शिक्षा का अधिकार कानून देर से आया, दुरुस्त आया
लेखक: अनु सिंह चौधरी | April 3, 2010 | ब्लॉग | Comments Off
दस-बारह साल की रही होऊंगी जब राजेश हमारे घर काम करने आया था। रांची के पास रातू के आस-पास के किसी गांव का। जहां तक मुझे याद है, उसके मां-बाप नहीं थे। उसकी उम्र भी हमारे जितनी ही रही होगी, लेकिन उससे उम्मीदों बहुत थी। हमारे संयुक्त परिवार के किसी भी सदस्य ने उस “बुतरू” या “छोटू” को आवाज़ दी हो, तो उसका भाग कर आना लाज़िमी थी। पानी देने से लेकर झाड़ू-पोंछा करने तक, सब्ज़ी लाने से लेकर सब्ज़ी काटने तक का काम राजेश का ही था। राजेश को बस शाम का इंतज़ार होता, जब तरकारी बन चुकी होती, आटा गूंथ चुका होता और घर की महिलाएं या तो स्वेटर बुनने में लगती या अपने-अपने बच्चों को कमरों में लिए पढ़ाने के लिए बैठती। हमारी मां भी हम तीनों भाई-बहन को पढ़ाने बिठाती, और साथ में राजेश भी बैठता।
राजेश में हमारे साथ ही बैठे-बैठे क, ख, ग, ए, बी, सी और गिनती सीखी। हमारी किताबों से ही अक्षर जोड़-जोड़कर पढ़ना सीखा और हमारे साथ ही लेख लिखना, अखबार पढ़ना सीखा। लेकिन राजेश स्कूल नहीं जा सका। राजेश खुशकिस्मत था, उसमें लगन थी, इसलिए साक्षर हो सका। लेकिन ऐसे कई राजेश हैं जिन्हें कभी पढ़ने का मौका नहीं मिलता, जो कभी स्कूल नहीं गए। घरों या होटलों या सड़कों-गलियों-प्लेटफॉर्मों पर जिनके बचपन की पहचान बुतरू या छोटू के नाम से ही होती है।
ऐसे में शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) का लागू होना उम्मीद की एक किरण लेकर आता है। बिना किसी भेदभाव के देश के एक-एक बच्चे को शिक्षा मिले, इसका वायदा हर सरकार ने किया, हर बजट में इसके लिए फंड तय किए गए। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। तमाम कोशिशों के बावजूद भारत में साक्षरता दर 66% ही है। यानि अभी भी हमारे देश में 40 करोड़ से ज्यादा लोग निरक्षर हैं। 47% साक्षरता दर के साथ शिक्षा के मामले में बिहार सबसे निचली पायदान पर है। हालांकि, ये 2001 के आंकड़े हैं और देखना ये है कि 2011 में होनेवाली अगली जनगणना में नीतीश के साइकिल बांटने का क्या असर साक्षरता दर पर नज़र आता है।
शिक्षा का अधिकार कानून के तहत 6 साल से लेकर 14 साल तक के बच्चे को स्कूल भेजने का दारोमदार सरकार पर होगा, और सरकार के सामने चुनौतियां भी कम नहीं होंगी। सबसे पहले तो स्कूल नहीं जानेवाले करीब एक करोड़ बच्चों के लिए स्कूल कहां से आएंगे? हर एक किलोमीटर पर एक स्कूल होने का सपना भी फिलहाल असंभव लगता है। हमारे देश में 12 से 14 साल की लड़कियां शौचालयों के अभाव में स्कूल जाना छोड़ देती हैं। 2009 की रिलीज़ हुई वार्षिक शिक्षा रिपोर्ट (Annual Status of Education Report) के मुताबिक देश के 583 ज़िलों में से 575 ज़िलों के सरकारी और निजी स्कूलों का सर्वे किया गया। इन स्कूलों में सिर्फ 50 फीसदी ऐसे स्कूल थे जिनमें शौचालय थे। लेकिन 10 सरकारी स्कूलों में से 4 स्कूल ऐसे थे जिसमें लड़कियों के लिए शौचालय नहीं थे। जहां थे भी, वहां या तो बंद पड़े थे, या ऐसी हालत में थे कि उनका इस्तेमाल असंभव था।
पिछले साल एक फिल्म की शूटिंग के दौरान हम झारखंड के खूंटी ज़िले के कई गांवों में गए। ज्यादातर गांवों में स्कूल के नाम पर जो भवन था वो ऐसी जर्जर हालत में था कि एक बारिश के बाद उसका खड़ा होना नामुमकिन लगता। प्राथमिक स्कूल की पहली कक्षा से लेकर पांचवीं कक्षा के लिए कमरा एक, और कई बार पढ़ानेवाला भी एक! शिक्षा का स्तर क्या होगा, ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं। यहां भी मुझे एक राष्ट्रीय चैनल पर दिखाई एक रिपोर्ट याद आती है जिसमें छात्रों और उनके शिक्षकों को ये नहीं मालूम था कि देश आज़ाद कब हुआ था!
