भारत में फिर “अश्लील” फैशन टीवी पर रोक

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  March 12, 2010  |  मुद्दा   |   Leave a Comment

फैशन टीवी पर नौ दिन के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। अश्लीलता फैलाने और नियमों के उल्लंघन के मामले में यह रोक लगाई गई है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के मुताबिक भारत में शुक्रवार सात बजे से लेकर 21 मार्च सात बजे तक चैनल का प्रसारण रुका रहेगा। चैनल पर बीते साल एक शो के दौरान अर्धनग्न (टॉपलेस) मॉडल्स दिखाई गई थीं।

सितंबर 2009 में पेश किए गए एक कार्यक्रम में फैशन टीवी ने नियमों का उल्लंघन किया। वह शो बच्चों के लिए सही नहीं था और महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला था। Read more

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क्या महिला हिंदू, मुस्लिम, पंडित या दलित नहीं होती

लेखक: समरेंद्र  |  March 12, 2010  |  मुद्दा   |   Leave a Comment

यह एक बड़ी हक़ीक़त है कि महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में पास हो गया है। इसलिए बहस का यह मुद्दा कतई नहीं हो सकता कि महिलाओं को आरक्षण दिया जाए या नहीं। देर सवेर यह आरक्षण उन्हें मिलना ही है। इसलिए बहस इस पर होनी चाहिए कि क्या दलितों-आदिवासियों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों, को उनका हक़ दिया जाए या नहीं। यह हक़ दिया ही जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तब फिर यह इस देश की बहुसंख्य आबादी के साथ बहुत बड़ा धोखा होगा। और महिला आरक्षण को सकारात्मक कदम की जगह अवर्णों और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ सवर्णों की क्रूर साज़िश के तौर पर जाना जाएगा। Read more

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कुंबले-धोनी मॉडल से सबक लें बीजेपी और कांग्रेस

देश के महान गेंदबाज अनिल कुंबले और सियासत के माहिर खिलाड़ी लाल कृष्ण आडवाणी का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, लेकिन अपने-अपने क्षेत्र में ये दोनों लीडरशिप को लेकर दिलचस्प केस स्टडी बन सकते हैं।

भारत जब टेस्ट क्रिकेट में दुनिया की नम्बर वन टीम बना, तो पूर्व कप्तान कुंबले ने अपने कॉलम एक अहम बात कही…”20 महीने पहले गैरी कर्स्टन के कोच बनने के बाद पूरी टीम ने नम्बर वन बनने का सपना देखा था। मैं कप्तान के तौर पर इस हसरत का हिस्सा रहा। लेकिन नंबर वन बनने में हर किसी का योगदान रहा। इसकी एक बड़ी वजह रही कि हर किसी के मन में ये साफ था कि हमें पहुंचना कहां है। ये पहले से ही तय था कि मेरा उत्तराधिकारी कौन होगा जिससे कि ये मिशन इसी मजबूती के साथ आगे बढ़ सके” अनिल कुंबले टेस्ट कप्तानी में अपने उत्तराधिकारी महेंद्र सिंह धोनी की ओर इशारा कर रहे थे…अगर कुंबले-धोनी दौर इस बात की मिसाल है कि कैसे अगली पीढ़ी को बेटन थमाया जाना चाहिए तो अटल-आडवाणी दौर इस बात की गवाह रही कि उत्तराधिकार तय करने में लापरवाही और दिशाहीनता कैसे एक पार्टी, एक विचारधारा और एक सोच को हाशिए पर ले जाती है। Read more

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छह से सात रुपये में बिकेंगे अख़बार!

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  August 29, 2009  |  पहरेदार, मुद्दा   |   Comments Off

अगले दो से तीन साल के भीतर अख़बारों की कीमत छह से सात रुपये हो सकती है। दिल्ली में दो दिन पहले साउथ एशिया न्यूज़ पेपर कॉन्फ्रेंस हुई। जिसमें न्यूज़पेपर इंडस्ट्री के दिग्गजों ने हिस्सा लिया इस कॉन्फ्रेंस में द हिंदू के प्रबंध निदेशक एन मुरली ने कहा कि अख़बारों की लागत को कम करने के लिए दाम बढ़ाने की ज़रूरत है। उनके मुताबिक अब तक प्रिंट मीडिया का विज्ञापन रेवेन्यू बीस फीसदी प्रति वर्ष की रफ़्तार से बढ़ रहा था। लेकिन अब बढ़ोतरी की रफ़्तार दस फीसदी से कम रहने का अनुमान है। ऐसे में अख़बारों की लागत को कम करने के उपायों पर गौर करना होगा। Read more

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सेक्स विवाद में फंसे बार्लुस्कोनी के निशाने पर प्रेस

इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बार्लुस्कोनी ने अब मीडिया से दो-दो हाथ करने की ठान ली है। निजी ज़िंदगी को लेकर मीडिया के कवरेज से बार्लुस्कोनी काफी दुखी हैं। बीते कुछ महीनों में बार्लुस्कोनी की निजी ज़िंदगी से जुड़े कई विवादों को यूरोपीय मीडिया ने चटखारे लेकर प्रस्तुत किया। बड़ी संख्या में उनकी नग्न तस्वीरें छापी गईं। आरोप लगाया गया कि उनके घर पर हुई पार्टी में कई कम उम्र की लड़कियों को बुलाया गया था। अब बार्लुस्कोनी के वकील का कहना है कि उनके ख़िलाफ़ मुहिम में जुटे मीडिया संस्थानों पर कार्रवाई की जाएगी। Read more

