हिंदुस्तान-अमर उजाला में समझौता नहीं, एफ़आईआर दर्ज

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बरेली में हिंदुस्तान और अमर उजाला के बीच कोई सुलह-सफाई नहीं हो सकी। जिसके बाद दोनों पक्षों ने इज्जत नगर थाने में एक दूसरे के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करा दी है। सूत्रों के मुताबिक हिंदुस्तान ने अमर उजाला के सात लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया है जबकि अमर उजाला की तरफ से भी छह लोग नामजद कराए गए हैं। हिंदुस्तान की शिकायत पर आईपीसी की धारा 397 और 395 के तहत घायल करके लूटपाट करने का मामला दर्ज हुआ है। जबकि अमर उजाला की तरफ से लूटपाट की शिकायत की गई है। दोनों ही पक्षों ने एक दूसरे के प्रसार मैनेजर को आरोपी बनाया है। Read more

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हिंदुस्तान और अमर उजाला की सर्कुलेशन टीमों में हिंसक झड़प

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उत्तर प्रदेश के बरेली में हिंदुस्तान और अमर उजाला की सर्कुलेशन टीमों के बीच हिंसक झड़प हुई है। इस मारपीट में छह लोग घायल हैं। जिनमें से पांच को ज़्यादा चोटें आई हैं। उन्हें बरेली के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

बरेली में दो महीने पहले ही, नौ अक्टूबर को हिंदुस्तान ने अपना संस्करण लॉन्च किया था। हिंदुस्तान ने रुहेलखंड इलाके के पांच जिलों – बरेली, पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखिमपुर और बदायूं, को ध्यान में रख कर यह संस्करण शुरू किया। बरेली संस्करण लॉन्च करने से पहले अख़बार की बुकिंग के लिए एक स्कीम शुरू की। जिन लोगों ने बुकिंग कराई उन्हें एक कूपन दिया गया और ये वादा किया गया कि उन्हें एक साल तक हिंदुस्तान पचास फीसदी कम कीमत पर मिलेगा। Read more

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अमर उजाला में कई नई नियुक्तियां

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अमर उजाला मैनेजमेंट अपने मार्केटिंग विभाग को मजबूत करने में जुटा है। इसी के तहत एस एन झा को जीएम (सरकारी बिज़नेस और मिनी मेट्रोज) के तौर पर नियुक्त किया गया है। वो दिल्ली में बैठेंगे और आलोक माथुर, वाइस प्रेसिडेंट (मीडिया सॉल्युशन्स) को रिपोर्ट करेंगे। माथुर भी कुछ समय पहले ही अमर उजाला में आए हैं और वो प्रेसिडेंट (मार्केटिंग) सुनील मुत्रेजा को रिपोर्ट करते हैं।

इनके अलावा राष्ट्रीय सहारा से यादवेश कुमार ने पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश के जीएम (एसपीएमडी) के तौर पर ज्वाइन किया है। साथ ही कुछ बदलाव और किए गए हैं। एस एन झा से पहले जीएम (सरकारी बिज़नेस) का काम देख रहे ए पी सिंह को लखनऊ भेज दिया गया है। वो लखनऊ यूनिट को हेड करेंगे। जबकि लखनऊ का काम संभाल रहे वीरेंद्र पठानिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के एसपीएमडी (सर्कुलेशन) बना दिया गया है। ये सभी सुनील मुत्रेजा को रिपोर्ट करेंगे। Read more

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वासुदेवन से मिले एक करोड़ रुपये, अंकुर चावला से पूछताछ

वासुदेवन से 1.4 करोड़ रुपये बरामद, अंकुर चावला से पूछताछ अमर उजाला प्रकरण में कंपनी लॉ बोर्ड के अधिकारी आर वासुदेवन और जाने-माने वकील अंकुर चावला की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। वासुदेवन को 23 नंवबर की रात घूस लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था। उसी समय मनोज बंथिया नाम के कंपनी सेक्रेटरी को घूस देने के आरोप में धरा गया। उन दोनों की पुलिस रिमांड 30 नवंबर को खत्म हो गई। जिसके बाद वासुदेवन को 12 दिसंबर तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। जबकि मनोज बंथिया को एक और दिन की रिमांड पर लिया गया है। सीबीआई ने इस मामले में अंकुर चावला को भी आरोपी बनाया है।