यानि एक बड़ी चुनौती शिक्षकों को चुनना और चुने हुए शिक्षकों को प्रशिक्षित करना भी होगी। जिस देश में बेरोज़गार आबादी साढ़े चार करोड़ हो और स्नातक बेरोज़गार पचास लाख (2001 जनगणना के मुताबिक), वहां अगली पीढ़ी को तैयार करने के लिए कैसे शिक्षक मिलेंगे, ये खुद ही सोच लें। लेकिन इस भीड़ में से भी शिक्षकों को चुनना और तैयार करना ही इकलौता रास्ता है, क्योंकि जबतक शिक्षक स्वयं प्रेरित ना हो, वो स्कूल आनेवाले बच्चों को शिक्षा हासिल करने की प्रेरणा नहीं दे सकता।
ये पढ़कर तसल्ली मिली है कि इस कानून के मुताबिक बिना किसी लिंग या सामाजिक भेदभाव के बच्चों को स्कूलों में दाखिले दिए जाएंगे। निजी स्कूलों में भी समाज के निचले तबके के छात्रों के प्रति कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा, ना उन्हें अलग कक्षाओं में बिठाया जाएगा। हालांकि, ज़मीनी स्तर पर ये कितना लागू हो पाएगा, ये आनेवाला वक्त ही बताएगा।
फिलहाल हर गांव, हर शहर के स्तर पर कुछ ज़रूरी कदम सरकार और प्रशासन को उठाने होंगे। स्कूल के लिए एक छत, पीने का पानी, शौचालय, किताबें और यूनिफॉर्म उपलब्ध कराना सबसे ज़रूरी होगा। अगर हर गली, हर कस्बे में स्कूल नहीं खुल सकता तो कम-से-कम दूर-दराज़ के ग्रामीण इलाकों में स्कूलों तक पहुंचाने के लिए परिवहन की सुविधा मुहैया करानी होगी।

अनु सिंह चौधरी
((अनु सिंह चौधरी। सुलझी हुई पत्रकार। करीब एक दशक का अनुभव। देश के प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनलों में से एक एनडीटीवी में लंबे समय तक काम। फिलहाल नौकरी छोड़ मीडिया में स्वतंत्र रूप से पैर जमाने की कोशिश में जुटी हैं।))
ऐसे देखो तो “मर्यादा पुरुषोत्तम” राम भी बहुत “छिछोरे” लगते हैं
लेखक: मुकेश कुमार सिंह | March 26, 2010 | देश-दुनिया, ब्लॉग | 31 Comments
रामनवमी के मौके पर राम का गुणगान करने की परम्परा है। मेरी भी कई अखबारों के ‘विशेष लेखों’ पर नज़र पड़ी। कुछ को पढ़ा भी। ऐसा लगा कि लेखकों, संपादकों और प्रकाशकों का पूरा ज़ोर रस्म अदायगी पर ही है। सभी राम को अपने-अपने तरीके से याद करके श्रद्धांजलि देते हैं। जैसा दिवंगतों के लिए होता है। रामराज्य का बखान है, उपदेशों की भरमार है तो मौजूदा दौर को कोसने की प्रवृति की भी। इसी उकसावे से मेरे मन ने भी बहती गंगा में डुबकी लगाने का इरादा बना लिया। अंगुलिया मचलने लगीं। गुस्ताख़ी आपके सामने है।
राम को बचपन से ही भगवान के रूप में ही जाना। बाप-दादाओं की मानें तो मैं राम का ही वंशज हूं। “सूर्यवंशी क्षत्रिय, निकुंभ राजपूत, वशिष्ठ गोत्र और वंश शत्रुघ्न” – ये मेरी जातिगत और धार्मिक पहचान है। इसका कोई दस्तावेज़ तो नहीं है, लेकिन सदियों और पीढ़ियों से मेरे खानदान में इन्हीं प्रतीकों के ज़रिये शादी-ब्याह, मुंडन-कनछेदन, जनेऊ, श्राद्ध-तर्पण और पिंडदान वगैरह होते हैं। साफ कर दूँ कि इन संस्कारों से बंधा हुआ मैं एक आस्तिक व्यक्ति हूं। हिन्दू होने का मुझे उतना ही गर्व भी है, जितना कि हो सकता है। लेकिन मैं अपने पुरखे राम को समालोचना से देखना चाहता हूं। उनके प्रति आदर और श्रद्धा को कम किये बगैर। किसी की भावना को चोट पहुंचाए बगैर। Read more
