हुसैन का जाना सामूहिक कायरता का नतीजा है

लेखक: कुमार प्रशांत  |  March 10, 2010  |  ब्लॉग   |   6 Comments

मकबूल फिदा हुसैन अब कानूनन भारतीय नहीं रहे! इससे हुसैन को क्या फर्क पड़ा? वे मुंबई के अपने स्टूडियो में बैठ कर चित्र बनाते थे, अब कतर के स्टूडियो में बैठ कर बनाते हैं। काम के प्रति उनकी दीवानगी, उनकी गहराई और उनकी प्रतिबद्धता वैसी ही है जैसी तब थी, जब इक्यासी साल की उम्र में भारत छोड़ कर वे कहीं और पनाह लेने गए थे। यह वही दौर था जब बांग्लादेश से इसी प्रकार, वैसी ही जुनूनी जमात के कायराना हमलों से क्षत-विक्षत लेखिका तसलीमा नसरीन भारत में पनाह लेने की जद्दोजहद में थीं। तसलीमा के साथ बांग्लादेश में जो हुआ और वहां की सरकार ने उनके साथ जो किया, हुसैन के साथ भी ऐसा ही हुआ और हमारी सरकारों ने उनके साथ वैसा ही किया। बड़े अजीब, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से इतिहास मनुष्यों को पाठ पढ़ाता है। Read more

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बात नारी के हक़ और बराबरी की है, पूरब-पश्चिम की नहीं

पश्चिमी नारीवाद तो क्या प्राच्य के नारीवाद की भी मेरी खास समझ नहीं थी, लेकिन फिर भी बचपन से ही परिवार और समाज के अनेक उपदेशों और बंधनों को मैंने मानने से इनकार कर दिया या उन पर सवाल किए। मुझे जब बाहर मैदान में खेलने नहीं दिया जाता और मेरे भाइयों को खेलने दिया जाता था। ऋतुधर्म के समय मुझे जब अपवित्र बोला जाता। मुझसे कहा जाता कि मैं बड़ी हो गई हूं और बाहर निकलते समय काले रंग का बुरका पहन कर निकलूं। ऐसे हर मौके पर मैंने प्रश्न किए हैं। Read more

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खजुराहो के गर्भ में अटक गए हैं हुसैन के अंध समर्थक

मकबूल फिदा हुसैन के समर्थन में इन दिनों मोटे तौर पर तीन तर्क दिए जा रहे हैं।

  • हुसैन की कला को समझो, उनके सिम्बॉलिज्म और रेखाओं के विस्तार को समझो।
  • भारत में देवी-देवताओं की नग्न तस्वीरों और मूर्तियों का पुराना इतिहास रहा है। अमूर्त को मूर्त रूप देने और फिर मिथकों को अपने नज़रिये से दर्शाने की पुरानी परंपरा रही है।
  • और कलाकार देश की संवेदनाओं और मजबूरियों से ऊपर होता है। उसे इसके दायरे में मत बांधों। कलाकार का सरोकार समाज और देश के प्रति नहीं बल्कि अपनी कला और अपनी सोच के प्रति होता है।

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तसलीमा को पढ़ कर मोनिका लेविंस्की याद आती हैं

इस्लामिक कट्टरता और पुरुष के पुरुष होने के ख़िलाफ़ किसी भी आम मुस्लिम स्त्री के भीतर चल रही लड़ाई उतनी ही पैनी हैं जितना तसलीमा के उपन्यासों का कथानक। उनमें नया कुछ अगर है तो वो सिर्फ़ सेक्स है। “का” से लेकर “अमर मेयेबेला” तक उनके लिखे उपन्यासों को पढ़कर उतनी ही उत्तेजना महसूस होती है जितनी जेम्स हेडली चेईस के किसी उपन्यास या फिर लोलिता को पढ़कर। जिस वक़्त उनकी कहानियां उत्तेजित नहीं कर रही होती, मन मस्तिष्क में इस्लामिक कट्टरता के ख़िलाफ़ हमले का वर्चुअल वर्ल्ड तैयार करती दिखती हैं। लज्जा को पढ़कर संभव है आप अपने मन में कितने ही अनदेखे चेहरों की आंखें फोड़ डाले या फिर उनका सर कलम कर दें। कभी-कभी मुझे उन्हें पढ़कर मोनिका लेविंस्की की भी याद आती है। जिसके और बिल क्लिंटन के सेक्स संबंधों के किस्से आज भी चाव से पढ़े जाते हैं । Read more

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संयम और शांति से काम लें तसलीमा

आस्था के प्रश्न ने कर्नाटक के दो शहरों – हसन और शिमोगा – को हिला दिया। परदे के सवाल पर विक्षुब्ध मुसलमान प्रतिवादियों ने जगह-जगह जुलूस निकाले और पुलिस को गोली चलानी पड़ी। दो आदमी मारे गए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा। सरकार का कहना है कि स्थिति शांत हो चुकी है। दोनों शहरों में पुलिस के अलावा केंद्रीय बल तैनात हैं। पुलिस ने दो अखबारों पर, तसलीमा नसरीन पर तथा कुछ और लोगों पर केस दायर कर दिया है। जैसा कि होता है, दो-चार दिनों में माला रफा-दफा हो जाएगा। प्रश्न है, इस घटना से हासिल क्या हुआ? Read more