सूत्रों के मुताबिक अंकुर चावला से सोमवार को काफी देर तक पूछताछ हुई है। ऐसी ख़बरें भी हैं कि आज अंकुर चावला से मनोज बंथिया की मौजूदगी में पूछताछ की जाएगी। ताकि सच और झूठ को पकड़ा जा सके। Read more

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अतुल माहेश्वरी और अंकुर चावला पर कसा शिकंजा

अमर उजाला विवाद में अब कंपनी के मालिक अतुल माहेश्वरी और जाने-माने वकील अंकुर चावला से पूछताछ हो सकती है। सीबीआई के कुछ सूत्रों के मुताबिक उन दोनों को नोटिस भेजा जा चुका है। हालांकि इस बारे में कुछ आला अधिकारियों का यह भी कहना है कि रिमांड पर मौजूद कंपनी लॉ बोर्ड के ऐक्टिंग चीफ आर वासुदेवन और कंपनी सेक्रेटरी मनोज बंथिया से मिली जानकारी के बाद ही अतुल माहेश्वरी और अंकुर चावला से पूछताछ की जाएगी। सीबीआई के सूत्र यह संकेत भी दे रहे हैं कि अगले कुछ दिनों में इस मामले में कुछ और गिरफ़्तारियां भी हो सकती हैं। Read more

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अमर उजाला केस में उलझी सत्यम घोटाले की जांच

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देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट घोटाले की जांच अब अमर उजाला विवाद के कारण उलझ गई है। कंपनी लॉ बोर्ड की जो टीम सत्यम घोटाले की जांच में जुटी थी उस पर बोर्ड के ऐक्टिंग चीफ आर वासुदेवन निगरानी कर रहे थे। आर वासुदेवन को सीबीआई की टीम में अमर उजाला केस में गिरफ़्तार कर लिया है और उनके घर से 55 लाख रुपये नकद बरामद किए गए हैं। इससे सत्यम घोटाले की जांच की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं। Read more

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अमर उजाला विवाद ख़तरनाक मोड़ पर

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अमर उजाला को लेकर चल रहा झगड़ा अब ख़तरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। इस मामले में कंपनी लॉ बोर्ड के एक्टिंग चीफ और सदस्य आर वासुदेवन को गिरफ़्तार कर लिया गया है। ख़बरों के मुताबिक उन पर एक पक्ष के हक़ में फैसला देने के लिए घूस मांगने और लेने के आरोप है।  सीबीआई ने छापा मार कर रुपये के बैग के साथ वासुदेवन को गिरफ़्तार किया है। यह छापा दक्षिणी दिल्ली के हुडको पैलेस में उनके घर पर मारा गया था। इसी मामले में एक कंपनी सेक्रेटरी मनोज बंथिया को रिश्वत देने के अरोप में गिरफ़्तार किया गया है। गिरफ़्तारी के बाद दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां जज ने उन्हें छह दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया है। Read more

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“नारे उन्होंने ही लगाए, जिन्होंने मैनेजरों से फायदे उठाए”

वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर के इंटरव्यू का यह दूसरा हिस्सा है। जनतंत्र को उन्होंने यह इंटरव्यू हिंदुस्तान में समूह संपादक की जिम्मेदारी संभालने से ठीक एक दिन पहले यानी तीन सितंबर को दिया। तब वो अमर उजाला के समूह संपादक थे। इस इंटरव्यू का पहला हिस्सा जनतंत्र के पाठक पढ़ चुके हैं। उसमें हिंदुस्तान को लेकर उनकी योजनाओं के बारे में बात की गई थी। आज के हिस्से में अमर उजाला में उनके अनुभवों का जिक्र है। अमर उजाला के मालिकों से उनके संबंधों का जिक्र है। उनके अलावा शशि शेखर ने कुछ सामाजिक मुद्दों पर भी अपना नज़रिया साझा किया है। संपत्ति की घोषणा पर बात की। साथ ही पत्रकारिता और सत्ता के बीच गठजोड़ पर भी अपनी राय जाहिर की। आप उनका यह इंटरव्यू पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। - मॉडरेटर

समरेंद्र - अमर उजाला का अनुभव कैसा रहा? आप वहां मेरठ के संपादक बन कर गए। फिर ग्रुप एडिटर बने।

