लेखक का पन्ना
विनीत कुमार द्वारा लिखित आलेख:
बातें, किस्से, विचार और हंसी… दून रीडिंग्स का शानदार आयोजन
,लेखक: विनीत कुमार | April 4, 2010 | देश-दुनिया | 1 Comment


हिंदू होने पर मुझे पर मुझे गर्व नहीं, अपमान का बोध होता है। क्योंकि इसी ने मुझे अछूत बनाया। दलितों के आदर्श कभी भी राम नहीं हो सकते। दलित समाज कभी भी हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं रहा। मुझे कभी भी ऐसा एहसास नहीं होता कि मुझे धर्म की जरूरत है।
जो दलित सफल हो जाते हैं, वो अपनी पहचान छिपाना शुरू कर देते हैं। वो या तो अपना नाम बदल लेते हैं या फिर अपना सरनेम बदल लेते हैं। ऐसा इसलिए कि सफल होने पर जैसे ही समाज को पता चलता है कि वो दलित है तो उसकी योग्यता को कमतर करके देखना शुरू कर देता है। उसकी प्रतिभा को शक की निगाह से देखना शुरू कर देता है। समाज उसे इस रूप में स्वीकार नहीं करता।
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने साहित्य और समाज के बीच दलितों को लेकर जो रवैया है, उस पर कुछ इस तरह से अपनी बातें रखीं कि दून रीडिंग्स के दूसरे दिन, सुबह से ही महौल में गर्माहट पैदा हो गयी। वहां मौजूद जिन लोगों ने वाल्मीकि को सुना, सत्र के बाद उनसे अलग से बात करने के लिए अपने को रोक नहीं सके। जो लोग लंबे अरसे के बाद हिंदी साहित्य के बारे में सुन रहे थे उन्हें हैरानी हो रही थी कि लिटरेचर को समझने का नजरिया कितना कुछ बदल गया है।
सुबह के सत्र को विंड ऑफ चेंज का नाम दिया गया, जिसे कि हिंदी में परिवर्तन की बयार भी कह सकते हैं। पहले सत्र की शुरुआत पेंगुइन हिंदी के संपादक एसएस निरुपम और दलित साहित्य के शुरुआती दौर के आलोचक और जूठन जैसी हिट आत्मकथा के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि से होती है। निरुपम उनसे बातचीत की शुरुआत हिंदी के संत साहित्य से शुरू करते हैं और फिर धीरे-धीरे मामला समाज, राजनीति, दलितों की मौजूदा स्थिति और अस्मिता विमर्श तक पहुंचती है। सवालों के जवाब में वाल्मीकि कहीं भी दोहराव या उलझाव पैदा नहीं करते। इसकी बड़ी वजह है कि वो अपनी समझ को लेकर कॉन्शस हैं। साहित्य के मामले में उनकी समझ साफ है। हिंदी की मुख्यधारा लेखन में अपार श्रद्धा रखनेवाले लोगों को उनकी बातें एकतरफा लग सकती है लेकिन उनकी मान्यताओं में ग्रे एरिया नहीं है। जो है वो या तो स्याह या फिर बिल्कुल सफेद। शायद इसलिए, जब वो संत साहित्य पर बात करते हैं तो अपना आदर्श कबीर या तुलसीदास को नहीं मानते और न इसे हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहने से सहमत होते हैं।
उनका साफ कहना है कि ये संभव है कि संतों ने समाज में बयार लाने की कोशिश की लेकिन दलितों को परिवर्तन के लिए बयार नहीं चक्रवात की जरूरत है और वो सहमति और सामंजस्य के साहित्य से नहीं बल्कि संघर्ष के साहित्य से ही संभव है।
निरुपम ने कंटेंट के अलावा भाषा और शिल्प के स्तर पर वाल्मीकि से जो सवाल किये मसलन कि आपकी पूरी परवरिश मुख्यधारा का साहित्य पढ़ते हुए हुई है तो फिर आपकी भाषा किस हद तक वहां से आती है, उन सारे सवालों का जबाव देते हुए वो भाषा के भीतर के कुचक्र को बेपर्दा करते हैं। वो इस बात को स्वीकार करते हैं कि धर्म में कोई आस्था न होने पर भी वो जूठन से अपनी मां के लिए दुर्गा का मेटाफर हटा नहीं सकते क्योंकि इससे ज्यादा प्रभाव पैदा करनेवाला कोई शब्द नहीं है। इसलिए उनकी पूरी राइटिंग में मुख्यधारा के जितने भी शब्द हैं वो प्रभाव को लेकर हैं, वो भाषिक परंपरा का निर्वाह मात्र नहीं है।
शिमला इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज में हमने वाल्मीकि को सुना। करीब सात महीने बाद उनके विचारों में और तल्खी आयी है। वो दलित साहित्य को अभिव्यक्ति से कहीं ज्यादा हिस्सेदारी का मामला मानते आये हैं। नमिता गोखले ने जब उनकी कविता प्रतिबंधित का अंग्रेजी अनुवाद सुनाया तो वो मूल कविता सुनाने से अपने को रोक नहीं पाये। उन्हें इस वक्त ठाकुर का कुआं कविता फिर से याद हो आयी। अंधड़ और सलाम जैसी कहानियां फिर से रेफरेंस प्वाइंट के तौर पर याद आये। देहरादून की पहाड़ों पर मल्टीनेशनल के होर्डिंग्स और बेतहाशा कंसट्रक्शन के बूते इसे संवेदनहीन शहर की शक्ल देते हुए मैं महसूस कर रहा हूं और ऐसे में वाल्मीकि की प्रतिबंधित कविता की ये लाइन हमेंशा याद रहेगा – मेरी जरूरतों में एक नदीं भी है… कागज, कलम और आस-पड़ोस। ओमप्रकाश वाल्मीकि, नमिता गोखले और निरुपम के बीच जो पूरी बातचीत हुई है वो हिंदी समाज के लिए एक जरूरी संवाद है। हमारी कोशिश रहेगी कि पूरी बातचीत जो मेरे आइपॉड में है, उसे रूपांतरित करके आप तक पहुंचाएं।
