यह जीत सिर्फ़ भारत की नहीं बल्कि हॉकी की है

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हुक, पुल और ड्राइव की जगह बरसों बाद फ़्लिक, स्कूप और ड्रिबलिंग जैसे शब्द सुनाई पड़ रहे हैं और बहुत दिनों बाद हॉकी का कोई स्टेडियम दर्शकों से खचाखच दिख रहा है. भला वर्ल्ड कप हॉकी की इससे बेहतर क्या शुरुआत हो सकती थी.

2008 के बीजिंग ओलंपिक तक से वंचित रह गई भारतीय हॉकी टीम ने जो कामयाबी हासिल की है, उसकी टाइमिंग बेमिसाल है. पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जीत सिर्फ़ एक टीम की जीत नहीं, एक कोशिश की जीत है, जो पिछले दिनों में बेहद विपरीत परिस्थितियों में भारतीय हॉकी खिलाड़ी करते आए हैं और कभी हॉकी संघ के टूट जाने, कभी अपनी तनख़्वाह के लिए हड़ताल कर जाने और कभी किसी पार्टी में शामिल होने के लिए पैसे मांगने के आरोप झेलते आए हैं. लगभग अपना वजूद बचाने के मुहाने पर खड़ी भारतीय हॉकी टीम को ताज़ा हवा के इस झोंके की बेहद ज़रूरत थी लेकिन किसी ने शायद यह नहीं सोचा था कि ऐसा वर्ल्ड कप के भारत के पहले ही मैच में पाकिस्तान को 4-1 से हरा कर होगा. Read more

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क्या वनडे की संजीवनी है सचिन का रिकॉर्ड

क्रिकेट का वनडे मैच भारत की लैंड लाइन टेलीफ़ोन जैसा है. 30-40 साल पहले भारत की आम जनता ने पहली बार काले रंग के डिब्बे को देखा तो यह अजूबा लगा. अब मोबाइल युग में किसी घर में टेलीफ़ोन देखते हैं, तो फिर से अजूबा लगता है.

वनडे क्रिकेट का भी यही हाल होता जा रहा है. लिमिटेड ओवरों में ट्वेन्टी 20 तेज़ी से पसर गया है. क्लासिक और परंपरा के नाम पर टेस्ट क्रिकेट तो बचता दिखता है लेकिन वनडे क्रिकेट पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. कई बड़े क्रिकेटर वनडे को बंद कर देने की वकालत कर चुके हैं और लोगों की दिलचस्पी भी, बताई जाती है, कि कम हो रही है. टेलीविज़न कंपनियों को विज्ञापन कम मिल रहे हैं और स्टेडियमों में मौजूदगी घट रही है. पहले की तरह दिन भर टेलीविज़न से चिपकने वालों की भी कमी होती जा रही है. Read more

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बाउंड्री भी नहीं लगा पाया आईपीएल

दो साल पहले आईपीएल का बाज़ार सजा और क्रिकेटरों को ख़रीदा बेचा गया. क्रिकेट चाहने वाले तो तभी बेचैन हो उठे, लेकिन इस बार बाज़ार में पेश किए गए खिलाड़ी जब नहीं बिके, तो बेचैनी और बढ़ गई.

विश्व चैंपियन पाकिस्तान के खिलाड़ियों को आईपीएल की किसी टीम ने नहीं ख़रीदा. यह सही है कि वेस्ट इंडीज़ के रामनरेश सरवन और डेरेन गंगा जैसे खिलाड़ियों को भी ख़रीदार नहीं मिला और इंग्लैंड के ग्रेम स्वैन और श्रीलंकाई ओपनर उपुल तरंगा को भी नहीं. लेकिन इन बड़े नामों ने ट्वेन्टी 20 क्रिकेट में कोई बड़ा धमाल नहीं मचाया है. Read more

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तु्म्हें सत्येंद्र दुबे और मंजूनाथ से सीखना चाहिए था सतीश

सतीश शेट्टी, तुमने हिम्मत कैसे की. कैसे राज़ खोल दिया ग़ैरक़ानूनी ज़मीन पर बने बंगलों का. कैसे बता दिया दुनिया को कि किसानों को बहका कर उनकी ज़मीनें हड़पी जा रही हैं. सतीश, यह हिम्मत करके तुमने बड़ी ग़लती कर दी.

