस्म की क्षेत्रीय असामनता के बीज छुपे हैं जिन्हें नीतीश सरकार पल्लवित करने में दिन-रात एक कर रही है।

नीतीश सरकार विकास के उसी मॉडल पर आगे बढ़ रही है जिस पर कभी चंद्रबाबू नायडू काम करते थे। पटना में बिहार का पूरा भ्रष्ट पैसा जमा हो गया है। कुछ आंकड़े आंखें खोल देने के लिए काफी है। पटना में एक फ्लैट की कीमत 25 लाख से लेकर 65 लाख रुपये तक पहुंच गई है जो दिल्ली-एनसीआर के बराबर है। पटना उन शहरों में शुमार हुआ है जहां से हवाई यात्रियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इंडिया टुडे के एक सर्वे के मुताबिक पटना में इंटरनेट की पहुंच (प्रतिव्यक्ति फीसदी में) दिल्ली से थोड़ी ही कम है! ये विकास की भयावह तस्वीर है, जो बताती है कि विकास कहां केंद्रित हो रहा है। Read more

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“जिम्मेदारी तो संपादक को ही लेनी पड़ती है”

आज का मीडिया

आज का मीडिया

बिहार में दैनिक जागरण और उसके संपादक पर उठाए गए सवाल पर बहस अब तेज़ हो रही है। बहस का मुद्दा है कि अगर किसी अख़बार से कोई ग़लती हो गई हो तो उसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाए? क्या किसी संपादक को यह हक़ है कि वह अख़बार की अच्छाइयों को कबूल करे लेकिन बुराइयों के लिए व्यवस्था को दोषी ठहरा कर पल्ला झाड़ ले? यहां बात किसी एक अख़बार या फिर किसी एक संपादक की नहीं है। बात पूरे मीडिया जगत की है। संकट विश्वास का है। जनतंत्र पर जारी इसी बहस को आगे बढ़ाने के लिए हमने बिहार के दो वरिष्ठ पत्रकारों से कुछ सवाल पूछे। उनके जवाब आपके सामने हैं। आप पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। Read more

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दैनिक भास्कर की चोरी, ऊपर से सीनाजोरी

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आज दैनिक भास्कर के  राष्ट्रीय संस्करण में भी अभिलाष खांडेकर के महान विचार छप गए। मध्य प्रदेश के एडिशन में की गई उनकी विशेष टिप्पणी (भोपाल को बिहार होने से बचाएं) को राष्ट्रीय संस्करण में हू-ब-हू छाप दिया गया है। कहीं कोई संशोधन नहीं। कहीं कोई भूल सुधार नहीं। अख़बार में पृष्ठ संख्या सात पर आप खांडेकर की ये विशेष टिप्पणी पढ़ सकते हैं।

अभिलाष खांडेकर के संकीर्ण नज़रिये पर सवाल उठने के बाद से दैनिक भास्कर का रवैया बेहद हैरान करने वाला है। कल वेब एडिशन के संपादक राजेंद्र तिवारी ने पाठकों की भावनाओं का खयाल रखते हुए खांडेकर के लेख पर खेद जताया और आपत्तिजनक पंक्तियों को हटा दिया। मगर खेद जताने का तरीका बड़ा अजीब था। कायदे से होना तो ये चाहिये था कि लेख अभिलाष खांडेकर ने लिखा है तो माफी भी वही मांगते। अगर अभिलाष खांडेकर में अहंकार इतना अधिक है कि उन्हें अपनी ग़लत बात को वापस लेने में शर्म आ रही हो तो संस्था में उनका कोई वरिष्ठ माफी मांगता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वेब संस्करण के संपादक राजेंद्र तिवारी ने मामले को टालने के अंदाज में पाटकों की प्रतिक्रिया के लिए दी गई जगह पर खेद भरी टिप्पणी चिपका दी। अब इसे आप क्या कहियेगा?