इस संवाद के ठीक बाद दो किताबों का लोकार्पण हुआ, जिसकी चर्चा करने से पहले मैं अनलीशिंग नेपाल के लेखक सुजीव शाक्या और अमिताभ पांडे के बीच हुई बातचीत को शामिल करना पसंद करुंगा। मैंने अनलीशिंग नेपाल किताब पढ़ी नहीं है लेकिन इन दोनों के बीच हुई बातचीत को सुनने के बाद वापस दिल्ली जाकर इस किताब को खरीदना मेरी प्रायॉरिटी रहेगी। ये किताब न सिर्फ नेपाल के उन संदर्भों को टच करती है, जिस पर कि पहाड़, जनजातीय संस्कृति और मान्यताओं को लेकर लिखनेवाले ज्यादातर लोगों का ध्यान नहीं जाता है बल्कि सिटी स्पेस को समझने के लिए ये एक जरूरी किताब है। सुजीत शाक्या ने बातचीत में और अमिताभ पांडे के रिस्पांस को लेकर पूछे गये सवाल का जवाब देते हुए बताया कि जब उन्होंने इस किताब को लिखा तो प्राइवेट सेक्टर और बिजनेस, चैंबर्स से जुड़े लोग नाखुश हुए क्योंकि ये किताब नेपाल में उन लोगों के मतलब साधने की कहानी कहती है। कुछ लोगों ने कहा कि इसे आपको नेपाली भाषा में भी लिखना चाहिए क्योंकि नेपाल के लोग अभी भी ज्यादा इसी भाषा में समझ सकेंगे। बाकी लेखकों से अलग सुजीत मानते हैं कि पहाड़ के लोगों के लिए सिर्फ पहाड़ ही उनके दिमाग में है जबकि नेपाल में तराई क्षेत्र एक बहुत बड़ा क्षेत्र है जिस पर बात होनी चाहिए और इसके भीतर बननेवाली इकॉनमी को समझना चाहिए। माओवाद के सवाल पर सुजीत शाक्या का सीधा कहना रहा कि यहां माओवादी नेताओं ने मौके को बस भुनाने की कोशिश की। परिवर्तन या सरोकार उनके कंसर्न में नहीं है। उनके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि वो किस तरह से सत्ता में बने रहें। नेशन स्टेट और आइडेंटिटी के सवाल पर सुजीत की अपनी समझ है जो कि उनके मुताबिक किताब में भी शामिल है कि सवाल इस बात का नहीं है कि हमारी संस्कृति और मान्यताएं कितनी पुरानी है। इसकी पहचान सिर्फ टोपी और टीशर्ट के चिन्हों से नही बची रह सकती। एक अलग देश के तौर पर नेपाल का इतिहास 250 साल पुराना है और इसमें करीब 65 अलग-अलग मान्यताओं के समूह हैं। लेकिन इससे ? असल सवाल है कि इस वक्त ग्लोबल युग में नेपाल अपने को कहां खड़ा पाता है। जाहिर है इस सवाल में आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विकास के सवाल शामिल हैं।
सुजीत भारत और नेपाल के ओपन वार्डर रिलेशनशिप के समर्थक हैं और मानते हैं कि ये दोनों देशों के विकास में बराबरी का असर पैदा करेगा। अमिताभ पांडे ने जिस तरह से संतुलित होकर संवाद को जारी रखा इससे नेपाल, अनलीशिंग नेपाल को लेकर टेम्प्ट तो पैदा हुआ ही, इसके साथ ही लगा कि टेलीविजन और हिंदी के सेमिनारों मे बहुत कम ही ऐसे संवाद मय्यसर होते हैं।
जिन दो किताबों के लोकार्पण की बात हमने ऊपर की, उनमें से एक किताब कुछ शब्द कुछ लकीरें उत्तराखंड से आये संसद सदस्य विश्वजीत की है। ये काव्य संकल्न है। दूसरी किताब विकी आर्य की कविताओं का संकलन बंजारे ख्वाब नाम से है। विकी आर्य की इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद दीप ने किया है। विश्वजीत की कविताओं में कोई दम नहीं है। ये बस प्रभाव में आकर छापी गयी किताब लगती है। विश्वजीत ने अपनी बातचीत में अशोक वाजपेयी को कोट करते हुए भले ही कह दिया कि सच्ची अभिव्यक्ति अपनी मातृभाषा में ही आती है लेकिन उसका असर हमें उनकी कविताओं में कहीं से भी दिखाई नहीं दिया। तिस पर दून स्कूल के हिंदी विभाग के भूतपूर्व एचओडी डॉ हरिदत्त भट्ट शैलेश ने जब विश्वजीत को लेकर जो बातें कहीं, उसे साहित्य की समीक्षा न मान कर गुरु का शिष्य के प्रति अनिवार्य स्नेह ही मानें तो ज्यादा बेहतर है।
विकी आर्य की कुछ कविताएं अच्छी हैं और महज चार-छह लाइनों में अपनी बातें कह जाती हैं। सतर्क होकर पढ़ें तो इसके कुछ गंभीर मायने भी निकल आते हैं। हिंदी मूल सुनने के बाद अंग्रेजी में दीप की जुबानी इन्हीं कविताओं को सुनकर ज्यादा अच्छा लगा। विकी आर्य का ऐसा कहना कि उन्होंने कविताएं नहीं लिखी हैं बल्कि कविताओं ने उन्हें लिखा है – पता नहीं ऐसा लिखना और कहना महज शिल्प का हिस्सा है या फिर व्यक्तिगत आग्रह लेकिन दोनों संकलनों से गुजरते हुए मैंने महसूस किया कि अभी भी कई लोगों के जेहन में कविता का मतलब जो मन में आये, लिख दो ही है। पॉलिटिकल करेक्टनेस और सोशल इंवाइडमेंट से वो कोसों दूर हैं।
सुजीव शाक्या के सत्र के बाद दिल्ली से आये हम सारे पत्रकार दोस्त तीन घंटे के लिए देहरादून से मसूरी के लिए निकल गये। एक के बाद एक सत्र को एटेंड करते हुए हमें लग रहा था कि दिमाग हैंग हो जाएगा। हड़बड़ी में देखी गयी मसूरी की उपलब्धि के नाम पर माल रोड पर खींची गयी कुछ तस्वीरें है, जहां-तहां घाटियों में एक-दूसरे के साथ पोज देते हुए कुछ और तस्वीरें हैं और दोपहर का भोजन। उस पहाड़ी में छोटे से ढाबे में किये गये लंच की याद मुझे और मेरे साथियों को लंबे समय तक रहेगी। एक जमाने के बाद मैंने जीरे की खुशबू महसूस की। पहाड़ी स्त्री के हाथों की बनी वो रोटी अभी भी नजर से ओझल नहीं हो रही और वो सात महीने की बच्ची जो कि अविनाश से ऐसी चिपटी कि अपने भाई के पास तक जाने को तैयार नहीं। मेरे इस सवाल पर कि जब तुम बड़ी होकर मिस उत्तराखंड बनोगी तो मुझे पहचानोगी, मुंह में आंचल दबाते हुए उसकी मां का मुस्काराना टेस रंग की तरह जेहन में बना रहेगा।