सूचना के अधिकार का क़ानून मिला तो क्या. क्या तुम सबकी पोल खोलते फिरोगे. क्या सबको बताते चलोगे कि सफ़ेद खादी के नीचे वहशी और नापाक इनसान छिपा है. क्या ग़रीबों को बता दोगे कि उनके साथ कौन धोखा कर रहा है. तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था सतीश.

अरे, तुमने सत्येंद्र दुबे से क्यों नहीं सीखा. वह भी तो पहले ऐसी ग़लती कर चुका था. एक विशाल घोटाले की ख़बर सीधे प्रधानमंत्री को दे दी थी. आईआईटी में पढ़ा तो क्या, आईईएस में सेलेक्ट हुआ तो क्या, विशालकाय परियोजना का प्रोजेक्ट डायरेक्टर हुआ तो क्या. Read more

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बुश पर जूता फेंकने वाले पत्रकार पर पड़ा जूता

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जॉर्ज बुश पर जूता फेंकने वाले इराक़ी पत्रकार मुंतज़र अल ज़ैदी को भी ठीक वैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा, जब पेरिस में उन पर इराक़ के ही एक शख़्स ने जूता फेंक दिया. लेकिन बुश की तरह ज़ैदी भी साफ़ बच गए.

साल भर के अंदर मुंतज़र अल ज़ैदी को वैसी ही हालत का सामना करना पड़ा, जैसा पिछले साल इराक़ की राजधानी बग़दाद में हुआ था. ज़ैदी जब फ्रांस की राजधानी पेरिस में पत्रकारों से बात कर रहे थे, तो उन पर जूता फेंका गया.

जूता फेंकने वाले ने ख़ुद को इराक़ का एक पत्रकार बताया था और कहा था कि वह फ्रांस में शरण लिए हुए है. उसने ज़ैदी पर जूता फेंकते हुए कहा, “लो, तुम्हारे लिए यह भी एक जूता है.”
उसने जूता फेंकने से पहले इराक़ी लहजे में और अरबी भाषा में कुछ देर तक कुछ कहा और अचानक अपना जूता ज़ैदी की तरफ़ पूरी ताक़त से उछाल दिया. जूता सीधे ज़ैदी के सिर को निशाना बना कर फेंका गया था, लेकिन ज़ैदी ऐन मौक़े पर झुक गए और जूते का वार ख़ाली चला गया. ज़ैदी ने जब पिछले साल बुश पर जूते फेंके थे, तो बुश भी डाइव मार कर बच गए थे. Read more

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गूगल लगाएगा मुफ़्त ख़बर पर लगाम

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इंटरनेट पर गूगल की चौपाल बंद होने वाली है. मुफ़्त में कहीं भी, कितनी भी ऑनलाइन ख़बरें पढ़ने के आदी हो चुके लोगों के लिए मुश्किल खड़ी होने वाली है. मीडिया हाउसों के दबाव के बाद गूगल यूज़र के लिए समाचारों को सीमित करेगा.

गूगल ने बताया कि जल्दी ही ऐसी व्यवस्था क़ायम की जाएगी, जिससे इंटरनेट यूज़र ऑनलाइन बेहिसाब ख़बरें नहीं पढ़ पाएगा. उन्हें कुछ सीमित रिपोर्टें पढ़ने का मौक़ा मिल सकेगा. लेकिन इसके बाद उन्हें प्रकाशकों के वेबसाइट पर रजिस्टर करना होगा या फिर इसकी फ़ीस देनी होगी. Read more

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सचिन को बाल ठाकरे की धमकी पर मुंबई शर्मिंदा है

मुंबई शर्मिन्दा है. वह समझ नहीं पा रही है कि हंसे या रोए. जब सचिन को उनके क्रिकेट की 20वीं सालगिरह पर तोहफ़ा देना था, तो उनका दिल तोड़ दिया. क्या पता जब अहमदाबाद में सचिन पारी खेलने उतरे हों, तो कलेजे के किसी कोने में इसकी भी टीस चुभ रही हो? क्या पता वह ख़ुद भी सोच रहे हों कि क्या मुंबई वाला होकर उन्होंने कोई ग़लती तो नहीं कर दी?

