श्श्श्श् आलोक जी जनता देख रही है

मीडिया संस्थानों की आय का मुख्य स्रोत विज्ञापन हैं। विज्ञापनों का स्तर कैसा हो यह फैसला अख़बार या मीडिया संस्थान का होता है। बड़े अख़बारों में विज्ञापन लेते वक़्त एक खास ख्याल रखा जाता है कि उस विज्ञापन से मीडिया संस्थान के अपने ब्रांड पर कोई बुरा असर नहीं पड़े। इस लिहाज से देखा जाए तो विज्ञापनों के स्तर से आप अख़बार की नीति, स्थिति और स्तर का अंदाजा लगा सकते हैं।

हम आपके सामने दो विज्ञापन रख रहे हैं जो एक राष्ट्रीय डेली में पहली जनवरी को यानी नए साल के पहले दिन छापे गए। इन विज्ञापनों को देख कर आप बताएं कि क्या इन्हें किसी भी अख़बार में छापा जाना चाहिए या नहीं? Read more

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अंग्रेजी मुखौटों के विरुद्ध, आलोक मेहता का युद्ध

आलोक मेहता। कुछ समय पहले तक आउटलुक हिंदी के संपादक। अब नई दुनिया के प्रधान संपादक। बतौर साहित्यकार पद्म सम्मान हासिल करने वाले पत्रकार। सत्ताधारी यूपीए के बेहद करीबी कलमबाज। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के भक्त। अरुंधती रॉय के घोर विरोधी। नक्सलियों के ख़िलाफ़ चल रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट के हिमायती। उन्होंने संडे नई दुनिया में आज संपादकीय लिखा है। “अंग्रेजी दा मुखौटों के आंसू”। निशाना अरुंधती रॉय पर है। और उन तमाम लोगों पर जिन्हें अरुंधती का लिखा पसंद है। लेकिन नाम लिए बगैर। जाहिर है अरुंधती रॉय और उनके प्रशंसकों से वो बेहद दुखी हैं। आलोक मेहता दुखी इसलिए भी हैं कि रिलायंस गैस विवाद में नई दुनिया के स्कूप का सच सामने आ गया है। हम चाहते हैं कि अपने “एजेंडे” में पूरी तरह से “ईमानदार” पत्रकार आलोक मेहता का ये छायावादी लेख जनतंत्र के पाठक भी पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। - मॉडरेटर

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अंग्रेजी दा मुखौटों के आंसू

अंग्रेजी भाषा पर उनका अच्छा अधिकार है। अच्छी शिक्षा-दीक्षा मिली है। बैंक में लाखों ही नहीं, कुछ करोड़ रुपये जमा हो जाते हैं। मेग्सायसाय, बुकर, नोबेल पुरस्कार की सिफारिश करने वाले प्रशंसकों से घिरी रहती हैं। कहानी, उपन्यास के अलावा अंग्रेजी की समाचार पत्रिकाओं में 25 से 30 पृष्ठों के बड़े-बड़े लेख छप जाते हैं। इतने बड़े लेख उस पत्रिका या देश के किसी अन्य संपादक के नहीं छप सकते। जिन पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-छपने पर उन्हें हजारों रुपये मिलते हैं, उन प्रकाशनों के प्रबंधक वही पूंजीपति हैं, जो जंगल काट कर उद्योग लगाते हैं, झुग्गियां तोड़ कर बहुमंज़िली इमारतें बनाते हैं। अंग्रेजी में लिखी जिन पुस्तकों की रॉयल्टी से उन्हें लाखों रुपये मिलते हैं, वे पुस्तकें वही वर्ग खरीदता है, जिसे झोंपड़ियों के प्रति दर्द का अहसास नहीं होता। हां, अंग्रेजी में भारत के आदिवासियों की दुर्दशा, खूनी हिंसा की मानसिकता वाले नक्सली अतिवादियों के बारे में पढ़-सुनकर भारत विरोधी षड्यंत्र करने वाले परदेसी बहुत अधिक प्रसन्न होते हैं। वह भारत में झोला लटका कर चलती हैं और हवाई यात्रा महंगे बिजनेस क्लास में करती हैं। पांच सितारा होटलों की पार्टियों में आनंद लेती हैं लेकिन प्रशंसकों के रूप में दूर खड़े फटेहाल लोगों को देखना चाहती हैं। आखिर जयकार वही कर सकते हैं। Read more

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एक अख़बार जिसमें हर रोज छपती है राष्ट्रपति की तस्वीर!

