“सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराये जाएंगे”
लेखक: अरुंधती रॉय | March 29, 2010 | हक़ की आवाज़ | Comments Off
दंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केंद्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है।
दंतेवाड़ा में पुलिस सादे कपड़े पहनती है और बागी पहनते हैं वर्दी। जेल अधीक्षक जेल में है, और कैदी आजाद (दो साल पहले शहर की पुरानी जेल से करीब 300 कैदी भाग निकले थे)। जिन महिलाओं का बलात्कार हुआ है, वे पुलिस हिरासत में हैं। बलात्कारी बाजार में खड़े भाषण दे रहे हैं। Read more
चोरों ने की थी सत्येंद्र दुबे की हत्या, तीन दोषी करार
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 22, 2010 | हक़ की आवाज़ | Comments Off

पटना की विशेष अदालत ने सत्येंद्र दुबे हत्याकांड में तीन आरोपियों को दोषी ठहराया है। इन तीनों के नाम हैं मंटू कुमार, उदय कुमार और पिंकू रविदास। अदालत के मुताबिक इन तीनों ने लूट के इरादे से सत्येंद्र दुबे को घेरा और प्रतिरोध करने पर हत्या कर दी। इन तीनों को 27 मार्च को सज़ा सुनाई जाएगी।
सत्येंद्र दुबे ने देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी से इंजीनियरिंग की और उसके बाद नेशनल हाइवे अथॉरिटी से जुड़े। जहां से उनकी पोस्टिंग स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में की गई। तब केंद्र में बीजेपी की सरकार थी और यह तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का ड्रीम प्रोजेक्ट था। उसी में धांधली को बेनकाब करने के लिए सत्येंद्र दुबे ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी थी। उसी के तुरंत बाद 27 नवंबर 2003 को गया में सत्येंद्र दुबे की गोली मार कर हत्या कर दी गई। उस वक़्त वो बनारस में एक शादी से शामिल होने के बाद लौट रहे थे। Read more
चौंकिए मत, ये उत्तर प्रदेश है और यहां दलित हुक्मरान है
लेखक: आवेश तिवारी | March 19, 2010 | ब्लॉग, हक़ की आवाज़ | 2 Comments
उत्तर प्रदेश का सोनभद्र जिला सुलग रहा है। गांव मगरदहा में आदिवासियों पर वनकर्मियों के हमले को 48 घंटे हो चुके हैं। हर बीतते पल के साथ वनकर्मियों के जुल्मों के नए-नए किस्से सामने आ रहे हैं। बुधवार को कोन के घने जंगलों में मगरदहा की ही लकिता अगरिया बेहोश पड़ी मिली। उसे इतना पीटा गया था कि उसका गर्भपात हो गया। आप तस्वीरों में लकिता को देख सकते हैं। बगल में शोक मनाते परिजन हैं। वो समझ नहीं पा रहे कि कानून के रखवाले कैसे इतनी बेरहमी से एक अजन्मे बच्चे की हत्या कर सकते हैं? Read more
मायावती के राज में दलितों, आदिवासियों पर दमन
लेखक: आवेश तिवारी | March 18, 2010 | हक़ की आवाज़ | 3 Comments
पहली तस्वीर नोटों में ढकी मायावती की हैं। बाकी दोनों तस्वीरें जख्मी आदिवासी महिला लालती की हैं। उन्हें ये जख़्म किसी और ने नहीं बल्कि वनकर्मियों ने दिए हैं। लालती का गांव मगरदहा, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में पड़ता है। बीते साल मगरहदा गांव के सभी लोगों को वन विभाग उजाड़ चुका था। कुछ दिन पहले उन्होंने दोबारा बसने की कोशिश की तो उनका ये हाल कर दिया गया। वनकर्मियों ने निहत्थे आदिवासियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। और सबक सिखाने के इरादे से सैकड़ों लोगों के बीच लालती के गुप्तांगों में लाठी डालने की कोशिश की। Read more
VC विभूति की SC/ST कमिशन में होगी शिकायत
