4 साल पूरे होने पर नीतीश सरकार ने अख़बारों पर लुटाया खजाना
November 24, 2009 by जनतंत्र डेस्क
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बिहार में एनडीए सरकार ने चार साल पूरे कर लिए हैं। नीतीश कुमार की अगुवाई में चल रही सरकार अब चार साल पूरे होने का जश्न मनाया जा रहा है। इस जश्न में सरकारी खजाना पानी की तरह बहाया जा रहा है। बड़े-बड़े विज्ञापन छापे और छपवाए जा रहे हैं। इस जश्न का सबसे अधिक फायदा मीडिया कंपनियों को हुआ है। अख़बारों की तो चांदी ही चांदी है। कहीं आठ, कहीं नौ तो कहीं दस पन्नों का विज्ञापन छपा है। नीतीश सरकार के मुताबिक बीते चार साल में उसने बिहार की सूरत बदल दी है। कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल-कूद… सभी क्षेत्रों में अभूतपूर्व क्रांति हुई है। अपराध का खात्मा हो गया है। निवेश बढ़ा है। रोजगार के नए-नए अवसर खुले हैं। और तमाम उपलब्धियों के लिए विज्ञापन छपवाए गए हैं। हर ख़बार में विज्ञापन की भाषा अलग-अलग है। कहीं-कहीं मुद्दे भी अलग-अलग हैं। लेकिन लक्ष्य सिर्फ़ एक। नीतीश कुमार और एनडीए का गुणगान करना। Read more
नया कानून नहीं, ख़बरों का स्पेस बढ़ाना जरूरी है
July 18, 2009 by Samrendra
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अभी मोहल्लालाइव पर बड़ी बहस चल रही है। बहस कि ख़बरों में मिलावट के ख़िलाफ़ कानून बनाना चाहिए या नहीं? लेकिन इस बहस से पहले सवाल यह है कि ख़बरों में मिलावट हुई है इसका परीक्षण कैसे होगा? किसी भी ख़बर को असली और मिलावटी साबित करने के लिए किसी मानक का निर्माण कैसे होगा? या फिर ये कि क्या ऐसा कोई मानक बनाया भी जा सकता है – जो ख़बरों की शुद्धता प्रमाणित कर सके?
आप किसी भी मीडिया संस्थान में जाइए और देखिए कि बच्चों को आखिर पढ़ाया क्या जाता है? आप पाएंगे कि सभी मास्टर बच्चों से कहते हैं कि ख़बरों की प्रस्तुति ऑब्जेक्टिव (वस्तुनिष्ठ) तरीके से होनी चाहिए। लेकिन व्यवहारिक तौर पर ऐसा कर पाना बेहद कठिन है। Read more
मनमोहन सरकार का मीडिया मैनेजमेंट
June 4, 2009 by Samrendra
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कुछ दिन पहले ही एक्सचेंज फॉर मीडिया पर इस साल जनवरी से मार्च के बीच टॉप टेन एडवरटाइजर्स यानी विज्ञापन देने वाली कंपनियों और संस्थाओं की सूची छापी गई। उस सूची में एक बात चौंकाने वाली थी। मंदी के इस दौर में मनमोहन सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने अख़बारों के लिए खजाना खोल दिया था। टॉप टेन एडवरटाइजर्स में दो सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हैं। इनके अलावा भारत सरकार, नागरिक उड्डन मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय भी शामिल हैं।
इस लिस्ट के मुताबिक पिछले साल जनवरी से मार्च के बीच तीसरे स्थान पर मौजूद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया इस साल पहले स्थान पर है। बैंकिंग सेक्टर की दूसरी बड़ी कंपनियां इस लिस्ट में कहीं नहीं हैं। मतलब साफ है एसबीआई ने प्रचार पर अपने प्रतिद्वंदियों से काफी अधिक पैसा खर्च किया… आखिर क्यों? ठीक इसी तरह दूसरे नंबर पर मौजूद है एक और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीएसएनल। जबकि टेलीकॉम सेक्टर की कोई और कंपनी टॉप टेन में शामिल नहीं है। वोडाफोन और रिलायंस भी नहीं।