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक तरह से नई दुनिया ने अपना ब्रांड एम्बेडसर बना लिया है। शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता है जब उनकी तस्वीर नई दुनिया के किसी न किसी पन्ने को शोभा नहीं बढ़ाती हो। बीते एक हफ़्ते में दो दिन को छोड़ कर हर रोज उनकी तस्वीर नई दुनिया में छापी गई है। आमतौर पर चार कॉलम में मगर एक बार तीन कॉलम में। जिन दो दिन उनकी तस्वीर नहीं छपी है उनमें से एक दिन यानी चार अक्टूबर को पहले पन्ने पर उनकी ख़बर है और उसी दिन अपने कॉलम में अख़बार के समूह संपादक आलोक मेहता ने प्रतिभा पाटिल के बेटे को केंद्र में रख कर वंशवाद के समर्थन में एक लेख लिखा है।

नई दुनिया में किस दिन और कौन से पन्ने पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की तस्वीर छपी है या फिर रिपोर्ट या लेख – उसका ब्योरा नीचे दिया जा रहा है। आप एक नज़र डालिए। Read more

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एक साल बाद ख़बरों की जगह बेडशीट के भरोसे नई दुनिया

नई दुनिया के दिल्ली संस्करण ने एक साल पूरा कर लिया है। पिछले साल दो अक्टूबर को ही यह अख़बार पूरे ताम-झाम के साथ लॉन्च हुआ था। राजधानी के एक पांच सितारा होटल में बड़े-बड़े नेताओं को अख़बार की पहली प्रति बांटी गई और जश्न मनाया गया। बड़े-बड़े वादे और दावे किए गए हैं। लेकिन एक साल बाद सारे वादे धरे रह गए हैं और दावे झूठे साबित हुए हैं।  सूत्रों के मुताबिक बाहर के लोगों की बात क्या करें? अख़बार में काम करने वालों के बीच ही अख़बार की विश्वसनीयता घटती चली गई है। तभी एक साल पूरा होने पर संपादक आलोक मेहता को अपनी टीम से यह कहना पड़ा कि आप सभी चिंता मत करें… यह एक लड़ाई है… इसमें कभी हम आगे निकल जाते हैं और कभी पीछे।  Read more

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राष्ट्रपति के बेटे के समर्थन में नई दुनिया की मुहिम

September 26, 2009 by जनतंत्र डेस्क  
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नई दुनिया ने प्रतिभा पाटिल के बेटे राजेंद्र सिंह शेखावत के बारे में माहौल बनाने के लिए सभी घोड़े खोल दिये हैं। शुक्रवार को भी नई दुनिया में एक ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित की गई है जिसमें अमरावती से राजेंद्र सिंह शेखावत को टिकट दिये जाने के फैसले को सही ठहराया गया है। राजेंद्र को टिकट देने के लिए कांग्रेस ने सुनील देशमुख का पत्ता काटा है। सुनील देशमुख अमरावती से लगातार दो बार से कांग्रेस के विधायक हैं। महाराष्ट्र में वित्त राज्य मंत्री और अमरावती के प्रभारी मंत्री हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सुनील देशमुख जब से अमरावती पहुंचे हैं वहां कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है। रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने वहां नेता बदलने की मांग की थी। यह रिपोर्ट नई दुनिया ब्यूरो के नाम से प्रकाशित की गई है। Read more

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नई दुनिया की राष्ट्रपति भवन पर ख़ास नज़र!

September 26, 2009 by जनतंत्र डेस्क  
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नई दुनिया में शुक्रवार को 12वें पेज पर प्रतिभा पाटिल की तस्वीर छपी है। भारतीय मूल के पीटर वर्गीज के साथ। पीटर वर्गीज भारत में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त बने हैं। रिपोर्ट दो कॉलम की है और उसके ठीक बगल में तीन कॉलम में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की तस्वीर है। उस तस्वीर में पीटर वर्गीज राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को अपना परिचय पत्र भेंट कर रहे हैं। आपको यह बताने का मकसद सिर्फ़ इतना ही है कि इस महीने शायद ही कोई ऐसा दिन हो जब राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की कोई ख़बर या फिर उनकी तस्वीर प्रमुखता से नई दुनिया में नहीं छपी हो। Read more

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नई दुनिया का मतलब राष्ट्रपति भवन का भोंपू !