लोहिया के शिष्यों की औकात नहीं कि उनका सही मूल्यांकन करें
लेखक: सुशांत झा | March 23, 2010 | ब्लॉग | 3 Comments
इस देश में गुरू-शिष्य परंपरा रही है। महान गुरुओं से सैकड़ों-हज़ारों शिष्य बाज़ार में घूम रहे हैं। ऐसे ही महान गुरुओं में एक हैं राम मनोहर लोहिया। बीते तीन दशक में उनके शिष्यों को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के जितने मौके मिले उतने कम ही लोगों को मिले होंगे। कुछ ने तो लोहिया को एक ब्रांड की तरह पेश करके बेचने की कोशिश भी की। लेकिन यह भी एक बहुत बड़ा सत्य है कि लोहिया के विचारधारा को उनके इन स्वघोषित शिष्यों ने जितना नुकसान पहुंचाया है उतना शायद ही किसी ने पहुंचाया हो। इसी संदर्भ में युवा पत्रकार सुशांत झा का यह लेख काफी प्रासंगिक है। उनका कहना है कि लोहिया का सही मूल्यांकन अभी तक नहीं हुआ है और सही मूल्यांकन करने की हिम्मत और ईमानदारी उनके शिष्यों में नहीं है। – मॉडरेटर
समकालीन जनमत ने मना किया, जनसत्ता ने छापा
लेखक: अनिल चमड़िया | March 22, 2010 | ब्लॉग | 4 Comments
ये लेख 15 जनवरी के आसपास लिखा गया था। पहले इसे समकालीन जनमत में भेजा गया था। पत्रिका के संपादक ने जानकारी दी थी कि यह लेख छपा जा रहा है। इस बीच 27 जनवरी को वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के जन संचार विभाग में अनिल चमड़िया की प्रोफेसर पद पर नियुक्ति रद्द कर दी गई। विश्वविद्यालय के इस फैसले को लेकर विभिन्न मंचों पर तीखी प्रतिक्रिया हुई।समकालीन जनमत के संपादक ने जानकारी दी कि पत्रिका के संपादक मंडल ने इस लेख को नहीं छापने का फैसला किया है। यह लेख समकालीन जनमत के बाद दूसरे जनचतेना की प्रगतिशील धारा बहाने वाली धाराओं के संपादकों के पास गई। इसकी एक अलग कहानी है। बहरहाल 22 मार्च 2010 को जनसत्ता ने ये लेख प्रकाशित किया है। अपने पाठकों के लिए हम इसे प्रस्तुत कर रहे हैं।
आज कांशीराम होते तो मायावती को शाबासी देते
लेखक: आशुतोष | March 22, 2010 | देश-दुनिया, ब्लॉग | 2 Comments
मायावती के गले में पड़ी माला देखी तो कांशीराम की याद ताजा हो गयी। कांशीराम के साथ बीते दिन भी याद आये और और वो बातें जो उनके साथ न जाने कितनी बार मैंने की थीं। मैं अक्सर उनसे पूछता था कि उन्हें कैसी सरकार पसंद है वो हर बार यही कहते कि उन्हें मजबूर सरकार अच्छी लगती है। क्यों? उनका जवाब होता जितनी मजबूर होगी वो उतना ही उनके एजेंडे पर काम करेगी। उनका एजेंडा क्या था, यह बताने की जरूरत नहीं है।
कांशीराम एक बात और खूब कहते थे। जहां सब स्थिर सरकार की बातें करते, वो कहते उन्हें स्थिर नहीं अस्थिर सरकार चाहिये। उनकी सोच थी कि जितनी ज्यादा अस्थिरता होगी, उतने ज्यादा चुनाव होंगे और उतना ही ज्यादा दलितों को मोबिलाइज करने का मौका मिलेगा। तब कांशीराम की ये बातें लोगों को अटपटी लगती थीं। Read more
भ्रम में जी रहे हैं असगर वजाहत और रोमन के समर्थक
लेखक: राजकिशोर | March 21, 2010 | ब्लॉग, स्पेशल रिपोर्ट | 8 Comments