सरकारी कंपनियों के बाद अब मंत्रालयों पर नज़र। हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल कितना बुरा है इसका अंदाजा सभी को है। यहां हर साल हजारों की संख्या में लोग इलाज नहीं मिलने के कारण मर जाते हैं। लेकिन जब विज्ञापन पर पैसे खर्च करने की बारी हो और वो भी चुनाव से पहले तो स्वास्थ्य मंत्रालय किसी से कम नहीं। विज्ञापन देने वालों की सूची में स्वास्थ्य मंत्रालय ने तो बहुत ऊंची छलांग लगाई है। वो 62वें स्थान से 10वें स्थान तक पहुंच गया है। 2008 में 18वें स्थान पर रहने वाली भारत सरकार इस बार 8वें स्थान पर है यानी दस पायदान ऊपर। नागरिक उड्डन मंत्रालय की तो बात ही मत पूछिये। पिछले साल ये मंत्रालय विज्ञापन देने वालों की रेस में कहीं नहीं था, लेकिन इस बार सातवें स्थान पर है।
चुनाव से ठीक पहले सरकार की तरफ से प्रचार पर इतने भारी खर्च की वजह क्या थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार मीडिया का मुंह बंद रखना चाहती थी? सरकार से ये पूछा जाना चाहिए कि किस मीडिया संस्थान को कितना विज्ञापन दिया गया? क्या विज्ञापन सर्कुलेशन और टीआरपी के आधार पर बांटे गए या फिर कुछ खास कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई?
इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सरकारी विज्ञापनों के जरिये किस तरह से ब्लैकमेलिंग होती है। ये भी कि ये सच सिर्फ बिहार का नहीं बल्कि पूरे देश का सच है। कहीं कम कहीं ज़्यादा। जिस राज्य के मुखिया में तानाशाही प्रवृति ज़्यादा है वहां पर खुलेआम अख़बारों और पत्रकारों को डराया-धमकाया जाता है। जिन राज्यों का मुखिया थोड़ा लोकतांत्रिक है, वहां पर अख़बारों को थोड़ी आज़ादी मिली हुई है। सवाल उठता है कि केंद्र और राज्य सरकारों की विज्ञापन नीति में ये क्यों जोड़ा जाता है कि आप सारी अनिवार्यताएं पूरी करके भी विज्ञापन पर हक़ नहीं जता सकते?
मैंने कई वरिष्ठ पत्रकारों से यही सवाल किया। संपादक स्तर के पत्रकारों से भी। मैंने उनसे ये भी पूछा कि क्या सरकारों की इस विज्ञापन नीति को कभी किसी अख़बार या मीडिया संस्थान ने अदालत में चुनौती दी है या नहीं? सबने यही कहा कि उनकी जानकारी में ऐसा कोई वाकया नहीं है। आखिर क्यों? अगर सारी अनिवार्यताएं पूरी करने के बाद राज्य हित के ख़िलाफ़ ख़बर लिखने के आरोप में उनका विज्ञापन रोका गया तो उसे अदालत में चुनौती क्यों नहीं दी गई? क्यों नहीं कहा गया है कि राज्य के हित में क्या है ये तय करने का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ नेताओं और सरकारी बाबुओं को नहीं हो सकता। अगर नेताओं और सरकारी बाबुओं को ही ये तय करने का अधिकार है तो फिर देश की बाकी स्वायत्त संस्थाओं को भंग क्यों नहीं कर दिया जाता? तब संविधान में दिये गए बोलने के अधिकार को ख़त्म क्यों नहीं कर दिया जाता?