इस पूरे प्रकरण में कुछ लोग बड़े बेतुके तर्क दे रहे हैं। ऐसे लोगों की एक दलील तो ये है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी को जाति, धर्म, प्रांत जैसी सीमाओं में नहीं बांधना चाहिये। अरे भई, अभिव्यक्ति की आज़ादी में ये कहीं नहीं है कि आप किसी दूसरे की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करें। सोचिये अगर ऐसा हो जाए तो अंजाम कितना बुरा होगा। तब तो हर तरफ अराजकता होगी और नफ़रत की सियासत करने वाले चांदी काटेंगे। एक धर्म के कट्टरपंथी दूसरे धर्म को गाली देंगे। हिंसा भड़केगी और कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं होगी। इसलिए अभिव्यक्ति की आज़ादी ही नहीं, किसी भी तरह की आज़ादी के साथ जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों तत्व जुड़े हुए हैं। वैसे आपको ये भी बता दें कि सत्ता की तानाशाही के ख़िलाफ़ जब आवाज़ उठाने की बात होती है तो यही लोग ये तर्क देने लगते हैं कि राष्ट्र के ख़िलाफ़ कुछ लिखने पर राजद्रोह का मुक़दमा चलाना चाहिये। मतलब जिन मुद्दों पर अभिव्यक्ति की आज़ादी का सही इस्तेमाल होना चाहिये वहां पर ये भोकुस दलाल लोग उसका गला घोंटने लगते हैं और जब इस आज़ादी के ग़लत इस्तेमाल का विरोध करने की बात हो तो उसके समर्थन में नारा बुलंद करने लगते हैं।

अगर अभिलाष खांडेकर को भोपाल में बढ़ते अपराध पर कुछ लिखना था तो इसके लिए उन्हें बिहार को नीचा दिखाने की जरूरत नहीं थी। वो चाहते तो भोपाल के ही लोगों से बात करके बहुत कुछ लिख सकते थे। इसलिए ये मुद्दा संकीर्ण और बीमार सोच का मुद्दा है। इस सोच से अभिलाष खांडेकर जैसे लोग निजी फायदा भले ही उठा लें, पत्रकारिता को बहुत बड़ी क्षति पहुंचा देते हैं। इसलिए ऐसे लेख और लेखकों का जितना हो सके, उतना विरोध करना चाहिये।

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पूरे देश से माफी मांगें अभिलाष खांडेकर

अभी मोहल्ला लाइव पर मौजूद एक ख़बर पर मेरी नज़र पड़ी। सोच कर हैरानी हुई। क्या किसी अख़बार का संपादक इतनी संकीर्ण सोच रख सकता है? और सपाट शब्दों में कहें तो क्या इतनी संकीर्ण सोच रखने वाले किसी भी शख़्स को हक़ है कि वो संपादक बने? दैनिक भास्कर के संपादक अभिलाष खांडेकर ने अपने विशेष संपादकीय “भोपाल को बिहार होने से बचाएं” में अपनी सोच का जो परिचय दिया है उसकी जितनी निंदा की जाए वो कम है।


दैनिक भास्कर ने इंटरनेट से अभिलाष का लेख हटाया

अभिलाष खांडेकर के लेख पर सवाल उठने के तुरंत बाद दैनिक भास्कर ने इंटरनेट पर मौजूद उनके लेख को हटा दिया है। अब उसकी जगह आपको कोई और ख़बर मिलेगी। लेकिन इससे सवाल ख़त्म नहीं हुआ है। अभिलाष खांडेकर और दैनिक भास्कर दोनों को इस ग़लती के लिए पूरे देश से माफी मांगनी चाहिये। चूंकि अभिलाष का लेख इंटरनेट के पाठकों के लिए भी उपलब्ध था इसलिए सिर्फ अख़बार ही नहीं इंटरनेट पर भी माफी मांगनी चाहिये।

अभिलाष खांडेकर ने संपादकीय में लिखा है कि “कभी-कभी लगता है हम बिहार के किसी शहर में रह रहे हैं, शांत, कानूनप्रिय भोपाल में नहीं। पुलिस महानिदेशक संतोष राऊत भले अफसर की छवि रखते हैं पर उनसे यदि लूट, बलात्कार, चोरी-डकैती नहीं रुकती तो उस छवि का क्या फायदा? सख्त उन्हें भी होना है और मुख्यमंत्री को भी। भोपाल को पटना बनाने से रोकना हो तो।” अभिलाष से ये पूछना चाहिये कि क्या वो कभी बिहार गए हैं? अगर नहीं, तो फिर किस आधार पर उन्होंने ये ज़हर उगला है। अगर हां, तो क्या बिहार में कदम रखने पर किसी ने उनकी इज्जत तार-तार कर दी थी कि वो पूरे राज्य की जनता को अपमानित करने पर आमादा हो गए?

