Exclusive: बेतुके आरक्षण से नक्सली बन रहे हैं आदिवासी
लेखक: आवेश तिवारी | March 11, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 6 Comments
सोनभद्र। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के बीच उत्तर प्रदेश का आदिवासी इलाका। जिस आरक्षण से देश के करोड़ों दलितों और आदिवासियों को उनके लोकतांत्रिक अधिकार मिले, आरक्षण की उसी नीति में खामियों की वजह से यह इलाका अब धीरे-धीरे नासूर बनता जा रहा है। ग्रामसभाओं से लेकर संसद तक चुनाव लड़ने के लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित आदिवासी अब माओवादी बन रहे हैं। “बैलेट नहीं तो बुलेट” का नारा बुलंद हो रहा है।
उत्तर प्रदेश के जिस जिले में सबसे अधिक आदिवासी हैं, विधानमंडल में वहां से एक भी आदिवासी प्रतिनिधि का नहीं होना काफी कुछ कहता है। यह बताता है कि आरक्षण के नाम पर हित साधने में जुटे हमारे हुक्मरान कितने दोमुंहे, मूर्ख और भ्रष्ट हो सकते हैं। यहां माहौल इतना ख़राब है कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में मौजूद खामियों को दूर करने की कोशिश से जातिगत तनाव बढ़ जाता है और हिंसा शुरू हो जाती है। Read more
ये तस्वीरें कहती हैं – नारी का दर्द एक है, खुशी भी एक
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 10, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 27 Comments
तस्वीरें बहुत कुछ कहती हैं। इतिहास की गवाही देती हैं। भविष्य की दिशा बताती हैं। खुशी, ग़म, बेबसी, घमंड … एक अच्छी तस्वीर बिना कुछ कहे बहुत कुछ सुना जाती है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिंदू में महिला आरक्षण बिल से जुड़ी ऐसी ही तस्वीरें छपी हैं। द हिंदू की तस्वीर आर वी मूर्ति ने खींची है और टाइम्स ऑफ इंडिया की तस्वीर किस फोटो जर्नलिस्ट की है यह अख़बार में नहीं छपा है। नाम से तस्वीर की अहमियत पर फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन उस फोटो पत्रकार का नाम होता तो अच्छा लगता। बहरहाल, भविष्य में हममें से जब भी कोई इन पर नज़र डालेगा तो अतीत तपाक से उसके सामने आकर खड़ा हो जाएगा। यह कहने के लिए हम और आप महिलाओं के हक़ में हुए इस बदलाव के गवाह रहे हैं। Read more
हुसैन का जाना सामूहिक कायरता का नतीजा है
लेखक: कुमार प्रशांत | March 10, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 6 Comments
मकबूल फिदा हुसैन अब कानूनन भारतीय नहीं रहे! इससे हुसैन को क्या फर्क पड़ा? वे मुंबई के अपने स्टूडियो में बैठ कर चित्र बनाते थे, अब कतर के स्टूडियो में बैठ कर बनाते हैं। काम के प्रति उनकी दीवानगी, उनकी गहराई और उनकी प्रतिबद्धता वैसी ही है जैसी तब थी, जब इक्यासी साल की उम्र में भारत छोड़ कर वे कहीं और पनाह लेने गए थे। यह वही दौर था जब बांग्लादेश से इसी प्रकार, वैसी ही जुनूनी जमात के कायराना हमलों से क्षत-विक्षत लेखिका तसलीमा नसरीन भारत में पनाह लेने की जद्दोजहद में थीं। तसलीमा के साथ बांग्लादेश में जो हुआ और वहां की सरकार ने उनके साथ जो किया, हुसैन के साथ भी ऐसा ही हुआ और हमारी सरकारों ने उनके साथ वैसा ही किया। बड़े अजीब, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से इतिहास मनुष्यों को पाठ पढ़ाता है। Read more
“तू निर्बंध सारी धरती पर घूम सके, अपने दिवाने को चूम सके”
लेखक: रंगनाथ सिंह | March 8, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 22 Comments
