चरित्र खोता देश!
गांव के स्कूल में सुना। धोती-कुर्ता वाले मास्टर से। भावार्थ था- अगर जीवन में धन चला जाये, कोई चिंता नहीं। मान लो कुछ नहीं खोया। स्वास्थ्य गिरा, तो समझो नुकसान हुआ। पर चरित्र गिरा, तो समझो सब कुछ खत्म। Read more
इस युद्ध में नक्सलियों का सफाया ज़रूरी है
लेखक: मुकेश कुमार सिंह | April 8, 2010 | मुद्दा | 14 Comments
युद्ध की परिभाषा क्या होनी चाहिए? क्या कोई माई का लाल हमारी सरकार को ये समझा सकता है? देश के सामने आज यही सवाल खड़ा है। हम युद्धरत हैं। हमारी सरकार को ये समझ में नहीं आ रहा है। विपक्षी पार्टियां भी उसे समझा नहीं पा रही हैं। कुछ अपनी सरकारों की नाकामी को छिपाने के लिए तो कुछ इसलिए कि हम्माम में सारे नंगे हैं। लोकतंत्र में सरकार भले ही गूंगी-बहरी और निकम्मी हो जाए लेकिन अगर विपक्ष का हाल भी ऐसा हो तो कैसे जागेगी सरकार? कैसे समझेगी और कौन समझाएगा? जनता की बारी तो पांच साल पर आती है। Read more
यूपी और बिहार : पानी को लेकर रार
लेखक: आवेश तिवारी | April 6, 2010 | मुद्दा | Comments Off

अभूतपूर्व जल संकट से त्राहि त्राहि कर रहे बिहार और उत्तर प्रदेश के बीच पानी के बंटवारे को लेकर एक बार पुनः तलवारें खींच गयी हैं। बिहार सरकार ने उत्तर प्रदेश से सिंचाई के लिए रिहंद बांध से 5000 क्यूसेक पानी छोड़ने को कहा है, वहीं उत्तर प्रदेश ने जल संकट का हवाला देते हुए पानी छोड़ने से साफ इनकार कर दिया है। उप्र के सिंचाई विभाग के प्रमुख सचिव किशन सिंह अटरिया का कहना था कि मौजूदा समय में रिहंद से अतिरिक्त जल छोड़ना असंभव है। बिहार जिस रिहंद समझौते का हवाला देकर जल की मांग कर रहा है – असल में वैसा कोई भी समझौता उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच कभी नहीं हुआ है। वहीं बिहार जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने इस पूरे मामले पर केंद्रीय जल आयोग का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया है।
महत्वपूर्ण है कि बिहार के जल संकट का ये सारा तानाबाना उत्तर प्रदेश में जारी विद्युत संकट से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। प्रदूषण के अथाह भंडार पर बैठे रिहंद बांध की जलग्रहण क्षमता पिछले एक दशक में बहुत तेजी से घटी है। हर वर्ष मार्च का महीना शुरू होते ही रिहंद का जल स्तर तेजी से न्यूनतम बिंदु की ओर भागने लगता है। ऐसे में रिहंद के पानी का उपयोग करने वाले लगभग 15 हजार मेगावाट क्षमता के बिजलीघरों के सामने जबरदस्त उत्पादन संकट की स्थिति पैदा हो जाती है। उस वक़्त एनटीपीसी और उत्तर प्रदेश उत्पादन निगम के बिजलीघर जल विद्युत इकाइयों को बंद करने और पानी को नष्ट न करने की गुहार लगाने लगते हैं। यह वही समय होता है, जब बिहार और उत्तर प्रदेश में सोन नदी के किनारे स्थित तमाम जिलों में रबी की फसल के लिए पानी की जरूरत होती है, मगर सोन नदी पर स्थित इंद्रपुरी बैराज पानी के अभाव में दम तोड़ रहा होता है। वहीं समूचे बिहार को सिंचित करने वाला 125 साल पुराना सोन कैनाल सिस्टम किसानों, ग्रामीणों को मुंह चिढ़ाता नजर आता है।
यहां ये भी जान लेना जरूरी है कि सोन नदी पर ही उत्तर प्रदेश में बनाये गये सोन पंप कैनाल के माध्यम से सोनभद्र और मिर्जापुर जनपदों में सिंचाई का काम होता है।
