बुरके के पीछे से विद्रोह की आवाज

लेखक: राजकिशोर  |  April 5, 2010  |  स्पेशल रिपोर्ट   |   1 Comment

नकाब, हिजाब या बुरके के पीछे सिर्फ मुस्सिम कट्टरपंथ की शिकार ही नहीं छिपी होती, बल्कि रेडिकल विचार भी पनप रहे होते हैं, यह सऊदी अरब की कवयित्री हिसा हिलाल ने साबित कर दिया है। सऊदी अरब वह मुल्क है, जिसने इस्लाम की सबसे प्रतिक्रियावादी व्याख्या अपने नागरिकों पर थोपी हुई है। इसकी सबसे ज्यादा कीमत वहां की औरतों को अदा करनी पड़ी है। सऊदी अरब में औरतों को पूर्ण मनुष्य का दरजा नहीं दिया जाता। वे घर से अकेले नहीं निकल सकतीं, अपरिचित आदमियों से मिल नहीं सकतीं, कार नहीं चला सकतीं और बड़े सरकारी पदों पर नियुक्त नहीं हो सकतीं। घर से बाहर निकलने पर उन्हें सिर से पैर तक काला बुरका पहनना पड़ता है, जिसमें उनका चेहरा तक पोशीदा रहता है – आंखें इसलिए दिखाई पड़ती हैं, क्योंकि इसके बिना वे ‘हेडलेस चिकन’ हो जाएंगी। । पुरुषों की तुलना में उनके हक इतने सीमित हैं कि कहा जा सकता है कि उनके कोई हक ही नहीं हैं — सिर्फ उनके फर्ज हैं, जो इतने कठोर हैं कि दास स्त्रियों या बंधुवा मजदूरों से भी उनकी तुलना नहीं की जा सकती। ऐसे दमनकारी समाज में जीनेवाली हिसा हिलाल ने न केवल पत्रकारिता का पेशा अपनाया, बल्कि विद्रोही कविताएं भी लिखीं। इसी हफ्ते अबू धाबी में चल रही एक काव्य प्रतियोगिता में वे प्रथम स्थान के लिए सबसे मज़बूत दावेदार बन कर उभरी हैं। Read more

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सोनभद्र में रेत-लकड़ी से सोना बना रहे हैं हुक्मरान

नेहरु का स्विट्ज़रलैंड आज कराह रहा है। जंगल के रखवालों ने जंगल को ही चर डाला। ओबरा और सोनभद्र वन प्रभाग में सुरक्षित वन भूमि पर गिट्टी बोल्डरों की सैकड़ों अवैध खदानों को संचालित कर अरबों रुपये की काली कमाई कर रहे जंगल विभाग का अगला निशाना वन्य जीव अभ्यारण्य हैं। हाल ये है कि सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली समेत पांच जनपदों में फैले कैमूर वन्य जीव अभ्यारण्य का अस्तित्व संकट में है। सूत्रों की माने तो लगभग 70 फीसदी अभ्यारण्य इस वक़्त अवैध खनन का केंद्र है। यही हाल प्रभागों का है। यहां अब शेर, बाघ, मोर और काले हिरण की आवाज़ सुनाई नहीं देती। यहां या तो धूल उड़ाते भारी वाहन नज़र आते हैं या फिर नदी तटों पर जनरेटर और मशीनों का भारी शोर, जिनके जरिए नदी को छाती चीरकर बालू निकाला जाता है। Read more

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“मेरे मित्र दिलीप मंडल कुछ ज़्यादा ही दलितवादी हो गए हैं”

