मुस्लिम विवाह में हिन्दुस्तान इतना दकियानूस क्यों है?

लेखक: राजकिशोर  |  April 10, 2010  |  बड़ी ख़बर   |   2 Comments

एक पुरानी कहावत है, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। शोएब मलिक और सानिया मिर्जा की होनेवाली शादी में एक नहीं, कई अब्दुल्ला दीवाना हैं। शादी दो व्यक्तियों का व्यक्तिगत मामला है। परदे में छिपी आयशा सिद्दीकी नामक एक महिला का दावा है कि इस मामले से मेरा भी ताल्लुक है, क्योंकि शोएब मेरा शौहर है। हो सकता है, हो। यह जानने में हमारी क्या दिलचस्पी हो सकती है कि इस दंपति के बीच सक्रिय संबंध रहे हैं या नहीं और नहीं रहे हैं तो क्यों। हम यह भी नहीं जानना चाहते कि आयशा अपने शौहर से खुश नहीं थी, तो उसने यह नटखट धागा काट कर अपनी जिंदगी फिर से बसाने की क्यों नहीं सोची। शोएब के व्यवहार और बातों से लगता है कि वह खुशी-खुशी आयशा को तलाक दे देता। उसके अनुसार, यह शादी उसने की जरूर थी, लेकिन इसमें उसके साथ जबरदस्त फरेब हुआ था। ताज्जुब की बात है कि वह इतने दिनों से इस फरेब के साथ रह रहा था। उसने अपनी और से कोई कोशिश नहीं की कि इस जालबट्टे से बाहर निकल आए। मामला सचमुच दिलचस्प है। कोई नहीं जानता कि ऊंट किस करवट बैठेगा। Read more

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सहारा इंडिया टीवी नेटवर्क की तरफ से जनतंत्र को नोटिस

सहारा इंडिया टीवी नेटवर्क ने जनतंत्र को कानूनी नोटिस भेजा है। मानहानि का ये नोटिस 19 अगस्त को सहारा से जुड़ी ख़बरें प्रकाशित करने पर भेजा गया है। नोटिस के मुताबिक सहारा को जनतंत्र पर छपी ख़बरों से धक्का लगा है और हैरानी हुई है। जनतंत्र पर कंपनी से जुड़ी कुल चार ख़बरें छापी गई थीं, जिनमें से तीन का ज़िक्र नोटिस में है। पहली खबर है, “सहारा में सुनामी, 48 कर्मचारियों से मांगा गया इस्तीफ़ा“। दूसरी, “सहारा के कर्मचारी नहीं करेंगे सरेंडर” और तीसरी ख़बर, “कर्मचारियों को टॉप मैनेजमेंट ने दिया फिलहाल “सहारा”।”  नोटिस में हमारी ख़बरों को ग़लत बताया गया है। लेकिन हमें जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक हाल में सहारा के कई कर्मचारियों से वाकई इस्तीफा लिया गया है और कई कर्मचारियों का तबादला किया गया है। तबादला उन्हीं कर्मचारियों का हुआ है… जिनका जनतंत्र में नाम छपा था। और उन्हीं ब्यूरो से हुआ है जिनका जनतंत्र में ज़िक्र हुआ था। क्या ये ख़बर के ग़लत होने का संकेत है? अगर कर्मचारियों से इस्तीफ़ा मांगने की ख़बर गलत है तो फिर सहारा के कर्मचारी दूसरी नौकरी मिले बगैर इस्तीफ़ा क्यों दे रहे हैं? क्या वो सभी अचानक इतने अमीर हो गए हैं कि उन्हें नौकरी की ज़रूरत नहीं रही?