मैं अपनी बात को सामान्यीकृत नहीं करूंगा। मैं विशेष संदर्भ में बात करूंगा। जिससे बात का दायरा साफ दिखे। मैं आगे जो कुछ लिखूंगा वह सब एक मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि के अनुभव हैं। मूलतः बड़े किसानों, व्यावसायियों, उद्यमियों और सरकारी अफसरों के समाजिक लोक वृत्त के अनुभव हैं।
हम छोटे थे तो हमारी कालोनी में एक बैंक मैनेजर सार्वजनिक चर्चा का विषय बनते रहते थे। क्योंकि उन्होंने एक बाद एक आठ लड़कियां पैदा कीं। एक बेटे की आस में। उनकी आस नौवें प्रयास में पूरी भी हो गयी। यह मामला बनारस शहर का है। देहात में ऐसा नहीं होता। कोई सात/आठ लड़कियों तक इंतज़ार नहीं करता। जहां भी वर पक्ष को शक हुआ कि वधु से लड़के की संभावना अभी दूर है, वह तुरंत बेटे की दूसरी शादी की चर्चा छेड़ देता है। या फिर यदि बच्चा न हुआ हो तो पुरुष की दूसरी शादी लगभग अवश्यंभावी ही मानी जाती है। ऐसा नहीं है कि यह सारा मामला पुरुषों का रचा हुआ है। या फिर उन महिलाओं का जो सास, ननद, भाभी की भूमिका में होती है। मनुष्य की विश्वदृष्टि उसके भौतिक जीवन के निर्णय का आधार बनती है। मैंने बहुधा देखा है कि जिन स्त्रियों को सिर्फ़ बेटियां हों या जिनके बच्चा न हो वो पति की दूसरी शादी के पक्ष में होती हैं। ज्यादातर विकल्पहीनता की लाचारी के तहत लेकिन कई बार इसे अपनी नियति मानकर प्रसन्नतापूर्वक इसे स्वीकार करती हैं। Read more
हुसैन बौद्धिक रूप से दुर्बल, दुविधाग्रस्त और दोमुंहे लगते हैं
लेखक: विष्णु खरे | March 7, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment
कतर कन्ने क्या है, जो मेरे घर में नाहीं?
बहुत नहीं है- भारत में अब तक अल्पज्ञात खाड़ी देश कतर का कुल रकबा ग्यारह हजार चार सौ सैंतीस वर्ग किलोमीटर है और मूल निवासियों और विदेशी कामगारों को मिलाकर आबादी पंद्रह लाख के आसपास होगी। हमारा कच्छ जिला उससे लगभग चौगुना है और दिल्ली के मयूर विहार इलाके में शायद उससे ज्यादा लोग रहते हों। कतर में पेयजल का कोई स्रोत नहीं है, लेकिन उसकी जमीन के नीचे जो तरल प्राकृतिक गैस, जिसे ‘ऑयल’ या ‘पेट्रोल’ कह दिया जाता है, उसका आज का बाजार-दाम चार सौ पचास खरब रुपया बताया जाता है। पिछले वर्ष उसने तीन करोड़ नब्बे लाख टन तेल का निर्यात किया और उसकी प्रति व्यक्ति आय बढ़ कर एक लाख डॉलर हो चुकी है। ये दोनों आंकड़े विश्व में सर्वोच्च बताए जा रहे हैं। एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि व्यक्तिगत आमदनी पर कोई आयकर नहीं है। Read more
शायद कांग्रेस को हुसैन के इस फैसले का इंतजार था
लेखक: साजिद रशीद | March 7, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 2 Comments
मकबूल फिदा हुसैन ने जिन कारणों से कतर की नागरिकता स्वीकार की है, उनके मद्देनजर यह प्रश्न फिर बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया है कि धार्मिक भावनाओं के आहत होने का मापदंड क्या है? और क्या नग्नता और अश्लीलता के बीच के अंतर को तय कर लिया गया है? किसी कलाकृति में नग्नता कब अश्लीलता में बदल जाती है, इसका फैसला तो हमारे देश का सर्वोच्च न्यायालय तक नहीं कर सका है। अरुंधति राय के उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ पर भी अश्लीलता का आरोप लगा था। दिलचस्प बात तो यह है कि धर्म में विश्वास न करने वाले मार्क्सवादियों की भावनाएं भी अरुंधति राय के इस उपन्यास से आहत हुई थीं; उसमें केरल की कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता ईएमएस नंबूदिरीपाद का लेखिका ने जिस ढंग से चित्रण किया था, वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास रखने वाले मार्क्सवादियों को भी नागवार गुजरा था। Read more
