एक्सप्रेस समूह और द हिंदू के संपादक एन राम में दो-दो हाथ
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 27, 2010 | पहरेदार | Comments Off
एक्सप्रेस समूह ने द हिंदू के संपादक एन राम के आरोपों को खारिज कर दिया है। समूह की वेबसाइट पर छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि द हिंदू के पारिवारिक झगड़े के बारे में फाइनेंशिअल एक्सप्रेस और द इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट पूरी तरह सही है। उस रिपोर्ट में दर्ज सभी तथ्य पुख्ता हैं। एक्सप्रेस ने पूरी तहकीकात के बाद ही अर्चना शुक्ला की वो रिपोर्ट प्रकाशित की। इसलिए समूह रिपोर्ट और रिपोर्टर दोनों के साथ हैं और एन राम की कानूनी कार्रवाई की धमकी से नहीं डरता। Read more
केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने पत्रकार से कहा गेट आउट
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 24, 2010 | पहरेदार | Comments Off
वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा को गुस्सा आता है। वो भी इतना कि बात करने की तमीज तक भूल जाते हैं। फिक्की के कार्यक्रम में उन्होंने अपनी बद्तमीजी का परिचय दिया। एक पत्रकार के सवाल पूछने पर मुख्य अतिथि आनंद शर्मा ने उसे अपने रास्ते से हट जाने को कह दिया। जैसे वो पत्रकार उनका रास्ता रोक कर बैठा था।
दरअसल, हुआ यह कि फिक्की के कार्यक्रम में कई पत्रकार आनंद शर्मा से वाणिज्य मंत्रालय से जुड़े सवाल पूछ रहे थे। उसी बीच न्यूज़ 24 के एक पत्रकार ने आनंद शर्मा से उनकी संसद सदस्यता पर एक सवाल पूछ दिया। आनंद शर्मा की राज्यसभा सदस्यता दो अप्रैल को ख़त्म होने वाली है। आनंद शर्मा हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा के सांसद हैं। लेकिन हिमाचल में अब कांग्रेस के पास इतने विधायक नहीं कि वो दोबारा वहां से राज्यसभा पहुंच सके। ऐसे में उन्हें किसी और राज्य से चुनाव जितवाना होगा। लेकिन राज्यसभा के लिए घोषित के कांग्रेस की ताज़ा सूची में आनंद शर्मा का नाम नहीं है। Read more
विज्ञापन एजेंसी को दोषी ठहरा कर रेलवे ने किया ब्लैकलिस्ट
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 21, 2010 | पहरेदार | Comments Off
ममता बनर्जी के रेलवे के एक विज्ञापन में दिल्ली पाकिस्तान में दिखाया गया और कलकत्ता बंगाल की खाड़ी में। मामला सामने आते ही पूर्वी रेलवे ने सारा दोष विज्ञापन एजेंसी ऐडयूनिक 76 के मत्थे जड़ा और उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया।
पूर्वी रेवले की प्रेस विज्ञप्ती के मुताबिक विज्ञापन एजेंसी ने महाराजा एक्सप्रेस की शुरुआत पर यह विज्ञापन डिजाइन किया और जारी किया। विज्ञापन में भारत का नक्शा तो ठीक है लेकिन शहरों को ग़लत जगह दिखाया गया। आप उस विज्ञापन पर नज़र डालिए। उसमें न केवल दिल्ली और कोलकाता बल्कि सभी शहरों को ग़लत दिखाया गया है। ग्वालियर गुजरात में है। गया और बांधवगढ़ भी बंगाल की खाड़ी में। आगरा राजस्थान में। बनारस उड़ीसा में। आखिर कोई इतनी ग़लतियां कैसे कर सकता है? और अगर ऐसी ग़लती हो गई है तो उस विज्ञापन को जारी कैसे किया जा सकता है? Read more
साल भर का हुआ जनतंत्र, सफर जारी है
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 21, 2010 | पहरेदार | 18 Comments
जनतंत्र को एक साल हो गया है। बीते साल मार्च में यह वेबसाइट शुरू हुई थी। अप्रैल में उसे नए सिरे से लॉन्च किया गया था। इस साल भी अप्रैल में आप जनतंत्र को नए अवतार में देखेंगे। जिसमें बहस के साथ ख़बरों पर भी जोर होगा। ख़बरों के पीछे के खेल पर भी नज़र रहेगी।
साथियों अभी यह शुरुआत है। हम चंद कदम ही चले हैं। सफ़र बहुत लंबा है और काफी मुश्किल भी। बीते एक साल में कई ऐसे मौके आए जब लगा कि जनतंत्र बंद कर दें। लेकिन बंद करने का मतलब हार मानना था। और हार मानने से कुछ हासिल नहीं होता। यही सोच कर हमने, इसे बंद नहीं किया। इसे ऐसे मंच के तौर पर विकसित करने की कोशिश में लगे रहे जहां आप और हम खुल कर अपनी बात कह सकें। स्वस्थ बहस कर सकें। एक दूसरे के ग़लत कदमों की निंदा कर सकें, आलोचना कर सकें। सरकार और मीडिया की भूमिका पर चर्चा कर सकें। Read more
शिक्षा के लिए जिस्म का सौदा – यही भारत का भविष्य है!