शशि शेखर – (बीच में टोकते हुए) यह ग़लत बात है। यह उड़ाई हुई बात है कि मैं स्थानीय संपादक बन कर गया था। यह बिल्कुल ग़लत है। मैं “आज तक” में काम करता था। यहां आने से पहले श्री अतुल माहेश्वरी और श्री अशोक अग्रवाल से मेरी कई महीने बात होती रही। दोनों के समान स्नेह का मैं भागीदार हूं। अजब सी बातें होती रहती हैं। कुछ ऐसे लोग हैं जो फैला देते है। उस समय सोच रहा था कि मैं किसी अख़बार को ज्वाइन करूं या टेलिविजन में रह जाऊं। मैंने इनसे बात की। बात होती रही… होती रही। फिर मैंने इनको डीसेंट्रलाइजेशन की थ्योरी बताई। मेरा मानना है कि अक्सर संपादक आते हैं और वो अपने को लाद देते हैं। मेरा तो कोई एजेंडा नहीं है तो क्यों नहीं चंदौली के जिला संवाददाता को प्रेरित करूं कि वो हमको विचार दे और कठुवा या जम्मू या श्रीनगर में भी उसका उपयोग हो सके। हम विचारशील लोगों का समूह हैं। इस लेटेस्ट सिस्टम में जब संचार के साधन जोरदार हो गए हैं तो हमें उनका प्रयोग करना चाहिए। जब मैंने कहा तो उन्होंने कहा कि ये तो संभव ही नहीं है। अतुल जी हंस कर बोले कि देखो शशि तुम्हारे बारे में और तुम्हारी क्षमता के बारे में किसी से कुछ पूछना नहीं है। तुमने जो काम किया है, उससे सबसे ज़्यादा प्रभावित मैं हूं। लेकिन यार संपादक लोग बातें बहुत करते हैं काम नहीं करते। तो मैंने कहा कि एक बार हो जाए। तय ये हुआ कि पूरा ग्रुप चलाने से पहले एक बार मेरठ और देहरादून चला कर देखो।

आपको जान कर आश्चर्य होगा कि बीस किलोमीटर से कम के दायरे वाले मेरठ में हमने कंप्यूटर लगाए। संवाददाताओं को सिखाया कि वो आठ बजे घर चले जाएं। मैंने कहा कि शिक्षा विभाग के संवाददाता को रात के एक बजे तक काम करने की क्या जरूरत है। मैंने कहा कि आप घर जाइए और क्वालिटी टाइम एन्ज्वॉय कीजिए। मैंने उन्हें एक भाई की तरह समझाने की कोशिश की। सोच के स्तर पर बदलाव की कोशिश हुई। मैं आपको बताऊं कि मुझे अख़बार के मालिकों ने जो दिया वो दिया। मेरे सहयोगियों ने जो दिया वो मेरे लिए अतुलनीय है। मैं अपने सहयोगियों का बहुत आभारी हूं। उन्होंने जो दिया उसे भूला नहीं जा सकता। मैं गदगद, भावुक और कृतज्ञ तीनों हूं।

समरेंद्र – अतुल माहेश्वरी का आपने बार-बार जिक्र किया है। उनके बारे में कुछ बताएं।

शशि शेखर – अतुल माहेश्वरी जी का वैल्यू सिस्टम बहुत जोरदार है। इसका श्रेय आप मुझे दे सकते हैं कि अमर उजाला में हमने समाचार की शक्ल में विज्ञापन नहीं छापे। लेकिन अतुल जी के बगैर यह संभव था क्या? और पूरे निदेशक मंडल के बिना यह संभव था क्या? अतुल जी का मानना है कि अमर उजाला की विश्वसनीयता से हम कोई समझौता नहीं करेंगे। आज जान लीजिए कि हिंदुस्तान के मालिक भी इस मामले में दृढ़ हैं। दिक्कत वहां होती है जब हम दृढ़ता से अपनी बात नहीं रखते। मुझे नहीं लगता कि कोई भी अख़बार मालिक अपनी विश्वनीयता से समझौता करना चाहता है। और हिंदुस्तान टाइम्स वो ग्रुप है जिसने कभी पेज थ्री को मौका नहीं दिया। उस अंधड़ में भी जब एक ग्रुप करोड़ों-अरबों रुपये कमा रहा था, उन्होंने पेज थ्री को जगह नहीं दी। दिक्कत यही हो गई है कि मीडिया में हम लोग कभी-कभी एकांगी बात करते हैं। मेरा मानना है कि एक अच्छे मालिक का दिल नहीं तोड़ना चाहिए। चाहे वो प्रणव रॉय हों, चाहे वो अतुल माहेश्वरी हों, चाहे वो शोभना भरतीया हों या कोई भी हो। हमें उनका सहयोग करना चाहिए। हम अक्सर मान लेते हैं कि वो हमारे शत्रु हैं।