अभिलाष खांडेकर ने अपने इस संपादकीय से पत्रकारिता के पवित्र पेशे को कलंकित कर दिया है। पत्रकार का सिर्फ़ एक कर्म है। उसे जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, निजी राजनीतिक और आर्थिक हितों से ऊपर उठ कर देश और देश की जनता के बारे में सोचना चाहिये। जहां कहीं भी अन्याय हो रहा है तो वो पीड़ितों के हक़ में अपनी कलम को हथियार की तरह इस्तेमाल करे। उसकी ताक़त सताए हुए लोगों के पक्ष में खड़े होने से बनती है। लेकिन लगता है कि निचले पायदान से संपादक जैसे ऊंचे पद पर पहुंचने के दौरान अभिलाष के भीतर इतना अहंकार पैदा हो गया है कि उनके सोचने की सारी शक्ति समाप्त हो गई है। तभी वो एक राज्य विशेष को अपमानित कर बैठे।

दैनिक भास्कर के मध्य प्रदेश स्टेट हेड से ये भी पूछना चाहिये कि कहीं उनकी मंशा सियासत में जाने की तो नहीं है। अगर हां, तो उन्हें हमेशा ये याद रखना चाहिये कि वो नफ़रत की इस ओछी सियासत से बाल ठाकरे और राज ठाकरे तो बन सकते हैं लेकिन उनसे ऊपर नहीं उठ सकते। बाल ठाकरे और राज ठाकरे सारे धतकर्म करने के बाद भी महाराष्ट्र में बीस फ़ीसदी से अधिक आबादी अपने साथ नहीं जोड़ सके हैं। इसलिए सबको समझ लेना चाहिये कि इस तरह की राजनीति से कोई तात्कालिक फायदा ज़रूर उठा सकता है लेकिन लंबे दौर में उसे घाटा ही होगा।

जहां तक बिहार और मध्य प्रदेश के बीच तुलना की बात है तो यकीनन सड़क और बिजली जैसे कुछ मामलों में मध्य प्रदेश आगे है। लेकिन अपराध के मामले में मध्य प्रदेश का दामन ज़्यादा दागदार है। शहरों में होने वाले अपराध के मामले में मध्य प्रदेश के तीन शहर … इंदौर, भोपाल और जबलपुर बिहार की राजधानी पटना से काफी आगे हैं।  अगर आप अपराध दर (आबादी और अपराध का अनुपात) की बात करें तो उसमें भी मध्य प्रदेश बिहार से काफी आगे है। यही नहीं महिलाओं से जुड़े अपराध में तो मध्य प्रदेश देश भर में पहले स्थान पर है। मध्य प्रदेश में सबसे ज़्यादा बलात्कार के मामले सामने आए हैं। छेड़खानी के मामले भी सबसे ज़्यादा वहीं दर्ज हुए हैं। बाल विवाह आज भी वहां पर संस्थागत रूप से होता है। ये आंकड़े नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की वेबसाइट पर दर्ज हैं। इसलिए अभिलाष खांडेकर को चाहिये था कि ऐसा कुछ भी लिखने से पहले एक बार उन आंकड़ों पर तो गौर कर लेते। लेकिन लगता है कि उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया।