इस बीच कुमाऊं की गूंज थीम पर एक सत्र हुआ, जिसमें इरा पांडे ने इंडियन सोप ओेपेरा के जनक (हमलोग सीरियल) मनोहर श्याम जोशी की ट’टा प्रोफेसर और दिद्दी का अंश पाठ किया। इरा पांडे ने ट’टा प्रोफेसर का अंग्रेजी अनुवाद किया है। इस पर नमिता गोखले ने परिचर्चा की। उसके बाद इधर भी लंच हो गया।
लंच के बाद इन सर्च ऑफ सीता : रिवीजिटिंग मायथलॉजी, जिसका संपादन मालाश्री लाल ने की है, खुद लेखक और नमिता गोखले ने इस पर बातचीत की। इस परिचर्चा में सीता के साथ स्त्री-अस्मिता के उन सारे सवालों को उठाया गया, जहां से बहस की एक मुकम्मल जमीन तैयार हो सकती है। एक स्त्री का स्त्रीत्व किन-किन शर्तों और स्थितियों से पारिभाषित होती है, सीता के संदर्भ से उन बिंदुओं पर बात की गयी। इसी बीच आदित्य सुदर्शन की फिक्शन जो कि उत्तराखंड के हिल स्टेशन भैरवगढ़ की एक मर्डर मिस्ट्री पर आधारित है, ए नाइस क्वाइट हॉलीडे, उस पर लेखक के साथ माया जोशी की परिचर्चा हुई। रचना जोशी का कविता-पाठ हुआ और नटराज पब्लिशर्स की ओर से प्रकाशित फ्लॉवर्स एंड एलिफेंट का लोकार्पण भी हुआ।
तीन घंटे की थकान लेकर जब हम वापस होटल अकेता के सेमिनार हॉल में दाखिल हुए, तब गिरदा ने अपना जादू-जाल फैलाना शुरू ही किया था। गिरदा अपने गानों में उत्तराखंड के भूले-बिसरे चेहरों और यादों को फिर से अपनी आवाज के जरिये सामने लाते हैं। वो जब भी गाते हैं, उनकी आवाज पहाड़ी जीवन के संघर्षों को दर्शाती है। इन्होंने फैज की कई कविताओं का अनुवाद भी किया है। गिरदा ने जब हमें सुनाया कि चूल्हा गर्म हुआ है, साग के पकने की गंध चारों ओर फैल रही है और आसमान में चांद कांसे की थाली की तरह टंगा है, तो बाबा नागार्जुन आंखों के आगे नाचने लग गये। यकीन मानिए आप गिरदा को सुनेंगे तो पागल हो जाएंगे। मैं दिल्ली आते ही उनके गाये गीतों का ऑडियो लोड करता हूं।
नरेंद्र सिंह नेगी का पूरा उत्तराखंड दीवाना है, जो हमने पहले की पोस्ट में ही कहा। नेगी के गीतों में पहाड़ी सौंदर्य के साथ-साथ आज भी शामिल है, इसलिए वो हमें सिर्फ रोमैंटिक मूड की तरफ ले जाने के बजाय उस दर्द की तरफ घसीटता है जिसे सुन पाना तो आनंद पैदा करता है लेकिन जिसे बर्दाश्त कर पाना मुश्किल है। इसी कड़ी में डॉ अतुल शर्मा ने भी रचना-पाठ किया। हम इन सभी लोगों के बारे में फिलहाल विस्तार से बात नहीं कर रहे हैं। हमने इनके गीतों और कविताओं का जो आनंद लिया है, हम नहीं चाहते हैं कि उसके नाम पर आपके लिए कोई क्लासरूम खड़ी कर दें। इसे ऑडियो में ही आपके सामने लाना बेहतर होगा।
कविता और गीत सत्र के बाद पेंगुइन-यात्रा बुक्स की संगीत शृंखला का विमोचन किया गया। इस शृंखला में संगीत और संगीतकारों से जुड़ी कुल छह किताबें हैं। साहिर लुधयानवी पर जाग उठे ख्वाब कई, बिस्मिल्ला खान की जीवनी पर सुर की बारादरी, मन्ना डे की आत्मकथा यादें जी उठीं, नौशाद की जीवनी पर जर्रा जो आफताब बना, नौटंकी की मलिका गुलाबबाई और कुंदन लाल सहगल पर कुंदन सहगल जीवन और संगीत। दिल्ली में इन किताबों का पहले भी विमोचन हो चुका है। संभवतः इसलिए पेंगुइन के हिंदी संपादक एसएस निरुपम ने जो कि इस पूरे सत्र का संचालन भी कर रहे थे कहा कि संगीत पर लिखी इन किताबों के लोकार्पण का मतलब महज इसे कागज या लिफाफे से बाहर लाना भर नहीं है। हम इस पर बातचीत करना चाहते हैं। बातचीत के लिए मंगलेश डबराल को आमंत्रित किया गया। एक कवि से इतर मंगलेश डबराल को सुनना सुखद लगा। उन्होंने सुर की बारादरी के लेखक यतींद्र मिश्र और जाग उठे ख्वाब कई के संपादक मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह से बातचीत की।
मंगलेश डबराल ने इन दोनों लेखकों से बातचीत करने से पहले भूमिका के तौर पर कहा कि फिल्मी गीत अब वो नहीं रह गये जो साहिर के समय में थे। साहिर की विशेषता थी कि वो अपनी नज्मों को फिल्मी गीतों में ले आते थे। उन्होंने विष्णु खरे की बात को शामिल करते हुए कहा कि साहिर फैज से बड़े कवि थे। मुझे लगता है कि साहिर लुधयानवी पर अब तक जो भी किताबें आयीं है, हिंद पॉकेट को छोड़ दें तो अब तक कि ये साहिर पर आयी संपूर्ण किताब है। संगीत पर ऐसी किताबें निकाल कर पेंगुइन-यात्रा ने सचमुच जोखिम का काम किया है और हमें उन्हें बधाई देनी चाहिए। मंगलेश डबराल के इतना कहने के बाद दोनों लेखकों से बातचीत का सिलसिला शुरू होता है जिसे मजाक में ही सही, यतींद्र मिश्र बार-बार प्रोमोशन कैंप करार देते हैं।