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हुसैन चचा, तुसी ना जाओ

वैसे तो तुम ताऊ की उम्र के हो लेकिन हम तुम्हें चचा ही कहेंगे। हम ग़ालिब को भी चचा कहते हैं। चचा हमें मालूम है कि तुम खुश नहीं हो इस वक्त। अपने मुल्क से दूर रहकर एक आम इंसान तो फिर भी जिंदगी बसर कर लेता है लेकिन तुम तो हिंदुस्तान के नगीनों में से हो। आधी सदी से ज्यादा वक्त तक तुम्हारे इस मुल्क ने तुम्हें जो प्यार दिया है उसे कैसे भुला पाओगे। वैसे भी, दूर रहने और नाता तोड़ने में बहुत बड़ा फर्क है। उम्र के आखिरी दिनों में हमारे यहां के बुजुर्ग तो अपनी पुश्तैनी हवेलियों, अपने पुराने गांव, पुराने घर लौटने की बात करते हैं। बिस्मिल्लाह खां कोलकाता के आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी समेत तमाम साधन-संपन्न लोगों के बुलावे के बावजूद अपना बनारस तक छोड़ने को तैयार नहीं हुए। तुम इस उम्र में अपना हिंदुस्तान कैसे छोड़ सकते हो चचा? Read more

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एम एफ़ हुसैन नाम का एक भारतीय नागरिक

भारतवर्ष के सबसे बड़े चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन अब खाड़ी देश क़तर के नागरिक होंगें. उन्हें क़तर की नागरिकता की पेशकश की गई है. चूंकि भारत में दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है लिहाज़ा अब हुसैन शायद आने वाले दिनों में ओवरसीज़ इंडियन सिटीज़न के रूप में अपना नामांकन चाहें तो करा लें वरना वो अब तो शायद क़तर के नागरिक होंगे ही.

2010 की शुरूआत में कला संस्कृति की भारतीय परंपरा के लिए ये एक सदमे वाली स्थिति है. द हिंदू अख़बार में हुसैन के भेजे एक संदेश से हुसैन के प्रशंसक और कला प्रेमी और संस्कृतिकर्मी स्तब्ध हैं कि भारत देश ने अपने एक सपूत को इस तरह गंवा दिया. ये एक अजीब संयोग है कि जब देश क्रिकेट के महान सितारे सचिन तेंदुलकर के वनडे में 200 रन का अभूतपूर्व जश्न मना रहा था तो उधर देश से बाहर अघोषित किस्म के निर्वसन में रह रहा देश का सबसे बड़ा पेंटर देश लौटने की एक विकराल छटपटाहट से जूझता हुआ एक दूसरे देश का नागरिक बनने का अनचाहा गौरव हासिल कर रहा था. Read more

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कुछ हुसेन की कुछ तसलीमा की

कहते हैं, आखिरी वक्त में क्या खाक मुसलमाँ होंगे। मकबूल फिदा हुसेन ने साबित कर दिया है कि यह मुमकिन है। हुसेन ने खुद नहीं बताया है कि वे कतर की नागरिकता के प्रस्ताव का क्या करने जा रहे हैं। एक समाचार चैनल के अनुसार, उनका कहना है कि उन्हें इस प्रस्ताव पर एतराज नहीं है। दूसरी ओर, उनके बेटे ने कन्फर्म कर दिया है कि वे कतर की नागरिकता स्वीकार करने जा रहे हैं और जल्द ही भारत के नागरिक नहीं रह जाएंगे। इसके पहले कि यह दुविधा खत्म हो, हम हुसेन साहब से हाथ जोड़ कर यह बिनती करते हैं कि वे कतर सरकार का शुक्रिया अदा कर भारत की अपनी नागरिकता बनाए रखें। इतना ही नहीं, वे जल्दी से जल्दी भारत लौट आएं। Read more

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क्या वनडे की संजीवनी है सचिन का रिकॉर्ड

क्रिकेट का वनडे मैच भारत की लैंड लाइन टेलीफ़ोन जैसा है. 30-40 साल पहले भारत की आम जनता ने पहली बार काले रंग के डिब्बे को देखा तो यह अजूबा लगा. अब मोबाइल युग में किसी घर में टेलीफ़ोन देखते हैं, तो फिर से अजूबा लगता है.

वनडे क्रिकेट का भी यही हाल होता जा रहा है. लिमिटेड ओवरों में ट्वेन्टी 20 तेज़ी से पसर गया है. क्लासिक और परंपरा के नाम पर टेस्ट क्रिकेट तो बचता दिखता है लेकिन वनडे क्रिकेट पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. कई बड़े क्रिकेटर वनडे को बंद कर देने की वकालत कर चुके हैं और लोगों की दिलचस्पी भी, बताई जाती है, कि कम हो रही है. टेलीविज़न कंपनियों को विज्ञापन कम मिल रहे हैं और स्टेडियमों में मौजूदगी घट रही है. पहले की तरह दिन भर टेलीविज़न से चिपकने वालों की भी कमी होती जा रही है. Read more

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ठहरी हुई, गुमसुम सियासत पर लिखना दर्दनाक है

लेखक: राजकिशोर  |  February 22, 2010  |  देश-दुनिया, ब्लॉग   |   3 Comments

भारत की राजनीति पर लिखना 1990 के बाद से ही एक कष्टदायक काम रहा है। लेकिन अब तो यह लगभग असंभव-सी चीज होती जा रही है। कारण बहुत साफ है : भारतीय राजनीति आगे नहीं बढ़ रही है। उसमें न कोई नई बहस पैदा हो रही है, न कहीं आत्म-परिष्कार की चेष्टा है। एक ठहरा हुआ-सा गुमसुम माहौल है। ऐसा माहौल कांग्रेस के लिए बहुत मुफीद होता है। इसलिए अजब नहीं कि बहुत-से लोगों को इस समय कांग्रेस ही सबसे बेहतर विकल्प प्रतीत हो रही हो। Read more

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