क्या सच में एनडीटीवी के प्रमोटर बेचेंगे हिस्सेदारी?

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  August 14, 2009  |  पहरेदार, बड़ी ख़बर   |   Comments Off

अगर ये खबर सच निकली तो कुछ दिनों बाद मीडिया सेक्टर की चंद बड़ी कंपनियों में से एक एनडीटीवी के प्रमोटर अपनी कंपनी के 50 फीसदी से कम के मालिक रह जाएंगे। अभी एनडीटीवी का स्टेकहोल्डिंग पैटर्न देखें तो प्रमोटर ग्रुप की कंपनी में हिस्सेदारी-63.1 फीसदी है। विदेशी संस्थाओं की हिस्सेदारी 22.8 फीसदी और पब्लिक की हिस्सेदारी 7.8 फीसदी है। अब पढ़िए वो खबर जो बुधवार को इकनॉमिक टाइम्स के पेज 8 पर “हर्ड ऑन द स्ट्रीट” कॉलम में छपी है। ये ख़बर इकनॉमिक टाइम्स की वेबसाइट पर भी मौजूद है। खबर का शब्दश: अनुवाद करने की कोशिश की गई है। Read more

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राज्यसभा की रेस में हैं कई दिग्गज पत्रकार!

राज्यसभा से बीते हफ़्ते मनोनीत सदस्यों की विदाई हो गई। विदा होने वालों में चंदन मित्रा भी रहे। राज्यसभा से जिस दिन विदाई हुई बताया जाता है कि चंदन मित्रा भावुक हो गए। सत्ता और भावुकता के बीच रिश्ता ही कुछ ऐसा है। जो कोई भी सत्ता से जाता है वो भावुक हो जाता है। लेकिन यहां मुद्दा भावुकता का नहीं है। मुद्दा है कि फिर से कुछ नामी गिरामी चेहरे राज्यसभा के लिए मनोनीत होने वाले हैं। चंदन मित्रा के जाने से जो स्थान खाली हुआ है उसे भरने के लिए कई बड़े पत्रकारों के नाम चर्चा में हैं। सत्ता के गलियारों से छन छन कर जो ख़बर आ रही है, उसके मुताबिक शेखर गुप्ता, आलोक मेहता, वीर सांघवी, विनोद मेहता , पंकज वोहरा और मृणाल पांडे राज्यसभा की रेस में हैं। Read more

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ख़बर बनाने के लिए टीवी एंकर ने कराए पांच क़त्ल!

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  August 12, 2009  |  देश-दुनिया, बड़ी ख़बर   |   Comments Off

ब्राजील में पुलिस ने एक टीवी एंकर पर कार्यक्रम की रेटिंग बढ़ाने के लिए और ड्रग्स तस्करी के धंधे में फायदे के लिए कई लोगों की हत्या कराने का आरोप लगाया है। इस टीवी एंकर का नाम है वालास सूजा। वालास सूजा कुछ समय के लिए पुलिस में भी काम कर चुके हैं और इस वक़्त टीवी एंकरिंग के साथ सियासत भी कर रहे हैं। वो अभी ब्राजील के अमेजोनास प्रांत के एक इलाके के प्रतिनिधि हैं। Read more

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स्वाइन फ्लू से सरकार के बचाव में जुटा “हिंदुस्तान”

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  August 12, 2009  |  पहरेदार, बड़ी ख़बर   |   Comments Off

हिंदुस्तान में हर रोज फ्रंट पेज पर दो टूक छपता है। पहले पन्ने पर संपादकीय देने का ये तरीका हिंदुस्तान ने शुरू किया है। कई बार उसमें बहुत ही बेतुकी बातें लिखी होती हैं। बिना सिर पैर की बातें। उनका सिर्फ़ एक ही मक़सद होता है कि किसी भी तरह से सरकार का बचाव किया जाए। मेट्रो हादसा हो, एनसीआर में बढ़ते अपराध हों या फिर कोई ऐसा मामला जिसमें सरकार घिरती नज़र आती है तो दो टूक में उसका समर्थन किया जाता है।

अभी स्वाइन फ्लू पर सरकार घिरी है। स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद बेतुके बयानों से उसकी फजीहत हो रही है। हिंदुस्तान को भी चाहिए कि उसके लिए सरकार को आड़े हाथों ले, लेकिन हिंदुस्तान में जनहित की पत्रकारिता को ताक पर रख कर सरकार का बचाव किया जा रहा है। आगे बढ़ने से पहले आप दो दिन के दो टूक पढ़िए। Read more

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प्रभात ख़बर, हरिवंश और उनका नीतीश प्रेम

लेखक: कबीर  |  August 11, 2009  |  बड़ी ख़बर, हक़ की आवाज़   |   5 Comments

अगर एक अखबार किसी भी सरकारी नीति के खिलाफ आयोजित विरोध प्रदर्शन के प्रति इस हद तक आक्रामक हो जाए कि समाज से इसके विरुद्ध खड़ा होने का आह्वान करने लगे, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसके इस पक्ष के निहितार्थ क्या होंगे और एक अखबार जब खुलेआम एक पक्ष बन जाता है तो कितना बुरा हो सकता है। राजू रंजन जी ने अपने लेख में इस मसले पर काफी कुछ कह दिया है और वे ठीक कहते हैं कि दूसरों की अयोग्यता पर अंगुली उठाने वालों को पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। Read more

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कोई अख़बार जवाब भी नहीं देता, बेशर्मी की हद है!

