“सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्‍त गिराये जाएंगे”

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दंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केंद्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है।

दंतेवाड़ा में पुलिस सादे कपड़े पहनती है और बागी पहनते हैं वर्दी। जेल अधीक्षक जेल में है, और कैदी आजाद (दो साल पहले शहर की पुरानी जेल से करीब 300 कैदी भाग निकले थे)। जिन महिलाओं का बलात्कार हुआ है, वे पुलिस हिरासत में हैं। बलात्कारी बाजार में खड़े भाषण दे रहे हैं। Read more

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मध्यस्थता से इनकार, स्वतंत्र प्रेक्षक बनने को तैयार हैं अरुंधती

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जानी-मानी लेखिका अरुंधती रॉय ने नक्सली संगठनों और सरकार के बीच बातचीत की मध्यस्थता से इनकार किया है। बीबीसी से बातचीत में अरुंधती रॉय ने कहा है कि मध्यस्थता के लिए जो हुनर चाहिए वो उनके पास नहीं हैं। वो मूलत: लेखिका हैं। लेकिन वो इस बातचीत में स्वतंत्र प्रेक्षक की भूमिका निभा सकती हैं।

दरअसल, माओवादी नेता कोटेश्वर राव ऊर्फ किशन जी ने बीबीसी से कहा था कि अगर अरुंधती रॉय, बीडी शर्मा और कबीर सुमन जैसे बुद्धिजीवी मध्यस्थता को तैयार हो जाएं, तो वो सीजफायर कर सकते हैं। इसके जवाब में अरुंधती रॉय ने कहा है कि सरकार को माओवादियों की पेशकश को गंभीरता से लेना चाहिए और दोनों पक्षों के बीच सीजफायर (लड़ाईबंदी) होना चाहिए। Read more

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अंग्रेजी मुखौटों के विरुद्ध, आलोक मेहता का युद्ध

आलोक मेहता। कुछ समय पहले तक आउटलुक हिंदी के संपादक। अब नई दुनिया के प्रधान संपादक। बतौर साहित्यकार पद्म सम्मान हासिल करने वाले पत्रकार। सत्ताधारी यूपीए के बेहद करीबी कलमबाज। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के भक्त। अरुंधती रॉय के घोर विरोधी। नक्सलियों के ख़िलाफ़ चल रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट के हिमायती। उन्होंने संडे नई दुनिया में आज संपादकीय लिखा है। “अंग्रेजी दा मुखौटों के आंसू”। निशाना अरुंधती रॉय पर है। और उन तमाम लोगों पर जिन्हें अरुंधती का लिखा पसंद है। लेकिन नाम लिए बगैर। जाहिर है अरुंधती रॉय और उनके प्रशंसकों से वो बेहद दुखी हैं। आलोक मेहता दुखी इसलिए भी हैं कि रिलायंस गैस विवाद में नई दुनिया के स्कूप का सच सामने आ गया है। हम चाहते हैं कि अपने “एजेंडे” में पूरी तरह से “ईमानदार” पत्रकार आलोक मेहता का ये छायावादी लेख जनतंत्र के पाठक भी पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। - मॉडरेटर

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अंग्रेजी दा मुखौटों के आंसू

अंग्रेजी भाषा पर उनका अच्छा अधिकार है। अच्छी शिक्षा-दीक्षा मिली है। बैंक में लाखों ही नहीं, कुछ करोड़ रुपये जमा हो जाते हैं। मेग्सायसाय, बुकर, नोबेल पुरस्कार की सिफारिश करने वाले प्रशंसकों से घिरी रहती हैं। कहानी, उपन्यास के अलावा अंग्रेजी की समाचार पत्रिकाओं में 25 से 30 पृष्ठों के बड़े-बड़े लेख छप जाते हैं। इतने बड़े लेख उस पत्रिका या देश के किसी अन्य संपादक के नहीं छप सकते। जिन पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-छपने पर उन्हें हजारों रुपये मिलते हैं, उन प्रकाशनों के प्रबंधक वही पूंजीपति हैं, जो जंगल काट कर उद्योग लगाते हैं, झुग्गियां तोड़ कर बहुमंज़िली इमारतें बनाते हैं। अंग्रेजी में लिखी जिन पुस्तकों की रॉयल्टी से उन्हें लाखों रुपये मिलते हैं, वे पुस्तकें वही वर्ग खरीदता है, जिसे झोंपड़ियों के प्रति दर्द का अहसास नहीं होता। हां, अंग्रेजी में भारत के आदिवासियों की दुर्दशा, खूनी हिंसा की मानसिकता वाले नक्सली अतिवादियों के बारे में पढ़-सुनकर भारत विरोधी षड्यंत्र करने वाले परदेसी बहुत अधिक प्रसन्न होते हैं। वह भारत में झोला लटका कर चलती हैं और हवाई यात्रा महंगे बिजनेस क्लास में करती हैं। पांच सितारा होटलों की पार्टियों में आनंद लेती हैं लेकिन प्रशंसकों के रूप में दूर खड़े फटेहाल लोगों को देखना चाहती हैं। आखिर जयकार वही कर सकते हैं। Read more

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कंपनियों को खजाना और जनता को मौत बांटती सरकार