सहारा में मची है भगदड़


सहारा समय से इन दिनों बुरी ख़बरें ही आ रही हैं। एक के बाद एक लोग इस्तीफा दे रहे हैं। कुछ दिन पहले मीडिया में ख़बर आई कि सहारा में प्रबंधन ने 48 कर्मचारियों से इस्तीफा मांगा है। सूत्रों के मुताबिक कर्मचारियों ने उसका विरोध किया। अपनी बात रखने के लिए वो लखनऊ भी गए। लखनऊ से छन कर जो ख़बरें आईं उसके मुताबिक टॉप मैनेजमेंट ने कर्मचारियों के हितों का ख्याल रखने का वादा किया और उन सभी को समझा-बुझा कर वापस भेज दिया। लेकिन एक दिन बाद स्थिति बदल गई। वो रिपोर्टिंग के लिए दफ़्तर पहुंचे तो उन्हें बता दिया गया कि मंगलवार (25 अगस्त) तक इंतज़ार …
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नोटिस में इस बात पर एतराज़ किया गया है कि जनतंत्र की रिपोर्ट ने इस सबके पीछे एक “खेल” होने का आरोप लगाया है और इस खेल में सहारा के उच्च अधिकारियों सीईओ सुमित रॉय, मध्य प्रदेश चैनल के हेड राजेश कुमार और बिहार चैनल के हेड संजय मिश्रा के शामिल होने की बात कही गई है। सवाल ये है कि क्या बिना किसी खेल के इतनी बड़ी तादाद में कर्मचारियों की नौकरी ख़तरे में पड़ गई है? अगर कंपनी मंदी के चलते कर्मचारियों की छंटनी करना चाहती है, तो उसका भी एक वाजिब तरीका होना चाहिए। अगर मंदी होगी तो उसका असर हर जगह नज़र आना चाहिए। लेकिन हाल के दिनों में देखा गया है कि मंदी में अधिकारी तो मस्त रहते हैं और निचले पायदान पर तैनात कर्मचारियों पर गाज़ गिरती है। ये खेल नहीं है तो क्या है? सहारा पर जनतंत्र की रिपोर्ट में बताया गया था कि कंपनी ने सीईओ के लिए हाल के दिनों में दो महंगी गाड़ियां खरीदी हैं। मर्सडीज और फोर्ड एनडेवर। यही नहीं सभी चैनल हेड्स के लिए मारुति डिजायर भी खरीदी गई है। ब्लैक बेरी फोन दिये गए हैं। इन सब पर जितने पैसे खर्च हुए होंगे, उसके बहुत से कर्मचारियों को साल भर तक तनख्वाह दी जा सकती थी। कंपनी की ओर से मिले नोटिस में इन तथ्यों को कहीं भी चुनौती नहीं दी गई है। मंदी से जूझ रही एक कंपनी लक्ज़री पर खर्च करती है और कर्मचारियों की छंटनी करती है .. ये खेल नहीं तो क्या है? किसी भी कंपनी को मंदी से उबारने के लिए खर्चों में कटौती करने की ज़िम्मेदारी किनकी होती है? कंपनी के बड़े अधिकारियों की ही ना! लेकिन जब ऐसे अधिकारी खुद ही अपनी सुविधाओं पर पैसे लुटाएं और कर्मचारियों की नौकरियां ख़तरे में पड़ जाएं, तो इसे क्या कहेंगे? Read more

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पत्रकारिता ने जातीयता बढ़ाई है कम नहीं की है: एसपी सिंह

पत्रकारिता के शोधार्थी और अब दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक डॉक्टर श्योराज सिंह बेचैन ने रुहेलखंड विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के दौरान एक प्रश्नावली कई पत्रकारों को भेजी थी। ये लगभग 13 साल पुरानी बात होगी। इस शोध के गाइड कवि-पत्रकार डॉक्टर वीरेन कुमार डंगवाल थे। आप पढ़िए सुरेंद्र प्रताप सिंह का साक्षात्कार, बिना किसी काट-छांट के। ये साक्षात्कार उस दौर का है जब एसपी ‘आज तक’ पहुंच चुके थे:
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वीओआई में हड़ताल जारी, मैनेजमेंट पर धमकाने का आरोप

हड़ताल का चौथा दिन

वॉयस ऑफ इंडिया में कर्मचारियों की हड़ताल का चौथा दिन है। वहां लोग अब भी धरने पर बैठे हुए हैं और अपने जायज हक़ की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि मैनेजमेंट ने अभी तक उनकी मांगों पर अमल नहीं किया है। जून की तनख्वाह भी सभी कर्मचारियों को नहीं दी गई है। धरने पर बैठे कर्मचारियों का यह भी कहना है कि “जो भी यह कह रहे हैं कि समझौता हो गया है वो झूठ बोल रहे हैं और मैनेजमेंट के हाथों में खेल रहे हैं।”