लेखक: राजकिशोर  |  March 29, 2010  |  स्पेशल रिपोर्ट   |   2 Comments

मेरे मित्र दिलीप मंडल आजकल कुछ ज्यादा ही दलितवादी हो गए हैं। दलित या दलितवादी का मैं थोड़ा आगे बढ़ कर सम्मान करता हूं। यहां तक कि उनकी आतार्किक बातें भी सुनने के लिए तैयार रहता हूं। गालिब का कहना था, फरियाद की कोई लय नहीं होती। लेकिन सार्वजनिक बहस में कई बातों का खयाल रखना होता है। उदाहरण के लिए, सब भ्रष्ट हैं, यह कहना और भ्रष्ट हुए बिना अब कोई चारा नहीं है और इसलिए हमें भ्रष्टाचार को मान्यता दे देनी चाहिए, यह कहना एक नहीं है। पहली बात का संबंध स्थिति से हैं। दूसरी बात का संबंध स्थिति को मूल्य मान कर चलने की है। जब हम कहते हैं कि भ्रष्टाचार बहुत व्यापक हो गया है, तब हमारा स्वर शिकायत करने का होता है। जब हम कहते हैं कि क, ख और ग भ्रष्ट हैं, इसलिए अगर घ भी भ्रष्टाचार में लिप्त दिखाई पड़ रहा है, तो इसका रोना क्यों, तब हम भ्रष्टाचार की संस्कृति को प्रच्छन्न रूप से भी नहीं, सीधे बढ़ावा देना है। इसका प्रतिवाद करना जरूरी है। Read more

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तुलसी के रामचरितमानस से छेड़खानी पर संतों में कोहराम

इन दिनों हिंदू धर्माचार्य कुछ ज़्यादा ही विवादों में हैं। कृपालू महाराज के बाद अब ताज़ा विवाद में घिरे हैं चित्रकूट स्थित तुलसीपीठ के पीठाधीश्वर और जगतगुरु रामभद्राचार्य। उन्होंने तुलसीकृत “रामचरितमानस “को ही संपादित कर उसका संशोधित संस्करण प्रकाशित करा दिया है। आडवाणी और अशोक सिंघल के बेहद करीबी माने जाने वाले और पूर्व राष्ट्रपति कलाम से संस्कृत भाषा में निपुणता हेतु पुरस्कृत स्वामी जी ने कहा है “श्रीरामचरितमानस कि दस हजार पंक्तियों के छोटे से कलेवर में लगभग तीन हजार अशुद्धियां”।

रामभद्राचार्य की इस हरकत से धर्माचार्यों और अखाड़ों के बीच हडकंप मचा हुआ है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने रामभद्राचार्य द्वारा किये गए इस कारनामे को अक्षम्य अपराध घोषित किया है। साथ ही जगतगुरु की पदवी छीनने पर विचार करने और अयोध्या में प्रवेश पर प्रतिबंध भी लगा दिया है। लेकिन हिन्दू धर्मगुरु से जुड़ा मामला होने के कारण विश्व हिन्दू परिषद खुद इस पूरे मामले में कुछ भी कहने से बच रही है। रामभद्राचार्य के पास करोडो रूपए की चल अचल संपत्ति है, और देश विदेश में इनके कई संस्थान भी चल रहे हैं जिनमे एक पब्लिकेशन हाउस और एक विश्वविद्यालय भी शामिल है । यही नहीं सत्ता के हलके में भी उनकी गहरी पैठ है। रामभद्राचार्य की ताक़त का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ताज़ा विवाद में जब लखनऊ के स्वतंत्र पत्रकार एस. ए. अस्थाना ने जगतगुरु के ख़िलाफ़ न्यायालय चले गए तो उन्हें डराया-धमकाया जाने लगा। पत्रकारों के भारी दबाव के बाद पुलिस ने अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की। Read more

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अनीश्वरवादी, एक-पत्नी समर्थक लोहिया का हथियार थे राम

लोहिया अनीश्वरवादी थे। यों भी समाजवादी अमूमन इहलोकवादी होता है, क्योंकि भौतिकता ही उसकी विचारधारा की बुनियाद होती है। ईश्वर को माने तो उसके बनाए नियमों को भी मानना पड़ेगा। मसलन, पूर्वजन्म और नियति वाले विश्वासों को अंगीकार करना होगा। तो फिर वर्णव्यवस्था तार्किक बन जाएगी। कर्मणा कोई भी महत्त्व नहीं हासिल कर पाएगा। इन ढेर सारे कारणों के चलते ही जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव और लोहिया ने कभी परमसत्ता को नहीं माना। हालांकि अपनी पत्नी प्रभा देवी का मन रखने के लिए जयप्रकाश नारायण विधुर जीवन में विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने लगे थे। मगर अविवाहित लोहिया पर किसी का दबाव नहीं था। फिर भी लोहिया का धर्म, ईश्वर, लोक-परलोक, वर्ण व्यवस्था, कर्म का सिद्धांत आदि पर अपना सोच था। Read more

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हुजूर, माईबाप… आप ही कहें, इन गरीबों का देश कौन सा है?