सोना उगाने वाली सोन अब अभिशापित हो चुकी है। विकास की मौजूदा होड़ ने नदी के स्वरूप को छिन्न भिन्न करके, नदी के जल पर निर्भर किसानों-खेतिहरों के लिए मुश्किल की स्थिति पैदा कर दी है। बिहार के भोजपुर, अलवर, जहानाबाद, पाटलिपुत्र आदि जनपदों में जल संकट की वर्तमान परिस्थितयों से रबी की फसल में भारी नुकसान की संभावनाएं हैं। पूर्व में इंद्रपुरी बेराज द्वारा पूर्वी और पश्चिमी सोन कैनाल के माध्यम से इन इलाकों में 2410 क्यूसेक पानी छोड़ गया था, लेकिन ये पानी पूरी तरह से अपर्याप्त साबित हुआ है।
जल संसाधन विभाग, बिहार के अधिकारियों का कहना है कि अगर उत्तर प्रदेश हमारे हिस्से का पानी हमें दे दे तो बिहार की आवश्यकता पूरी हो सकती है – मगर उत्तर प्रदेश द्वारा समझौते का उल्लंघन किये जाने से हम आवश्यकता के सापेक्ष तीस से चालीस फीसदी ही पानी इंद्रपुरी बैराज के माध्यम से छोड़ पाते हैं। गौरतलब है कि सोन कैनाल प्रणाली द्वारा रोहतास, भभुआ, बक्सर, भोजपुर, औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, पटना जिलों के लगभग 24 लाख एकड़ जमीन पर सिंचाई किये जाने का लक्ष्य रहता है, मगर ये लक्ष्य पिछले दो दशकों में कभी पूरा नहीं हो पाया। वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के जिन हिस्सों में सोन नदी के पानी से सिंचाई होती है, वहां पर भी किसान बेबसी और लाचारी से जूझते रहते हैं। सोन पंप कैनाल भी गर्मी शुरू होते ही बंद हो जाता है। हालात ये हैं कि किसी वक़्त देश में सर्वाधिक टमाटर पैदा करने वाले मिर्जापुर के इलाकों से ज्यादातर किसान एक बार पुनः वनोपजों की खेती की ओर लौटने लगे हैं।
सोन के सूखने की वजह सिर्फ उत्तर प्रदेश में ताप बिजलीघरों की रिहंद बांध पर अतिनिर्भरता और रिहंद जलाशय का जल संकट ही नहीं है। प्रदेश के सोनभद्र जनपद में बालू का अवैध खनन भी इस संकट की एक बड़ी वजह है। सत्ता समर्थित माफियाओं ने सोनभद्र में सोन नदी को बालू के खनन हेतु जगह जगह से बांध दिया है। कई जगहों पर तो वो पाइपों से होकर गुजरती है। ऐसे में नदी के जलस्तर का कम होना स्वाभाविक है। इसके अलावा सोन कैनाल प्रणाली की मरम्मत को लेकर भी बिहार की सरकार ने कभी गंभीर प्रयास नहीं किया। नीतीश कुमार द्वारा कैनाल के जीर्णोद्वार हेतु वादे तो बार बार किये गये, लेकिन उन्हें पूरा नहीं किया गया।
जल आंदोलन से जुड़े और बिहार के पत्रकार प्रभात कुमार शांडिल्य कहते हैं, आप राज्य सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से लगा सकते हैं कि 1965 में अस्तित्व में आये इंद्रपुरी बैराज ने अपनी उम्र पूरी कर ली है, लेकिन सरकार के पास नया बैराज बनाने का या फिर इंद्रपुरी का अन्य विकल्प तैयार करने का कोई भी कार्यक्रम नहीं है।
जहां तक रिहंद समझौते का प्रश्न है, जिसे हम बाणसागर अनुबंध भी कहते हैं, बिहार को रिहंद जलाशय से कुल 50 लाख एकड़ फीट पानी दिया जाना था। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के बीच हुए इस समझौते का अगर पालन किया जाता तो स्थिति पूरी तरह से भिन्न होती। मगर अफसोस इस बात का है कि रिहंद बांध के अस्तित्व में आने के बाद से ही पूरी तरह से भविष्यगत जल संकट की अनदेखी की गयी। एक तरफ रिहंद की तलहटी में जमे कचड़े ने बांध को अधमरा कर दिया – हालात यूं हो गये कि बांध की जलग्रहण क्षमता को कम (880 से 970 फीट) करना पड़ा, वहीं दूसरी तरफ सोन नदी में जमा गाद के ढेर से सोन का न्यूनतम जल बिंदु भी पांच से छह फीट बढ़ गया। ऐसे में स्वाभाविक जल प्रवाह पर तो असर पड़ा ही, रही-सही कसर उत्तर प्रदेश में बन रहे दुनिया के सबसे बड़े एनर्जी पार्क ने पूरी कर दी। अब जबकि बिहार सोन नदी पर बहुद्देशीय बांध बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है, आने वाले दिन दोनों ही राज्यों के लिए संबंधों को और भी तल्खी भरा कर सकते हैं।
