“…तो भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति”

अगर आधे घंटे का एक टेलीविज़न शो सदियों पुरानी संस्कृति को उखाड़ फेंक रहा हो, तो भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति। ऐसी कमज़ोर और बेबुनियाद संस्कृति, जो हज़ारों साल पुरानी होने का दम भरती हो और दुनिया की सबसे मज़बूत तहज़ीब, सबसे सम्मानित समझी जाती हो।

सच का सामना सिर्फ़ भारत ही नहीं कर रहा, यहां जर्मनी में भी हो रहा है. इंडियन लोगों में चर्चा हो रही है और बहस भी। लेकिन ताज्जुब इस बात पर कि जब सात समंदर पार समोसा और बिरयानी को नहीं भुला पाए, जब अरहर की दाल के बिना दिन का खाना पूरा नहीं होता, तो ख़ुद अपने देश में एक बनावटी और नक़ल किया हुआ शो कैसे तहज़ीब पर ख़तरा बन सकता है।

जो लोग इसे अमेरिका के नक़्शे क़दम पर चलने की बात बता रहे हैं, ज़रा एक बार फिर सोचें। आप कहां अमेरिका के पीछे नहीं चलते. क्या पहनावे में नहीं चलते। शर्ट पैंट और टाई में नहीं चलते, बर्गर सैंडविच के साथ नहीं चलते। क्या ये आपकी ज़िन्दगी के अहम हिस्सा नहीं बन गए हैं। क्या आप जिस कंप्यूटर पर अभी पढ़ रहे हैं, उसमें अमेरिका के पीछे पीछे नहीं चल रहे। तो फिर काहे की परेशानी. दो तरह का पैमाना रखने की क्या ज़रूरत। ज़्यादातर लोकप्रिय टीवी शो की तरह सच का सामना भी एक नक़ल है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

और नक़ल होने दीजिए। लोग ख़ुद तय कर लेंगे कि कौन सी नक़ल उनके लिए ठीक है, कौन नहीं। अब तक वे ऐसा ही तो करते आए हैं। उन्हें मौक़ा तो दीजिए। संसद में और यहां वहां हवा बना कर क्यों कन्फ़्यूज़ कर रहे हैं।

पिछले 15 साल में टेलीविज़न चैनलों का इतिहास रहा है, न सिर्फ़ भारत, बल्कि पश्चिमी देशों में भी। जब भी कोई नया रियालटी या गेम शो शुरू होता है, लोगों में दिलचस्पी जगती है और कुछ दिनों बाद बाज़ार मंदा हो जाता है। फिर आता है नया शो, कुछ नए तेवर और विवादों के साथ। फिर कुछ दिन इनके चलते हैं, फिर तीसरे की ज़रूरत पैदा हो जाती है। मिसालें आपके सामने हैं। हू वान्ट्स टू बी मिलेनियर का हिन्दी संस्करण कौन बनेगा करोड़पति जब हिट था,तो था, जब पिटा तो ऐसा कि तीसरी सीरीज़ बनाने की हिम्मत ही नहीं हुई। द वीकेस्ट लिंक पर आधारित कमज़ोर कड़ी कौन भी कभी हिट था, फिर इश्तेहार के लाले पड़ने लगे। ब्रिटेन में कभी आर यू बेटर दैन के फ़िफ़्थ ग्रेडर की तूती बोलती थी, जिसकी नक़ल शाहरुख़ के साथ क्या आप पांचवीं पास से तेज़ हैं। लेकिन फिर यानी ऐसी चीज़ों का आना जाना लगा होता है, हर बार आप दूसरे का नक़ल कर लेते हैं और कभी भी आपकी संस्कृति उनके साथ कहीं और नहीं निकल गई। सो इस बार भी नहीं निकलेगी।

हाल के दिनों में जो रियालटी शो आ रहे हैं, बिग ब्रदर्स से लेकर जंगल तक में रहने का या फिर सच का सामना। हर जगह निजी ज़िन्दगी की उधेड़बुन और गहरे छिपे राज़ सामने आ रहे हैं। बड़ी दिलचस्पी होती है किसी का राज़ जानने में। पड़ोसियों के, अपने साथ काम करने वालों के। फ़लां का अफ़ेयर किससे चल रहा है, फ़लां की बीवी किसके बारे में क्या सोचती है?