September 25, 2009 by जनतंत्र डेस्क  
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संबंध निजी होते हैं और संबंधों को हर कोई निभाता है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति किसी संस्थान के शीर्ष पर बैठा हो और वो उस संस्थान को निजी संबंधों को साधने का जरिया मात्र बना दे तो यह किसी के लिए अच्छा नहीं। न खुद उस व्यक्ति के लिए और न ही संस्थान के लिए। लेकिन लगता है कि नई दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता इन दिनों कुछ ऐसी ही मुहिम में जुटे हैं, जिससे उनके प्रति सम्मान पूरी तरह ख़त्म हो रहा है। उन्होंने नई दुनिया को राष्ट्रपति भवन का भोंपू जैसा बना दिया है। अमूमन हर दूसरे दिन पहले पन्ने पर राष्ट्रपति और उनके परिवार से जुड़ी कोई न कोई ख़बर या फिर तस्वीर ज़रूर होती है। Read more

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प्रतिभा पाटिल के प्रति नई दुनिया का भक्तिभाव देखिए

नई दुनिया के दिल्ली संस्करण में बुधवार को एक तस्वीर छपी। पहले पन्ने पर चार कॉलम में छपी यह तस्वीर काफी कुछ कह देती है। इसमें माननीय राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल उत्तर प्रदेश की सुरेखा यादव को पुरस्कार दे रही हैं। सुरेखा के दोनों पैर काम नहीं करते। वो हाथों के बल चल कर लोगों को साक्षर बना रही हैं। यकीनन यह तस्वीर पहले पन्ने पर छापी जा सकती है।

लेकिन राष्ट्रपति और राष्ट्रपति भवन में होने वाले कार्यक्रम को लेकर नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता का आदरभाव सब जानते हैं। इस महीने तो कम से कम दस मौकों पर या तो राष्ट्रपति से जुड़ी कोई ख़बर या फिर उनकी तस्वीर ने नई दुनिया के पहले पन्ने की शोभा बढ़ाई है। यही वजह है कि अख़बार के एक पाठक ने जनतंत्र पर अपनी टिप्पणी में कहा है कि आलोक मेहता को इस तपस्या का फल जरूर मिलना चाहिए। राष्ट्रपति को चाहिए कि अब वो आलोक मेहता को राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दें। आप नई दुनिया की यह तस्वीर देखिए और अपनी राय दीजिए।

नई दुनिया में 23 सितंबर को छपी तस्वीर

नई दुनिया में 23 सितंबर को छपी तस्वीर

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“मोदी”गान के जरिए आलोक मेहता बना रहे हैं “नई दुनिया”!

बड़ा पत्रकार होने के लिए बड़ा दिल चाहिए। आलोक मेहता के जितना बड़ा दिल। वो एक ही साथ कांग्रेस और बीजेपी दोनों की तारीफ कर सकते हैं। प्रतिभा पाटिल की शान में कसीदे पढ़ने के साथ नरेंद्र मोदी को भी साध सकते हैं। यह बहुत बड़ा हुनर हैं। और आलोक मेहता जैसे कई बड़े पत्रकार इस हुनर में माहिर हैं। आलोक मेहता ने अपने इसी हुनर का ताज़ा उदाहरण एक दिन पहले दिया है। उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को उदारवादी और अल्पसंख्यक प्रेमी करार दिया है।

रविवार को नई दुनिया में छपे अपने स्तंभ में आलोक मेहता ने बताया है कि हाल में गुजरात विधानसभा की सात सीटों पर हुए उपचुनाव में पांच पर बीजेपी को कामयाबी नरेंद्र मोदी की उदार नीतियों के कारण मिली है। उनके अल्पसंख्यक प्रेम ने उनकी छवि बदल दी है और अब गुजरात के मुसलमान भी नए नरेंद्र मोदी को गले लगा रहे हैं। आगे बढ़ने से पहले आप आलोक मेहता उवाच पर एक नज़र डालें। – Read more

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आलोक मेहता की अगुवाई में नई दुनिया का “गौरवशाली क्षण”

हिंदी के अख़बार बदल रहे हैं और उनमें में सबसे तेज़ी से बदल रहा है नई दुनिया। बीते हफ़्ते नई दुनिया को पढ़ने पर एक सुखद अनुभूति हुई। मन काफी खुश हुआ। लगा कि पहली बार किसी हिंदी अख़बार ने लीक से हट कर कुछ सकारात्मक करने की कोशिश की है और बाज़ार को ठेंगा दिखाया है।

बीते एक हफ़्ते में नई दुनिया, न केवल हिंदी बल्कि अंग्रेजी का, इकलौता अख़बार रहा जिसने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की रूस और ताजिकिस्तान यात्रा का विस्तृत कवरेज दिया। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के व्यक्तित्व को नया उभार दिया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह शायद पहला मौका है जब किसी राष्ट्रपति की विदेश यात्रा को उचित स्पेस दिया गया है। Read more

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