पोस्टर छाप पोलटिक्स
December 29, 2009 by विचित्र मणि
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कुल जमा तीन जन थे। रात कमर तक घनी हो चुकी थी और ठंड की ठिठुरन में उनका हाल बहुत बुरा नहीं तो बुरा तो कहा ही जाएगा। एक आदमी सीढ़ी लगाकर डिवाइडर पर बने पोस्ट लैंप पर पोस्टर टांगने की कोशिश कर रहा था, दूसरा सीढ़ी संभाले हुए था और तीसरा इधर-उधर छिटके पोस्टरों को समेट रहा था। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पोस्टर थे, जिन पर काफी बड़े आकार में राहुल गांधी मुस्कुरा रहे थे। इधर-उधर छिटके पोस्टरों में राहुल बाबा का एक पोस्टर डिवाइडर से नीचे सड़क पर आ गया था, जिसपर चिपकाने वाले की नजर शायद गयी नहीं। कांग्रेस का भविष्य तो इस देश की जनता बांचेगी लेकिन कांग्रेसी जिसे अपना भविष्य मानते हैं, उनका पोस्टर करीब-करीब आधी रात को आईटीओ के चौराहे पर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की तरफ जाने वाली सड़क पर अपना धुल-धुसरित भविष्य देख रहा था। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी यानी डीपीसीसी के जिस अधिकारी ने राहुल गांधी का पोस्टर लगवाने का ठेका उन तीन मजदूर सरीखे लोगों को दिया होगा, उसकी ड्यूटी तो आदेश और पैसा देकर ही ख़त्म हो गयी होगी। पोस्टर टांगने और चिपकाने वालों ने भी अपना कर्तव्य रात बारह बजे तक पूरा कर लिया होगा और सड़क पर मोटर गाड़ी में बैठे हमारे आप जैसे लोगों की नज़र पड़ गयी तो कुछ रोज तक कांग्रेस के मुस्कुराते भविष्य को सड़क पर टंगा हुआ देख हम आप भी अपना फर्ज निभा लेंगे। उसमें कितनी खुशी, कितनी उदासी, राम जाने! Read more
हमारा और आपका गुनाह भी कम नहीं
December 26, 2009 by विचित्र मणि
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हिमांशु जी ने दफ्तर में पूछा कि आपने कुछ लिखा क्यों नहीं? मैंने उन्हें बताया कि जानकारी जो मुझे मिली है, उसे लिखा नहीं जा सकता। फिर भी लिखूंगा लेकिन पहले मन बना लूं कि क्या लिखते वक्त अपनी भावना, आक्रोश और गुस्से को दबा पाऊंगा। चार-पांच दिनों से उस तस्वीर को जितनी बार देखता हूं, उतनी ही अपनी हिम्मत जवाब देने लगती है। सच कहें तो उस तस्वीर से आंख मिलाने की हिम्मत नहीं होती। ऐसा लगता है जैसे वो दो मासूम आंखें पूछ रही हैं कि क्या इस दुनिया को जी भरकर और सौ साल तक जीने का हक उन्हें नहीं था? क्या उनकी तरफ जिसने बुरी नजर उठायी, उसे उसके किये की सजा दिलाने के लिए लड़ने का अधिकार उसका नहीं था?
उन आंखों और उनसे निकले सवालों से बचकर आप निकल जाइएगा लेकिन उस पिता का विलाप तो पूरे देश से पूरे 16 साल का हिसाब मांग रहा है। 29 दिसंबर 1993 को रुचिका गिरहोत्रा ने खुदकुशी कर ली। तब से सोलह साल में उसके वजूद और आत्मा की लड़ाई उसके घर, उसके बाप और भाई, उसकी दोस्त और इस देश के दिल पर लड़ी जा रही थी लेकिन उस लड़ाई में हर कोई हारा। न्याय हारा, बेबस बाप हारा, अपना सब कुछ गंवा चुका भाई हारा, 19 साल से लड़ रही उसकी दोस्त आराधना हारी, मानवीय संवेदना हारी और सबसे बढ़कर तो उस मासूम बच्ची की आत्मा हारी। उछलकर अपने सपनों को पाने की ख्वाहिश के रीते हुए उन सत्रह वर्षों की जद्दोजहद ने कुछ ऐसे सवाल खड़े कर दिये हैं, जिसका जवाब हमें अपने अंदर खोजना पड़ेगा। Read more
इस संसद का क्या करें?