साहिर पर किताब तैयार करने का विचार कैसे आया, मंगलेश डबराल के इस सवाल का जवाब देते हुए मुरलीबाबू ने कहा कि 1857 की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ मनायी जा रही थी तो हिंदी-उर्दू संबंध पर खोजबीन, नया पथ का विशेषांक निकालने के सिलसिले में शुरू की। मेरे लिए ये अचरज की बात थी कि 1856 से लेकर 61 के बीच लगभग पचास अखबार पत्रकार, अखबारनवीस और उर्दू के कल्चरल एक्टिविस्ट चाहे तो गोली से उड़ा दिये गये, काला पानी भेज दिए गये, जेलों में डाल दिये गये, घर-बदर कर दिये। तब मैंने खोजना शुरू किया कि उन्होंने ऐसा क्या लिख दिया। उसी क्रम में मैं हिंदी फिल्मी गीतों की तरफ गया। मैंने पाया कि जिसे हम हिंदी फिल्मी गीत कहते हैं, उसमें बड़ा कंट्रीब्यूशन शायरों का है। अली मेंहदी खां से लेकर जावेद अख्तर तक इसमें शामिल हैं। हम एक झूठा हिंदीवाद चलाते हुए उर्दू का जो कंट्रीब्यूशन हिंदी फिल्मों में रहा है उसको हम नकार देते हैं। इस क्रम में जब मैंने देखना शुरू किया तो पाया कि इसमें अवधी, भोजपुरी, कन्नौजी इन बोलियों के साथ उर्दू, हिंदी, संसकृत, तत्सम के शब्द प्रयोग करके हिंदी के गीत रचे गये हैं। इसलिए इन फिल्मी गीतों में इन बोलियों का भी योगदान है, उर्दू का भी है। साहिर पर मैंने इसी रूप में काम करना शुरू किया। मुरली बाबू ने साहिर की नज्मों से जुड़े उन रोचक प्रसंगों पर भी बात की जब गीतकार अपनी शर्तों पर रचनाएं किया करते। जिसमें क्राइम और पनिशमेंट पर रमेश सहगल की बनायी फिल्म के गीत वो सुबह कभी तो आएगी का जिक्र किया। जिसे सुनकर फैज के गीत हम देखेंगे की याद आ जाती है।
यतींद्र मिश्र ने संगीत के बाकी जानकारों की खुशफहमी से अपने को अलग करते हुए साफ तौर पर कहा कि मैं कानसेन हूं। मैं दुनियाभर के संगीत सुनता हूं। कइयों के पास जा-जाकर सुनता आया हूं। इसी क्रम में वो गिरिजा देवी के प्रसंग को याद करते हुए कहते हैं कि मैं अक्सर गिरजाजी के पास सुनने चला जाता और उनसे कभी ठुमरी तो कभी कुछ सुनाने को कहता। वो अपनी छात्राओं को सिखा रही होतीं और इसी बीच मैं पहुंच जाता। उनसे मेरा दादी-पोते जैसा संबंध था और वो मुझे उसी रूप में स्नेह भी करतीं। बात-बात में एक बार उन्होंने बताया कि उन्हें तो ये भी पता नहीं कि उनका एचएमवी वालों ने कब और क्या कलेक्शन निकाल। तभी मुझे महसूस हुआ कि यहां हस्तियों को लेकर कितनी बेअदबी है। मैंने मन बनाया कि मुझे इन लोगों पर काम करना चाहिए और पहला काम गिरिजा देवी पर ही किया। आज भी लोग मुझे अपनी उस पहली रचना गिरिजा के कारण ही ज्यादा जानते हैं। जिस समय मैं उन पर काम कर रहा था, मेरे साथ के लोगों ने कहा कि ये सब तुम क्या कर रहे हो – वामपंथी लोग नाराज हो जाएंगे। विद्यानिवास मिश्र ने ये जानने पर कहा कि अच्छा एलीट हो गये हो। बाइयों का लेखा-जोखा लिख रहे हो। लेकिन मुझे इन सबसे कुछ भी फर्क नहीं पड़ा।
मुझे रचना और लिखने के स्तर पर कुंवर नारायण, अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल ने बहुत अधिक प्रभावित किया है। मैं अक्सर सोचता हूं कि इनकी कविताओं में कितना खिला गद्य है। इस सवाल के जवाब में कि उनकी किताबें कितनी बिकेंगी, ऐसी किताबों की कितनी मांग है, यतींद्र मिश्र ने साफ कहा कि ये काम पब्लिशर्स का है लेकिन मैं इतना जरूर मानता हूं कि इन किताबों की जरूरत है।
यतींद्र मिश्र के पास यादों और संस्मरणों का खजाना है और सुनाने की वो खास शैली जिसे सुन कर मुझे अक्सर महमूद फारुकी की दास्तानगोई याद आती है। यतींद्र मिश्र की संपादित किताब कुंवर नारायण संसृति मैंने पूरी पढ़ी है और सुर की बारादरी का कुछ हिस्सा। लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर महसूस करता हूं कि संस्मरणों को सुनाने में यतींद्र मिश्र को महारत हासिल है। युवा पीढ़ी के लिए उनसे संस्मरण को सुनना साहित्य से नये किस्म से जुड़ना है। जब वो बिस्मिल्ला खान के संस्मरण सुना रहे होते हैं, तो हमारे मन में अक्सर सवाल उठते हैं – क्या हमारे आसपास कोई ऐसा शख्स नहीं है या फिर हममें नोटिस करने की काबिलियत ही नहीं है। उन्होंने यहां भी बिस्मिल्ला खान से जुड़े दो संस्मरण सुनाये जिसे कि मैं फिलहाल बचाकर रख ले रहा हूं।
किताबों की पब्लिसिटी की चिंता के बीच भी कुल मिलाकर ये सत्र अच्छा रहा और लगा कि हिंदी साहित्य से जुड़े लोगों को संगीत के इस पक्ष पर विस्तार से चर्चा करनी चाहिए।
एक घंटे के ब्रेक के बाद हम होटल अकेता से ग्रेट वेल्यू होटल की तरफ रवाना होते हैं जहां कि पेंगुइन-यात्रा बुक्स की ओर से संगीत शृंखला की संगीतमय प्रस्तुति और दून लाइब्रेरी की ओर से डिनर का आयोजन किया गया था। समरजीत और उनकी टीम ने एक के बाद एक गाने गाये और अपनी-अपनी हैसियत के मुताबिक लोग सुरों में खोते चले गये।
