हुसैन का जाना सामूहिक कायरता का नतीजा है

मकबूल फिदा हुसैन अब कानूनन भारतीय नहीं रहे! इससे हुसैन को क्या फर्क पड़ा? वे मुंबई के अपने स्टूडियो में बैठ कर चित्र बनाते थे, अब कतर के स्टूडियो में बैठ कर बनाते हैं। काम के प्रति उनकी दीवानगी, उनकी गहराई और उनकी प्रतिबद्धता वैसी ही है जैसी तब थी, जब इक्यासी साल की उम्र में भारत छोड़ कर वे कहीं और पनाह लेने गए थे। यह वही दौर था जब बांग्लादेश से इसी प्रकार, वैसी ही जुनूनी जमात के कायराना हमलों से क्षत-विक्षत लेखिका तसलीमा नसरीन भारत में पनाह लेने की जद्दोजहद में थीं। तसलीमा के साथ बांग्लादेश में जो हुआ और वहां की सरकार ने उनके साथ जो किया, हुसैन के साथ भी ऐसा ही हुआ और हमारी सरकारों ने उनके साथ वैसा ही किया। बड़े अजीब, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से इतिहास मनुष्यों को पाठ पढ़ाता है। Read more

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कट्टरपंथी हुसैन के जाने से देश पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा

धर्म इस देश में हमेशा से संवेदनशील मसला रहा है। धर्म के नाम पर विभाजन पहले ही हो चुका है। दंगों से धरती बार-बार लाल हुई है। कई धर्म और पंथ वाले इस राष्ट्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी की एक सीमा है। हर संवेदशनशील शख़्स को उस सीमा का ख्याल रखना चाहिए। अगर कहीं चूक हो जाए तो इतना तत्पर रहना चाहिए कि यह कह सके कि “मेरी मंशा ठेस पहुंचाने की नहीं थी। अगर किसी को ठेस पहुंची तो उसके लिए वो माफ करे।” लेकिन क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी की मांग करने वाले हमेशा उस लक्ष्मण रेखा का पालन करते हैं? और चूक होने पर क्या माफी मांगने का साहस दिखाते हैं? ये कुछ बड़े सवाल हैं। खासकर उस संदर्भ में तो ज़रूर जिस संदर्भ में एम एफ हुसैन को खुदा बनाने की कोशिश की जा रही है। Read more

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हुसैन, तुम धर्म के ठेकेदारों से माफ़ी मत मांगना

मकबूल फ़िदा हुसैन को कतर की नागरिकता दिये जाने पर फिर से उन्हें खोने का एहसास हो रहा। लेकिन राजनीति की बिसात पर हुसैन बस मोहरा बन कर रह जाते हैं। आज सेक्यूलरिज़म की दुहाई देने वाले चुप हैं। ये वही लोग हैं जिन्होने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को सरकारी दस्तावेजों के विशाल डम्पिंग ग्राउंड में दफ्न कर दिया है। ये हिम्मत कौन दिखाएगा कि उस रिपोर्ट को बाहर निकाल कर, उसे झाड़ पोंछ कर उस पर सिरे से अमल किया जाए। हुसैन से अलग जस्टिस सच्चर ने जो देश की अक़लियत के विकास का एक्स-रे निकाला उसमें देश की सेक्यूलर छवि तार-तार दिखी। Read more

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रुश्दी डरपोक, हुसेन कट्टरपंथी हैं, मेरा नाम उनसे मत जोड़ें

बहुत सारे लोग मेरा नाम सलमान रुश्दी के साथ जोड़ देते हैं। देश विदेश सब जगह। लेकिन अगर दो ऐसे लोगों को एक साथ रख कर देखा जाता है, जिनमें काफी असमानता है तो आपत्ति स्वाभाविक है। आजकल मुझे धड़ल्ले से महिला रुश्दी कह दिया जाता है। मैं पूछती हूं, सलमान रुश्दी को पुरुष नसरीन क्यों नहीं कहते? एक फतवे को छोड़ दें, तो हमारे बीच कोई समानता नहीं है। रुश्दी पुरुष हैं। मैं स्त्री हूं। यह सबसे बड़ा अंतर है। पुरुष होने के कारण वे सुविधाएं भोग रहे हैं और स्त्री होने के चलते मैं असुविधाओं से घिरी हूं।

मैं एक-एक कर असमानताएं गिनाती हूं। फतवा जारी होने के बाद उन्होंने कट्टरपंथियों से माफी मांगी, तौबा करके खांटी मुसलमान बने रहने की कसम खाई। मैंने माफी नहीं मांगी। मुसलमान भी नहीं होना चाहती। मैं बचपन से नास्तिक हूं। चाहे जितने आँधी-तूफान आए, हमेशा सिर ऊंचा किए नास्तिक बनी रही। जिस ईरान ने रुश्दी के खिलाफ फतवा जारी किया था वे उस देश में कभी नहीं रहे। मगर जिस देश में मुझे फांसी पर चढ़ाने के मकसद से बरसों उन्मादियों का जुलूस निकलता रहा, जहां असहिष्णु मुसलमान मेरी हत्या को उतारू थे, जहां की सरकार ने खुद मेरे खिलाफ अपील की थी; जिसके चलते मेरा हुलिया जारी किया गया और मुझे महीनों रात के अंधेरे में लुक-छिप कर रहना पड़ा था, जिस देश के कट्टरपंथी अपने हाथों मेरी गर्दन मरोड़ने पर तुले थे, उस देश में- ऐसे उग्र माहौल में भी- मैं सशरीर उपस्थित रही। सरकार और कट्टरपंथियों के तमाम अत्याचार मैंने अकेले सहे थे। Read more

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एम एफ़ हुसैन नाम का एक भारतीय नागरिक

भारतवर्ष के सबसे बड़े चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन अब खाड़ी देश क़तर के नागरिक होंगें. उन्हें क़तर की नागरिकता की पेशकश की गई है. चूंकि भारत में दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है लिहाज़ा अब हुसैन शायद आने वाले दिनों में ओवरसीज़ इंडियन सिटीज़न के रूप में अपना नामांकन चाहें तो करा लें वरना वो अब तो शायद क़तर के नागरिक होंगे ही.

2010 की शुरूआत में कला संस्कृति की भारतीय परंपरा के लिए ये एक सदमे वाली स्थिति है. द हिंदू अख़बार में हुसैन के भेजे एक संदेश से हुसैन के प्रशंसक और कला प्रेमी और संस्कृतिकर्मी स्तब्ध हैं कि भारत देश ने अपने एक सपूत को इस तरह गंवा दिया. ये एक अजीब संयोग है कि जब देश क्रिकेट के महान सितारे सचिन तेंदुलकर के वनडे में 200 रन का अभूतपूर्व जश्न मना रहा था तो उधर देश से बाहर अघोषित किस्म के निर्वसन में रह रहा देश का सबसे बड़ा पेंटर देश लौटने की एक विकराल छटपटाहट से जूझता हुआ एक दूसरे देश का नागरिक बनने का अनचाहा गौरव हासिल कर रहा था. Read more

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