December 2, 2009 by विचित्र मणि
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“आजतक एक भी चीज को पार्लियामेंट ने ठिकाने लगाया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बड़े सवालों की चर्चा जब पार्लियामेंट में चलती है, तब उसके मेंबर पैर फैलाकर लेटते हैं या बैठे बैठे झपकियां लेते हैं। उस पार्लियामेंट में मेम्बर इतने जोरों से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान-परेशान हो जाते हैं। उसके एक महान लेखक ने उसे दुनिया के बातूनी जैसा नाम दिया है। मेंबर जिस पक्ष के हों, उस पक्ष के लिए अपना मत बगैर सोचे-समझे दे देते हैं, देने को बंधे हुए हैं। अगर कोई मेंबर इसमें अपवादस्वरूप निकल आए, तो उसकी कमबख्ती ही समझिए। जितना समय और पैसा पार्लियामेंट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले, तो प्रजा का उद्धार हो जाए।”
ठीक 100 साल पहले गांधी जी ने यह विचार ब्रिटिश संसद के लिए व्यक्त किये थे। अपनी किताब हिंद स्वराज्य में। तब भारत अंग्रेजों का गुलाम था और यहां संसद की जगह ब्रिटिश असंबली थी। लेकिन 100 साल में भारतीय संसद उस बदतर स्थिति से भी बदतर हो गयी है, जिसका जिक्र गांधी जी ने ब्रिटिश संसद के लिए किया है। Read more
वाजपेयी “देवतुल्य” हैं, अंगुली उठाओगे तो पाप लगेगा!
November 27, 2009 by विचित्र मणि
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लिब्रहान आयोग की रपट को लेकर हंगामा मचा हुआ है। सारे राजनीतिक दल अपनी सुविधा के मुताबिक उसका खंडन-मंडन कर रहे हैं। लेकिन लिब्रहान आयोग में एक अदद नाम ने भी पूरे राजनीतिक वातावरण में कम लुत्ती नहीं लगायी है। आयोग ने जिन लोगों को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए जिम्मेदार ठहराया है, उनमें एक नाम अटल बिहारी वाजपेयी का भी है। वाजपेयी का नाम आया तो पूरी भाजपा ही नहीं, संघ परिवार को भी मिर्ची लग गयी। और तो और, वाजपेयी को कल तक पानी पी पीकर कोसने वाले कल्याण सिंह ने भी सप्तम स्वर में कोसना शुरू किया कि कांग्रेस वालों की बेशर्मी तो देखो, बेचारे अटल बिहारी वाजपेयी जैसे संतपुरुष का नाम अयोध्या विवाद से जोड़ दिया। मोम से भी कमतर बीजेपी के लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी ने भी अपनी फटी आवाज में चीखना शुरु किया कि मेरा नाम लिया तो लिया, वाजपेयी का नाम कैसे जिम्मेदारों की सूची में ठहरा दिया। वैसे आडवाणी मानते हैं कि 6 दिसंबर 1992 उनकी जिंदगी का सबसे दुखद दिन है। यानी अयोध्या प्रकरण में सारे धत्कर्म करके भी आडवाणी खुद को पाक-साफ मानते हैं। वाणी और बुद्धि की बलिहारी है! Read more
इतनी जल्दी क्यों कर दी, प्रभाष जी?
