मीडिया की आधी आबादी का सच
लेखक: जनतंत्र डेस्क | July 10, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
“अंग्रेजी पत्रकार की जिन बातों को हिंदी पत्रकार उसके गुण बताते, उन्हीं बातों को वे अपनी सहकर्मी के चरित्र हनन का औजार बना लेते। मसलन, अंग्रेजी पत्रकार बोले तो तेज-तर्रार और अपनी सहकर्मी बोले तो बदतमीज। अंग्रेजी पत्रकार अपने हकों के लिए लड़े तो जुझारू और हिंदी पत्रकार का आवाज़ उठाना शोशेबाजी। इस तरह की अनेक त्रासदियां महिला पत्रकार को जाने-अनजाने झेलनी पड़ती। महिला पत्रकार के साथ एक कप चाय पीकर धन्य हो जाने वाले साथी उसके प्रमोशन की बात उठते ही बैरी बन जाते हैं।” – वरिष्ठ पत्रकार इरा झा ने अपनी ज़िंदगी के कुछ अनछुए पन्नों को सामने रख कर कई बड़े सवाल उठाए हैं। ये सिर्फ़ उनका सच नहीं बल्कि हिंदी पत्रकारिता से जुड़ी तमाम महिलाओं का है जिन्हें हर रोज मर्दों की बनाई इस दुनिया में अपने हक़ की लड़ाई लड़नी पड़ती है। ये वो सच है जिससे हम और आप नज़रें तो चुरा सकते हैं, लेकिन उसे झुठला नहीं सकते। इरा झा की ये दास्तान सामयिक वार्ता के मीडिया विशेषांक से साभार आपके सामने है… आप पढ़िए और बताइए कि क्या ये सच नहीं है?
प्रणब का बजट और मीडिया की तल्खी
लेखक: जनतंत्र डेस्क | July 7, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
प्रणब मुखर्जी के बजट को मीडिया ने आड़े हाथों लिया है। कुछ अख़बारों ने बड़ी तीखी प्रतिक्रिया दी है। बजट की आलोचना में कुछ पत्रकार तो व्यक्तिगत हो गए हैं। देश के बड़े-बड़े कारोबारी, जिन्हें धंधा करना है, वो बजट की आलोचना संतुलित तरीके से कर रहे हैं लेकिन पत्रकार कुछ ज़्यादा ही इमोशनल हो गए। आगे बढ़ने से पहले एक नज़र कुछ उदाहरणों पर।
दैनिक हिंदुस्तान ((पृष्ट संख्या – एक))
हेडर – बाबू मोशाय का इंद्रजाल
सब हेडर – वित्त मंत्री ने नापा नौ गज, फाड़ा दो गज
इंट्रो – यूपीए सरकार की दूसरी पारी का पहला बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कमाल कर दिया। उन्होंने बंगाल के विश्वप्रसिद्ध जादूगर पी सी सरकार जैसी बाजीगरी दिखाई। चुनावी वादों और सरकार के 100 दिन के अजेंडा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने वोटर को हंसाया तो जरूर, लेकिन थमाया कुछ खास नहीं। गुड़ कम दिया, गुड़ सी मीठी बातें ज़्यादा कीं। बजट भाषण में बजट कम था भाषण ज्यादा। घोषणाएं ज़्यादा थीं, क्रियान्वयन की ठोस योजनाएं कम। Read more
टाइम मशीन में लालगढ़ और एसपी सिंह
लेखक: जनतंत्र डेस्क | July 6, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | 2 Comments
बहुत से संवेदनशील मुद्दों पर न्यूज़ चैनलों और सरकार का गठजोड़ साफ़ दिखता है। लालगढ़ भी ऐसा ही मुद्दा है, जहां मीडिया ने सत्ता पक्ष के साथ हाथ मिला कर जनता को धोखा किया है। इसकी कई वजहें हो सकती हैं। सरकारी दबाव के अलावा एक वजह सही जानकारी और सही नज़रिये का अभाव भी हो सकती है। साथ ही वो बदलते सरोकार भी जिन्होंने आज मीडिया को सत्ता के जितने करीब धकेला है, जनता से उतना ही दूर कर दिया है। ऐसे में एस पी सिंह जैसे संपादकों की कमी बहुत खलती है जो हमेशा कमजोर के पक्ष में खड़े रहे। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने इसी अंतर को बयां करने के लिए लालगढ़ पर एक कहानी लिखी है। इस कहानी के केंद्र में हैं एसपी सिंह। आप भी इसे पढ़ें और अपनी राय जाहिर करें।
पुष्पेंद्र से इस्तीफ़े की मांग, क्लब में घोटाले का आरोप
लेखक: Samrendra | June 30, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
((प्रेस क्लब का पांच साल से ऑडिट नहीं हुआ है। मौजूदा कमेटी पर बड़े घोटाले का आरोप। ट्रेजरार के मुताबिक लेन-देन के दस्तावेज़ पर उनके दस्तख़त नहीं। कच्ची पर्चियों पर बड़े-बड़े पेमेंट का आरोप। नए सदस्य बनाने में धांधली का आरोप। क्लब के कई पूराने और वरिष्ठ सदस्यों ने बीते तीन साल के कामकाज पर श्वेतपत्र जारी करने की मांग की है। उन्होंने मौजूदा कमेटी को भंग करके घोटाले की जांच की मांग की है। उनका ये भी कहना है कि किस हक़ से जनरल सेक्रेटरी क्लब को निजी हाथों में सौंप रहे हैं। आरोप बड़े हैं और उनके जवाब में जनरल सेक्रेटरी का क्या कहना है … ये सब इस रिपोर्ट में।))
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घुसपैठ के बाद दिल्ली के प्रेस क्लब में पुलिस
लेखक: जनतंत्र डेस्क | June 30, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में इन दिनों जो कुछ हो रहा है वैसा क्लब के इतिहास में कभी नहीं हुआ। रविवार की घटना से आप प्रेस क्लब की हालत का अंदाजा लगा सकते हैं। साथ ही मीडिया के एक खराब पहलू को भी जान और समझ सकते हैं। ये भी कि पत्रकारिता के इस पवित्र पेशे में किस हद तक सड़ांध हो गई है। जो बेहद छोटे लाभ के लिए गुणा-गणित में जुटे हों वो समाज और देश के बारे में कैसे सोचेंगे।