वीओआई त्रिवेणी ग्रुप का चैनल है और पिछले शुक्रवार से वहां पर हड़ताल चल रही है। वहां कर्मचारियों को मई के बाद से तनख्वाह नहीं मिली थी। सैकड़ों की संख्या में लोग सिर्फ़ उम्मीद के सहारे काम में जुटे थे। लेकिन शुक्रवार को वो उम्मीद की डोर खुद मैनेजमेंट के लोगों ने तोड़ दी। सूत्रों के मुताबिक जब कुछ कर्मचारियों ने नए सीईओ अमित सिन्हा से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि वो मुंबई में हैं और अभी उनकी मदद करने की स्थिति में नहीं हैं। गौरतलब है कि त्रिवेणी ग्रुप ने जून में अमित सिन्हा को कंपनी का सीईओ और डायरेक्टर नियुक्त किया था। Read more

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प्रेस क्लब से पुष्पेंद्र की विदाई, बालाचंद्रन को कमान

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  August 23, 2009  |  देश-दुनिया, बड़ी ख़बर   |   Comments Off

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की मैनेजमेंट कमेटी भंग कर दी गई है। शनिवार को ईजीएम में दो सौ से ज़्यादा सदस्यों ने सेक्रेटरी जनरल पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ और अध्यक्ष परवेज अहमद के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित कर दिया। इस प्रस्ताव के मुताबिक मौजूदा कमेटी को तत्काल प्रभाव से भंग करते हुए चुनाव तक पी पी बालाचंद्रन की अगुवाई में सात सदस्यों की अंतरिम कमेटी का गठन कर दिया गया है।

प्रेस क्लब में अगले एक-दो महीने में चुनाव होने हैं। लेकिन उससे पहले ही क्लब के सेक्रेटरी जनरल पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ पर घोटाले के आरोप लग गए। उन आरोपों के बाद आपात ईजीएम बुलाई गई। उस ईजीएम में क्लब के ट्रेजरार नदीम अहमद काजमी ने आरोप पत्र पढ़ा। उन्होंने बताया कि पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने मैनेजमेंट कमेटी की मंजूरी के बगैर बैंक में एक गोपनीय खाता खुलवाया और उस खाते से लेन-देन किया। इसके अलावा क्लब में कच्ची पर्चियों पर कई बड़े भुगतान किए गए। नियमों के ख़िलाफ़ पांच हज़ार रुपये से अधिक का कैश पेमेंट किया गया। Read more

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सहारा में सुनामी, 48 कर्मचारियों से मांगा इस्तीफ़ा

सहारा के लोग अब बेसहारा हो रहे हैं। उन्हें बेसहारा कोई और नहीं बल्कि उनकी ही कंपनी कर रही है। ताज़ा ख़बर के मुताबिक मंगलवार को 48 रिपोर्टरों, कैमरामैनों और टेक्नीशियनों से मैनेजमेंट ने इस्तीफ़ा मांगा। ज़्यादातर कर्मचारियों ने मैनेजमेंट के इस आदेश को मानने से इनकार किया जिसके बाद बात इतनी बढ़ी कि रात आठ बजे उन सभी को गेस्टहाउस खाली करने का हुक्म दे दिया गया।

नाम नहीं छापने की शर्त पर सहारा के एक कर्मचारी ने इस पूरे मामले का ब्योरा दिया। बताया कि मैनेजमेंट ने उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के स्टाफ रिपोर्टरों और कैमरामैनों को एक बैठक के लिए दिल्ली आने का न्योता दिया। दिल्ली पहुंचने पर उन सभी से कहा गया कि वो तीन महीने की बेसिक तनख्वाह लेकर नौकरी छोड़ दें। Read more

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खबर की राजनीति का दूसरा नाम प्रभात खबर

लेखक: तथागत  |  August 18, 2009  |  बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट   |   2 Comments