एक बात और जो समझ में आती है, भागदौड़ की ज़िन्दगी ने लोगों का बहुत कुछ छीना है। यार दोस्त भी छीन लिया और राज़दार भी। अब अपनी बात बताने को पेट में कुलबुली होती है लेकिन कोई ऐसा मिलता नहीं। बीवी को बता दिया तो तलाक़ की नौबत आ सकती है। ऐसे में दसेक साल पहले एक आभासी दोस्त मिला था। इंटरनेट. चैट पर किसी को दोस्त बनाती और घंटों बतियाती, दिल का हर राज़ बताती एक पूरी पीढ़ी जवान हो गई। लेकिन कमी तो खलती है न। वह आभासी शख़्स कौन है? कैसा दिखता है? कोई गारंटी नहीं। दिल का राज़ बता रहे हैं सैन फ्रांसिस्को की किसी 21 साला सारा पार्कर को और यह बात हमें पता भी न लग पाई कि वह राज़ जा रहा था नोएडा के किसी 37 साल के गौरव के पास, जो सारा बन कर मज़े ले रहा था।

तो वर्चुअल यानी आभासी दुनिया से निकल कर रीयल लाइफ़ में खेलना ज़रा दूसरी अनुभूति देता है। लोगों के राज़ जब पता लगते हैं तो मज़ा आता है। और ऐसे लोग ज़रा जाने पहचाने हों तब तो और मज़ा आता है। खाने में तड़का लग जाता है। ऐसे रियालटी शो में पूरे फ़ेमस लोग तो नहीं आते। उनके पास काम ज़रा ज़्यादा रहता है, तो इनकी कोशिश होती है फ़्लॉप हीरोज़ को साथ लाने की। शिल्पा शेट्टी जब बॉलीवुड के लिए बेगानी हो चलीं, तो उन्हें बिग ब्रदर्स में मौक़ा दिया गया। राहुल महाजन और मोनिका बेदी को इंडियन बिग ब्रदर्स में और विनोद कांबली सरीखे लोगों को सच का सामना में। ज़ाहिर है यह मौक़ा उन्हें एक बार फिर चर्चा में ले आता है।

तरीक़ा बहुत आसान है। जैसे आप बच्चों को सिखाते हैं कि भला क्या है, बुरा क्या। फिर भी कुछ बच्चे शराब पीने लग ही जाते हैं, कुछ सिगरेट पर रुक जाते हैं और कुछ ड्रग्स तक पहुंच जाते हैं। और ऐसी रिवायत हर जगह है। वेस्टर्न देशों में भी आपको ख़ूब टी-टोटलर मिलेंगे। कॉफ़ी तक से परहेज़ करने वाले मिल जाएंगे। कहेंगे कि अगर दो कप कॉफी पी ली तो रात को नींद नहीं आएगी। वैसे ही सच का सामना देखने वालों को भी ख़ुद ही फ़ैसला कर लेने दीजिए। क्या परेशानी है? वीर सांघवी अगर कहते हैं कि वह रिमोट का इस्तेमाल करेंगे तो ऐसा और लोग भी कर सकते हैं। अगर वाक़ई शो संस्कृति को मार रही हो तो फिर संस्कृति ही इसे मार देगी। भारत की संस्कृति कोई जुमा जुमा आठ दिन की संस्कृति तो है नहीं। आप शो का टीआरपी ज़ीरो पहुंचा दीजिए, फिर ख़ुद ब ख़ुद दुकान बंद करनी होगी।

और जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, ज़रा एक बार यह भी सोचिए कि क्या आप इसका विरोध कर रहे हैं या इसका प्रचार। जिस चीज़ की जितनी ज़्यादा चर्चा होगी, उस चीज़ को लेकर लोगों की दिलचस्पी उतनी ज़्यादा होगी। तो आप इसका विरोध करके दरअसल आप शो वालों को फ़ायदा ही पहुंचा रहे हैं।

जर्मनी के बॉन से वरिष्ठ पत्रकार अनवर जमाल अशरफ़

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लूटपाट, क़त्ल और व्यभिचार के लिए एकजुट हों !

लेखक: Samrendra  |  July 27, 2009  |  बड़ी ख़बर, हक़ की आवाज़   |   4 Comments

“सच का सामना” के बचाव में कई महारथी मैदान में उतर आए हैं। वीर सांघवी का कहना है कि अगर आपको रिएल्टी टीवी पसंद नहीं तो अपना मत रिमोट से जाहिर कीजिए। चैनल बदल दीजिए। वो भी ऐसा करते हैं इसलिए भारत के तमाम दर्शकों से उनकी अपील है कि वो भी ऐसा ही करें। वीर सांघवी के मुताबिक सच का सामना या फिर ऐसे किसी भी कार्यक्रम को बंद करना सेंसरशिप को बढ़ावा देना है। वो ऐसी किसी भी सेंसरशिप के पक्ष में नहीं।