दरअसल, सहनशीलता और उदारता किसी भी लोकतंत्र के बुनियादी तत्व होते हैं। जब हुक्मरान सहनशील और उदार नहीं रहेंगे तो फिर लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाता। यहां पर मैं आपका ध्यान इवेलाइन बीट्राइस हॉल के एक मशहूर कोटेशन की तरफ खींचना चाहता हूं। आमतौर पर कहा जाता है कि वो कोटेशन वोल्टेयर का है। लेकिन ये सच नहीं है। वो कोटेशन बीट्राइस का है जिन्होंने वोल्टेयर पर किताब भी लिखी थी। उनका कहना था कि “ आई डिस्एप्रूव ऑफ व्हाट यू से, बट आई विल डिफेंड टू द डेथ योर राइट टू से इट” मतलब “मैं आपकी बात खारिज कर दूंगा लेकिन अपनी अंतिम सांस तक आपके बोलने के अधिकार की रक्षा करूंगा”। कुछ ऐसी ही भावना हमारे संविधान बनाने वालों की भी रही होगी, तभी तो उन्होंने मौलिक अधिकारों में फ्रीडम ऑफ स्पीच को शामिल किया। फिर जब सरकार संविधान की उस मूल भावना के साथ खिलवाड़ करती है तब उसका विरोध क्यों नहीं होता? क्या मीडिया संस्थान कानूनी लड़ाई से डरते हैं?
जहां तक मुझे लगता है मीडिया संस्थान कानूनी लड़ाई से डरते नहीं हैं बल्कि बचना चाहते हैं। मैं ऐसे कई वाकयों को जानता हूं जिनमें मीडिया संस्थानों में स्टैंड लिया है। सही रिपोर्ट होने पर मुकदमे भी लड़े हैं। अदालत से लेकर संसदीय समिति तक चक्कर काटे हैं। जाहिर है अदालती लड़ाई तो लड़ी जा सकती है, लेकिन विज्ञापन बंद होने पर हर रोज लाखों रुपये का जो नुकसान होगा वो सहना मुश्किल है। अख़बार या फिर टीवी चैनल चलाना सफेद हाथी पालने जैसा है … कानूनी लड़ाई लंबी खिंची तो कारोबार बंद करने की नौबत भी आ सकती है।
फिर हमारे पास कौन सा विकल्प बचता है? मेरे हिसाब से इसका एक ही उपाय है कि जिस तरह दूसरे तमाम सेक्टरों में रेगुलेटरी बॉडी हैं ठीक उसी तरह कोई रेगुलटरी बॉडी बनाई जानी चाहिये। जिसमें मीडिया से जुड़े तमाम मुद्दों पर का जल्द से जल्द निपटारा हो सके। ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए एक निष्पक्ष समिति की गठन होना चाहिए। मीडिया से जुड़े सरकारी आदेश को चुनौती देने का अधिकार भी दिया जाना चाहिये। साथ ही विज्ञापन नीति में एक क्लाज भी जोड़ा जाए कि दोष साबित होने तक किसी भी मीडिया संस्थान का विज्ञापन नहीं रोका जाएगा। ना ही उस पर कोई आर्थिक दंड लगाया जाएगा।
((जारी))…………………….
((अगर आप भी विज्ञापन के ज़रिये ब्लैकमेलिंग के मुद्दे पर कोई राय रखते हों तो उसे खुल कर बताएं।))
बिहार की गुलाम पत्रकारिता ((पार्ट – 2))
June 3, 2009 by Samrendra
Filed under बड़ी ख़बर, हक़ की आवाज़
बीते एक दशक में मीडिया का स्वरूप जितनी तेज़ी से बदला है, उतनी ही तेज़ी से उसे नियंत्रित कर हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की चाहत भी बढ़ी है। ये चाहत सबसे अधिक नेताओं में होती है। शुरू से देखा गया है कि नेता मीडिया से डरते हैं। भ्रष्ट नेता तो बहुत ज़्यादा डरते हैं। इसलिए साम-दाम-दंड़-भेद सभी तरीके से उसे नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। Read more




