दलित छात्रों की आवाज़ नहीं सुनते हैं विभूति नारायण राय

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  March 11, 2010  |  हक़ की आवाज़   |   1 Comment

जनतंत्र के पास यह चिट्ठी अंबेडकर स्टूडेंट्स फोरम ने भेजी है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के इस फोरम ने अपने इस ख़त में कुलपति विभूति नारायण राय के आरोपों का जवाब दिया है। जनतंत्र और मोहल्लालाइव से बातचीत में विभूति नारायण ने यह कहा था कि दलित छात्रों ने 6 दिसंबर की अपनी रैली का न्योता उन्हें नहीं दिया। कुलपति महोदय ने यह भी कहा कि दलित छात्रों की उस रैली में ब्राह्मणों को मां-बहन की गालियां दी गईं। उसी आरोप में उन्होंने यूनिवर्सिटी के एकमात्र दलित प्रोफेसर कारुण्यकारा को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया। वो भी एक बार नहीं बल्कि दो बार। अंबेडकर फोरम के मुताबिक जुलूस में शामिल होने का न्योता विभूति नारायण राय को भेजा गया था। यह भी की उस जुलूस में ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ नारे लगे और किसी जाति विशेष को कोई गाली नहीं दी गई। – मॉडरेटर

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति माननीय विभूति नारायण राय ने अपने इंटरव्यू में 06 दिसंबर को बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर आयोजित जुलूस को लेकर कई बातें की हैं। चूंकि यह रैली अम्बेडकर स्टूडेन्ट्स फोरम (ए.एस.एफ.) ने आयोजित की थी, लिहाजा हम अपनी ओर से कुछ स्पष्टीकरण देना जरूरी समझते हैं। कुलपति जी ने अपने साक्षात्कार में ऐसी कई आधारहीन बातें की हैं जिससे हमें भारी निराशा हुई है। एक संस्था के सर्वोच्च पद पर बैठा कोई सम्माननीय व्यक्ति, जो स्वयं पुलिस का इतना बड़ा अधिकारी रहा है – ऐसी बातें कर सकता है, यह हमारे लिए अत्यंत दुखद है। Read more

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महिलाओं को बांटने की कोशिश कर रहे हैं लालू-मुलायम

लेखक: मोहिनी गिरि  |  March 8, 2010  |  हक़ की आवाज़   |   1 Comment

पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का आगे आना इसलिए जरूरी है कि वे परिवार और समाज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था ने पुरुषों को आगे बढ़ने के कई मौके दिए हैं पर वह महिलाओं के हक के लिए नहीं लड़ते और न ही महिलाओं के मुद्दों से उनका कोई सरोकार है। कितने पुरुष सांसद है जो दुष्कर्म, छेड़खानी जैसे मामलों को छोड़कर महिलाओं की बुनियादी जरूरतों के बारे में सोचते हैं? सरकारी अस्पतालों में गरीब महिलाएं किस तरह बच्चे को जन्म देती हैं, इसके बारे में कितने सांसद सोचते हैं? यदि महिलाओं के लिए अब तक कुछ किया भी गया है तो केवल राजनीतिक फायदे के लिए। अब जब सरकार संसद और विधायिका में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखा रही है तो इस विधेयक का विरोध करने वाले दलों को शांत मन से इस विधेयक का समर्थन करना चाहिए। Read more

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बात नारी के हक़ और बराबरी की है, पूरब-पश्चिम की नहीं

पश्चिमी नारीवाद तो क्या प्राच्य के नारीवाद की भी मेरी खास समझ नहीं थी, लेकिन फिर भी बचपन से ही परिवार और समाज के अनेक उपदेशों और बंधनों को मैंने मानने से इनकार कर दिया या उन पर सवाल किए। मुझे जब बाहर मैदान में खेलने नहीं दिया जाता और मेरे भाइयों को खेलने दिया जाता था। ऋतुधर्म के समय मुझे जब अपवित्र बोला जाता। मुझसे कहा जाता कि मैं बड़ी हो गई हूं और बाहर निकलते समय काले रंग का बुरका पहन कर निकलूं। ऐसे हर मौके पर मैंने प्रश्न किए हैं। Read more