सियासतदानों और नौकरशाहों की बेशर्मी तो हमने और आपने बहुत देखी है। संसद से सड़क तक उनकी बेशर्मी के उदाहरण मिल जाएंगे। लेकिन अब मीडिया भी बेशर्मों की इस जमात में शामिल हो गया है। जनसत्ता में इस बार वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने मीडिया की इसी बेशर्मी से पर्दा उठाया है। उन्होंने कहा है कि चुनाव के दौरान ख़बरों का सौदा करने वाले अख़बार अपने अपराधों पर कोई बहस भी नहीं करना चाहते। प्रभाष जी ने अख़बारों की आलोचना के साथ साइबर स्पेस पर सक्रिय पत्रकारों की तारीफ़ भी की है। उन सभी से प्रभाष जी की अपील है कि वो इस बहस को ज़िंदा रखें। बहस जारी रही तो नए रास्ते भी खुलेंगे। जनसत्ता से साभार हम प्रभाष जोशी जी का ये लेख आपके बीच रख रहे हैं। आप भी पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए।

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… ताकि लक्ष्मण रेखा के भीतर रहें न्यूज़ चैनल

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  August 10, 2009  |  देश-दुनिया, बड़ी ख़बर   |   Comments Off


केरल के पलक्कड में प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष जस्टिस जी एन रे ने कहा है कि इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की समीक्षा के लिए एक मीडिया आयोग का गठन ज़रूरी हो गया है। मुंबई में हुए आतंकी हमलों के दौरान न्यूज चैनलों की कवरेज का हवाला देकर जस्टिस जी एन रे ने कहा कि ये सुनिश्चित करना चाहिए कि न्यूज चैनल लक्ष्मण रेखा पार नहीं करें। उन्होंने कहा कि सरकार चाहे तो ख़बरिया चैनलों को भी प्रेस काउंसिल के दायरे में ला सकती है। Read more

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“आपसे आग्रह है कि ये बहस यहीं बंद कर दें”

दैनिक जागरण के वरिष्ठ फोटोग्राफर अजीत कुमार ने जनतंत्र को एक चिट्ठी भेजी है। इस चिट्ठी में भोले शंकर की तरह उन्होंने विष का प्याला पीते हुए कबूल किया है कि प्रकाश कुमार का फोटो उन्होंने ही जानबूझ कर ब्लर किया था और इसके लिए दैनिक जागरण के संपादक शैलेंद्र दीक्षित और ब्यूरो चीफ सुभाष पांडे को दोष देना सही नहीं है। उन्होंने ऐसा क्यों किया, इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं। उन तर्कों से आप सहमत हो सकते हैं और असहमत भी। लेकिन हम उनके इस साहस का सम्मान करते हुए दैनिक जागरण के फोटो प्रकरण पर चली बहस को यहीं रोकना चाहते हैं। वैसे भी इस बहस में अब कुछ बचा नहीं है। बातचीत मुद्दे से भटक कर निजी आरोप-प्रत्यारोप की तरफ मुड़ चुकी है। इसलिए हम अजीत कुमार की इस स्वीकारोक्ति को आपने सामने रख रहे हैं… इस उम्मीद में कि आप भी इस बहस को यहीं ख़त्म समझेंगे और मामले को ज़्यादा तूल नहीं देंगे। Read more

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चुप्पी टूटेगी और टूटेंगे मीडिया के सभी मठ

लेखक: Samrendra  |  August 9, 2009  |  बड़ी ख़बर, हक़ की आवाज़   |   7 Comments

किसी भी अख़बार को उठाइए और तमाम ख़बरों को पढ़िए। संपादकीय पृष्ठ पर मौजूद लेखों को भी पढ़िए। आप पाएंगे कि अख़बारों में आमतौर पर किसी शख़्स की आलोचना होती और किसी की तारीफ़। वो शख़्स कोई भी हो सकता है। मंत्री, नेता, अधिकारी, अभिनेता या फिर कारोबारी… कोई भी हो सकता है। आलोचना सभी की होती है। सवाल सभी पर खड़े किए जाते हैं। किसी न किसी मुद्दे पर और किसी न किसी वक़्त पर। यहां सवाल उठता है कि आखिर दूसरों की आलोचना करने वाले पत्रकारों का खुद की आलोचना को लेकर क्या रवैया रहता है? Read more

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इंटरनेट पर भी ख़बरों के लिए चुकाने पड़ेंगे पैसे!

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  August 8, 2009  |  देश-दुनिया, बड़ी ख़बर   |   Comments Off

पैसा दो, ख़बर लो

फाइनेंशियल टाइम्स ने एलान किया है कि उसकी वेबसाइट पर अगले साल की गर्मियों तक पे-पर-व्यू (हर ख़बर के लिए कीमत) की योजना पूरी तरह से लागू हो जाएगी। कंपनी के मुताबिक इस पर विचार किया जा रहा है कि क्या ग्राहकों को कोई भी कंटेंट मुफ़्त दिया जाए या नहीं। अभी फाइनेंशियल टाइम्स के रजिस्टर्ड यूजर हर महीने 20 ख़बरों को मुफ़्त में हासिल कर सकते हैं। ऐसे रजिस्टर्ड यूजर्स की संख्या करीब 14 लाख है। अगर कोई बीस ख़बरों से अधिक जानकारी चाहता है तो उसके लिए उसे पैसे चुकाने पड़ते हैं। अभी अख़बार पर दो दरें लागू हैं। सालाना 150 डॉलर और 199 डॉलर। 199 डॉलर चुकाने वाले ग्राहकों को कुछ ऐसी एक्सक्लूसिव जानकारियां दी जाती हैं जो उनका निवेश और कारोबार बढ़ा सकें। Read more

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