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“प्रभाष जोशी पर सवाल उठाने वाले लफंगे हैं”

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  August 27, 2009  |  मुद्दा   |   24 Comments

प्रभाष जोशी चुप हैं। चुप्पी एक हथियार है। वो हथियार जिससे सत्ता बड़े से बड़े आंदोलन को दबाती है। प्रभाष जोशी पत्रकारिता के शलाका पुरुष हैं। वो इस हथियार से न केवल वाकिफ हैं। बल्कि इसकी मारक क्षमता के परिचित भी हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने कागद कारे में लिखा कि बड़ी बेशर्मी है कोई जवाब भी नहीं देता। वो आहत थे। आहत इसलिए कि उन्होंने पैसे लेकर ख़बरें छापने का काला धंधा उजागर किया था उस पर कोई संस्थान जवाब नहीं दे रहा था। ठीक वैसे ही प्रभाष जोशी भी अपने इंटरव्यू से उठे सवालों पर जवाब नहीं दे रहे हैं। लेकिन अब उनके बदले कई लोग प्रतिक्रिया दे रहे हैं। अंबरीश कुमार, आलोक, संजय कुमार सिंह, गणेश प्रसाद झा, शमशेर सिंह… सभी के “नामों” से प्रतिक्रिया आई है। यहां हम उन सभी की प्रतिक्रिया छाप रहे हैं। उनकी ई-मेल आईडी भी। कोई खुद को प्रभाष जोशी का “लठैत” बता रहा है। कोई “पहलवान” तो कोई प्रभाष जोशी के इंटरव्यू पर सवाल उठाने वालों को “लफंगा” कह रहा है। अब आप इनकी भाषा पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। – मॉडरेटर Read more

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न्यूज़ चैनलों के संपादकों का अपना संगठन

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  August 23, 2009  |  पहरेदार, मुद्दा   |   Comments Off

न्यूज़ चैनलों के संपादकों ने अपना अलग संगठन बनाया है। इसका नाम ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए)। बीईए के पहले अध्यक्ष बने हैं स्टार न्यूज़ के शाजी जमा। टाइम्स नाउ के एडिटर अर्णव गोस्वामी और एनडीटीवी इंडिया के मैनेजिंग एडिटर (स्पेशल) पंकज पचौरी उपाध्यक्ष चुने गए हैं। ईटीवी के एन के सिंह महासचिव हैं और लाइव इंडिया के सुधीर चौधरी कोषाध्यक्ष। इनके अलावा आशुतोष (आईबीएन-7), विनय तिवारी (सीएनएन-आईबीएन), अजीत अंजुम (न्यूज़ – 24), सतीश के सिंह (ज़ी न्यूज़), विनोद कापरी (इंडिया टीवी), संजय ब्राग्टा (सहारा टीवी) और प्रांजल शर्मा (यूटीवी) इस संगठन की कार्यकारी समिति के सदस्य चुने गए हैं। Read more

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स्वाइन फ्लू पर सरकार और संपादकों की बैठक

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  August 18, 2009  |  पहरेदार, मुद्दा   |   Comments Off

न्यूज़ चैनलों और अख़बारों के संपादकों के साथ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद और सूचना एंव प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने बैठक की। बैठक में सरकार ने स्वाइन फ्लू की रोकथाम के लिए उठाए जा रहे कदमों का ब्योरा दिया। साथ ही ये भी बताया कि इस बीमारी से लड़ने के लिए नए दिशानिर्देश अगले एक-दो दिन में जारी कर दिए जाएंगे। Read more

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अमेरिका में निकलेगी “टीआरपी” की हवा!

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  August 17, 2009  |  देश-दुनिया, मुद्दा   |   Comments Off

टीआरपी का लफड़ा सिर्फ़ भारत में नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में है। हर जगह इस टीआरपी ने टेलीविजन चैनलों में काम करने वालों की ज़िंदगी में चरस बो दिया है। अमेरिका में तो मीडिया कंपनियां इतनी परेशान हैं कि उन्होंने टीआरपी मापने वाली कंपनी नील्सन मीडिया रिसर्च को चुनौती देने का मन बना लिया है। Read more

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ये संपादक तो बड़ा ख़तरनाक है

जागरण में छपी तस्वीर

जागरण में छपी तस्वीर

क्या किसी पत्रकार को ये हक़ है कि वो निजी खुन्नस निकालने में अपने संस्थान का इस्तेमाल करे? इस सवाल का सीधा जवाब है – नहीं। किसी भी पत्रकार को ऐसा नहीं करना चाहिए और ना ही उसे ये हक़ दिया जाना चाहिए। इसी सिलसिले में दिल्ली के एक मीडिया संस्थान का एक वाकया ध्यान आ रहा है। वहां के एक कर्मचारी ने किसी इंस्टीट्यूट को डराने के लिए संस्थान का बेजा इस्तेमाल कर दिया था। इंस्टीट्यूट की तरफ से शिकायत मिलने पर उस कर्मचारी को नौकरी छोड़नी पड़ी। लेकिन आप हर कंपनी से ऐसी आचार संहिता की उम्मीद नहीं कर सकते। खासकर जब वो कंपनी अपने कर्मचारियों का इस्तेमाल अनैतिक तरीके से धन जुटाने में करती हो। Read more

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