(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्ण मीडिया विश्लेषक। ओजस्वी वक्ता। दिल्ली विश्वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्लॉग राइटर। कई राष्ट्रीय सेमिनारों में हिस्सेदारी, राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। ताना बाना और टीवी प्लस नाम के दो ब्लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
दून रीडिंग्स में क्रिएटिव लोगों का जमावड़ा
,लेखक: विनीत कुमार | April 3, 2010 | देश-दुनिया | Comments Off
देहरादून में ‘दून रीडिंग्स’ के नाम से होनेवाले तीन दिवसीय (अप्रैल 2-4) साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता जब हमें पेंगुइन इंडिया की तरफ से मिला तो हम काफी एक्साइटेड हुए। एक तो दिल्ली की किचिर-पिचिर जिंदगी से छिटककर तीन-चार दिन तक देहरादून में पड़े रहने के सुख का ध्यान आया, ये अपने को रिचार्ज करने जैसा है और दूसरी बात कि प्रोग्राम शिड्यूल में प्रसून जोशी का नाम देखकर मेरी एक्साइटमेंट थोड़ी और बढ़ी कि टीवी देखते हुए, रियलिटी शो में कमेंट करते हुए और इनके लिखे गानों और विज्ञापनों को सुनते हुए अब तक जो छवि बनी है, जब वो साहित्य और संस्कृति के मसले पर बात करेंगे तो देखते हैं कि उनकी छवि पहले से और मजबूत होती है, ध्वस्त होती है या फिर कोई अलग किस्म की छवि बनती है। लेकिन हमें कार्यक्रम के शुरुआती दौर में ही उदासी झेलनी पड़ी। आयोजक की तरफ से घोषणा हुई कि वो नहीं आ सकेंगे। एसएमएस के जरिए जो उन्होंने खेद भरा संदेश भेजा, उसे ही सुना दिया गया।
देहरादून आने का बहुत मन था। कुछ नयी कविताएं भी सुनाने वाला था। पर कुछ चीजें शायद हमारे हाथ में नहीं होतीं। अपनी नयी कविता ख्वाब खर्च करके भी सुनाता। मैं ख्वाब खर्च करके खाली हो गया हूं। पतझड़ के बाद गुमसुम डाली सा हो गया हूं। पर पूरी कविता वहीं आकर जल्द ही पढूंगा। आप सबसे रूबरू होकर। वैसे भी चाहे शरीर से मैं कहीं भी रहूं, मन हमेशा उत्तराखंड के पहाड़ों में ही रहता है। मेरे उत्तराखंड के सभी साथियों को बहुत बहुत स्नेह।
आपका, प्रसून जोशी
दिल्ली से मीडिया की जो पूरी टीम, इस इवेंट को कवर करने आयी, उनके हिसाब से कार्यक्रम का एक बड़ा आकर्षण खत्म हो गया। प्रसून जोशी जो भी बोलते, वो मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए खुराक होता।


बहरहाल, दिल्ली और देहरादून के भारी ट्रैफिक जाम को झेलते हुए जब हम निर्धारित समय से करीब १५ मिनट लेट पहुंचे तब तक कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत हो चुकी थी। उत्तराखंड के प्रमुख सचिव एनएस नपालचायल के हाथों कैंडल लाइटनिंग और दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर के निदेशक डॉ बीएन जोशी के शुभकामना संदेश के साथ अकेता होटल के लॉन में छह सौ के करीब बैठी देहरादून की एलीट ऑडिएंस कार्यक्रम से जुड़ चुकी थी। मेरे पहुंचने तक कार्यक्रम का मिजाज पूरी तरह बदल चुका था। ये औपचारिकताओं से हट कर सीधे-सीधे मुद्दे पर जाकर फोकस हो गया था। लॉन में घुसते ही मंच पर हिंदी के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, बॉलीवुड के मशहूर एक्टर और जादुई आवाज के मालिक टॉम आल्टर को देखकर अच्छा लगा। गढ़वाल के मशहूर लोक गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी को देखकर कतार में बैठी ऑडिएंस के बीच फुसफुसाहट शुरू हो गयी कि देखना, ये माहौल जमा देगें। मंच संचालक के तौर पर मौजूद डॉ शेखर पाठक को देखकर हमें क्भी जेएनयू में देखी ‘पहाड़ पत्रिका का ध्यान आया जो पर्वतों और उसकी संस्कृति से जुड़े सवालों पर काम करनेवाले लोगों के लिए एक जरूरी मटीरियल है। शेखर पाठक ने मंच पर बैठे कवियों को ऑडिएंस के मिजाज को देखते हुए कविता पाठ करने के लिए बुलाने से पहले हिंदी कविता की उस लंबी परंपरा का विस्तार से जिक्र किया जिससे कि देहरादून और उत्तराखंड में पले-बढ़े कवि जुड़ते हैं। तारसप्तक से लेकर अब तक कविता की चर्चा करते हुए शेखर पाठक ने समकालीन कविता की मौखिक किंतु गंभीर बारीक चर्चा की। ये अलग बात है कि हिंदी साहित्य से इतर लोगों के लिए ये सिर्फ परिचय जैसा ही था और देहरादून की ऑडिएंस के लिए बार-बार गर्व करने का विषय कि वो एक बहुत ही प्रसिद्ध और हैसियत रखनेवाले शहर से आते हैं। इस परिचय के दौरान ही उन्होंने कविता में हिंदी और अंग्रेजी का वर्चस्व होने की स्थिति में अभिव्यक्ति के स्तर पर विविधता के खत्म होने की बात की। एक भाषा के वर्चस्वकारी प्रभाव में आकर उसके साथ चलनेवाली बोलियां और भाषिक प्रयोग कैसे खत्म होते हैं, शेखर पाठक की टिप्पणियों से हमें बेहतर तरीके से समझ आया। कुल मिलाकर माहौल ऐसा बना कि प्रसून जोशी के न आने का मलाल जाता रहा और हम जैसा हिंदीवाला जो कि कभी मंच पर बैठे कवियों के एक-एक संकलन को खोजने के लिए दिल्ली के दरियागंज में पागल हुआ फिरता था, उसका चित्त स्थिर हो आया कि चलो कुछ बेहतर ही सुनने को मिलेगा।