खजुराहो के गर्भ में अटक गए हैं हुसैन के अंध समर्थक
लेखक: समरेंद्र | March 6, 2010 | ब्लॉग, स्पेशल रिपोर्ट | 11 Comments

मकबूल फिदा हुसैन के समर्थन में इन दिनों मोटे तौर पर तीन तर्क दिए जा रहे हैं।
- हुसैन की कला को समझो, उनके सिम्बॉलिज्म और रेखाओं के विस्तार को समझो।
- भारत में देवी-देवताओं की नग्न तस्वीरों और मूर्तियों का पुराना इतिहास रहा है। अमूर्त को मूर्त रूप देने और फिर मिथकों को अपने नज़रिये से दर्शाने की पुरानी परंपरा रही है।
- और कलाकार देश की संवेदनाओं और मजबूरियों से ऊपर होता है। उसे इसके दायरे में मत बांधों। कलाकार का सरोकार समाज और देश के प्रति नहीं बल्कि अपनी कला और अपनी सोच के प्रति होता है।
तसलीमा को पढ़ कर मोनिका लेविंस्की याद आती हैं
लेखक: आवेश तिवारी | March 6, 2010 | ब्लॉग, स्पेशल रिपोर्ट | 20 Comments
इस्लामिक कट्टरता और पुरुष के पुरुष होने के ख़िलाफ़ किसी भी आम मुस्लिम स्त्री के भीतर चल रही लड़ाई उतनी ही पैनी हैं जितना तसलीमा के उपन्यासों का कथानक। उनमें नया कुछ अगर है तो वो सिर्फ़ सेक्स है। “का” से लेकर “अमर मेयेबेला” तक उनके लिखे उपन्यासों को पढ़कर उतनी ही उत्तेजना महसूस होती है जितनी जेम्स हेडली चेईस के किसी उपन्यास या फिर लोलिता को पढ़कर। जिस वक़्त उनकी कहानियां उत्तेजित नहीं कर रही होती, मन मस्तिष्क में इस्लामिक कट्टरता के ख़िलाफ़ हमले का वर्चुअल वर्ल्ड तैयार करती दिखती हैं। लज्जा को पढ़कर संभव है आप अपने मन में कितने ही अनदेखे चेहरों की आंखें फोड़ डाले या फिर उनका सर कलम कर दें। कभी-कभी मुझे उन्हें पढ़कर मोनिका लेविंस्की की भी याद आती है। जिसके और बिल क्लिंटन के सेक्स संबंधों के किस्से आज भी चाव से पढ़े जाते हैं । Read more
संयम और शांति से काम लें तसलीमा
लेखक: राजकिशोर | March 5, 2010 | ब्लॉग, स्पेशल रिपोर्ट | 6 Comments
आस्था के प्रश्न ने कर्नाटक के दो शहरों – हसन और शिमोगा – को हिला दिया। परदे के सवाल पर विक्षुब्ध मुसलमान प्रतिवादियों ने जगह-जगह जुलूस निकाले और पुलिस को गोली चलानी पड़ी। दो आदमी मारे गए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा। सरकार का कहना है कि स्थिति शांत हो चुकी है। दोनों शहरों में पुलिस के अलावा केंद्रीय बल तैनात हैं। पुलिस ने दो अखबारों पर, तसलीमा नसरीन पर तथा कुछ और लोगों पर केस दायर कर दिया है। जैसा कि होता है, दो-चार दिनों में माला रफा-दफा हो जाएगा। प्रश्न है, इस घटना से हासिल क्या हुआ? Read more
मेरा पैसा, मेरा मजहब, मेरी आज़ादी और मेरी नागरिकता
लेखक: एम एफ हुसैन | March 4, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 5 Comments
एम एफ हुसैन साहब ने एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत्त को एक इंटरव्यू दिया है। अगर टेलीविजन पर वह इंटरव्यू आपने देखा-सुना नहीं है तो उसे पढ़ना ज़रूर चाहिए। हिंदी पाठकों के लिए हमने एनडीटीवी की अंग्रेजी वेबसाइट से उस इंटरव्यू के कुछ हिस्सों का अनुवाद किया है। आप उसे पढ़ सकते हैं। लेकिन हम आपसे यही गुजारिश करेंगे कि एक बार अंग्रेजी का वह पूरा इंटरव्यू पढ़िएगा। उससे इस विवाद का एक दूसरा पहलू भी सामने आएगा। - मॉडरेटर
बरखा दत्त – आपने भारतीय पासपोर्ट सरेंडर क्यों किया और कतर की नागरिकता क्यों कबूल की? आखिरकार आप कई साल से देश से बाहर रह रहे थे, ऐसी नौबत क्यों आई कि आपने भारतीय नागरिकता छोड़ दी?