मैं चाहूंगा कि आप एक वाकये का जिक्र करें। जब मैं आज अख़बार में सब-एडिटर था। तो एक दिन यूनियन के लोग मेरे पास चंदा मांगने आए। उन्होंने कहा कि बीस रुपये चंदा दीजिए। मैंने कहा कि क्या करेंगे बीस रुपये लेकर। उन्होंने कहा कि हम मुकदमा लड़ेंगे। मैंने कहा कि मुकदमा लड़ कर क्या करेंगे। उन्होंने कहा कि हम इस अख़बार को बंद करा देंगे। तो मैंने कहा कि भगवन आप अख़बार बंद करा देंगे? उसके लिए आप बीस रुपये मुझसे चाहते हैं। अरे आप किसी का भला करें तो बीस की जगह दो सौ रुपये ले जाइए। इस पर वो आग बबूला हो गए। एक सज्जन बहुत बड़े थे… गालियां देने लगे। मैंने कहा कि गालियां दीजिएगा तो उठा कर पटक दूंगा। गाली वाली नहीं सुनूंगा।

उस दिन मैंने सोचा कि झंडा और डंडा लेकर मालिक से लड़ना जरूरी हो गया तो लड़ेंगे, लेकिन उससे पहले एक बार उसे ठंडे दिमाग से समझाना चाहिए। कहना चाहिए कि हम आपको व्यापार चलाने में मदद करेंगे। उसके बदले में आप मुनाफे का कुछ हिस्सा हमें दीजिए।

अतुल माहेश्वरी ने इसी अख़बार में जूनियर सब-एडिटर का पद समाप्त किया। मुझे नहीं मालूम कि इसकी चर्चा क्यों नहीं होती है। एक अवैधानिक पद था जूनियर सब-एडिटर का। अमर उजाला में हमने ख़त्म किया। हमने सब-एडिटर की सैलरी अवार्ड से कहीं अधिक तय की। 12 हज़ार रुपये। हमने तीन साल पहले कैल्कुलेट किया कि बुलंदशहर जैसे शहर में क्लास टू ऑफिसर की सैलरी जितनी होती है उतना हम अपने जिला संवाददाता को दें तो अच्छा है। लेकिन आप गौर करिए कि क्लास टू ऑफिसर लोक सेवा आयोग के जरिए आता है। अभी पत्रकारों में प्रशिक्षण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। फिर भी हमने एक परंपरा की शुरुआत की। अगर हम झंडा और डंडा लेकर लड़ते तो जो आज अख़बार का हाल हुआ है शायद वही हाल यहां होता। इसलिए मैं यह मानता हूं कि अगर हम अच्छी बात करें। साथियों को अच्छी तरह प्रेरित करें। तो ज़्यादातर मौकों पर बिना लड़ाई के अच्छे नतीजे निकल सकते हैं।

समरेंद्र – अमर उजाला छोड़ने की कोई और वजह है या फिर सिर्फ यही कि एक नई जिम्मेदारी मिली है।