November 11, 2009 by विचित्र मणि
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कागद तो आगे भी कारे होंगे लेकिन वैसे नहीं जैसे प्रभाष जी किया करते थे। लिखना चलता रहेगा। लिखने वाले दूसरे आ जाएंगे लेकिन कभी खुशियों की अंतहीन ऊंचाई पर ले जाने वाली तो कभी आंसुओं में डुबोने वाली लेखनी तो बंद हो गयी ना! अब पत्रकारिता में शायद ही वैसे नए अनगढ़ शब्द आएं और देसी अंदाज में भाषा प्रवाह दिखे। शब्द शायद ही भावनाओं के सारथी बन पाएं क्योंकि उन शब्दों को सही मूल्य देने वाला नहीं रहा। यह कमी ना जाने कितने अरसे तक एक टीस पैदा करेगी। कब तक एक विचलन मन में समाया रहेगा कि अब इतवार को नींद खुलते ही जनसत्ता का छठा पेज देखने की आकुलता बेमानी हो गयी है। जिस कारेपन से कागद खुद को धन्य मान लेता होगा, कागद का वह टुकड़ा भी बहुत दिनों तक अपने कलमघसीट की याद में रोता रहेगा और उसके आंसू हर इतवार को पाठकों के आंखों में जब्त होते रहेंगे। Read more
ये क्रिकेट का नेपोलियन है
November 6, 2009 by विचित्र मणि
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अगर खेल का आनंद लेना है तो हार-जीत को बगल की मेज पर रख दीजिए। हैदराबाद में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत का पांचवा वनडे मैच भी हार-जीत से ज़्यादा खेल का मजा लेने के लिए था। इसलिये कि सचिन तेंदुलकर जिस लय में खेले, वह अद्भुत रहा। जहां नए-नए खिलाड़ी चंद रन बनाकर खुद को तीसमार खां समझ लेते हैं, वही सचिन का साढ़े 36 साल की उम्र में 175 रनों की शानदार पारी खेलना एक नया विश्वास जगाता है। विश्वास यह कि सचिन आज भी टीम इंडिया के मेरुदंड हैं और उनका खेल क्रिकेट की मर्यादा की रक्षा करता है। वह खेल बताता है कि जीत और हार का फासला तो सिर्फ चंद लम्हों की मानसिक अवस्था है, नहीं तो खेल देखिए और खिलाड़ी का पराक्रम। Read more
प्रभाष जी की कमी हमेशा खलेगी
November 6, 2009 by विचित्र मणि
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भारत-ऑस्ट्रेलिया वनडे मैच देखते हुए यही सोच रहा था कि सचिन के सत्रह हजारी होने पर प्रभाष जी जरूर लिखेंगे। सच कहें तो मैच देखने से उनके लिखे को पढ़ना ज़्यादा मजेदार होता है। लेकिन आज सुबह एक ऐसी मनहूस खबर से जागरण हुआ, जो सालों तक दिल में एक हूक पैदा करती रहेगी। प्रभाष जोशी नहीं रहे। हिंदी का सबसे बड़ा हस्ताक्षर मिट गया। अब बचा है तो सिर्फ एक शून्य।
क्रिकेट में गहरी दिलचस्पी थी लेकिन उससे ज़्यादा सामाजिक सरोकार और राजनीतिक के स्तर में गिरावट उन्हें परेशान करती थी। उनका लिखा अक्सर समाज के आखिरी आदमी के सवालों से जूझता हुआ दिखता था। तभी तो अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट पर उन्होंने सरकार की खटिया खड़ी कर दी कि जिस देश में 84 करोड़ लोग रोजाना 20 रुपये से भी कम कमाई करते हैं, उस देश को महाशक्ति कैसे बनाओगे। Read more
श्रद्धांजलि और सम्मान पर उनका भी हक है
November 1, 2009 by विचित्र मणि
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आचार्य नरेंद्र देव
सड़ना मंजूर मगर मरना नहीं
September 25, 2009 by विचित्र मणि
