विभा रानी को प्रथम “राजीव सारस्वत स्मृति सम्मान”

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  December 19, 2009  |  देश-दुनिया   |   Comments Off

पहला राजीव सारस्वत स्मृति सम्मान सुप्रसिद्ध लेखिका विभा रानी को दिया गया है। राजीव सारस्वत हिंदुस्‍तान पेट्रोलियम में प्रबंधक (राजभाषा) के रूप में कार्य कर रहे थे। पिछले साल यानी 2008 के 26/11 के आतंकवादी हमले के वे शिकार हो गये। हादसे के वक़्त वे ताज होटल में कंपनी की तरफ से दी गयी अपनी ड्यूटी पर थे। ताज होटल, ट्राइडेंट होटल, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, नरीमन हाउस -इन सभी पर उस रात आतंकवादियों ने कहर ढाया था, जिसकी चपेट में सैकडों लोग आ गये थे। राजीव सारस्वत भी उनमें से एक थे। राजीव न केवल एक कुशल अधिकारी थे, बल्कि एक कुशल वक्ता, चुटकीदार कवि, अच्छे मंच संचालक भी थे। मुंबई की कई साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से वे जुड़े हुए थे। Read more

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अपनों से संवाद टूटेगा तो देश का नक्शा बदलेगा

पोट्टी श्रीरामुलु की जान व्यर्थ नहीं गयी। भूख हड़ताल के 58वें दिन जब उनकी मौत हुई तो नेहरू सरकार जागी और उसने अलग आंध्र प्रदेश बनाने की मांग तुरंत मान ली। तेलुगु भाषियों के लिए अपने नेता को खो देने का गम था मगर अपना अलग घर यानी अलग आंध्र प्रदेश पाने की खुशी भी। आज लगभग 55 साल बाद गृह मंत्री पी चिदंबरम के ‘स्ट्रोक ऑफ द मिडनाइट आवर’ एलान ने आंध्र् प्रदेश के बंटवारे की चिंगारी को हवा दे दी है। तेलंगाना राष्ट्रीय समिति नेता चंद्रशेखर राव भले ही तेलंगाना आंदोलन के जरिए अपनी खोयी राजनीतिक पहचान वापस पाना चाहते हों लेकिन अलग तेलंगाना की मांग उतनी ही पुरानी है जितना की आंध्र प्रदेश राज्य का अस्तित्व। आंध्र प्रदेश बनते समय हैदराबाद स्टेट (आज का तेलंगाना) नए राज्य में शामिल कर लिया गया था। मगर महज एक दशक के भीतर ही अलग तेलंगाना की मांग ने जोर पकड़ ली। 1969 में अलग तेलंगाना राज्य का आंदोलन चरम पर था। लेकिन आंदोलन की अगुवाई करते हुए प्रजा राज्यम पार्टी के चेन्नारेड्डी ने पल्टी मारी और इंदिरा गांधी से डील कर ली। आंदोलन स्थगित हुआ। चन्ना रेड्ड़ी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। समस्या टल गई। खत्म नहीं हुई। Read more

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“बोलना तो है”

बोलना तो है! – प्रसिद्ध साहित्कार और समालोचक डॉ नामवर सिंह के हाथों विमोचन के साथ ही ये पुस्तक बाज़ार में आ गयी है। जैसा कि पुस्तक का नाम है, यह बोलने यानी वाणी, उसके रूप, प्रकृति, प्रभाव औऱ उसके असरकारी तरीके से उपयोग की विभिन्न विधियों और सुधार के तरीक़ों पर केंद्रित है। पुस्तक विमोचन समारोह सेक्टर 58 नोएडा स्थित मास्को मीडिया इंस्टीट्यूट में संपन्न हुआ। मुख्य अतिथि डॉ नामवर सिंह ने इस मौके पर कहा कि इक्कीसवीं सदी में उन्हीं चीज़ों का बाज़ार तेज़ी से फैल रहा है जो लिखने और पढ़ने से ज़्यादा बोलने और सुनने से जुड़ी हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इसकी उम्दा मिसाल है। पुरानी कहावत भी है कि बातन हाथी पांव – बातन हाथी पीठ। यानी आपकी उपलब्धि बहुत हद तक आपकी शैक्षिक योग्यता के साथ ही आपके बोलने और सुनने की तरीके पर निर्भर है। लेकिन हैरत की बात है कि ‘पढ़ो-लिखो’ की सीख देने वाले समाज में अब भी बोलने-सुनने की कला की व्यावहारिक और औपचारिक शिक्षा देने की कोई व्यवस्था नहीं है। Read more