शेखर पाठक की तरफ से कविता को लेकर दिये गंभीर परिचय से मामला कुछ इस तरह से बन गया कि सामने बैठी ऑडिएंस ने मानसिक स्तर पर अपने को तैयार कर लिया कि ये आम तौर पर लाफ्टर चैलेंज से होड़ लेनेवाली कविता नहीं है। ये सरोकारों और साहित्यिक गंभीरता की कद्र करनेवाली कविता है। इसलिए ऑडिएंस के बीच थोड़ी सी आवाजाही का माहौल बनता लेकिन फिर लंबे समय तक ठहरनेवाली शांति छा जाती है। कविता पाठ के लिए सबसे पहले लीलाधर जगूड़ी को आमंत्रित किया जाता है।
लीलाधर जगूड़ी अपनी दो कविता (एक तो बहुत लंबी और दूसरी उससे थोड़ी कम लंबी) पढ़ने के पहले साथ में एक जानकारी भरी टिप्पणी जड़ते हैं। जानकारी अपने रचना संसार को लेकर है कि उनके अब तक 12 काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और उनमें कुल सात सौ के करीब कविताएं संकलित हैं और टिप्पणी इस बात को लेकर कि अब सारी की सारी कविताएं तो याद नहीं रहती और न ही वो उन मंचीय कवियों की तरह हैं कि अपनी लिखी कुल कविताओं में से दस-बारह को याद कर लेते हैं और फिर उन्हीं को सब जगह बार-बार सुनाते रहते हैं। कंटेंट से इतर जगूड़ी ने आदत के स्तर पर भी मंचीय कवि से अपने को अलग किया। जगूड़ी ने इस बात पर जोर दिया कि कविता में इस बात को हर हाल में शामिल किया जाना चाहिए कि आज की दुनिया कैसी है, जीवन में किस तरह के बदलाव हो रहे हैं। यानी सामयिक स्तर पर कविता को सचेत होना चाहिए और इसी क्रम में उन्होंने पुरुषोत्तम की जनानी नाम से अपनी लंबी किंतु प्रसिद्ध कविता का पाठ किया – एक पेड़ को छोड़कर फिलहाल मुझे कोई जिंदगी याद नहीं आ रही, जो जिस समय डरी हो, उसी समय मरी न हो। और दूसरी कविता नये जूते जो कि इस ग्लोबल होते बाजार के होने और न होने के बीच के सन्नाटे का बयान करती है।
जगूड़ी के बाद हिंदी के मशहूर कवि मंगलेश डबराल जो कि कविता में अनरिटेन हिस्ट्री को सहेजने और संजोनेवाले कवि के रूप में जाने जाते हैं। जिनकी कविता पाठ रहित इतिहास के बीच लाइव हिस्ट्री समेटने की ताकत रखती है, उन्होंने कविता पाठ शुरू किया। मंगलेश डबराल ने लीलाधर जगूड़ी की कविता की साइज से अपनी कविता की साइज की तुलना करते हुए कहा कि मेरी कविता उतनी बड़ी नहीं है, उससे छोटी है और बाकी हर मामलों में छोटी है क्योंकि मैंने उनके बाद लिखना शुरू किया। मंगलेश डबराल ने सबसे पहले दरवाजे और खिड़कियां नाम की अपनी प्रसिद्ध कविता सुनायी और उसके बाद पत्थर। ये दोनों कविताएं अभी दो दिन पहले ही दिल्ली के इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी में THE WORLD, THE POET, THE IMAGE कार्यक्रम में सुनकर आया था। इससे पहले भी ये दोनों कविताएं मैंने डी स्कूल में सुनी है। इसलिए मेरी तरह अगर किसी और ऑडिएंस ने इन कविताओं को एक से ज्यादा या फिर बार-बार सुनी हो तो वो लीलाधर जगूड़ी की इस बात से शायद असहमत हो जाएं कि रिपीटेशन का काम सिर्फ और सिर्फ मंचीय कवि करते हैं। सरोकार और गंभीरता के स्तर पर लिखनेवाले कवि भी अपनी कुछ कविताओं को लेकर बहुत ही पजेसिव होते हैं और इसे कई जगहों पर रिपीट करते हैं। इसके पीछे संभव है कि कई जेनुइन कारण हों। बहरहाल इन दोनों कविताओं के अलावा मां की तस्वीर से ऑडिएंस भावानात्मक स्तर पर जुड़ती है और तालियों की खनक भी यहां तक आते-आते बढ़ जाती है।
उत्तराखंड के लोगों के बीच नरेंद्र सिंह नेगी बहुत ही लोकप्रिय और सराहा जानेवाला नाम है। नेगी साहब के लोकगीतों की खास बात है कि वो उत्तराखंड की पौराणिकता जो कि यहां की पहचान है, उससे अलग रचना के स्तर पर सामयिक मसलों को लेकर लगातार सक्रिय हैं। इसलिए भला-भला गीत लग्यौ ल में किसानी संस्कृति का जो खुशनुमा अंदाज बयान करते हैं, वहीं दूसरी रचना में सीधे-सीधे मौजूदा महंगाई की विस्तार से चर्चा करते हैं। ये आदमी की समस्याओं की रचनात्मक कराह है। कन क्वै खेलडणा, अब भारी गरीबी ह्वैगे – जिंदगी में ये कराह अपने चरम पर है।
तीन दिनों तक चलनेवाले इस दून रीडिंग्स में आकर टॉम आल्टर को सुनना, मैं इस पूरे कार्यक्रम के बीच अपने लिए एक बड़ी उपलब्धि मानता हूं। उन्हें सुनना कुछ उसी तरह से है, जैसे हममें से कई लोग नसीरुद्दीन शाह के न होने पर भी सिर्फ उनकी आवाज को सुनने के लिए जा सकते हैं। टॉम साहब की जो आवाज है, हिंदी-उर्दू के शब्दों का जो चयन है, उसे सुन कर हम जैसे हिंदी प्रैक्टिसनर को अपनी भाषा और समझ से कोफ्त होने लगती है और जुबान से सिर्फ एक ही शब्द निकलता है – काश, हम भी… टॉम आल्टर नज्म पेश करने के पहले हिंदुस्तानी दिलों में तैरनेवाली फिल्म राम तेरी गंगा मैली के उस प्रसंग की चर्चा करते हैं, जहां वो स्क्रिप्ट में रामपुर की जगह मसूरी लिख कर फेरबदल करते हैं। आल्टर साहब को लगता है कि सिनेमा में उनके शहर का भी नाम आ जाए, जिसे राजकपूर पकड़ लेते हैं और कहते हैं – अब बताओ, मंगलू जैसा चोर-बदमाश क्या मसूरी से आएगा, क्या ऐसा लिखना ठीक रहेगा?