शशि शेखर – (मुस्कुराते हुए, मजाक के लहजे में) ज्योतिषी लोग एक वजह बताते हैं। मुझे बहुत ज़्यादा यकीन नहीं है। पहले शनि की महादशा थी जब आज अख़बार में मैं काम करता था। कहते हैं कि शनि मेरे लिए एक स्थिर ग्रह है। शनि की महादशा में मैंने बीस साल आज अख़बार में काम किया। अत्यंत प्रलोभन मिले। 93 में नवभारत टाइम्स पटना का रेजिडेंट एडिटर बन रहा था। आलोक मेहता जी के बाद। तब मैं कुल 32-33 का था, लेकिन नहीं गया। फिर जब बुध की दशा आई तो एक ज्योतिषी ने कहा (मैं फिर कह रहा हूं कि मेरा ज्योतिषी में विश्वास नहीं है। लेकिन अपने यहां ज्योतिष छापता हूं और ज्योतिषियों से साबका पड़ता है।) कि अब चंचल ग्रह आ रहा है तुम्हारा, तुम एक जगह टिक कर नहीं बैठोगे। फिर मैं “आज तक” गया। एक साल पांच महीने में मन उखड़ गया। यहां सात साल रहा हूं। (यकीन मानिए कई रातों से सोया नहीं हूं। अतुल जी के साथ आगे काम नहीं कर पाने की कसक है।) कहीं वो ज्योतिषी सही तो नहीं कह रहा था कि मैं चंचल हो गया हूं। (हंसते हुए)

समरेंद्र – अब कुछ सामाजिक मुद्दों पर बात। अब जजों की भी संपत्ति सार्वजनिक होगी। यहां यह बात भी उठ रही है कि पत्रकारों को और मीडिया संस्थानों को भी अपनी आय के स्रोत सार्वजनिक करने चाहिए।

शशि शेखर – बहुत अच्छी बात है। सिर्फ पत्रकारों को ही क्यों? सबको करना चाहिए। यदि इस बारे में कोई फैसला लिया जाए तो सबसे पहले मैं घोषणा करने को तैयार हूं। एक-एक पाई की घोषणा। इसमें क्या बुरी बात है। वैसे भी जो लोग इनकम टैक्स देते हैं… एक तरह से उनका ब्योरा तो जमा होता ही है।

लेकिन मुझे लगता है कि संपत्ति की घोषणा भी हाथी के दांत की तरह है। मसलन नोएडा में किसी की कोठी है तो स्टांप रेट के हिसाब से उसकी कीमत होगी 28 लाख रुपये। बेचने चलिए तो हो सकता है कि तीन करोड़ रुपये मिलें। पर हाथी के दांत ही सही। कुछ रंग-रूप तो सामने आती ही है। मुझे लगता है कि इसका स्वागत किया जाना चाहिए

समरेंद्र – सत्ता और पत्रकारिता के बीच एक गठजोड़ है। उदाहरण के तौर पर राज्य सभा के लिए पत्रकारों के मनोनयन को देखिए। मनोनीत होने की पहली शर्त बुनियादी योग्यता नहीं यही गठजोड़ है।

शशि शेखर – बात ठीक कह रहे हैं। जब कोई किसी को देता है तो उसके बदले में कुछ चाहता भी है। गठजोड़ है और लाइकिंग-डिसलाइकिंग है तभी तो देना और लेना चल रहा है। लेकिन मुझ जैसे पत्रकार भी हैं जो किसी नेता के सत्ता में आने पर दुश्मन हो जाते हैं और वैसे घर के सदस्य रहते हैं। एक बड़े कद्दावर नेता हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कई बार रह चुके हैं। प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। मेरे गांव के पास के हैं। जब वो मुख्यमंत्री होते हैं तो नाराज़ हो जाते हैं और जब वो मुख्यमंत्री पद से हटते हैं तो मैं उनका भतीजा हो जाता हूं। मेरा अलग तरह का भाई भतीजावाद है, जो चलता रहता है। आमतौर पर तभी चलता है, जब लोग सत्ता में नहीं रहते हैं।

समरेंद्र – तो क्या सत्ता और पत्रकारिता के गठजोड़ को आप सही मानते हैं?

शशि शेखर – मैं सही क्यों मानूंगा। जहां लेना-देना है। वो एक व्यापार है। व्यापार को मैं सही कहूं या नहीं कहूं वो चल रहा है। मैं किसी की निंदा या आलोचना नहीं करना चाहता। पर मैं निजी तौर पर राज्यसभा में नहीं जाना चाहता। मैं निजी तौर पर कभी किसी भी सरकारी संस्था का सदस्य नहीं बना। मैंने कभी किसी राजनीतिक पार्टी से चुनाव लड़ने के बारे में नहीं सोचा।

समरेंद्र – आजकल कहा जा रहा है कि संपादक मैनेजर हो गया है। उसका काम ख़बरों से ज्यादा कंपनी के कारोबार को बढ़ाना है।

