हिंदी यूनिवर्सिटी में यह अघोषित “कर्फ्यू” है

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  March 9, 2010  |  देश-दुनिया   |   1 Comment

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में छात्रों पर हो रहा अत्याचार निरन्तर जारी है जिसका जिम्मेदार कौन है यह पूरे घटनाक्रम को समझने पर पता लगाया जा सकता है. आखिर एक बनते हुए विश्वविद्यालय में निरन्तर चल रही तानाशाही पर कौन लगाम लगायेगा.

मीडिया विभाग के एक छात्र अनिल को विश्वविद्यालय से निष्काशित करने के पीछे प्राक्टर मनोज कुमार और अनिल अंकित राय ने अपनी पूरी ताकत लगा दी. मनोज कुमार कथित तौर पर गांधीवादी कार्यकर्ता रहे हैं पर इनका गांधीवाद किस तरह का है, यह इस घटना और उनकी क्रूर कार्रवाई से समझा जा सकता है. Read more

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ऑस्कर में कैथरीन बिगेलो का जलवा

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  March 8, 2010  |  देश-दुनिया   |   1 Comment

कैथरीन बिगेलो ऑस्कर के इतिहास में बेस्ट डायरेक्टर का ख़िताब जीतने वाली पहली महिला बन गई हैं. जेम्स कैमरून की पूर्व पत्नी ने द हर्ट लॉकर से यह करिश्मा किया, जबकि कैमरून की बहुचर्चित फ़िल्म अवतार ऑस्कर में ढेर.

बिगेलो की फ़िल्म द हर्ट लॉकर एक कम बजट की फ़िल्म है, जिसने हाल के दिनों में बॉक्स ऑफ़िस पर दो करोड़ डॉलर की कमाई की है. उसे छह अकाडमी अवार्ड यानी ऑस्कर मिले, जबकि अवतार ने रिलीज़ होने के बाद से ढाई अरब डॉलर का कारोबार कर लिया है. Read more

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मध्यस्थता से इनकार, स्वतंत्र प्रेक्षक बनने को तैयार हैं अरुंधती

जानी-मानी लेखिका अरुंधती रॉय ने नक्सली संगठनों और सरकार के बीच बातचीत की मध्यस्थता से इनकार किया है। बीबीसी से बातचीत में अरुंधती रॉय ने कहा है कि मध्यस्थता के लिए जो हुनर चाहिए वो उनके पास नहीं हैं। वो मूलत: लेखिका हैं। लेकिन वो इस बातचीत में स्वतंत्र प्रेक्षक की भूमिका निभा सकती हैं।

दरअसल, माओवादी नेता कोटेश्वर राव ऊर्फ किशन जी ने बीबीसी से कहा था कि अगर अरुंधती रॉय, बीडी शर्मा और कबीर सुमन जैसे बुद्धिजीवी मध्यस्थता को तैयार हो जाएं, तो वो सीजफायर कर सकते हैं। इसके जवाब में अरुंधती रॉय ने कहा है कि सरकार को माओवादियों की पेशकश को गंभीरता से लेना चाहिए और दोनों पक्षों के बीच सीजफायर (लड़ाईबंदी) होना चाहिए। Read more

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यह जीत सिर्फ़ भारत की नहीं बल्कि हॉकी की है

हुक, पुल और ड्राइव की जगह बरसों बाद फ़्लिक, स्कूप और ड्रिबलिंग जैसे शब्द सुनाई पड़ रहे हैं और बहुत दिनों बाद हॉकी का कोई स्टेडियम दर्शकों से खचाखच दिख रहा है. भला वर्ल्ड कप हॉकी की इससे बेहतर क्या शुरुआत हो सकती थी.

2008 के बीजिंग ओलंपिक तक से वंचित रह गई भारतीय हॉकी टीम ने जो कामयाबी हासिल की है, उसकी टाइमिंग बेमिसाल है. पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जीत सिर्फ़ एक टीम की जीत नहीं, एक कोशिश की जीत है, जो पिछले दिनों में बेहद विपरीत परिस्थितियों में भारतीय हॉकी खिलाड़ी करते आए हैं और कभी हॉकी संघ के टूट जाने, कभी अपनी तनख़्वाह के लिए हड़ताल कर जाने और कभी किसी पार्टी में शामिल होने के लिए पैसे मांगने के आरोप झेलते आए हैं. लगभग अपना वजूद बचाने के मुहाने पर खड़ी भारतीय हॉकी टीम को ताज़ा हवा के इस झोंके की बेहद ज़रूरत थी लेकिन किसी ने शायद यह नहीं सोचा था कि ऐसा वर्ल्ड कप के भारत के पहले ही मैच में पाकिस्तान को 4-1 से हरा कर होगा. Read more