नागरी हिंदी या फिर रोमन हिंदी (Hindi)। मतलब हिंदी कैसे लिखी जाए। नागरी में जिसमें आप और हम लिखते-पढ़ते हैं या फिर रोमन (अंग्रेजी के अल्पाबेट्स के सहारे) में। वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत के मुताबिक रोमन में हिंदी लिखने से भाषा का विस्तार होगा। न केवल हिंदी बल्कि सभी भारतीय भाषाओं की लिपि बदल दी जानी चाहिए। असगर वजाहत का यह लेख दो हिस्सों में जनसत्ता में छपा था। हमने दोनों हिस्से जनतंत्र पर साझा किए थे। अब वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने जनसत्ता में ही असगर वजाहत को जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि ऐसी वैज्ञानिकता से खुदा बचाए। आप उनका यह लेख पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। – मॉडरेटर

असगर वजाहत के इस आह्वान को स्वीकार करते हुए मुझे प्रसन्नता है कि ‘आज समय का तकाजा है कि हम हिंदी भाषा की लिपि पर विचार करें और इस संबंध में जनमत बनाने पर विचार करें।’ (जनसत्ता, 17 मार्च) मेरा खयाल है, विचार करने पर कोई नई बात सामने आती है, तभी जनमत बनाने का सवाल उठता है। खुद असगर ने बताया है कि इस प्रश्न पर पहले भी काफी विचार हुआ था, लेकिन इस प्रस्ताव के पक्ष में कभी हवा नहीं बनी कि हिंदी भाषा को रोमन लिपि में लिखा जाए। दरअसल, यह प्रस्ताव कमजोर और तर्कहीन होने के अलावा इतना बोदा और क्रूर था कि इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना बुद्धि का अपमान होता। तब हिंदी की स्थिति आज जैसी बुरी नहीं थी। शेर पर वार करना कठिन होता है। चींटी को तो कोई भी कुचल देगा। हिंदी अब गरीब की भौजाई हो चुकी है। यही वजह है कि आज हिंदी को रोमन लिपि में लिखने की सलाह दी जा रही है। Read more
भारत और पाकिस्तान को सच्चे मध्यस्थ की ज़रूरत है
लेखक: राजकिशोर | March 20, 2010 | देश-दुनिया, ब्लॉग | Comments Off
भारत सरकार को बार-बार सफाई देनी पड़ती है कि वह पाकिस्तान से बातचीत करने के लिए किसी दबाव में नहीं है। विदेश सचिव स्तर पर बातचीत का पहला दौर विफल हो गया, ऐसा माना जाता है। फिर भी, दूसरे दौर की तैयारी चल रही है। दबाव का ज्यादातर आरोप संयुक्त राज्य अमेरिका पर लगाया जाता है। यह आरोप तब भी लगाया जाता था जब राजग की सरकार थी। यही आरोप अब भी लगाया जाता है जब यूपीए की सरकार है। विदेश नीति के मामलों में अकसर इनकार का मतलब इकरार से होता है। दुनिया का कौन-सा देश स्वीकार करेगा कि वह किसी महाशक्ति के कहने पर अपनी घोषित नीति से पीछे हट रहा है ? दरअसल, विदेश नीति के क्षेत्र में इतनी तरह की धाराएं और उपधाराएं चल रही होती हैं कि नागरिकों के लिए कुछ भी तय कर पाना लगभग असंभव होता है। यह एक ऐसा रहस्य लोक है जिसमें सिर्फ सरकारों का आना-जाना है। जब कोई ठोस नतीजा निकलता है, तब जनता को बता दिया जाता है, बस। Read more
चौंकिए मत, ये उत्तर प्रदेश है और यहां दलित हुक्मरान है
लेखक: आवेश तिवारी | March 19, 2010 | ब्लॉग, हक़ की आवाज़ | 2 Comments