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“I will try my level best” का मतलब

लेखक: विभा रानी  |  December 14, 2009  |  देश-दुनिया, ब्लॉग   |   3 Comments

अंग्रेजी भाषा सचमुच कभी कभी बड़ी अच्छी लगती है. ऐसे ऐसे शब्द और भाव इसमें हैं कि इनकी कोई काट आपके पास नहीं मिलेगी. जभी तो अंग्रेज हम पर इतने साल राज कर गए और अब भी अपनी भाषा के बल पर हम पर अमिट राज कर रहे हैं. बडी शिष्ट और क़ायदेदार ज़बान है. अब देखिए, बड़ी से बड़ी गलती करने पर भी आप महज एक शब्द बोल देते हैं “सॉरी” और लोग बाग कायल हो जाते हैं. वे उसके आगे कुछ बोल ही नहीं सकते. आपके सॉरी के बाद भी किसी ने अगर कुछ कहा तो उल्टा लोग उसी का बंटाधार करने लगेंगे कि “अरे भाई, क्यों पीछे पड़े हो बिचारे के? बोला न उसने सॉरी. अब क्या चाहिए आपको?”

इसी तरह से एक शब्द है “थैंक यू” अब इसके लिए आप लाख धन्यवाद बोलिए, शुक्रिया कहिए, वह मज़ा नहीं जो थैंक यू में है. इसकी महिमा तो इतनी न्यारी है कि धन्यवाद, शुक्रिया बोलने के बाद भी जबतक लोग थैंक यू नहीं बोलते हैं, तबतक बोलने या शिष्टाचार की प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जाती है. Read more

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मुझे नश्तर से छील दो, सुंदर बना दो!

लेखक: दिलीप मंडल  |  December 10, 2009  |  देश-दुनिया, ब्लॉग   |   2 Comments

वो अपने देश की सबसे खूबसूरत लड़की थी। 1994 में उसने मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में अपने देश का प्रतिनिधित्व किया था। सुंदरता के तय स्टैंडर्ड्स पर वो हर तरह से फिट थी। लेकिन 15 साल बाद, सुंदरता के उन्हीं तय स्टैंडर्ड्स पर फिट बने रहने की चाहत ने आखिरकार उसकी जिंदगी ले ली। बात हो रही है सोलांगे मैगनानो की। 1994 की मिस अर्जेंटिना। इस खिताब को जीतने के 15 साल बाद वो एक शादीशुदा महिला थीं। आठ साल पहले उसे जुड़वा बच्चे हुए थे।

सोलांगे मैगनानो को जमाने ने सुंदर माना। जमाने की नजरों में वो उसी तरह सुंदर बने रहना चाहती थी। इसके लिए वो समय यानी उम्र से भी लड़ ही थी। 38 साल की उम्र में वो सुंदरता के उन स्टैंडर्ड्स पर फिर से खरा उतरना चाहती थी, जो जमाने ने, जमाने के प्रभुत्वशाली लोगों ने और पुरुषों ने तय किए थे। वो अपनी हिप यानी कूल्हे को सुंदर बनाना चाहती थीं। इसके लिए उसने कॉस्मैटिक सर्जरी की शरण ली। इस सर्जरी के लिए वो देश की राजधानी ब्यूनस आयर्स आईं। वहां के अस्पताल में उनकी सर्जरी की गई। ग्लूटेयोप्लास्टी नाम की इस सर्जरी में उनके कूल्हे में इंप्लांट डाले गए। लेकिन सर्जरी के दौरान हीं उन्हें सांस की तकलीफ शुरू हो गई और तीन दिन तक मौत से जुझने के बाद आखिरकार जिंदगी हार गई। Read more