आल्टर एक पहाड़ी की उस आलोचना को भी याद करते हैं जिसे कि देश का बड़ा से बड़ा पत्रकार और फिल्म रिव्यूअर भी नहीं पकड़ पाया। उस औसत पहाड़ी ने टॉम आल्टर से सवाल किया कि आप और राजकपूर हम पहाड़ियों को क्या समझते हैं, क्या हमारे दिल नहीं है, क्या हम जज्बाती नहीं हैं – राम तेरी गंगा मैली क्या वाहियात फिल्म बनायी है। उस फिल्म में आप भाई बनते हैं, जान की कुर्बानी देकर उसकी रक्षा करते हैं लेकिन उस बहन की जुबान पर एक बार भी भाई का नाम नहीं? टॉम आल्टर इस प्रसंग को अभिभूत होकर सुनाते हैं और बताते हैं कि राजकपूर ने कहा कि सचमुच हमसे बड़ी चूक हुई है। इन प्रसंगों को सुनाने के बाद टॉम आल्टर ने दो नज्में हमें सुनायी। एक तो डॉ इदरार हट्टी साहब की और दूसरी कॉम वॉन की। उर्दू में होने की वजह से ये दोनों नज्म पूरी तरह तो समझ में नहीं आयी लेकिन जो भी और जितना भी समझ पाया ये सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि आल्टर की आवाज और उच्चारण की वजह से।
इस कार्यक्रम में हमें बसंती विष्ट और उनकी टोली का जागर जीत सुनने को मिला। जागर एक तरह से पौराणिक कथाओं को गाकर सुनने की विधा है। लेकिन इसे सामान्य तौर पर गद्य की गायन शैली में शामिल नहीं कर सकते। कथा की पूरी तस्वीर आपके सामने उभरती है लेकिन आपके भीतर जो अंतिम प्रभाव स्थायी तौर पर रह जाता है, वो है इनके गाने का अंदाज। इस जागर में पौराणिक कथाओं के अलावा भी कई लोक-कथाएं शामिल हैं। इस जागर में जो चीजों को बयान करने की जो शैली है, उसी शैली में अगर सामयिक मसलों और समस्याओं को, सरकारी अभियानों और प्रचारों को शामिल कर लिया जाए तो एक असरदार अभिव्यक्ति लोगों के सामने उभरकर आएगी। ये कुछ-कुछ दास्तानगोई सा होगा जिसके कहने की शैली तो बहुत पुरानी है लेकिन उसके भीतर मेटाफर के जरिये सामयिक मसलों को शामिल किया जा सकता है। मैंने तो इसे पहली बार सुना लेकिन जो लोग इसे बार-बार सुनते हैं और कथा रिपीट होती है तो ऐसे में इसे सिर्फ पौराणिक प्रसंगों तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक मुद्दों से जोड़ना बेहतर होगा।
देहरादून आकर मैंने महसूस किया कि यहां अभिव्यक्ति और कलाओं में प्रकृति के साथ की साझेदारी के साथ इसे बचाने की पुरजोर कोशिशें बनी हुई हैं। ऐसा सिर्फ लगाव के कारण से नहीं है और न सिर्फ इसलिए कि यहां के लोगों में प्रकृति अबाध रूप से शामिल है बल्कि ऐसा इसलिए भी है कि शायद वो मानते है कि बिना प्रकृति को शामिल किये न तो अभिव्यक्ति संभव है और न ही कला रूप। रचना और कला के स्तर पर उनके इस प्रयास की नोटिस ली जाए तो बेहतर होगा। शर्मिला भर्तृहरि ने गंगा को लेकर जो अपनी प्रस्तुति दी और वीणा जोशी ने जो क्लासिकल प्रस्तुति दी, उससे तो मैं यही समझ पाया। हां ये बात जरूर है कि इस पूरे कार्यक्रम में मैंने एक बात शिद्दत से महसूस की कि इन सब चीजों को बचाने और व्यक्त करने को लेकर सिर्फ और सिर्फ धार्मिक और पौराणिक आग्रह न होकर एक प्रोग्रेसिव और साइंटिफिक एप्रोच भी हो तो असर का विस्तार ज्यादा होगा।
दो तारीख का डिनर गेल इंडिया लिमिटेड की तरफ से स्पॉन्सर्ड था। खाना हमें दिल्ली के बाकी कार्यक्रमों की तरह ही लगा। मेनू भी दिल्ली ही तरह तय था। हां लोग मटन रोगन जोश की बहुत तारीफ कर रहे थे और एसएस निरूपम चावल के स्वाद पर फिदा होते नजर आये। मुझे शिमला एडवांस स्टडीज में बिताये गये उन आठ दिनों की याद ताजा होने लगी जब हमने काफी कुछ इसी स्वाद में खाया। ओमप्रकाश वाल्मीकि से मिलकर ये यादें और जीवंत हो उठीं। रात के डिनर में पुष्पेश पंत, यतींद्र मिश्र, इरा पांडे जैसे नामचीन लोग नजर आये जो कि आज अपनी बात रखेंगे। उम्मीद करते हैं कि आज का कार्यक्रम हिंदी समाज की तमाम बहसों के बीच एक बेहतर दखल होगा। हम यहां की एक-एक घटनाओं की खबर आप तक पहुंचाएंगे, फिलहाल दिल्ली से आये अपने तमाम पत्रकारों जिनमे से कि अब कई दोस्त होने-होने के करीब हैं, पूरे सेशन को एनजॉय कर रहे हैं।
नोट – यहां इंटरनेट स्लो है। फिर भी हमारी लगातार कोशिश रहेगी टॉम आल्टर और बसंती विष्ट की बातों का ऑडियो वर्जन आप तक पहुंचाएं।
(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्ण मीडिया विश्लेषक। ओजस्वी वक्ता। दिल्ली विश्वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्लॉग राइटर। कई राष्ट्रीय सेमिनारों में हिस्सेदारी, राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। ताना बाना और टीवी प्लस नाम के दो ब्लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
सेक्सी बिपाशा की “बीडी” से “भक्ति” जलइले
,लेखक: विनीत कुमार | March 16, 2010 | देश-दुनिया | 2 Comments