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 19, 2010 | पहरेदार | 3 Comments
यह रिपोर्ट बीबीसी की है। इसमें ब्रिटेन की त्रासद स्थिति का ब्योरा है। बताया गया है कि कैसे यूनिवर्सिटी की भारी फीस चुकाने के लिए लड़के-लड़कियां देह व्यापार के दलदल में फंसते जा रहे हैं। ऐसे छात्रों की संख्या तीन से बढ़ कर 25 फीसदी हो गई है। यह भारत के लिए भी ख़तरनाक संकेत है। इसलिए कि हम हर लिहाज से अमेरिका और ब्रिटेन के पीछे भाग रहे हैं।
हमारे शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल संसद में बयान देते हैं कि एक भी नया केंद्रीय विद्यालय खोलने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं। और विदेशी यूनिवर्सिटी के लिए दरवाजे खोल रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनका रिफॉर्म इस गरीब देश में रोजी-रोटी के लिए तरसते लोगों को मर्सडीज बेंज मुहैया कराने जैसा है।
हमारे हुक्मरान पहचान पत्र मुहैया कराने के नाम पर खरबों रुपये खर्च कर देते हैं। तानाशाह मुख्यमंत्रियों के जश्न पर अरबों रुपये बहा दिये जाते हैं। लेकिन शिक्षा के नाम पर बजट का छह फीसदी हिस्सा देने में उनकी जान जाने लगती है। आज यूनिवर्सिटीज से कहा जा रहा है कि वो अपना खर्चा खुद जुटाएं। यही वजह है कि यहां भी पढ़ाई दिन ब दिन महंगी होती जा रही है।
एक दशक पहले जहां एक-डेढ़ हज़ार रुपये में छात्र दिल्ली जैसे शहर में रह और पढ़ लेते थे आज उसके लिए पांच हज़ार रुपये भी कम पड़ते हैं। कॉलेजों की सालाना फीस भी दो-तीन गुना बढ़ गई है। बीस-पच्चीस रुपये वाली किताबें 250-300 रुपये में मिलती हैं। कुछ किताबें तो 500 रुपये से ऊपर हैं। बमुश्किल दो-तीन फीसदी छात्रों के लिए हॉस्टल हैं। और जिन छात्रों को बाहर रहना होता है उनका संघर्ष कई गुना बढ़ जाता है।
बीबीसी से साभार यह रिपोर्ट जनतंत्र पर छाप रहे हैं। इस उम्मीद में कि आप भी इसे पढ़ें और जेहन पर जोर डालें कि आखिर हम किस तरफ बढ़ रहे हैं। कहीं हम अपनी युवा पीढ़ी को अंधकार भरे रास्तों पर तो नहीं ढकेल रहे। – मॉडरेटर
अमीर छात्रों के लिए काम कर रहे हैं अमीर कपिल सिब्बल
लेखक: अनु सिंह चौधरी | March 18, 2010 | पहरेदार, ब्लॉग | 4 Comments
सरकार ने भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाज़े खोल दिए हैं। हर सिक्के के दो पहलुओं की तरह इस फैसले के भी दोनों पहलू समझ में आ रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इससे शिक्षा के क्षेत्र में नए विकल्प खुलेंगे, शिक्षा की गुणवत्ता शायद बेहतर होगी और हो सकता है, देशी-विदेशी विश्वविद्यालयों की इस प्रतिस्पर्द्धा का फायदा उन शिक्षकों को भी मिले जो सालों से कम वेतन का रोना रो रहे हैं।
लेकिन ये तो तय है कि भारत में कैंपस स्थापित करने का सबसे बड़ा फायदा विदेशी विश्वविद्यालयों को ही मिलेगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी भारत दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से है। भारत से हर साल तकरीबन 1.20 लाख छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेशों का रूख करते हैं, जिसमें से अधिकांश छात्रों की मंज़िल अमेरिका होती है। मानव संसाधन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी संस्थानों में पढ़ने के लिए छात्र और अभिभावक सालाना 4 बिलियन डॉलर (तकरीबन 180.2 अरब रुपये) खर्च करते हैं। हैरानी नहीं कि अटलांटा की जॉर्जिया टेक यूनिवर्सिटी ने 2008 में ही भारत में कैंपस खोलने के लिए हैदराबाद में 250 एकड़ ज़मीन खरीद ली थी। Read more
असुविधा के लिए खेद है
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 14, 2010 | पहरेदार | Comments Off