एम एफ हुसैन – मैं मानता हूं कि इसकी एक बड़ी वजह है। 2006 में तीन बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम करने का फैसला किया।
- मोहनजेदाड़ो से मनमोहन सिंह तक भारतीय सभ्यता का इतिहास – बेबिलोन काल तक दूसरी सभ्यताओं का इतिहास
- और सिनेमा, जो मेरे दिल के बहुत करीब है – यह मेरा प्यार है – भारतीय सिनेमा के 100 साल। सौ साल अगरे वर्ष पूरे हो रहे हैं।
मैं ये सभी प्रोजेक्ट्स भारत में करना चाहता था। लेकिन वहां कई बाधाएं थीं। आप मानिए, वहां काम करना आसान नहीं। पहला, वहां स्पॉन्सर ढूंढना मुश्किल है। मैं इंतज़ार कर रहा था और मैंने 2004 में यह फैसला लिया जब मैं स्पॉन्सर की तलाश में दुबई आया था। लंदन में भारतीय सभ्यता के प्रोजेक्ट के लिए मुझे एक प्रायोजक मिला। और कतर में शेख मूजा ने दूसरी सभ्यताओं पर काम करने न्योता दिया और अबु धाबी भारतीय सिनेमा के प्रोजेक्ट को स्पॉन्सर करने के लिए तैयार हो गया। वहां के टैक्स स्ट्रक्चर की वजह से (आप किसी भी कॉरपोरेट से पूछ लीजिए और आपको पता चल जाएगा) इन सभी प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए मुझे एनआरआई बनना था। यह केवल यहीं नहीं है, पूरी दुनिया में ऐसा ही है। स्वीडन में बर्गमैन, पोलान्सकी को क्या हुआ. उन्हें वहां से जाना पड़ा क्योंकि इनकम टैक्स विभाग के लोग पीछे पड़ गए थे।
अगर मैं 40 साल का होता तो मैं एड़ी-चोटी का जोर लगा कर लड़ लेता, लेकिन यहां मैं सारा ध्यान अपने काम पर केंद्रित करना चाहता हूं। मैं कोई तनाव नहीं चाहता। मैं सारी सुविधाएं और आराम चाहता हूं।
जैसा कि वो कहते हैं हिंदी हैं हम वतन हैं, सारा जहां हमारा
ये सीमाएं केवल सियासी सीमाएं हैं। खासकर विजुअल आर्ट तो युनिवर्सल भाषा है। आप दुनिया के किसी भी देश में हो सकते हैं लेकिन आप जो काम करते हैं उसका 5000 साल पुरानी महान भारतीय संस्कृति से गहरा जुड़ाव होता है।
बरखा दत्त – हुसैन साहब आपकी बात से लगता है कि आपने एक व्यावहारिक फैसला लिया है। उन अवसरों को ध्यान में रख कर जो भारत में नहीं हैं। लेकिन यह कहते हुए कोट किया गया है कि भारत ने आपको ठुकरा दिया है। क्या वाकई में उसने आपको कतर की नागरिकता कबूल करने के लिए प्रभावित किया है?