न्यूज़ एक्स में क़त्लेआम
लेखक: जनतंत्र डेस्क | June 29, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment
न्यूज़ एक्स में बड़े पैमाने पर छंटनी कर दी गई है। छंटनी की प्रक्रिया शनिवार को शुरू हुई और अभी तक की रिपोर्ट के मुताबिक 48 लोगों को पिंक स्लिप पकड़ाया जा चुका है। आज भी कई लोगों को चिट्ठियां बांटी गई हैं और सूत्रों के मुताबिक कुल मिला कर 70 से ज़्यादा लोगों को हटाया जाना है।
पीएम की मस्ती, पीएम का मीडिया
लेखक: जनतंत्र डेस्क | June 29, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
भारत ही नहीं पूरी दुनिया में मीडिया को मैनुपुलेट किया जाता है। मीडिया चाहे तो किसी नायक को एक पल में खलनायक बना दे और किसी खलनायक को नायक। इटली में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। वहां के प्रधानमंत्री बार्लुस्कोनी सेक्स स्कैंडल में फंसे हैं। विरोधी पार्टियां जांच के लिए दबाव डाल रही हैं तो दूसरी तरफ बार्लुस्कोनी अपने न्यूज़ चैनलों की मदद से बचाव में जुटे हैं। इससे पहले भी बार्लुस्कोनी कई बार संगीन आरोपों में फंस चुके हैं, लेकिन हर बार मीडिया के इस्तेमाल और अपनी चतुराई से वो बचते रहे हैं। यूरोप से पूरा ब्योरा दे रहे हैं साथी पत्रकार अनवर जे अशरफ़।
क्या मीडिया का काम सिर्फ़ उन्माद फैलाना है?
लेखक: Samrendra | June 26, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
दस दिन तक केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम और पश्चिम बंगाल सरकार के सुर में सुर मिलाने के बाद अब अख़बारों का जोश भी ठंडा पड़ गया है। बीते दस दिनों में उन्होंने खूब उन्माद फैलाया। लालगढ़ में सैन्य कार्रवाई के समर्थन में जोरदार हवा बनाई। लगा कि उनकी ललकार सुनकर कोबरा फोर्स के जवान एक दिन के भीतर ही सारे माओवादियों का सफाया कर देंगे और लालगढ़ को उनके चंगुल से छुड़ा लेंगे। Read more
वोट से पहले मीडिया में खेला गया नोट का खेल
लेखक: जनतंत्र डेस्क | June 25, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
दिल्ली सरकार ने चुनाव पूर्व मीडिया के लिए खजाना खोल दिया था। दस साल में विज्ञापन राशि तीस गुना से ज्यादा बढ़ गई है। चार साल में गैर-समाचार पत्र प्रचार माध्यमों में विज्ञापन के मद में खर्च सौ गुना से ज्यादा बढ़ गया है। केन्द्र सरकार ने भी चुनाव के पहले के महीनों में मीडिया के लिए खजाना लूटाया था। शीला दीक्षित और मनमोहन सिंह की इस दरियादिली पर से अब पर्दा उठ रहा है। और ये पर्दा उठा रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया। आप उनके इस शानदार विश्लेषण को पढ़िये और अंदाजा लगाइये कि क्यों यूपीए सरकार की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ मीडिया की आवाज़ धीमी पड़ गई है?… क्यों मंत्रियों की अय्याशी पर मीडिया ख़ामोश है? और क्यों बीते कई साल से किसी बड़े घोटाले का पर्दाफाश नहीं हुआ है? सोचिए कि क्या हमारे देश के सारे अधिकारी और सारे नेता ईमानदार हो गए हैं? या कहीं ऐसा तो नहीं कि दलाल दलाली छोड़ कर भजन-कीर्तन में जुट गए हैं? सोचिए और खुल कर अपनी प्रतिक्रिया दीजिये।
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आरटीआई के दायरे में हों मीडिया संस्थान
लेखक: जनतंत्र डेस्क | June 24, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
मीडिया को सूचना अधिकार के दायरे में लाया जाए या नहीं – ये बहस तेज हो रही है। कुछ समय पहले अरुंधति रॉय से बात हुई तो उन्होंने मीडिया को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाने की बात कही। मीडिया संस्थानों को मिलने वाले पैसे का पूरा हिसाब देने की मांग की। वो पैसा कहां से आता है और कौन देता है? मांग सही है। हर पैसे का अपना चरित्र होता है और यही पैसा मीडिया संस्थानों का चरित्र भी तय करता है। इसलिए इसे आरटीआई के दायरे में लाना चाहिये। वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया भी इसी बहस को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है जिस तरह मीडिया सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल कर दूसरी संस्थाओं के बारे में जानकारी हासिल करता है ठीक वैसे ही “मीडिया को भी अपने लिए इस कानून के इस्तेमाल की सुविधा मुहैया करानी चाहिये।” दैनिक हिंदुस्तान से साभार … हम उनका ये लेख आपके सामने पेश कर रहे हैं। आप भी इस बहस में शामिल हों। खुल कर अपनी प्रतिक्रिया दें।