शशि शेखर – परसों तक अमर उजाला में छपने वाली हर प्रमुख ख़बर, संख्या में 100-125, मुझको मालूम थी। परसों तक आज़मगढ़ में हादसे की ख़बर मुझे पता थी। मुझे मालूम था कि लीड ख़बर का शीर्षक क्या होगा। मुझे मालूम था कि पहले पन्ने का डिजाइन कैसा होगा। मुझे मालूम था कि पांच प्रदेशों के अलग-अलग संस्करणों में पहली हेडलाइन क्या होगी। अब अगर इसके बाद भी कोई मुझे मैनेजर कहे … तो मुझे उससे फर्क नहीं पड़ता।

मैं अपनी बात जानता हूं। पता नहीं कौन खुद को मैनेजर कहता है? कौन मैनेजर पत्रकार कहता है? लेकिन परसों तक तो मैं अपना काम कर रहा था। कल अलबत्ता ख़बर आई कि राजशेखर रेड्डी (आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री) लापता हो गए हैं तो मैं थोड़ा भावुक हो गया था। मैंने कहा कि आज मैं ख़बर नहीं जानना चाहता। तीस साल के करियर में यह पहली बार था जब मैंने अख़बार को फोन नहीं किया। सोचा जो अख़बार निकाल रहे हैं उन्हें निकालने दिया जाए। अगर मैं दफ़्तर में होता तो यह हेडिंग नहीं जाती कि हवा में लापता सीएम। क्योंकि मैं मैनपुरी के गांव में रहने वालों के लिए भी अख़बार निकालता हूं। उत्तरकाशी के गांव के लिए भी अख़बार निकालता हूं। कठुवा के लिए भी निकालता हूं। इसलिए परसों तक मैं पत्रकारिता कर रहा था और कल से फिर पत्रकारिता ही करूंगा। कोई मुझे मैनेजर कहे तो यह उसकी श्रद्धा है।

समरेंद्र – मैनेजमेंट से आपका कोई टकराव हुआ है। कभी कोई झगड़ा। कोई तीखी बहस।

शशि शेखर – यह भी बहुत स्वार्थी और चालाक लोगों की उड़ाई हुई चीज है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब तक संपादक जी की कुर्सी सुरक्षित रहती है तो कोई टकराव की बात सामने नहीं आती। जैसे ही कुर्सी हिलने लगती है तो वो और उनके साथी हल्ला मचाना शुरू कर देते हैं। मैं किसी बड़े का नाम नहीं लेना चाहता। एक हादसा तो अभी ही हुआ है। उससे पहले एक आदरणीय पुरुष थे। उनके बारे में बोल दिया तो बड़ी दिक्कत होगी। अब वो रह ही नहीं गए हैं। मेरे बहनोई उनके मित्र थे। हम लोग बैठा करते थे उनके साथ। हमसे वो बात कुछ करते थे और मंच पर जाते ही कुछ और कहने लगते थे। एक पूरा का पूरा कबिला उनके साथ चलता था। तो जय-जय भी होती रहती थी। हम जैसे लोगों की दिक्कत यह है कि हमारे पास कोई कबिला नहीं है। तो बुराई करने वाले तो खुल कर बुराई कर देते हैं। तारीफ़ करने वाले सोचते हैं कि यार पता नहीं ये आदमी कुछ देगा या नहीं देगा तो बोल कर दूसरों का दुश्मन न बन जाऊं। नारे आज तक उन्होंने ही लगाए हैं जिन्होंने मैनेजरों से फायदे उठाए हैं।

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“फिर मिलेंगे क्योंकि शो अभी जारी है”

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जहां किसी ने चंद लम्हे बिताए हों उस जगह से खुद-ब-खुद एक रिश्ता कायम हो जाता है। फिर शशि शेखर ने तो अमर उजाला में सात साल बिताए हैं। उस संस्थान से उनका रिश्ता कितना मजबूत होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। हिंदुस्तान में नई पारी शुरू करने से पहले अमर उजाला के समूह संपादक ने साथियों को विदाई संदेश भेजा। दिल को छू लेने वाला विदाई संदेश। आप सब वो संदेश पढ़िए। इस संदेश का सार यही है कि ज़िंदगी सूदखोर महाजन की तरह है। वो बिना कीमत वसूले किसी को कुछ नहीं देती।
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