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बुश पर जूता फेंकने वाले पत्रकार पर पड़ा जूता

लेखक: अनवर जमाल अशरफ़  |  December 2, 2009  |  देश-दुनिया   |   Comments Off

जॉर्ज बुश पर जूता फेंकने वाले इराक़ी पत्रकार मुंतज़र अल ज़ैदी को भी ठीक वैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा, जब पेरिस में उन पर इराक़ के ही एक शख़्स ने जूता फेंक दिया. लेकिन बुश की तरह ज़ैदी भी साफ़ बच गए.

साल भर के अंदर मुंतज़र अल ज़ैदी को वैसी ही हालत का सामना करना पड़ा, जैसा पिछले साल इराक़ की राजधानी बग़दाद में हुआ था. ज़ैदी जब फ्रांस की राजधानी पेरिस में पत्रकारों से बात कर रहे थे, तो उन पर जूता फेंका गया.

जूता फेंकने वाले ने ख़ुद को इराक़ का एक पत्रकार बताया था और कहा था कि वह फ्रांस में शरण लिए हुए है. उसने ज़ैदी पर जूता फेंकते हुए कहा, “लो, तुम्हारे लिए यह भी एक जूता है.”
उसने जूता फेंकने से पहले इराक़ी लहजे में और अरबी भाषा में कुछ देर तक कुछ कहा और अचानक अपना जूता ज़ैदी की तरफ़ पूरी ताक़त से उछाल दिया. जूता सीधे ज़ैदी के सिर को निशाना बना कर फेंका गया था, लेकिन ज़ैदी ऐन मौक़े पर झुक गए और जूते का वार ख़ाली चला गया. ज़ैदी ने जब पिछले साल बुश पर जूते फेंके थे, तो बुश भी डाइव मार कर बच गए थे. Read more

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गूगल लगाएगा मुफ़्त ख़बर पर लगाम

लेखक: अनवर जमाल अशरफ़  |  December 2, 2009  |  देश-दुनिया   |   Comments Off

इंटरनेट पर गूगल की चौपाल बंद होने वाली है. मुफ़्त में कहीं भी, कितनी भी ऑनलाइन ख़बरें पढ़ने के आदी हो चुके लोगों के लिए मुश्किल खड़ी होने वाली है. मीडिया हाउसों के दबाव के बाद गूगल यूज़र के लिए समाचारों को सीमित करेगा.

गूगल ने बताया कि जल्दी ही ऐसी व्यवस्था क़ायम की जाएगी, जिससे इंटरनेट यूज़र ऑनलाइन बेहिसाब ख़बरें नहीं पढ़ पाएगा. उन्हें कुछ सीमित रिपोर्टें पढ़ने का मौक़ा मिल सकेगा. लेकिन इसके बाद उन्हें प्रकाशकों के वेबसाइट पर रजिस्टर करना होगा या फिर इसकी फ़ीस देनी होगी. Read more

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यहां मुखौटे बिकते हैं

लिब्रहान कमीशन पर सरकार की एटीआर में एक प्रस्ताव ये भी है कि राजनीतिक दल अगर धर्म का इस्तेमाल करेंगे तो उन पर पाबंदी लगनी चाहिए। इशारा ज़रूर बीजेपी और संघ परिवार की ओर था। लेकिन फिर इतिहास में कांग्रेस पर भी धर्म का राजनीतिक फायदे के लिये इस्तेमाल करने का आरोप लगेगा। क्योंकि बाबरी विध्वंस की नींव तो उसी दिन पड़ गयी थी जब 1986 में एक दिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विवादस्पद ढांचे पर लगा चालीस साल पुराना ताला खुलवाया था और राम लला की पूजा करवायी थी। तब तक वहां साल में एक बार ही राम लला की पूजा होती थी। लेकिन ताला खुलवाते समय राजीव गांधी अचानक हिंदू नेता हो गये। क्योंकि शाह बानो मामले में वो कट्टरपंथी मुसलमानों के चक्कर में पड़ चुके थे। शाह बानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की काट में नया कानून ला चुके थे। हिंदू वोटर नाराज़ था। चुनांचे उसे भी खुश करना था। राजनीति चमकाने के लिये धर्म का ये चोगा उन्होंने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों तक ओढ़े रखा और 1989 में उन्होंने उस विवादास्पद भूमि पर शिलान्यास करा कर आडवाणी से पहले ही हिंदू हृदय सम्राट की उपाधि अर्जित कर ली। लेकिन इस फेर में उन्होंने हिंदू कट्टरपंथियों को वो करने का मौका दिया जो उन्होंने 6 दिसंबर 1992 को किया। Read more