(आवेश तिवारी। लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आवेश से awesh29@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
कुंबले-धोनी मॉडल से सबक लें बीजेपी और कांग्रेस
लेखक: अभिषेक दूबे | December 23, 2009 | मुद्दा, स्पेशल रिपोर्ट | 4 Comments
देश के महान गेंदबाज अनिल कुंबले और सियासत के माहिर खिलाड़ी लाल कृष्ण आडवाणी का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, लेकिन अपने-अपने क्षेत्र में ये दोनों लीडरशिप को लेकर दिलचस्प केस स्टडी बन सकते हैं।
भारत जब टेस्ट क्रिकेट में दुनिया की नम्बर वन टीम बना, तो पूर्व कप्तान कुंबले ने अपने कॉलम एक अहम बात कही…”20 महीने पहले गैरी कर्स्टन के कोच बनने के बाद पूरी टीम ने नम्बर वन बनने का सपना देखा था। मैं कप्तान के तौर पर इस हसरत का हिस्सा रहा। लेकिन नंबर वन बनने में हर किसी का योगदान रहा। इसकी एक बड़ी वजह रही कि हर किसी के मन में ये साफ था कि हमें पहुंचना कहां है। ये पहले से ही तय था कि मेरा उत्तराधिकारी कौन होगा जिससे कि ये मिशन इसी मजबूती के साथ आगे बढ़ सके” अनिल कुंबले टेस्ट कप्तानी में अपने उत्तराधिकारी महेंद्र सिंह धोनी की ओर इशारा कर रहे थे…अगर कुंबले-धोनी दौर इस बात की मिसाल है कि कैसे अगली पीढ़ी को बेटन थमाया जाना चाहिए तो अटल-आडवाणी दौर इस बात की गवाह रही कि उत्तराधिकार तय करने में लापरवाही और दिशाहीनता कैसे एक पार्टी, एक विचारधारा और एक सोच को हाशिए पर ले जाती है। Read more
छह से सात रुपये में बिकेंगे अख़बार!
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 29, 2009 | पहरेदार, मुद्दा | Comments Off
अगले दो से तीन साल के भीतर अख़बारों की कीमत छह से सात रुपये हो सकती है। दिल्ली में दो दिन पहले साउथ एशिया न्यूज़ पेपर कॉन्फ्रेंस हुई। जिसमें न्यूज़पेपर इंडस्ट्री के दिग्गजों ने हिस्सा लिया इस कॉन्फ्रेंस में द हिंदू के प्रबंध निदेशक एन मुरली ने कहा कि अख़बारों की लागत को कम करने के लिए दाम बढ़ाने की ज़रूरत है। उनके मुताबिक अब तक प्रिंट मीडिया का विज्ञापन रेवेन्यू बीस फीसदी प्रति वर्ष की रफ़्तार से बढ़ रहा था। लेकिन अब बढ़ोतरी की रफ़्तार दस फीसदी से कम रहने का अनुमान है। ऐसे में अख़बारों की लागत को कम करने के उपायों पर गौर करना होगा। Read more
सेक्स विवाद में फंसे बार्लुस्कोनी के निशाने पर प्रेस
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 29, 2009 | देश-दुनिया, मुद्दा | 1 Comment
इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बार्लुस्कोनी ने अब मीडिया से दो-दो हाथ करने की ठान ली है। निजी ज़िंदगी को लेकर मीडिया के कवरेज से बार्लुस्कोनी काफी दुखी हैं। बीते कुछ महीनों में बार्लुस्कोनी की निजी ज़िंदगी से जुड़े कई विवादों को यूरोपीय मीडिया ने चटखारे लेकर प्रस्तुत किया। बड़ी संख्या में उनकी नग्न तस्वीरें छापी गईं। आरोप लगाया गया कि उनके घर पर हुई पार्टी में कई कम उम्र की लड़कियों को बुलाया गया था। अब बार्लुस्कोनी के वकील का कहना है कि उनके ख़िलाफ़ मुहिम में जुटे मीडिया संस्थानों पर कार्रवाई की जाएगी। Read more