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रुश्दी डरपोक, हुसेन कट्टरपंथी हैं, मेरा नाम उनसे मत जोड़ें

बहुत सारे लोग मेरा नाम सलमान रुश्दी के साथ जोड़ देते हैं। देश विदेश सब जगह। लेकिन अगर दो ऐसे लोगों को एक साथ रख कर देखा जाता है, जिनमें काफी असमानता है तो आपत्ति स्वाभाविक है। आजकल मुझे धड़ल्ले से महिला रुश्दी कह दिया जाता है। मैं पूछती हूं, सलमान रुश्दी को पुरुष नसरीन क्यों नहीं कहते? एक फतवे को छोड़ दें, तो हमारे बीच कोई समानता नहीं है। रुश्दी पुरुष हैं। मैं स्त्री हूं। यह सबसे बड़ा अंतर है। पुरुष होने के कारण वे सुविधाएं भोग रहे हैं और स्त्री होने के चलते मैं असुविधाओं से घिरी हूं।

मैं एक-एक कर असमानताएं गिनाती हूं। फतवा जारी होने के बाद उन्होंने कट्टरपंथियों से माफी मांगी, तौबा करके खांटी मुसलमान बने रहने की कसम खाई। मैंने माफी नहीं मांगी। मुसलमान भी नहीं होना चाहती। मैं बचपन से नास्तिक हूं। चाहे जितने आँधी-तूफान आए, हमेशा सिर ऊंचा किए नास्तिक बनी रही। जिस ईरान ने रुश्दी के खिलाफ फतवा जारी किया था वे उस देश में कभी नहीं रहे। मगर जिस देश में मुझे फांसी पर चढ़ाने के मकसद से बरसों उन्मादियों का जुलूस निकलता रहा, जहां असहिष्णु मुसलमान मेरी हत्या को उतारू थे, जहां की सरकार ने खुद मेरे खिलाफ अपील की थी; जिसके चलते मेरा हुलिया जारी किया गया और मुझे महीनों रात के अंधेरे में लुक-छिप कर रहना पड़ा था, जिस देश के कट्टरपंथी अपने हाथों मेरी गर्दन मरोड़ने पर तुले थे, उस देश में- ऐसे उग्र माहौल में भी- मैं सशरीर उपस्थित रही। सरकार और कट्टरपंथियों के तमाम अत्याचार मैंने अकेले सहे थे। Read more

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क्या वनडे की संजीवनी है सचिन का रिकॉर्ड

क्रिकेट का वनडे मैच भारत की लैंड लाइन टेलीफ़ोन जैसा है. 30-40 साल पहले भारत की आम जनता ने पहली बार काले रंग के डिब्बे को देखा तो यह अजूबा लगा. अब मोबाइल युग में किसी घर में टेलीफ़ोन देखते हैं, तो फिर से अजूबा लगता है.

वनडे क्रिकेट का भी यही हाल होता जा रहा है. लिमिटेड ओवरों में ट्वेन्टी 20 तेज़ी से पसर गया है. क्लासिक और परंपरा के नाम पर टेस्ट क्रिकेट तो बचता दिखता है लेकिन वनडे क्रिकेट पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. कई बड़े क्रिकेटर वनडे को बंद कर देने की वकालत कर चुके हैं और लोगों की दिलचस्पी भी, बताई जाती है, कि कम हो रही है. टेलीविज़न कंपनियों को विज्ञापन कम मिल रहे हैं और स्टेडियमों में मौजूदगी घट रही है. पहले की तरह दिन भर टेलीविज़न से चिपकने वालों की भी कमी होती जा रही है. Read more

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यह रिकॉर्ड भी क्रिकेट के भगवान के नाम

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  February 24, 2010  |  देश-दुनिया   |   Leave a Comment