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अजमल कसाब के नाम एक हिंदुस्तानी का ख़त

सज़ा

आमिर अजमल कसाब,

तुम 26 नवंबर 2008 को फक्र से याद करोगे। हमारे दिलो-दिमाग में भी वो दिन हमेशा हमेशा के लिये चस्पा हो चुका है। वो वहशी तीन दिन जब तुमने और तुम्हारे नौ साथियों ने मिलकर मुंबई में खूनी खेल खेला था। लेकिन एक और दिन मेरे जहन की गहराइयों में उतर चुका है – 23 फरवरी 2009। उस दिन सारा हिंदुस्तान टकटकी लगाये अपने अपने घरों में टीवी देख रहा था। अमरीका के सबसे रंगीन शहर लॉस एंजीलीस में ऑस्कर अवार्ड दिये जा रहे थे। दुनिया भर में संगीत से जुड़े कलाकारों को उनके उम्दा काम के लिये नवाजा जा रहा था। उम्मीद से लब्रेज़ दो हिन्दुस्तानी कलाकार भी उस जलसे में शामिल थे। मैं तुम्हें उनसे मिलवाता हूं। तुम्हारी ही तरह दोनों इस्लाम धर्म को मानने वाले। एक का नाम है – अल्लाह रख्खा रहमान। और दूसरे का रेसूल पुकुट्टीRead more

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गुजरात एक, बस्तियां अलग… किस्से अलग

लेखक: विभा रानी  |  November 23, 2009  |  देश-दुनिया, ब्लॉग   |   1 Comment

उसका नाम प्रवीण है. वह प्राइवेट टैक्सी का ड्राइवर है. नरोदा पटिया में रहता है. समय बिताना था. हमारी गाड़ी अपने गंतव्य को भागी जा रही थी. अहमदाबाद का नया बसा इलाका- सेटेलाइट सिटी. विकास की दौड़ में भागता शहर. चौडी सड़कें, चौतरफा मॉल से पटा इलाका. एक फाइव स्टार होटल खुल चुका है. चार के और खुलने की योजना है. सड़क बनने का काम हो रहा है. अभी इसके ऊपर फ्लाइओवर बननेवाला है, तब यहां की ट्रैफिक और भी कम हो जाएगी. इसरो का एक कार्यालय भी उधर दिखा. तब लगा कि एक ज़माने में यह कितना वीरान इलाका रहा होगा. आज यह अहमदाबाद का सबसे मंहगा इलाक़ा है.

अहमदाबाद आना जाना रहता है. पिछले दस बारह साल में इसे बढ़ते, विकसित होते देखा है. लेकिन इधर के कुछ सालों में तो विकास का जैसे कोई रेला आया है. यह भौतिक विकास है और आज इस भौतिकतावाद को हमने विकास का, आधुनिकता का अहम हिस्सा मानते हुए समझ लिया है कि यही विकास है. इसमें बहस की कोई गुंजाइश नहीं है. आप कैसे किसी को कह सकते हैं कि उसके पास अपना एक घर ना हो, घर हो तो उसमें बिजली पानी ना हो, आसपास अच्छी दुकानें ना हों, साफ और चौड़ी सडकें ना हों, घर में टीवी से लेकर सोफा सेट, मोबाइल, आई पॉड तक सभी आधुनिक उपकरण ना हो. यही सब तो विकास है, और क्या चाहिए? Read more

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