“प्रभाष जोशी पर सवाल उठाने वाले लफंगे हैं”
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 27, 2009 | मुद्दा | 24 Comments
प्रभाष जोशी चुप हैं। चुप्पी एक हथियार है। वो हथियार जिससे सत्ता बड़े से बड़े आंदोलन को दबाती है। प्रभाष जोशी पत्रकारिता के शलाका पुरुष हैं। वो इस हथियार से न केवल वाकिफ हैं। बल्कि इसकी मारक क्षमता के परिचित भी हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने कागद कारे में लिखा कि बड़ी बेशर्मी है कोई जवाब भी नहीं देता। वो आहत थे। आहत इसलिए कि उन्होंने पैसे लेकर ख़बरें छापने का काला धंधा उजागर किया था उस पर कोई संस्थान जवाब नहीं दे रहा था। ठीक वैसे ही प्रभाष जोशी भी अपने इंटरव्यू से उठे सवालों पर जवाब नहीं दे रहे हैं। लेकिन अब उनके बदले कई लोग प्रतिक्रिया दे रहे हैं। अंबरीश कुमार, आलोक, संजय कुमार सिंह, गणेश प्रसाद झा, शमशेर सिंह… सभी के “नामों” से प्रतिक्रिया आई है। यहां हम उन सभी की प्रतिक्रिया छाप रहे हैं। उनकी ई-मेल आईडी भी। कोई खुद को प्रभाष जोशी का “लठैत” बता रहा है। कोई “पहलवान” तो कोई प्रभाष जोशी के इंटरव्यू पर सवाल उठाने वालों को “लफंगा” कह रहा है। अब आप इनकी भाषा पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। – मॉडरेटर Read more
न्यूज़ चैनलों के संपादकों का अपना संगठन
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 23, 2009 | पहरेदार, मुद्दा | Comments Off
न्यूज़ चैनलों के संपादकों ने अपना अलग संगठन बनाया है। इसका नाम ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए)। बीईए के पहले अध्यक्ष बने हैं स्टार न्यूज़ के शाजी जमा। टाइम्स नाउ के एडिटर अर्णव गोस्वामी और एनडीटीवी इंडिया के मैनेजिंग एडिटर (स्पेशल) पंकज पचौरी उपाध्यक्ष चुने गए हैं। ईटीवी के एन के सिंह महासचिव हैं और लाइव इंडिया के सुधीर चौधरी कोषाध्यक्ष। इनके अलावा आशुतोष (आईबीएन-7), विनय तिवारी (सीएनएन-आईबीएन), अजीत अंजुम (न्यूज़ – 24), सतीश के सिंह (ज़ी न्यूज़), विनोद कापरी (इंडिया टीवी), संजय ब्राग्टा (सहारा टीवी) और प्रांजल शर्मा (यूटीवी) इस संगठन की कार्यकारी समिति के सदस्य चुने गए हैं। Read more
स्वाइन फ्लू पर सरकार और संपादकों की बैठक
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 18, 2009 | पहरेदार, मुद्दा | Comments Off
न्यूज़ चैनलों और अख़बारों के संपादकों के साथ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद और सूचना एंव प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने बैठक की। बैठक में सरकार ने स्वाइन फ्लू की रोकथाम के लिए उठाए जा रहे कदमों का ब्योरा दिया। साथ ही ये भी बताया कि इस बीमारी से लड़ने के लिए नए दिशानिर्देश अगले एक-दो दिन में जारी कर दिए जाएंगे। Read more
अमेरिका में निकलेगी “टीआरपी” की हवा!
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 17, 2009 | देश-दुनिया, मुद्दा | Comments Off
टीआरपी का लफड़ा सिर्फ़ भारत में नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में है। हर जगह इस टीआरपी ने टेलीविजन चैनलों में काम करने वालों की ज़िंदगी में चरस बो दिया है। अमेरिका में तो मीडिया कंपनियां इतनी परेशान हैं कि उन्होंने टीआरपी मापने वाली कंपनी नील्सन मीडिया रिसर्च को चुनौती देने का मन बना लिया है। Read more