मीडिया से जुड़ी चर्चित वेबसाइट “एक्सचेंज फॉर मीडिया” पर एक लेख छपा। चार दिन पहले। कोई प्रद्युमन महेश्वरी हैं। मीडिया के बड़े जानकार मालूम होते हैं। उन्होंने सरकार से कहा है कि वो टीवी चैनलों को उनके हाल पर छोड़ दें। वो “सच का सामना” के समर्थन में यहां तक कह देते हैं कि नेताओं की कई हरकतें ऐसी होती हैं जिनसे बच्चों पर बुरा असर पड़ता है। तो क्या उन पर भी पाबंदी लगा दी जाए। यह भी कहते हैं कि सभी चैनलों को इस कार्यक्रम के समर्थन में एकजुट हो जाना चाहिए। Read more

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टाइम का टाइम ख़राब, इकोनमिस्ट की बढ़ी इनकम

ऐतिहासिक मंदी ने दुनिया भर के मीडिया संस्थानों की हालत ख़राब कर दी है। विस्तार की योजनाएं ठप पड़ी हैं। कई बड़ी कंपनियों पर कर्ज का बोझ बेतहाशा बढ़ गया है। बहुत से अख़बार बंद हो चुके हैं। वेबसाइट भी घाटे में हैं। लेकिन इन सब निराशाजनक ख़बरों के बीच द इकोनमिस्ट ने मुनाफा कमाया है। क्यों और कैसे – ये बता रहे हैं बॉन से ओंकार सिंह जनोटी। ओंकार एक ऐसे उभरते हुए पत्रकार हैं जिनमें असीम ऊर्जा है और व्यापक समझ भी। वो इन दिनों जर्मनी के डॉयचे वेले को अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

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सबसे पहले तो बंद करो “सच का सामना”

लेखक: Samrendra  |  July 25, 2009  |  बड़ी ख़बर, हक़ की आवाज़   |   3 Comments

“सच का सामना” बंद होना चाहिए या नहीं – इस पर बहस तेज़ हो रही है। वैसे ऐसे कार्यक्रमों में कोई बुराई नहीं। लेकिन क्या सच में हमारा समाज ऐसे किसी भी सच का सामना करने के लिए तैयार है? शुरुआती कुछ खुलासों से ऐसा नहीं लगता। आप सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली को ही लीजिए। विनोद कांबली ने इस कार्यक्रम के दौरान कह दिया कि सचिन ने उनकी उतनी मदद नहीं की। चाहते तो कर सकते थे। लेकिन नहीं की। बाद में इसका खंडन किया। लगभग गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में कहा कि उनकी मंशा ऐसा नहीं थी। लेकिन लोग कांबली की सफ़ाई कबूल करें भी तो कैसे? उन्होंने टीवी पर कांबली को खुद इस सच से पर्दा उठाते देखा। सचिन से रिश्तों में दूरी बढ़ गई। दोनों दोस्त अब दूर हो गए। Read more

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सोच-समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

लेखक: कबीर  |  July 25, 2009  |  बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट   |   4 Comments

अविनाश ने जो बातें कही हैं , उनमें बहुत दम है। और इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि “अश्लीलता कोई राजनीतिक या सामाजिक (या यहां तक कि निजी) विचारधारा नहीं है। यह हमारी सभ्‍यता की वो सरहद है, जहां कब दीवार खड़ी कर दी गयी, हमें पता ही नहीं चला”। लेकिन अश्लीलता परिभाषित नहीं की जा सके – ऐसा भी नहीं है। इसकी परिभाषा है। ये परिभाषा बहुत हद तक सब्जेक्टिव है। मतलब हमारे समाज में जो अश्लील है, यूरोप के लिए वो श्लील हो सकती है। यूरोप के अलग-अलग देशों में भी ये परिभाषा बदल सकती है। ये भी मुमकिन है कि यूरोप में जो अश्लील मानी जाए जापान में उसे लोग यूं ही नज़रअंदाज कर दें। हर देश के कानून में वहां के सामाजिक परिदृष्य को रख कर अश्लीलता की परिभाषा गढ़ी गई है। Read more

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सुपरहिट एक लाख क्लब में जनतंत्र की दस्तक

लेखक: Samrendra  |  July 24, 2009  |  बड़ी ख़बर   |   2 Comments

जनतंत्र मजबूत हो रहा है। रफ़्तार बहुत तेज नहीं है लेकिन बहुत धीमी भी नहीं। दो महीने में जनतंत्र ने साइबर स्पेस में 40 लाख वेबसाइटों को पीछे छोड़ दिया है। करीब तीन महीने पहले हमने जब ये वेबसाइट शुरू की तो एलेक्सा पर इसकी रैंकिंग नहीं आती थी। कुछ दिन बाद एलेक्सा पर इसकी रैंकिंग 46 लाख थी। लेकिन आज जनतंत्र का तीन महीने का औसत 6 लाख है। एक महीने का तीन लाख। बीते एक हफ़्ते का पौने दो लाख। और बुधवार को जनतंत्र सुपरहिट एक लाख क्लब में भी शामिल हो गया था। इससे कहा जा सकता है कि बिना कोई शोर मचाए जनतंत्र के कदम धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं।