मुद्दे प्रभात खबर के लिए जरूरत भर होते हैं। ये अखबार बड़ी पार्टियों के एजेंट की तरह काम करता है। कहा जा सकता है कि छोटी और अल्‍पकालिक पार्टियों की अराजकता के बहाने आक्रामक तेवर अख्तियार कर पाठकों को भरमाने वाले इस अखबार ने मधु कोड़ा के एक खास आदमी विनोद सिन्‍हा के बारे में दो साल पहले बैनर खबर छापी थी। मधु कोड़ा उस वक्‍त मुख्‍यमंत्री थे और और विनोद सिन्‍हा उनके निकट के आदमियों में से एक। विनोद सिन्‍हा को हम राष्‍ट्रीय राजनीति में उभरे अमर सिंह जैसों का झारखंडी संस्‍करण कह सकते हैं। Read more

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सामाजिक “प्रभु” वर्ग की सियासी साजिश

लेखक: रजनीश  |  August 18, 2009  |  बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट   |   1 Comment

इराक युद्ध के दौरान एक शब्द-युग्म खासा चर्चित हुआ था- “इम्बेडेड जर्नलिस्ट।” ये वैसे पत्रकार थे जिन्होंने अमेरिका और उसके मित्र देशों की फौज के साथ जुड़ कर युद्ध की रिपोर्टिंग की थी। इन रिपोर्टरों को अमेरिकी पक्ष के अलावा और कुछ  भी दिखाने की छूट नहीं थी। लिहाजा, युद्ध के दौरान दुनिया ने वही देखा जो अमेरिका ने दिखाना चाहा। और यह सब संभव हुआ इन्हीं “आज्ञाकारी” यानी इम्बेडेड पत्रकारों की बदौलत। ठीक ऐसा ही कुछ हो रहा है आजकल हमारे देश में। यहां हाल के वर्षों में “इम्बेडेड जर्नलिज्म” के चलन ने खासा जोर पकड़ा है। अधिकतर अखबार और चैनल सिर्फ वही दिखा और परोस रहे हैं जो केंद्रीय और स्थानीय स्तर के शासकों को रास आती है। और उसे कार्यरूप वैसे संपादक और पत्रकार दे रहे हैं जिनकी रुचि राज्यसत्ता के करीबी बनने की है। Read more

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न अखबार, न आंदोलन, यह एक छल का उत्‍सव है

लेखक: तथागत  |  August 16, 2009  |  बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट   |   9 Comments

हरिवंश जी हमारे समय के उन आख़िरी संपादकों में से हैं, जिनके साथ सामाजिक आंदोलन की पृष्‍ठभूमि है, विचार का टैग और सफलता के जनपक्षधर मानक हैं। देश के बुद्धिजीवियों के बीच प्रभात खबर की आज जैसी जगह है, उसके पीछे हरिवंश जी का विजन है, उनकी अपनी धार है। 14 अगस्‍त 1984 को शुरू हुआ यह अखबार आज 25 साल का हो गया है। हम कह सकते हैं कि इन 25 सालों में ये झारखंड के लोगों की आवाज़ बना। ऐसी आवाज़ कि बड़ी पूंजी के दो अखबार मिलकर भी उसे खामोश नहीं कर सके। जाहिर है, 25 सालों में बने इस भरोसे और इस आत्‍मविश्‍वास को पाठकों के सामने एक ब्रांड के रूप में पेश करने का यही मौका है। Read more

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यहां “शहाबुद्दीन”, “बजाज” और “ये पत्रकार” एक जैसे हैं!

राज्य (राज) सभा में जाने लायक जितने भी नाम आपने गिनाए हैं, वे सभी शायद एक “मनोनीत” पद के लिए हैं। विडंबना यह है कि इन सबके अलावा भी जो संभावित नाम हो सकते हैं, उनमें से कोई ऐसा नहीं, जो बिना सर्वश्रेष्ठ “भक्ति” साबित किए “राष्ट्रपति” की कृपा पा सकने में सक्षम हों। अपनी क्षमता भर सबने ऐसा किया ही है, या कर रहे हैं। हां, रूप-स्वरूप अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन “यह किए जाने” को हम इस तर्क से जस्टीफाई कर सकते हैं कि अगर हमारे “लोकतंत्र” के साठ से ज्यादा सालों का हासिल यही है कि देश के सबसे “पाक-साफ मंदिर” में जगह पाना है तो तमाम धतकर्मों में अपनी कुशलता दर्शानी होगी, तो वहां जाने की इच्छा रखने वालों का क्या गुनाह…! Read more

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