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दलितों, पिछड़ों के ख़िलाफ़ साज़िश है महिला आरक्षण बिल

लेखक: अजय यादव  |  March 8, 2010  |  हक़ की आवाज़   |   3 Comments

बात अगर यूं कहें कि भारत, एक ऐसा देश, जो अपने निर्माण के हजारों साल पहले से ही धर्म, जाति, क्षेत्र, समुदाय और विभिन्न संस्कृतियों के बीच उलझा हुआ देश था (है), आज वही देश कई तरह के संक्रमण को झेलते हुए न सिर्फ दुनिया की महाशक्ति बनने को बेकरार है, बल्कि संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने को प्रतिबद्ध भी। भारत के लिए यह ऐतिहासिक समय ही है कि महिला दिवस के मौके पर दक्षिणपंथी-वामपंथी-कांग्रेसी और कुछ क्षेत्रीय दल भी राजनीति में महिलाओं को एक तिहाई हिस्सेदारी देने के लिए एकमत हो गये हैं। ‘आरक्षण विरोधियों’ या यूं कहिए कि पिछड़ों का प्रतिनिधित्व करने वाली नाममात्र की कुछ क्षेत्रीय पार्टियों को छोड़ दें तो आज पूरा देश इस बात पर सहमत है कि महिलाएं, जो किसी भी वर्ग, वर्ण, जाति, क्षेत्र, समुदाय, धर्म या संस्कृति की हों, ‘दलित’ ही हैं, इसलिए उन्हें आरक्षण देना देश और समाज के हित में है – जाहिर है यह सब पढ़कर बहुतों को अच्छा लग रहा होगा, और इनमें भी सबसे ज्यादा वे लोग होंगे जो महिला आरक्षण के मामले में भरत (भारत) के साथ हैं। Read more

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ये थ्री, इडियट्स नहीं हैं!

लेखक: आवेश तिवारी  |  February 22, 2010  |  ब्लॉग, हक़ की आवाज़   |   1 Comment

ये तीन थे। मगर इडियट्स नहीं थे। न ही किसी 70 एमएम की फिल्म के हीरो थे, जिनकी अदाकारी पर आप ताली बजाएं। ये तीनों देश के सर्वाधिक मेधावी छात्रों में से एक थे। अभी दो हफ़्ते पहले की बात है। इनमें से एक के. सुशील ने छात्रावास परिसर में आत्महत्या की कोशिश की। कृष्णमोहन ने इसी महीने 48 घंटों तक खुद को कमरे में बंद रखा। वहीं ज्ञानेंद्र के पास अपनी विधवा मां के सवालों के उत्तर में सिर्फ़ आंसू थे। देश के बड़े प्रौद्योगिकी संस्थानों में से एक भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान इलाहाबाद के इन होनहार छात्रों की इस हालत की वजह सिर्फ एक थी। इन दलित छात्रों ने संस्थान के निदेशक द्वारा संस्थान के ही एक विद्वान प्राध्यापक की मनमाने ढंग से असमय सेवा समाप्ति के आदेश को लेकर ई-मेल किए थे। इसका खामियाजा इन्हें विश्ववद्यालय से निलंबन के साथ बंधक बनकर चुकाना पड़ा। Read more

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झारखंड पुलिस ने प्रभात ख़बर के विश्वास की हत्या की

लेखक: प्रभात ख़बर  |  February 21, 2010  |  हक़ की आवाज़   |   1 Comment


यह ख़बर प्रभात ख़बर में छपी है। इसे वहीं से साभार जनतंत्र पर छापा जा रहा है। इस रिपोर्ट से झारखंड पुलिस की बेशर्मी जाहिर होती है। यह भी कि अगर पुलिस के आला अधिकारियों ने प्रभात ख़बर की टीम में भरोसा जताते हुए उसे माओवादियों के पास भेजा था और बीडीओ प्रशांत कुमार को लाने की जिम्मेदारी सौंपी थी तो एक एसपी इतनी हिम्मत कैसे कर सकता है कि वो उस टीम को बीच जंगल में घेर ले। आप इस पूरी रिपोर्ट को पढ़िए और सोचिए कि जहां पुलिस और प्रशासन का रवैया इतना बेहूदा हो वहां पर नक्सली समस्या से कैसे निपटा जा सकता है? – मॉडरेटर