डोरियो पहुंचना आसान नहीं। इस गांव तक पहुंचने के लिए जसीडीह आना होता है, जो यहां का सबसे करीबी रेलवे स्टेशन है। जसीडीह से गोड्डा की दूरी 80 किलोमीटरहै और डोरियो गोड्डा से भी तकरीबन 60 किलोमीटर दूर है। डोरियो झारखंड की राजमहल पहाड़ियों पर बसा हुआ एक छोटा सा गांव है, जहां से सबसे नज़दीक की पक्की सड़क भी 20 किलोमीटर दूर है।

पहाड़िया नाम की आदिम जनजाति (प्रीमिटिव ट्राइबल ग्रुप) पर एक फिलम बनाने के सिलसिले में मेरा डोरियो जाना हुआ। बिहार-झारखंड में पली-बढ़ी, लेकिन अपने ही राज्य के इस चेहरे से मैं पूरी तरह अनभिज्ञ थी। गांव तक पहुंचने के लिए हमने ९ किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता पैदल तय किया। रास्ते में छोटे-छोटे पहाड़ी कस्बे हैं और उन कस्बों की टूटी-फूटी झोंपड़ियां वहां की हक़ीकत बयां करती है। इन गांवों और पहाड़ी बस्तियों तक आधुनिक जीवन की कोई मूलभूत सुविधा नहींपहुंची। अपनी धुन में तेज़ी से भागती हुई दुनिया ने राजमहल के पहाड़ों पर बसे इन पहाड़िया आदिवासियों को अपने विकास की राह में शामिल करना ज़रूरी नहीं समझा। इसलिए यहां ना सड़क पहुंची है ना स्कूल और अस्पताल ही। Read more

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भ्रम में जी रहे हैं असगर वजाहत और रोमन के समर्थक

नागरी हिंदी या फिर रोमन हिंदी (Hindi)। मतलब हिंदी कैसे लिखी जाए। नागरी में जिसमें आप और हम लिखते-पढ़ते हैं या फिर रोमन (अंग्रेजी के अल्पाबेट्स के सहारे) में। वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत के मुताबिक रोमन में हिंदी लिखने से भाषा का विस्तार होगा। न केवल हिंदी बल्कि सभी भारतीय भाषाओं की लिपि बदल दी जानी चाहिए। असगर वजाहत का यह लेख दो हिस्सों में जनसत्ता में छपा था। हमने दोनों हिस्से जनतंत्र पर साझा किए थे। अब वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने जनसत्ता में ही असगर वजाहत को जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि ऐसी वैज्ञानिकता से खुदा बचाए। आप उनका यह लेख पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। – मॉडरेटर

असगर वजाहत के इस आह्वान को स्वीकार करते हुए मुझे प्रसन्नता है कि ‘आज समय का तकाजा है कि हम हिंदी भाषा की लिपि पर विचार करें और इस संबंध में जनमत बनाने पर विचार करें।’ (जनसत्ता, 17 मार्च) मेरा खयाल है, विचार करने पर कोई नई बात सामने आती है, तभी जनमत बनाने का सवाल उठता है। खुद असगर ने बताया है कि इस प्रश्न पर पहले भी काफी विचार हुआ था, लेकिन इस प्रस्ताव के पक्ष में कभी हवा नहीं बनी कि हिंदी भाषा को रोमन लिपि में लिखा जाए। दरअसल, यह प्रस्ताव कमजोर और तर्कहीन होने के अलावा इतना बोदा और क्रूर था कि इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना बुद्धि का अपमान होता। तब हिंदी की स्थिति आज जैसी बुरी नहीं थी। शेर पर वार करना कठिन होता है। चींटी को तो कोई भी कुचल देगा। हिंदी अब गरीब की भौजाई हो चुकी है। यही वजह है कि आज हिंदी को रोमन लिपि में लिखने की सलाह दी जा रही है। Read more

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विभूति का झूठ और कारुण्यकारा का सच

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  March 20, 2010  |  स्पेशल रिपोर्ट   |   Comments Off

