जागरण नंबर वन, भास्कर कमजोर, हिंदुस्तान मजबूत

दैनिक जागरण और टाइम्स ऑफ इंडिया की बादशाहत बरकरार है। दैनिक जागरण ने इस साल राउंड वन की तुलना में हल्की बढ़त हासिल की है। लेकिन उसके लिए बुरी ख़बर पिछले साल की तुलना में उसके पाठकों की संख्या में करीब दस लाख की कमी आई है। जबकि सबसे अधिक बढ़त हासिल की है दैनिक हिंदुस्तान ने।

आईआरएस 2009 राउंड टू के नतीजों के मुताबिक दैनिक जागरण के पाठकों की संख्या 547.9 लाख रही है। हालांकि यह संख्या इसी साल राउंड वन (545.8 लाख) की तुलना में थोड़ी अधिक है, लेकिन 2008 राउंड टू की तुलना में काफी कम। तब पाठकों की संख्या 557.4 लाख थी। इसका मतलब यह निकला की दैनिक जागरण के करीब दस लाख पाठक कम हुए हैं। Read more

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सोच-समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

अविनाश ने जो बातें कही हैं , उनमें बहुत दम है। और इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि “अश्लीलता कोई राजनीतिक या सामाजिक (या यहां तक कि निजी) विचारधारा नहीं है। यह हमारी सभ्‍यता की वो सरहद है, जहां कब दीवार खड़ी कर दी गयी, हमें पता ही नहीं चला”। लेकिन अश्लीलता परिभाषित नहीं की जा सके – ऐसा भी नहीं है। इसकी परिभाषा है। ये परिभाषा बहुत हद तक सब्जेक्टिव है। मतलब हमारे समाज में जो अश्लील है, यूरोप के लिए वो श्लील हो सकती है। यूरोप के अलग-अलग देशों में भी ये परिभाषा बदल सकती है। ये भी मुमकिन है कि यूरोप में जो अश्लील मानी जाए जापान में उसे लोग यूं ही नज़रअंदाज कर दें। हर देश के कानून में वहां के सामाजिक परिदृष्य को रख कर अश्लीलता की परिभाषा गढ़ी गई है। Read more

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