मैं यह नहीं कहता कि किसी को अपने क्षेत्र पर नाज नहीं होना चाहिये। होना चाहिये और सबको होना चाहिये। मुझे भी अपने उत्तर प्रदेश पर नाज हैं। वहां हो रही गड़बड़ियों से मेरा भी मन खिन्न होता है। अपराधियों के वर्चस्व पर मुझे भी गुस्सा आता है। मैं भी राज्य की सरकार को कोसता हूं… उसकी निंदा करता हूं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि ऐसा करते वक़्त मैं किसी भी राज्य, क्षेत्र, धर्म, जाति या फिर बोली का मजाक उड़ाऊं। किसी समुदाय की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करूं। उसे हिकारत भरी नज़र से देखूं। अगर मैंने ऐसा किया तो ये सिर्फ उस खास तबके के लोगों का अपमान नहीं होगा बल्कि ये पत्रकारिता के पेशे का अपमान होगा … देश के संविधान का अपमान होगा और पूरे देश का अपमान होगा। इसलिए अभिलाष खांडेकर को बिना किसी देरी के सार्वजनिक तौर पर अपने लिखे के लिए माफी मांगनी चाहिये। ऐसा करने में वो जितनी देर करेंगे उनका गुनाह उतना बड़ा होता जाएगा।

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जिसकी जैसी मार्केटिंग, उसको वैसा वोट

जनसत्ता में आज वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शेष का लेख छपा है। बिहार के सीतामढ़ी जिले के रहने वाले अरविंद पटना में लंबे समय तक पत्रकारिता कर चुके हैं और वो बिहार की पत्रकारिता के बारे में काफी गहराई से जानते हैं। जनसत्ता में आज के लेख में उन्होंने बिहार की ज़मीनी हक़ीक़त और मीडिया के जरिये मार्केटिंग के बीच के अंतर को बयां किया है। साथ ही देश में मीडिया की मौजूदा भूमिका का विश्लेषण किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे मीडिया मैनेजमेंट ने आम चुनाव के नतीजों पर असर डाला। हम अरविंद शेष का ये लेख जनसत्ता से साभार जनतंत्र पर छाप रहे हैं। आप भी पढ़ें और अपना नज़रिया पेश करें।
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बिहार की गुलाम पत्रकारिता ((पार्ट – 2))

बीते एक दशक में मीडिया का स्वरूप जितनी तेज़ी से बदला है, उतनी ही तेज़ी से उसे नियंत्रित कर हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की चाहत भी बढ़ी है। ये चाहत सबसे अधिक नेताओं में होती है। शुरू से देखा गया है कि नेता मीडिया से डरते हैं। भ्रष्ट नेता तो बहुत ज़्यादा डरते हैं। इसलिए साम-दाम-दंड़-भेद सभी तरीके से उसे नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। Read more

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बिहार की गुलाम पत्रकारिता ((पार्ट – 1))

बिहार की राजधानी पटना में विकास के नाम पर एक केऑस (अफरा-तफरी) नज़र आता है। जगह जगह गड्ढे खुले पड़े हैं। जो परियोजाएं एक दो साल में पूरी हो जानी चाहिये थीं, वो लंबी और लंबी खिंचती जा रही हैं। ट्रैफिक की समस्या लगातार बनी हुई है। मुजफ्फरपुर का भी वही हाल है। बीच बाज़ार में आधा बना पुल विकास परियोजनाओं की खामियों की ओर इशारा करता है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि नीतीश के राज में कई ऐसी संस्थाओं और कंपनियों को भी परियोजनाएं बांटी गईं जिनके पास उनकी दक्षता नहीं थी। आखिर क्यों? कहीं उन लोगों का सरकार से कोई रिश्ता तो नहीं? रिश्ते सिर्फ़ ख़ून के ही तो नहीं होते। दिल, मतलब, सियासत और मजबूरी के रिश्ते भी तो हो सकते हैं। अगर रिश्ते हैं तो फिर मीडिया ने उनका खुलासा क्यों नहीं किया है? नीतीश की अंधभक्ति में जुटा मीडिया ख़राब पहलुओं पर सवाल खड़े क्यों नहीं कर रहा है? क्या अचानक बिहार के सभी भ्रष्ट अफ़सर ईमानदार हो गए हैं? क्या एक झटके में वहां की सारी बुराइयां ख़त्म हो गई हैं? इन सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं है। इसे समझने के लिए लालू यादव और नीतीश कुमार के अंतर को समझना होगा। Read more

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