माओवादियों ने शुक्रवार शाम लगभग छह बजे गुड़ाबांधा के पास जंगल में बीडीओ प्रशांत कुमार लायक को प्रभात खबर की टीम को सही सलामत सौंप दिया. अपना वादा भी नक्सलियों ने निभाया. जब तक प्रभात खबर की टीम जंगल में थी, सरकार ने भी अपना वादा निभाते हुए कोई ऐसा काम नहीं किया, जिससे स्थिति बिगड़ती. शुक्रवार को जब प्रभात खबर के पास माओवादियों ने संदेश भेजा कि बीडीओ प्रशांत को वे रिहा कर सकते हैं, लेकिन सिर्फ प्रभात खबर की टीम के समक्ष. प्रभात खबर के पास धर्मसंकट था. प्रभात खबर ने पत्रकारिता के धर्म को निभाते हुए झारखंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया. उन्हें बताया कि माओवादियों की ओर से ऐसा संकेत आया है. अगर सरकार कहेगी, तो प्रभात खबर की टीम जान जोखिम में डाल कर यह दायित्व निभाने को तैयार हैं. सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने सहमति दी. फिर शुरू हुआ अभियान. काम जोखिम भरा था. प्रभात खबर की टीम को माओवादियों द्वारा संदेश दिया गया कि किस जगह पर पहले जाना है. Read more

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“झूठे मुकदमे वापस लेकर पत्रकारों को रिहा करे सरकार”

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  February 17, 2010  |  हक़ की आवाज़   |   Leave a Comment

भारत एक बार फिर इमरजेंसी जैसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है, जहां विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडियाकर्मियों की खबर देने की आजादी खतरे में है। दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आज एक सेमिनार में इस बात पर चिंता जताई गई कि मीडिया के लिए तथ्यों की रिपोर्टिंग करना, खासकर आंदोलनों की खबरें देना इस समय कितना खतरनाक है। इस सेमिनार में मांग की गई कि झूठे मुकदमों में गिरफ्तार किए गए तमाम पत्रकारों को रिहा किया जाए।

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नय्यर ने कहा कि मौजूदा दौर में सरकार के कामकाज में पारदर्शिता यानी ट्रांसपेरेंसी घटी है, और सच को सामने लाने वाले पत्रकारों पर हमले तेज हुए हैं। प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंटने के मकसद से किए जा रहे हमलों में तेजी आई है। उन्होंने कहा कि 1974 में लगी इमरजेंसी के खिलाफ पत्रकारों ने जिस तरह विरोध किया था, वैसी आवाज एक बार फिर उठाने की जरूरत है और इसके लिए पत्रकारों के संगठनों को आगे आना चाहिए। Read more

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पुलिस ने कहा नक्सली, मीडिया ने कबूल कर लिया

लेखक: आवेश तिवारी  |  February 8, 2010  |  हक़ की आवाज़   |   2 Comments

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद की पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सीमा आजाद और उनके पति विश्वविजय को अचानक इलाहाबाद जंक्‍शन से गिरफ्तार कर लिया गया। वे दिल्‍ली में आयोजित विश्‍व पुस्‍तक मेले से लौट रहे थे। ये घटना बताती है कि उत्तर प्रदेश में मानवाधिकार आहत और लहूलुहान है। जिस एक वजह से सीमा आज़ाद और उनके पति की गिरफ्तारी की गयी, उस एक वजह का यहां हम खुलासा करेंगे।