क्रिकेट प्रेमियों को आज की शाम हमेशा याद रहेगी। जिन लोगों ने भी स्टेडियम में या फिर टेलीविजन पर महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर को खेलते देखा है वो इन पलों को शायद ही कभी भुला सकें। जिन्होंने रेडियो पर तालियों की गड़गड़ाहट सुनी होगी, उनके कानों में वो गूंज शायद ही धीमी पड़े। मास्टर ब्लास्टर ने वो करिश्मा कर दिया है जो दुनिया का कोई बल्लेबाज नहीं कर सका। विवियन रिचर्ड्स, सुनिल गावस्कर, ब्रायन लारा, रिकी पॉन्टिंग… कोई भी नहीं। भविष्य में अगर कोई उनके इस रिकॉर्ड को तोड़ेगा तो शायद उसे भी इसलिए याद रखा जाए कि उसने सचिन का रिकॉर्ड तोड़ा है। Read more

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ठहरी हुई, गुमसुम सियासत पर लिखना दर्दनाक है

लेखक: राजकिशोर  |  February 22, 2010  |  देश-दुनिया, ब्लॉग   |   3 Comments

भारत की राजनीति पर लिखना 1990 के बाद से ही एक कष्टदायक काम रहा है। लेकिन अब तो यह लगभग असंभव-सी चीज होती जा रही है। कारण बहुत साफ है : भारतीय राजनीति आगे नहीं बढ़ रही है। उसमें न कोई नई बहस पैदा हो रही है, न कहीं आत्म-परिष्कार की चेष्टा है। एक ठहरा हुआ-सा गुमसुम माहौल है। ऐसा माहौल कांग्रेस के लिए बहुत मुफीद होता है। इसलिए अजब नहीं कि बहुत-से लोगों को इस समय कांग्रेस ही सबसे बेहतर विकल्प प्रतीत हो रही हो। Read more

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हीरो जीता, विलेन हारा

ठाकरे जी,

आपको ब्रेकिंग न्यूज दे दें। आप तो “माई नेम इज़ ख़ान” देखने नहीं गए। लेकिन महाशिवरात्रि के दिन जो दर्शक आपके ‘शिवसैनिकों’ का घेरा तोड़कर मल्टीप्लेक्सेज़ में फिल्म देखने गया उसने फिल्म देखते देखते ताली पीटी। आप पूछेंगे कि इसमे कौन सी नई बात है। अपने हीरो को देखकर तो दर्शक ताली और सीटी बजाता ही है। लेकिन फिल्म देख रहे हमारे साथी ने अलग रिपोर्ट दी। सोचा आप को भी कन्वे कर दूं। मेरे साथी ने बताया कि फिल्म के इंटरवेल में दर्शकों ने तालियां पीटीं। और वो इसलिये कि उन्हें ये एहसास हुआ कि उन्होंने क्या अचीव (हासिल) किया है। उन्हें एहसास हुआ कि कैसे आपके तालिबानी हुक्म की धज्जियां उड़ाते, आपकी लुम्पेन बानर सेना को ठेंगा दिखाते हुए, अपने इंडियननेस पर भरोसा रखते हुए, आपकी स्यूडो (छद्म) भारतीयता बेनकाब करते हुए, उन्होंने वो कर दिखाया जो आप हर हाल में रोकना चाहते थे। Read more

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अब महानायक पहनेंगे भगवा चश्मा, करेंगे मोदी वंदना

अब सदी का महानायक गुजरात का चेहरा होगा। टूरिस्टों को गुजरात की ओर आकर्षित करने के लिए अमिताभ बच्चन अब मोदी के ब्रैंड अंबैसेडर होंगे। अमिताभ बच्चन ने नरेंद्र मोदी का निमंत्रण स्वीकार करते हुए उन्हें चिठ्ठी लिखका हामी भर दी है। अब गुजरात के दो चेहरे होंगे। नरेंद्र मोदी और अमिताभ बच्चन। दरअसल, ये डील तो उसी दिन पक्की हो गई थी जिस दिन अमिताभ बच्चन अपनी फिल्म “पा” के प्रमोशन के लिए गुजरात पहुंचे और नरेन्द्र मोदी और उनकी पूरी कैबिनेट के लिए फिल्म “पा” की स्पेशल स्क्रीनिंग की। उस दिन “पा” और गुजरात के हिंदुवादी “पा” मोदी की झप्पियां डालते हुए तस्वीर देखकर यूं लगा कि कुंभ के मेले में बिछड़े भाई सालों बाद मिले हों। Read more

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