एम एफ हुसैन – मैं कभी नहीं कहा कि भारत ने मुझे ठुकरा दिया है। मेरा पूरा नजरिया सामने है। जैसा की मैंने कहा यहां अवसर मौजूद थे, इसलिए मैं यहां आया। आखिर नागरिकता है क्या? यह केवल एक पेपर का टुकड़ा है। अगर कोई मुझे बहुत प्यार और स्नेह से न्योता दे तो क्या मैं उसके यहां नहीं जाऊंगा और उसके साथ डिनर (रात का भोजन) नहीं करुंगा? क्या मैं ऐसा कहूंगा कि नहीं, मैं मीट नहीं खाना चाहता, मैं केवल शाकाहारी भोजन करुंगा? ऐसे मामलों में मैं कोई ढकोसला नहीं करता।
वो कहते हैं ना जहां भी प्यार मिला उसी के साथ हो गया। मैं एक महान प्रेमी हूं। जहां के लोग मुझसे जोश से मिलते हैं मैं उनसे प्रेम करता हूं। भारत में यकीनन 99 फीसदी भारतीय मुझे प्यार करते हैं। आज भी करते हैं। लेकिन रचनात्मक के प्रति सियासत का हमेशा नकारात्मक प्रभाव रहा है।
गैलिलियो से लेकर कालीदास तक – हर महान कलाकार का उत्पीड़न हुआ। नेरुदा, चैपलिन जैसे ढेरों उदाहरण मौजूद हैं।
आखिर में सबकुछ सिसायत से जोड़ दिया जाता है। अगर यह कानूनी और सामाजिक समस्या होती तो इसका हल निकाला जा चुका होता। अदालतें भी ऐतिहासिक फैसले देतीं हैं। लेकिन सियासत और कुछ लोग सारा माहौल खराब कर देते हैं।
बरखा दत्त – क्या आप वतन लौटने के लिए छटपटाएंगे नहीं?
एम एफ हुसैन – मेरी आत्मा और मेरा सबकुछ वहीं मौजूद है। आखिर शारीरिक मौजूदगी होती क्या है? टेक्नोलोजी और कम्यूनिकेशन से भरी आज की दुनिया में आप सभी जगह मौजूद हैं। और एक क्रिएटिव शख़्स भौगोलिक सीमाओं में नहीं बंधा होता है। यह कोई मायने नहीं रखता कि आप कहां रहते हैं। मैं मौलिक रूप से एक भारतीय चित्रकार हूं और अंतिम सांस तक भारतीय चित्रकार रहूंगा।
बरखा दत्त – लेकिन यह भी एक तथ्य है कि बहुत-बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि आपको वापस लाने के लिए भारत सरकार काफी कुछ कर सकती थी।
एम एफ हुसैन – मैं ऐसी बातों पर ज़रा भी ध्यान नहीं देता। वो क्या सोचते हैं यह उनका काम है। मैं और मेरा काम इससे ज़रा भी प्रभावित नहीं होता।
बरखा दत्त – कुछ आलोचक आपके इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं कि आपने एक ऐसा देश चुना है जहां लोकतंत्र ही नहीं है। आखिर कतर ही क्यों?
एम एफ हुसैन – जैसा की मैं कह चुका हूं। मुझे यहां स्पॉन्सर मिला और सारी सुविधाएं। इसलिए मैं यहां काम कर रहा हूं। मैं ऐसा साठ साल से करता आ रहा हूं। मेरा कहीं भी अपना स्टूडियो नहीं है। मैं एक लोक पेंटर की तरह हूं। जो मौके पर ही पेंटिंग बनाता है। मैंने पेंटिंग के अपने स्टाइल को ऐसे ही डेवलप किया है। वहां कई महान पेंटर और विचारक हैं, मैं उनका सम्मान करता हूं। लेकिन मेरे काम का तरीका ऐसा ही है।
बरखा दत्त – क्या भारतीय पासपोर्ट को सरेंडर करने का फैसला आपके लिए कष्टदायक रहा?
एम एफ हुसैन – सच यही है। मुझे लगता है कि सारा दुख और दर्द मीडिया को है। मुझे नहीं है। मैं बीते 40 साल से परमानन्द (तमाम बंधनों से मुक्त हो चुका हूं) की स्थिति में (हंसते हुए … ) फिल्म बना रहा हूं, यहां और वहां कुछ शब्द लिख रहा हूं… अपनी सोच का सृजन कर रहा हूं … मैंने अभी तक केवल दस फीसदी ही जाहिर किया है। नब्बे फीसदी अब भी मेरे भीतर है। मुझे नहीं लगता कि मैं उन सभी को बाहर ला सकूंगा। मुझे लगता है कि वो सारी चीजें मेरे कब्र में मेरे साथ होंगी।