जनतंत्र को कुछ दिन में नए रंग-रूप में लॉन्च करने की तैयारी है। इस पर बहस के साथ थोड़ी-बहुत ख़बरें भी दी जाएंगी। बहस का कोना अलग। ख़बरों का अलग। इसके लिए हमारी टीम कई प्रयोग कर रही है। जिसकी वजह से अगले दो-तीन दिन तक आपको बीच-बीच में वेबसाइट पर कुछ उटपटांग चीजें नज़र आएंगी। हो सकता है कि महीनों पुराना कोई लेख उछल कर पहले पन्ने पर चला आए। इससे आपको असुविधा होगी। उम्मीद है कि आप असुविधा के लिए हमें माफ़ करेंगे और जनतंत्र के नए कलेवर पर खुले दिल से अपनी प्रतिक्रिया देंगे। पसंद-नापसंद बेझिझक जाहिर करेंगे।
भारत में फिर “अश्लील” फैशन टीवी पर रोक
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 12, 2010 | पहरेदार | Comments Off
फैशन टीवी पर नौ दिन के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। अश्लीलता फैलाने और नियमों के उल्लंघन के मामले में यह रोक लगाई गई है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के मुताबिक भारत में शुक्रवार सात बजे से लेकर 21 मार्च सात बजे तक चैनल का प्रसारण रुका रहेगा। चैनल पर बीते साल एक शो के दौरान अर्धनग्न (टॉपलेस) मॉडल्स दिखाई गई थीं।
सितंबर 2009 में पेश किए गए एक कार्यक्रम में फैशन टीवी ने नियमों का उल्लंघन किया। वह शो बच्चों के लिए सही नहीं था और महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला था। Read more
NBT-जागरण संतुलित, भास्कर-हिंदुस्तान हुड़दंग से नाराज़
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 10, 2010 | पहरेदार | Comments Off
राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल का पास होना एक ऐतिहासिक लम्हा है। हालांकि इस बिल की मंजिल अभी बहुत दूर है फिर भी इस लम्हे को भी ऐतिहासिक कहा जा सकता है। और जब भी इतिहास बनता है तो कहीं खुशी के साथ कहीं ग़म की गाढ़ी लकीर भी खिंचती है। इस बिल में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए अलग से प्रावधान नहीं किया गया है और इससे देश के बहुसंख्य तबके में छले जाने का अहसास घर कर रहा है। इस अहसास को जल्द से जल्द दूर किया जाना चाहिए वरना महिला सशक्तिकरण की कोशिशें अधूरी रह जाएंगी। जनतंत्र पर इस मुद्दे पर बहस जारी रहेगी। आप भी अपनी राय देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। साथ ही महिला आरक्षण बिल पर देश के बड़े अखबारों की क्या राय है – इस पर भी आप एक नज़र डालें। आपकी सहूलियत के लिए हमने कुछ चुनिंदा हिंदी अख़बारों के संपादकीय को सिलसिलेवार ढंग से इकट्ठा किया है। ताकि आप उन अख़बारों की नीति को अच्छे से समझ सकें। - मॉडरेटर Read more
हिंदुस्तान के साथ बिहार की विकास यात्रा पर चलें
बिहार का जिक्र आते ही जेहन में जैसे दो तस्वीरें बनती हैं। पहली सुनहरे अतीत की, जिसमें महावीर हैं। बुद्ध हैं। सम्राट चंद्रगुप्त हैं। अशोक हैं। चाणक्य हैं। गांधी का चंपारण है। बाबू राजेंद्र प्रसाद हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण आदि हैं। इसके उलट दूसरा बिंब बदहाली का उभरता है। एक घायल और मदद के लिए पुकारता बिहार। इधर पिछले कुछ दिनों से उत्साहजनक ख़बरें आई हैं कि देश का यह सर्वाधिक संवेदनशील सूबा करवट ले रहा है। अपहरण अब यहां उद्योग नहीं रहा। बड़े-बड़े अपराधी सलाखों के पीछे हैं। सड़कों के गड्ढ़े भर चले हैं और शहरों पर छाई मुर्दनी की कालिख धुल चली है। यहीं सवाल उठता है कि विकास की इस कदमताल को ओलंपिक की फर्राटा सी गति कैसे दी जाए? यहां की तरुणाई को वो जोश और जुनून कैसे दिया जाए कि वेअपनी जमीन पर रहकर उसे और मजबूत करने की कोशिश करें? Read more