बाजार भी कमाल की चीज है। कल तक जिस “बीड़ी जलइले”.. गाती हुई, कमर मटकाती हुई लड़की को देख, देश के ठुल्ले तक अपने को रोक नहीं पाए, उस गाने का ऐसा असर कि अच्छे-अच्छे मचलने लगें, आज उसी गाने के दम पर भक्ति पैदा करने के दावे किए जा रहे हैं। हिन्दी सिनेमा के पॉपुलर और सुपरहिट गानों की पैरोड़ी बनाकर मंदिरों, माता जागरण से लेकर पान की दूकान और चूडी-बिन्दी बेची जानेवाली दुकानों में बजाने का काम सालों से होता आया है। Read more
“मौत का पिंजरा”
,लेखक: विनीत कुमार | February 20, 2010 | पहरेदार | 3 Comments
आजतक पर ‘मौत का पिंजरा’ स्टोरी देखकर मैं अपने को रोक नहीं पाया। मैंने तुरंत शम्स ताहिर खान को एसएमएस किया, “ये जबरदस्त स्टोरी है सर,इसमें सरोकार है,मैं रिकार्ड कर रहा हूं।” एसएमएस करने के मिनट भर बाद ही उनका फोन आया और उनकी पहली ही लाइन- “सच कहूं,मन बहुत कचोटता है। टेलीविजन पर ऐसी स्टोरी की गुंजाइश बहुत ही कम रह गयी है। बहुत मुश्किल है यहां ये सब करना।”
शम्स जब ऐसा बोल रहे थे तो मुझे लगा कि उनके भीतर से आशा किरण होम में हर दो दिन में मर रहे बच्चे का दर्द और टेलीविजन के भीतर इस तरह की मर रही खबरों का दर्द दोनों एक साथ निकल रहे हों। ऐसा लगा कि एक संवेदनशील इंसान और सरोकारी टेलीविजन पत्रकार की चिंता घुलकर एक एब्सर्ड स्थिति की तरफ इशारा कर रहे हों। फोन पर मैं भी भावुक-सा हो जाता हूं और कहता हूं- आप बिल्कुल सही कह रहे हैं सर। मन ही मन सोचता हूं कि इस स्टोरी का प्रोमो पिछले एक घंटे से देख रहा हूं और इस बीच दीपिका पादुकोणे की लालपरी बनने की कथा से लेकर जावेद अख्तर-आमिर खान विवाद, खान ही सुपर है… और भी दुनियाभर की स्टोरी इस चैनल पर देखता रहा। मैं आगे कहा- ऐसी स्टोरी पर लगातार नजर बनाए हुए हूं सर, मैं इनकी लगातार रिकॉर्डिंग कर रहा हूं। आगे चलकर इस पर कुछ करुंगा। कुछ गंभीर तरीके से लिखने की कोशिश करुंगा। उन्होंने कहा- आप जरुर लिखिए, लिखने के क्रम में कभी भी किसी तरह की जरुरत हो, आप बताइएगा… हमारी बात यहीं पर ख़त्म होती है। Read more
थोड़ी जानकारी, थोड़ी हिदायत के साथ ब्लॉग मंथन ख़त्म
,लेखक: विनीत कुमार | October 25, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 6 Comments
ब्लॉग-विमर्श के लिहाज से पहले दिन के मुक़ाबले दूसरे दिन के दोनों सत्र ज़्यादा कारगार लगे। इसकी एक वजह तो समय से सत्र का शुरू होना रहा। अधिक वक्ताओं के विचार आए लेकिन इसके साथ ही तकनीकी सत्र में जिस बारीकी से रविरतलामी, मसिजीवी, ज्ञानदत्त पांडेय और संजय तिवारी ने सूचना, तकनीक औऱ अभिव्यक्ति के बीच के अंतरसंबंधों को बताया वो नॉन-ब्लॉगरों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण रहे। लेकिन पहले दिन वक्ताओं को बोलने देने में जितनी दरियादिली दिखायी गयी अगले दिन उसकी गाज भाषा, साहित्य और संप्रेषणियता के सवाल पर बोलने आए वक्ताओं पर गिरी। जाहिर तौर पर उसका शिकार मैं भी हुआ। विश्वविद्यालय की ओर से जो न्योता हमें भेजा गया था उसमें ये साफ तौर पर लिखा था कि आप जो भी बातचीत करेंगे उसे प्रकाशित किया जाएगा इसलिए हमनें अपने स्तर से बीस मिनट बोलने के लिहाज से तैयारी की थी जबकि हमें पांच मिनट, सात मिनट के भीतर, गहरे दबाबों के बीच अपनी बात खत्म करनी पड़ी। मैंने तो फिर भी पांच मिनट के निर्धारित समय होने पर भी हील-हुज्जत करके ढाई मिनट आगे तक जार रहा लेकिन बाद के वक्ताओं से कहा गया कि आप एक-एक मिनट में अपनी बात रखें। Read more
इलाहाबाद में ब्लॉग मंथन का पहला दिन
,लेखक: विनीत कुमार | October 24, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 5 Comments
अचानक पाबंदियों के टूटने से भी दम घुटने लगता है, अनंत आजादी कई बार अराजक स्थिति पैदा करते हैं। इसलिए चिट्ठाकारी पर जब भी हम बात करते हैं तो स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच के फर्क को समझना होगा। चिट्ठाकारी में जो कुछ भी कर रहे हैं उसके साथ हर हाल में जिम्मेदारी का एहसास भी होना चाहिए। आदमी जब बोलता है तो कुछ भी बक देता है लेकिन लिखते वक्त हम ऐसा नहीं कर सकते। बोलने से जीभ नहीं कटती लेकिन लिखने से हाथ कट जाता है। हमें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि आजाद अभिव्यक्ति के नाम पर जो कुछ भी चिट्ठाकारी की दुनिया में लिखा जा रहा है,इसके बीच एक स्टेट मशीनरी भी है। आनेवाले समय में ये राज्य लिखने के मामले में दखल करे इससे पहले ही चिठ्ठाकारों को चाहिए की वो अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए स्वयं अनुशासित हों। Read more