उत्तर प्रदेश का सोनभद्र जिला सुलग रहा है। गांव मगरदहा में आदिवासियों पर वनकर्मियों के हमले को 48 घंटे हो चुके हैं। हर बीतते पल के साथ वनकर्मियों के जुल्मों के नए-नए किस्से सामने आ रहे हैं। बुधवार को कोन के घने जंगलों में मगरदहा की ही लकिता अगरिया बेहोश पड़ी मिली। उसे इतना पीटा गया था कि उसका गर्भपात हो गया। आप तस्वीरों में लकिता को देख सकते हैं। बगल में शोक मनाते परिजन हैं। वो समझ नहीं पा रहे कि कानून के रखवाले कैसे इतनी बेरहमी से एक अजन्मे बच्चे की हत्या कर सकते हैं? Read more
अमीर छात्रों के लिए काम कर रहे हैं अमीर कपिल सिब्बल
लेखक: अनु सिंह चौधरी | March 18, 2010 | पहरेदार, ब्लॉग | 4 Comments
सरकार ने भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाज़े खोल दिए हैं। हर सिक्के के दो पहलुओं की तरह इस फैसले के भी दोनों पहलू समझ में आ रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इससे शिक्षा के क्षेत्र में नए विकल्प खुलेंगे, शिक्षा की गुणवत्ता शायद बेहतर होगी और हो सकता है, देशी-विदेशी विश्वविद्यालयों की इस प्रतिस्पर्द्धा का फायदा उन शिक्षकों को भी मिले जो सालों से कम वेतन का रोना रो रहे हैं।
लेकिन ये तो तय है कि भारत में कैंपस स्थापित करने का सबसे बड़ा फायदा विदेशी विश्वविद्यालयों को ही मिलेगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी भारत दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से है। भारत से हर साल तकरीबन 1.20 लाख छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेशों का रूख करते हैं, जिसमें से अधिकांश छात्रों की मंज़िल अमेरिका होती है। मानव संसाधन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी संस्थानों में पढ़ने के लिए छात्र और अभिभावक सालाना 4 बिलियन डॉलर (तकरीबन 180.2 अरब रुपये) खर्च करते हैं। हैरानी नहीं कि अटलांटा की जॉर्जिया टेक यूनिवर्सिटी ने 2008 में ही भारत में कैंपस खोलने के लिए हैदराबाद में 250 एकड़ ज़मीन खरीद ली थी। Read more
अच्छा! तो पंद्रह साल में बदल जाएगी किस्मत!
लेखक: राजकिशोर | March 15, 2010 | ब्लॉग, स्पेशल रिपोर्ट | 2 Comments
संसद में अल्पसंख्यकों के अलावा और किसी प्रकार का आरक्षण नहीं होना चाहिए, यह मानते हुए भी मेरी समझ में नहीं आता कि स्त्रियों के लिए आरक्षण के जिस विधेयक पर इतना शोर बरपा हुआ है, उसकी अवधि सिर्फ पंद्रह साल क्यों है। मजे की बात यह है कि इस पंद्रह साल वाले प्रावधान पर कोई चर्चा भी नहीं हो रही है। मानो आरक्षण कोई हीरा हो जो अभी मिल रहा है तो ले लो — पंद्रह साल बाद जब यह हीरा कांच में बदल जाएगा तब देखा जाएगा! लेनेवालों की जैसी मानसिकता है, पानेवालों की मानसिकता भी उससे कुछ कम अल्पकालिक नहीं लगती। महिला आरक्षण को सिर्फ पंद्रह साल तक सीमित करके (जिसमें दो या तीन टर्म तक ही साटें आरक्षित हो सकेंगी) सत्तारूढ़ दल ने यह साबित कर दिया है कि उसकी मंशा राजनीति में कोई टिकाऊ परिवर्तन लाना नहीं, बल्कि स्त्रियों को लॉलीपॉप थमा कर अपने को महिला-हितैषी साबित कर देना भर है। Read more