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“एक मजदूर काफी बूढ़ा हो गया था। बदन में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह मजदूरी कर सके। लेकिन संतान नालायक थीं, इसलिए वृद्धावस्था में भी उसे काम करना पड़ता था। जब भी वह बोझ उठाता तो भगवान का नाम लेकर कहता- हे भगवान, कितना सताओगे, अब तो मुझे उठा लो। एक दिन भगवान पसीज ही गये। प्रकट हुए और बोले कि वत्स, चलो मेरे धाम। तुम्हारा दुख-दर्द अब मुझसे सहा नहीं जाता। भगवान को सामने और खुद को अपने साथ ले जाने का उनका आग्रह देख उस बूढ़े की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। उसने भगवान से गिड़गिड़ाकर कहा- प्रभो, अभी मुझे मत उठाओ, बस मेरा बोझ उठा दो। मैं तो यूं ही मजाक में तुम्हें याद कर लेता था।” यह एक लघु कथा है राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की। शब्दों में हेर-फेर हो सकता है लेकिन भावार्थ यही है कि दुनियादारी की किचकिच में सड़ना मंजूर है, मरना मंजूर नहीं। चाहे उम्र ही क्यों ना हो गयी हो।
संसार को मृत्युलोक कहा जाता है। यहां जो आता है, उसे मरना ही होता है। मृत्यु सबसे बड़ा यक्ष-प्रश्न है और शाश्वत सत्य। लेकिन उस मृत्यु पर विजय पाने की मानवीय आकांक्षा जब तब जोर मारती है। मनुष्य ऐसी तरकीब तैयार करना चाहता है कि जिंदगी में सिर्फ जन्म हो, मृत्यु नहीं। वह अमर होने की राम-वाण दवा चाहता है। तभी तो अमेरिका के एक वैज्ञानिक रे कुर्जवील ने एक ऐसा फार्मूला खोज निकालने का दावा किया है, जिसके जरिये इंसान अगले बीस साल में अमर हो जाएगा। कुर्जवील का कहना है कि बीस साल में शरीर की दोबारा प्रोग्रामिंग कर स्टोन-ऐज सॉफ्टवेयर तैयार किया जा सकता है, जो उम्र को एक ही बिंदू पर रोक लेगा। यानी मनुष्य उम्र की एक सीमा से आगे नहीं बढ़ेगा, वही पर स्थिर रहेगा। कुर्जवील और उनके साथी वैज्ञानिक अपनी इस थ्योरी पर जी-जान से लग गये हैं।

विचित्र मणि
((विचित्र मणि टेलीविजन में वरिष्ठ पत्रकार हैं))
अपने-अपने गांधी, अपने-अपने राम
September 24, 2009 by विचित्र मणि
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गांधी टाइटल लगाकर कितने लोग घूमते हैं लेकिन गांधी सुनकर तो जेहन में एक ही नाम घूमता है- मोहनदास करमचंद गांधी। इन्हें हिंदुस्तान अपना राष्ट्रपिता और दुनिया महात्मा मानती है। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, सोनिया गांधी, मेनका गांधी, राहुल गांधी, वरुण गांधी वगैरह तक गांधियों की लंबी कतार है लेकिन गांधी अगर संज्ञा के बजाय किसी नाम से जुड़कर विशेषण बन गया तो वह नाम है मोहनदास। वह गांधी पर्याय बन गया सत्य और अहिंसा के पुजारी का। 23 सितंबर की सुबह हर अखबार में एक गांधी और छाया था। ना तो वह मोहनदास गांधी के खानदान का है, ना ही नेहरु गांधी परिवार का कोई वारिस। उसका नाम है खोबाद गांधी। एक बार तो कोई गांधी शब्द सुनकर यही सोचेगा कि खोबाद गांधी भी कोई गांधीवादी, अहिंसावादी, सविनय अवज्ञावादी होंगे। लेकिन इस गांधी का परिचय अलग निकला।
खोबाद गांधी सीपीआई (माओवादी) के पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं। सीपीआई (माओवादी) वह संगठन है जो चीनी अधिनायकवादी माओत्सो तुंग के इस बयान से चलायमान होता है कि सत्ता तो बंदूक की नली से निकलती है। खोबाद गांधी भी ऐसा ही मानते हैं। दून स्कूल में पढ़े और लंदन से चार्टर्ड एकाउंटेसी में डिग्री हासिल करने वाले खोबाद ने सर्वहारा की तानाशाही के लिए अपनी परंपरागत दुनिया छोड़ दी। वह अपनी पत्नी अनुराधा के साथ हिसाब-किताब की गली छोड़ बंदूक की नली से समाज बदलने निकल पड़े। 22 सितंबर को दिल्ली में वह गिरफ्तार हो गये। Read more