ख़तरनाक खेल शुरू हो चुका है। एक तरफ़ सरकार है… आधुनिक हथियारों से लैस सुरक्षाबल हैं और दूसरी तरफ माओवादी और करोड़ों की संख्या में वो आदिवासी जिन्हें कभी भी माओवादी साबित किया जा सकता है। यह खेल कितना घिनौना है। क्रूर है। और विभत्स। इसका अंदाजा शहरों में रहने वाले और अघोषित युद्ध क्षेत्र से दूर रहने वाले लोग नहीं लगा सकते हैं। लेकिन वो लोग जो छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा या फिर अघोषित युद्ध क्षेत्रों से लौटे हैं उन्हें “ऑपरेशन ग्रीन हंट” का सच पता है। मशहूर लेखिका अरुंधती रॉय उन्हीं में से एक हैं। आउटलुक के ताज़ा अंक में उनका लेख छपा है। हम उस लेख का हिंदी अनुवाद आपसे साझा कर रहे हैं। यह लेख थोड़ा लंबा है, लेकिन युद्ध के दंश को समझने के लिए थोड़ा धैर्य तो रखना ही होगा। हमें उम्मीद है कि आप इसे पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर देंगे। उससे बहस, आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। - मॉडरेटर

दक्षिणी उड़ीसा की हल्की ऊंची और सपाट चोटी वाली पहाड़ियां डोंगरिया कोंध आदिवासियों के घर हैं। तब से जब उड़ीसा नाम के किसी राज्य और भारत नाम के किसी देश का अस्तित्व भी नहीं था। उन पहाड़ियों ने कोंधों का खयाल रखा। कोंधों ने उन पहाड़ियों को सहेजे रखा। उनकी पूजा की। एक जीवित भगवान की तरह। लेकिन अब बॉक्साइट के कारण उन पहाड़ियों को बेच दिया गया है। कोंध आदिवासियों को लगता है कि उनका भगवान बेच दिया गया है। वो पूछ रहे हैं कि अगर उनके देवता की जगह राम, अल्ला या ईसा मसीह होते तो क्या उन्हें बेचा जाता?

शायद, कोंधों से अहसानमंद रहने की उम्मीद की जाती है। इसलिए कि नियामगीरी पहाड़ी जो कि उनके देवता नियाम राजा (यूनिवर्सल लॉ के भगवान) का घर है, एक ऐसी कंपनी को बेची गई है जिसका नाम है वेदांता। वेदांता मतलब हिंदू दर्शनशास्त्र की वो शाखा जो ज्ञान की सर्वोच्च प्रवृति सिखाती है। वेदांता दुनिया की सर्वाधिक बड़ी खनन कंपनियों में से एक है और इसके मालिक हैं अनिल अग्रवाल। भारतीय मूल के अरबपति जो लंदन के एक महल में रहते हैं। वह महल एक जमाने में ईरान के शाह का हुआ करता था। वेदांता उन ढेरों बहुराष्ट्रीय कंपनियों में से महज एक नाम है, जिन्होंने उड़ीसा की तरफ़ रुख किया है। Read more

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एक-दूसरे की हत्या करा रही है सरकार

अरुंधति रॉय से जनतंत्र की ख़ास बातचीत के पहले हिस्से में आपने मीडिया पर उनकी बेबाक राय पढ़ी। अब दूसरी और आखिरी किश्त … जिसमें मीडिया के साथ कुछ और बड़े मुद्दों पर चर्चा। इस बातचीत में अरुंधति ने कश्मीर के हालात पर… छत्तीसगढ़ में चल रहे नरसंहार पर… नंदीग्राम और सिंगूर की हिंसा पर… और भारत में चल रहे ब्रितानिया हुकूमत के औपनिवेशिक मॉडल पर खुल कर बात की। आप भी अरुंधति से हुए इस सवाल-जवाब को पढ़िये और अपनी राय रखिए। Read more

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“बहुत महंगी है अभिव्यक्ति की आज़ादी”

अभिव्यक्ति की आज़ादी क्या है? क्या भारत में आप और हम बोलने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं? क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ – मीडिया पूरी तरह आज़ाद है? ये कुछ मुद्दे हैं जिन पर, वर्तमान दौर में चर्चा बेहद अहम हो गई है। लोकसभा चुनाव में सबने देखा कि किस तरह मीडिया ने लेन-देन का खेल किया। किस तरह ख़बरें दबाई गईं, मैनुपुलेट की गईं। जिन उम्मीदवारों के पास पैसा नहीं था वो चीखते रहे, चिल्लाते रहे, अपनी बात कहते रहे लेकिन उन्हें किसी अख़बार ने नहीं छापा। देश और दुनिया में ऐसी कई घटनाएं हो रही हैं जिसे कोई अख़बार नहीं छापता है। कोई टीवी न्यूज़ चैनल नहीं दिखाता है। आखिर क्यों? इन सब मुद्दों पर जनतंत्र डॉट कॉम के लिए जितेंद्र और समरेंद्र ने अरुंधति रॉय से बात की। बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति उन चंद साहसी लोगों में एक हैं जो सच कहने से नहीं डरते। सच चाहे अमेरिका के ख़िलाफ़ हो, चाहे कंपनियों के ख़िलाफ़ या फिर चाहे भारत सरकार के ख़िलाफ़। Read more

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