ये अभी शुरुआत है।
अगले कुछ हफ़्तों में हम जनतंत्र का विस्तार करने जा रहे हैं। आप इसमें कई नए फीचर देखिएगा। इसे ज़्यादा से ज़्यादा इंटरेक्टिव बनाने की कोशिश की जा रही है। साथ ही एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश भी, जिससे जनतंत्र के पाठकों को मीडिया संसार के बारे में कुछ उपयोगी जानकारी भी मिल सके।

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खजुराहो क्‍या हमारे पर्यटन उद्योग का अश्‍लील पैकेज है?

जनतंत्र पर साथी कबीर ने दो दिन पहले एक लेख लिखानवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर की वेबसाइट पर ख़बरों के रूप में अश्लील साहित्य परोसने का आरोप लगाते हुए कबीर ने सविता भाभी की तरह उन पर प्रतिबंध लगाने का मांग की। आज वरिष्ठ पत्रकार अविनाश ने कबीर के लेख का जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि ये मांग बेतुकी है। साइबर स्पेस में हर किसी का अपना कोना है। दूसरे का कोना छेकने का हक़ किसी को नहीं होना चाहिए। कानून को भी नहीं। आप उनका लेख पढ़िए और उतनी ही बेबाकी से अपनी राय रखिए जितनी बेबाकी से अविनाश ने लिखा है।

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साहित्य की दुनिया इतनी ही गंदी है दोस्तों

लेखक: कबीर  |  July 23, 2009  |  बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट   |   6 Comments

मैंने ज़िंदगी में डायरी छोड़ कर कुछ नहीं लिखा (सिवाए जनतंत्र पर एक लेख के)। कभी कभार दोस्तों को ई-मेल भेज देता हूं। लेकिन मैं एक अच्छा पाठक जरूर हूं। इसलिए साहित्य की ज़्यादातर बहसों से वाकिफ़ हूं। चाहे वो प्रेमचंद को जातिवादी ठहराने की कोशिश हो या फिर उदय प्रकाश को लेकर चल रहा ताज़ा विवाद। मेरा इस विवाद से कोई नाता नहीं, लेकिन एक जागरुक पाठक होने के नाते मुझे भी अपनी बात कहने का हक़ है। इसी हक़ का इस्तेमाल करते हुए मैं भी अपनी बात कहूंगा। खुल कर कहूंगा। Read more

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“सविता भाभी” की तरह इन पर भी लगे प्रतिबंध

लेखक: कबीर  |  July 21, 2009  |  बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट   |   5 Comments

सविता भाभी। जी हां… हाल ही में सविता भाभी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ये एक पोर्न कार्टून साइट है, जिसके चरित्र का नाम है सविता भाभी। कुछ ही दिन में ये वेबसाइट भारत में काफी लोकप्रिय हो गई थी। इतनी कि दुनिया के सबसे अधिक “नैतिक राष्ट्र” में नैतिकता का सवाल उठ खड़ा हुआ। इंटरनेट पर ऐसी हज़ारों पोर्न वेबसाइट भारत में धड़ल्ले से खुलती हैं। साइबर कैफे में लोग घंटों ऐसी वेबसाइटों पर चिपके रहते हैं। लेकिन नैतिकता का सवाल सिर्फ़ और सिर्फ़ सविता भाभी नाम की साइट पर उठा। सरकार भी तुरंत हरकत में आई और उसने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। अब ये साइट भारत में नहीं खुलती है। Read more

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सिर्फ़ गायिका नहीं… एक वीरांगना थीं गंगूबाई

लेखक: गिरिजेश  |  July 21, 2009  |  ब्लॉग, बड़ी ख़बर   |   3 Comments

गिरिजेश, वरिष्ठ पत्रकार

गिरिजेश, वरिष्ठ पत्रकार


गंगूबाई नहीं रहीं! कौन गंगूबाई? गंगूबाई हंगल। अच्छा, ये शास्त्रीय गायिका थीं ना?
हां। …नहीं। गंगूबाई का परिचय सिर्फ इतना नहीं है। गंगूबाई भारतीय संगीत के इतिहास की एक क्रांतिकारी, एक वीरांगना का नाम है। ज़रा सोचिए, 1913 में पैदा हुई थीं। लड़की थीं। कर्नाटक के कट्टर जातिवादी समाज में एक देवदासी परिवार में जन्म। जिस दौर में शास्त्रीय गायकी में मर्दों का दबदबा था, औरतों पर हज़ार तरह के पहरे थे, उस दौर में उन्होने गाना गाने की हिम्मत की। Read more

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