मुंबई शर्मिन्दा है. सचिन की नगरी मुंबई शर्मिन्दा है. इसी शहर ने सचिन तेंदुलकर दिया है, जो पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने की ताक़त रखते हैं और जिससे पूरे देश को प्यार है. इसी शहर में बाल ठाकरे भी हैं, जिनका बस चले तो मुंबई को काट कर कहीं और ले जाएं. मुंबई समझ नहीं पा रही है कि सचिन को लेकर इठलाए या बाल ठाकरे की वजह से शर्म से गड़ जाए. Read more

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यहां का बेटा, वहां का बेटा

स्पेन में छुट्टी मनाने का मौक़ा मिला तो बड़ा मज़ा आया. छोटे से द्वीपीय शहर मलागा में समुद्र किनारे धूप सेंकने का भी मौक़ा मिला. बचपन में जो कहानियों और फ़िल्मों में देखते सुनते आया था, हक़ीक़त में भी चीज़ें लगभग वैसी ही होती हैं. बस पैसा लगता है.

बहरहाल, धूप सेंकते-सेंकते एक सदमा लगा. हुआ यूं कि साथ में बालू पर अस्थि पंजर जमाए एक यूरोपीय शख़्स के मोबाइल की घंटी घनघनाई. बातचीत शुरू हुई तो थोड़ी गंभीर होती गई. बाइसों भाषा वाले यूरोप में वह शख़्स ऐसी ज़ुबान बोल रहा था, जो मैं समझ सकता था.

क़रीब दो मिनट तक बातचीत हुई. पता चला कि जनाब के पिताजी गुज़र गए हैं और साहब इसलिए नाराज़ हैं कि उन्होंने बहुत पैसे ख़र्च करके यह छुट्टी तैयार की थी. अब पिताजी ऐसे वक्त में गुज़र गए तो छुट्टी ख़राब होने का ख़तरा था. लेकिन फ़िक्र की कोई बात नहीं, उन्होंने फ़ोन करने वाले को बता दिया है कि छुट्टी ख़राब नहीं कर सकते. अगले वीकेंड में आएंगे तो क्रिया कर्म कर दिया जाएगा. Read more

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“संस्कृति के ठेकेदारो, कहां हो”

बड़ी अजीब बात है. कोई सामने आता ही नहीं. अभी दो तीन महीने पहले ही तो ढोल नगाड़े लेकर सच का सामना के ख़िलाफ़ जंग छेड़ी गई थी. अब कार्यक्रम बंद हो गया तो कोई कुछ बोलता ही नहीं.

बोले भी तो कैसे. तब तो संस्कृति की दुहाई दी जा रही थी. बड़े बड़े जुमले कसे जा रहे थे. पता नहीं कितनी ही तलवारें मयान से निकल चुकी थीं कि अब तो काट कर ही लौटेंगे. लेकिन थोड़ी बहुत चमकने के बाद उन्हें ख़ाली ही मयान में ही शरण लेनी पड़ी.

अब तलवारें ठंडी हैं, ज़ुबान ख़ामोश हैं. मैं तो कहता हूं कि मौक़ा है, क्रेडिट ले लो. कह दो कि आपके दबाव से ही बंद हो गया. वर्ना तो यह बंद होता ही नहीं. कह दो कि आपने जीना हराम कर दिया सच का सामना करने वालों का, वर्ना तो वे पता नहीं कितना सच उगल देते. पूरी दुनिया को सच में डुबो देते. Read more

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सपनों में दौड़ती-भागती इलेक्ट्रिक कारें

ज़रा सोचिए. कार ऐसी बने, जिसमें साइलेंसर न हों. टंकी न हो.. वह बिजली से चल पड़े, पेट्रोल पंपों की जगह बैटरी चार्ज करने के स्टेशन बन जाएं, ठीक मोबाइल फ़ोन चार्ज करने की तरह. सड़कों पर गाड़ियां सरपट दौड़ें और धुआं न उठे.

इसी सपने को सच करने में जुट गई हैं कार कंपनियां. 2009 में फ्रैंकफर्ट में दुनिया के सबसे बड़े कार मेले में इलेक्ट्रिक कारों के मॉडल छाए हुए हैं. पूरी तरह बिजली से चलने वाले. बस बैटरी चार्ज करो और कार भगा ले जाओ… मशहूर जर्मन कार कंपनी फॉक्सवागन के प्रोफ़ेसर वोल्फ़गांग श्टाइगर बताते हैं कि “अगर हम पचास फ़ीसदी कारों को बिजली से चलने वाली कारों में बदल दें तो इनसे पर्यावरण के लिए अच्छा रहेगा. ख़ास तौर पर बड़े शहरों के सड़कों की तस्वीर बदल जाएगी और ध्वनि प्रदूषण भी बहुत कम हो जाएगा.” Read more

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