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 18, 2010 | हक़ की आवाज़ | Comments Off
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। इसकी वजह कोई और नहीं बल्कि वो खुद हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने जनतंत्र डॉट कॉम और मोहल्ला लाइव को दिए अपने साक्षात्कार में दलित प्रो. लैला करूण्यकारा के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए थे। ब्राह्मणों को मां-बहन की गाली देने के आरोप में नोटिस भेजने की बात कही थी। हमारी जानकारी के मुताबिक उन आरोपों के जवाब में प्रो. कारूण्यकारा ने कुलपति वीएन राय को दो पत्र लिखे हैं। एक पत्र में प्रो. कारूण्यकारा ने आरोपों का जवाब दिया है। दूसरे में उन्होंने दलित छात्र राहुल कांबले के पीएचडी में नामांकन के बारे में कुलपति की गलतबयानी का खंडन किया है और राहुल काबंले के नामंकन नहीं किए जाने की पूरी प्रक्रिया के बारे में अवगत कराया है। 6 दिसंबर 2009 को विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित मार्च के आयोजक आम्बेडकर स्टुडेंट फेडरेशन का भी जवाब हमने प्रकाशित किया था। – मॉडरेटर Read more
दलित छात्रों की आवाज़ नहीं सुनते हैं विभूति नारायण राय
लेखक: जनतंत्र डेस्क | March 11, 2010 | हक़ की आवाज़ | 1 Comment
जनतंत्र के पास यह चिट्ठी अंबेडकर स्टूडेंट्स फोरम ने भेजी है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के इस फोरम ने अपने इस ख़त में कुलपति विभूति नारायण राय के आरोपों का जवाब दिया है। जनतंत्र और मोहल्लालाइव से बातचीत में विभूति नारायण ने यह कहा था कि दलित छात्रों ने 6 दिसंबर की अपनी रैली का न्योता उन्हें नहीं दिया। कुलपति महोदय ने यह भी कहा कि दलित छात्रों की उस रैली में ब्राह्मणों को मां-बहन की गालियां दी गईं। उसी आरोप में उन्होंने यूनिवर्सिटी के एकमात्र दलित प्रोफेसर कारुण्यकारा को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया। वो भी एक बार नहीं बल्कि दो बार। अंबेडकर फोरम के मुताबिक जुलूस में शामिल होने का न्योता विभूति नारायण राय को भेजा गया था। यह भी की उस जुलूस में ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ नारे लगे और किसी जाति विशेष को कोई गाली नहीं दी गई। – मॉडरेटर
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति माननीय विभूति नारायण राय ने अपने इंटरव्यू में 06 दिसंबर को बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर आयोजित जुलूस को लेकर कई बातें की हैं। चूंकि यह रैली अम्बेडकर स्टूडेन्ट्स फोरम (ए.एस.एफ.) ने आयोजित की थी, लिहाजा हम अपनी ओर से कुछ स्पष्टीकरण देना जरूरी समझते हैं। कुलपति जी ने अपने साक्षात्कार में ऐसी कई आधारहीन बातें की हैं जिससे हमें भारी निराशा हुई है। एक संस्था के सर्वोच्च पद पर बैठा कोई सम्माननीय व्यक्ति, जो स्वयं पुलिस का इतना बड़ा अधिकारी रहा है – ऐसी बातें कर सकता है, यह हमारे लिए अत्यंत दुखद है। Read more
महिलाओं को बांटने की कोशिश कर रहे हैं लालू-मुलायम
लेखक: मोहिनी गिरि | March 8, 2010 | हक़ की आवाज़ | 2 Comments
पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का आगे आना इसलिए जरूरी है कि वे परिवार और समाज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था ने पुरुषों को आगे बढ़ने के कई मौके दिए हैं पर वह महिलाओं के हक के लिए नहीं लड़ते और न ही महिलाओं के मुद्दों से उनका कोई सरोकार है। कितने पुरुष सांसद है जो दुष्कर्म, छेड़खानी जैसे मामलों को छोड़कर महिलाओं की बुनियादी जरूरतों के बारे में सोचते हैं? सरकारी अस्पतालों में गरीब महिलाएं किस तरह बच्चे को जन्म देती हैं, इसके बारे में कितने सांसद सोचते हैं? यदि महिलाओं के लिए अब तक कुछ किया भी गया है तो केवल राजनीतिक फायदे के लिए। अब जब सरकार संसद और विधायिका में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखा रही है तो इस विधेयक का विरोध करने वाले दलों को शांत मन से इस विधेयक का समर्थन करना चाहिए। Read more
बात नारी के हक़ और बराबरी की है, पूरब-पश्चिम की नहीं
लेखक: तसलीमा नसरीन | March 8, 2010 | ब्लॉग, हक़ की आवाज़ | 5 Comments
पश्चिमी नारीवाद तो क्या प्राच्य के नारीवाद की भी मेरी खास समझ नहीं थी, लेकिन फिर भी बचपन से ही परिवार और समाज के अनेक उपदेशों और बंधनों को मैंने मानने से इनकार कर दिया या उन पर सवाल किए। मुझे जब बाहर मैदान में खेलने नहीं दिया जाता और मेरे भाइयों को खेलने दिया जाता था। ऋतुधर्म के समय मुझे जब अपवित्र बोला जाता। मुझसे कहा जाता कि मैं बड़ी हो गई हूं और बाहर निकलते समय काले रंग का बुरका पहन कर निकलूं। ऐसे हर मौके पर मैंने प्रश्न किए हैं। Read more
दलितों, पिछड़ों के ख़िलाफ़ साज़िश है महिला आरक्षण बिल
लेखक: अजय यादव | March 8, 2010 | हक़ की आवाज़ | 3 Comments
बात अगर यूं कहें कि भारत, एक ऐसा देश, जो अपने निर्माण के हजारों साल पहले से ही धर्म, जाति, क्षेत्र, समुदाय और विभिन्न संस्कृतियों के बीच उलझा हुआ देश था (है), आज वही देश कई तरह के संक्रमण को झेलते हुए न सिर्फ दुनिया की महाशक्ति बनने को बेकरार है, बल्कि संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने को प्रतिबद्ध भी। भारत के लिए यह ऐतिहासिक समय ही है कि महिला दिवस के मौके पर दक्षिणपंथी-वामपंथी-कांग्रेसी और कुछ क्षेत्रीय दल भी राजनीति में महिलाओं को एक तिहाई हिस्सेदारी देने के लिए एकमत हो गये हैं। ‘आरक्षण विरोधियों’ या यूं कहिए कि पिछड़ों का प्रतिनिधित्व करने वाली नाममात्र की कुछ क्षेत्रीय पार्टियों को छोड़ दें तो आज पूरा देश इस बात पर सहमत है कि महिलाएं, जो किसी भी वर्ग, वर्ण, जाति, क्षेत्र, समुदाय, धर्म या संस्कृति की हों, ‘दलित’ ही हैं, इसलिए उन्हें आरक्षण देना देश और समाज के हित में है – जाहिर है यह सब पढ़कर बहुतों को अच्छा लग रहा होगा, और इनमें भी सबसे ज्यादा वे लोग होंगे जो महिला आरक्षण के मामले में भरत (भारत) के साथ हैं। Read more
ये थ्री, इडियट्स नहीं हैं!
लेखक: आवेश तिवारी | February 22, 2010 | ब्लॉग, हक़ की आवाज़ | 1 Comment
ये तीन थे। मगर इडियट्स नहीं थे। न ही किसी 70 एमएम की फिल्म के हीरो थे, जिनकी अदाकारी पर आप ताली बजाएं। ये तीनों देश के सर्वाधिक मेधावी छात्रों में से एक थे। अभी दो हफ़्ते पहले की बात है। इनमें से एक के. सुशील ने छात्रावास परिसर में आत्महत्या की कोशिश की। कृष्णमोहन ने इसी महीने 48 घंटों तक खुद को कमरे में बंद रखा। वहीं ज्ञानेंद्र के पास अपनी विधवा मां के सवालों के उत्तर में सिर्फ़ आंसू थे। देश के बड़े प्रौद्योगिकी संस्थानों में से एक भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान इलाहाबाद के इन होनहार छात्रों की इस हालत की वजह सिर्फ एक थी। इन दलित छात्रों ने संस्थान के निदेशक द्वारा संस्थान के ही एक विद्वान प्राध्यापक की मनमाने ढंग से असमय सेवा समाप्ति के आदेश को लेकर ई-मेल किए थे। इसका खामियाजा इन्हें विश्ववद्यालय से निलंबन के साथ बंधक बनकर चुकाना पड़ा। Read more