यह प्रोफेसर एल कारुण्यकारा का दूसरा ख़त है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के दलित प्रोफेसर कारुण्यकारा ने इस ख़त में कुलपति विभूति नारायण राय के झूठ से पर्दा उठाया है। वीएन राय का कहना है कि दलित छात्र कांबले को पीएचडी में दाखिला इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि वो सीट ओबीसी के लिए रिजर्व थी। जबकि कारुण्यकारा का कहना है कि वो सीट कांबले को दी जा सकती थी और लायजन ऑफिसर की कमेटी ने इसकी सिफारिश भी की थी। लेकिन सिर्फ़ जिद की वजह से वो सीट कांबले को नहीं दी गई और आज भी वो सीट खाली पड़ी है। आप कारुण्यकारा का यह जवाब पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। – मॉडरेटर Read more

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“काबा मेरे पीछे है कलीसा (चर्च) मेरे आगे”

लेखक: असगर वजाहत  |  March 19, 2010  |  स्पेशल रिपोर्ट   |   6 Comments

हिंदी की दशा और दिशा पर वरिष्ठ साहित्यकार और प्रोफेसर असगर वजाहत का लेख जनसत्ता में दो हिस्सों में छपा है। पहला हिस्सा हम जनसत्ता से साभार जनतंत्र पर तीन दिन पहले छाप चुके हैं। आज उसी लेख का दूसरा हिस्सा। इसमें प्रोफेसर असगर वजाहत ने तुर्की के उदाहरण के जरिए यह समझाने की कोशिश की है कि कैसे लिपि बदलने से भाषा मरती नहीं है। आप उनका यह लेख पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। किसी भी भाषा के विकास के लिए नए-नए विचारों का स्वागत किया जाना चाहिए। उन्हें व्यवहारिकता की कसौटी पर कसना चाहिए। उम्मीद है कि आप सभी मर्यादित ढंग से अपनी बात रखेंगे और इस बहस को आगे बढ़ाएंगे। - मॉडरेटर

अतातुर्क के भाषा संबंधी सुधारों का बहुत गहरा प्रभाव तुर्की समाज और संस्कृति पर पड़ा था। रोमन लिपि स्वीकार करने के कारण तुर्की में यूरोपीय भाषाओं के प्रति रुचि बढ़ी और सामाजिक परिवर्तनों को एक नई गति मिली थी। यही कारण है कि आज तुर्की यूरोपीय संघ की ओर बढ़ रहा है। बीसवीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक में पढ़े-लिखे भारतीय मुसलमानों पर तुर्की और कमाल अतातुर्क का गहरा प्रभाव पड़ा था। यह प्रभाव खिलाफत आंदोलन के विपरीत प्रगतिशील प्रभाव था। लेकिन पता नहीं क्यों भारतीय मुसलिम समुदाय ने अतातुर्क के लिपि संबंधी सुधार के आलोक में उर्दू की लिपि पर विचार नहीं किया। Read more

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“रोमन” हिंदी खिल रही है, “नागरी” हिंदी मर रही है

लेखक: असगर वजाहत  |  March 16, 2010  |  स्पेशल रिपोर्ट   |   10 Comments

मुंबई से फिल्म निर्देशक का फोन आया कि फिल्म के संवाद रोमन लिपि में लिखे जाएं। क्यों? इसलिए कि अभिनेताओं में से कुछ हिंदी बोलते-समझते हैं लेकिन नागरी लिपि नहीं पढ़ सकते। कैमरामैन गुजरात का है। वह भी हिंदी समझता-बोलता है लेकिन पढ़ नहीं सकता… इसी तरह… फिल्म से जुड़े हुए तमाम लोग हैं। फिल्मी दुनिया में गहरी पैठ रखने वालों ने बाद में बताया कि फिल्म उद्योग में तो हिंदी आमतौर पर रोमन लिपि में लिखी और पढ़ी जाती है। एनडीटीवी के हिंदी समाचार विभाग में बड़े ओहदे पर बरसों काम कर चुके एक दोस्त ने बताया कि टीवी चैनलों पर हिंदी समाचार आदि रोमन लिपि में लिखे जाते हैं। वजह केवल यह नहीं है कि समाचार पढ़ने वाला नागरी लिपि नहीं जानता है बल्कि यह भी है कि समाचार की जांच-पड़ताल करने वाले नागरी लिपि के मुकाबले रोमन लिपि ज्यादा सरलता से पढ़ सकते हैं। Read more

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