“मेरे मित्र दिलीप मंडल कुछ ज़्यादा ही दलितवादी हो गए हैं”
March 29, 2010 by राजकिशोर
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मेरे मित्र दिलीप मंडल आजकल कुछ ज्यादा ही दलितवादी हो गए हैं। दलित या दलितवादी का मैं थोड़ा आगे बढ़ कर सम्मान करता हूं। यहां तक कि उनकी आतार्किक बातें भी सुनने के लिए तैयार रहता हूं। गालिब का कहना था, फरियाद की कोई लय नहीं होती। लेकिन सार्वजनिक बहस में कई बातों का खयाल रखना होता है। उदाहरण के लिए, सब भ्रष्ट हैं, यह कहना और भ्रष्ट हुए बिना अब कोई चारा नहीं है और इसलिए हमें भ्रष्टाचार को मान्यता दे देनी चाहिए, यह कहना एक नहीं है। पहली बात का संबंध स्थिति से हैं। दूसरी बात का संबंध स्थिति को मूल्य मान कर चलने की है। जब हम कहते हैं कि भ्रष्टाचार बहुत व्यापक हो गया है, तब हमारा स्वर शिकायत करने का होता है। जब हम कहते हैं कि क, ख और ग भ्रष्ट हैं, इसलिए अगर घ भी भ्रष्टाचार में लिप्त दिखाई पड़ रहा है, तो इसका रोना क्यों, तब हम भ्रष्टाचार की संस्कृति को प्रच्छन्न रूप से भी नहीं, सीधे बढ़ावा देना है। इसका प्रतिवाद करना जरूरी है। Read more
क्रीमी लेयर को क्यों चाहिए महिला आरक्षण
March 11, 2010 by दिलीप मंडल
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आरक्षण की पिछले 20 साल में हुई कोई चर्चा क्रीमी लेयर के बगैर पूरी नहीं हुई है। सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण संबंधी मंडल कमीशन लागू होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के दायरे से क्रीमी लेयर को बाहर करने का फैसला सुनाया। इसी आधार पर 2006 में भी केंद्र की यूपीए सरकार के उच्च शिक्षा संस्थानों में ओबीसी आरक्षण लागू करते समय क्रीमी लेयर को कोटे से बाहर रखा गया। यहां तक कि हाल ही में जब पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य सरकार की नौकरियों में मुसलमानों के लिए 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया तो उसमें भी क्रीमी लेयर को आरक्षण नहीं देने की व्यवस्था की गई। यहां तक कि दलितों और आदिवासियों के आरक्षण में, संविधान और कानून में कहीं प्रावधान न होने के बावजूद, बीच बीच में ये शिगूफा छेड़ा जाता है कि यहां भी क्रीमी लेयर को कोटे से बाहर किया जाए। Read more