जिस वक़्त सीमा आजाद को गिरफ्तार किया गया, ठीक उसी वक़्त पूर्वी उत्तर प्रदेश के अति नक्सल सोनभद्र जनपद में सोन नदी के किनारे बालू के अवैध खनन को लेकर सरकार के विधायक विनीत सिंह और उदयभान सिंह उर्फ़ डॉक्टर के समर्थकों के बीच गोलीबारी हो रही थी। इस गोलीबारी से डर कर तमाम आदिवासी अपने घरों से भाग खड़े हुए थे। घटनास्थल पर पुलिस पहुंची। गोली के खोखे भी बरामद किये, लेकिन किसी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गयी। ये घटना कोई नयी नहीं है। समूचे प्रदेश में खनन मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा और उनके कारिंदों के द्वारा अवैध खनन का जाल बिछा कर अरबों रुपये की काली कमाई की जा रही है और इसको अंजाम तक पहुंचाने के लिए प्रदेश के तमाम माफियाओं, हिस्ट्रीशीटरों को बेनामी ठेके दिये जा रहे हैं। निस्संदेह ऐसी स्थिति में आम मजदूर, आदिवासी और किसान का शोषण होना लाजिमी है। Read more

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कविता का रामदास और पुणे का सतीश शेट्टी

भारत के समकालीन लोकतंत्र की ख़ूबियों और उसमें आ रही गिरावटों को कविता में सबसे मुखर सबसे तीखे और सबसे उदास ढंग से दर्ज करने वाले थे हिंदी के वरिष्ठ कवि रघुबीर सहाय जिन्हें नागरिक लोकतांत्रिक मूल्यों की हिफ़ाज़त का पहरुआ कवि भी माना जाता है. उनकी एक चर्चित कविता है रामदास जिसे आशंका हो गई है कि एक दिन उसकी हत्या होगी. वो घर से निकलता है, उधेड़बुन, असमंजस और आधे भय आधे साहस और किंचित उदासी के साथ,

रामदास उस दिन उदास था, अंत समय आ गया पास था, उसे पता था आज उसकी हत्या होगी.

कविता का नागरिक रामदास अपनी हत्या की पक्की ख़बर को जानता हुआ जिस तरह चौड़ी सड़क और पतली गली से गुज़रता हुआ जा रहा था कुछ कुछ उसी तरह 21वीं सदी के हिंदुस्तान के एक शहर की एक सड़क पर सुबह की सैर पर निकला था सतीश शेट्टी. जिसकी उम्र 38 साल थी और उसे पता था कि उसकी हत्या हो सकती है. और उसने बताते हैं कि पुलिस को इस बारे में बताया भी था. उसे पता था कि भू दलालों के जिस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए वो सूचना के अधिकार के औजारों से लड़ाई में कूदा है वो उसे फंसा कर गिरा भी सकता है. लेकिन इस आशंका और चिंता के बावजूद सतीश सैर पर निकला था. खुली हवा से अपने फेफड़ो को सक्रिय करने और अपने ख़ून को और तपिश से भरने और अपने इरादों को और तरोताज़ा और इस्पाती बनाने के लिए. Read more

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किससे और क्यों इंसाफ़ मांगू मैं?

लेखक: सचिन गौड़  |  January 18, 2010  |  हक़ की आवाज़   |   2 Comments

मैं सतीश शेट्टी हूं. मेरी हत्या हुए कुछ दिन बीत गए हैं. पुलिस जांच चल रही है, सीबीआई जांच की मांग भी उठ रही है. कुछ लोग पकड़े भी गए हैं, शायद जल्द ही मेरी हत्या की ‘नई थ्योरी’ भी सामने आ जाए. पर मैं अब इन सब पचड़ों से दूर जा चुका हूं.

ऊपर जा कर थोड़ा तनावमुक्त भी महसूस कर रहा हूं. लंबे समय से एक मुहिम लड़ रहा था. ज़मीन घोटालों, भ्रष्टाचार, नौकरशाही, सत्ता और दलालों के बीच के संबधों को उजागर करने के लिए आरटीआई एक्ट को औजार बना कर संघर्ष कर रहा था. Read more

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