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द्वारा लिखित आलेख:
चलो लिख लो, एक भी दलित नियुक्ति याद नहीं : विभूति
,लेखक: विभूति नारायण राय | February 22, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
जहां मजबूरी नहीं हो वहां विभूति नारायण राय ने एक भी दलित नियुक्ति नहीं की। या यूं कहें कि उन्हें एक भी दलित नियुक्ति याद नहीं। बावजूद इसके विभूति दंभ भरते हैं कि वो दलित हितों के रक्षक हैं। वो यह भी कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था पर उन्होंने जो काम किया है वो अपने आप में एक मिसाल है। विभूति के मुताबिक एक्जीक्यूटिव काउंसिल में यूनिवर्सिटी की तरफ से सिर्फ दो ही बंदे थे- एक वो खुद और दूसरा उनके द्वारा नियुक्त प्रो वाइस चांसलर। अब वही दोनों किसी एक शिक्षक के ख़िलाफ़ हो जाएं तो फिर उसे कौन बचाएगा? इस सवाल के जवाब में विभूति का कहना है कि अगर किसी को शिकायत हो तो वो अदालत जाए। अनिल चमड़िया अदालत जाएं। आप वी एन राय के इंटरव्यू के दो हिस्से पढ़ चुके हैं। पहले हिस्से में उन्होंने कहा था कि अनिल चमड़िया को निकाल कर ग़लती सुधार ली। दूसरे हिस्से में उन्होंने कहा कि दलितों के मुद्दे पर उन्हें किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं। और अब आप इस इंटरव्यू का तीसरा हिस्सा पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए – मॉडरेटर
मुझे तुम्हारे किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं: विभूति
,लेखक: विभूति नारायण राय | February 20, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 7 Comments
विभूति नारायण राय दलित विरोधी नहीं हैं। अंकित चोर गुरू नहीं हैं। उनके ख़िलाफ़ यह दुश्मनों की साज़िश है। दलित छात्र राहुल कांबले को नियमों के आधार पर दाखिला नहीं मिला। दलित प्रोफेसर लैला कारुण्यकारा को नोटिस ब्राह्मणों को मां-बहन की गालियां देने की वजह से भेजा गया। विभूति को दलित वादी और धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में चल रही गड़बड़ियों पर उसके कुलपति विभूति नारायण राय के इंटरव्यू का आज दूसरा हिस्सा। इस हिस्से में और भी बहुत कुछ बातें और कुछ बौखहालटें हैं। आप इस इंटरव्यू को पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। – मॉडरेटर
अनिल चमड़िया को निकाल कर ग़लती सुधार दी: विभूति
,लेखक: विभूति नारायण राय | February 8, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 4 Comments
विभूति नारायण राय। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति। एक सीनियर आईपीएस अफ़सर। सेकुलर साहित्यकार और जनवादी लेखक। लेकिन अब ये सारी छवियां टूटती नज़र आ रही हैं। बीते कुछ महीनों में उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय में जो कुछ भी घटित हुआ, उससे विभूति नारायण राय पर दलित विरोधी होने का आरोप लगा। एक ईमानदार प्रोफेसर को साज़िशन हटाने और एक दलित प्रोफेसर को मानसिक यंत्रण देने का आरोप लगा। साथ ही जातिवादी ज़हर फैलाने का आरोप भी लगा।
इन सभी आरोपों पर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल, मोहल्लालाइव के संपादक अविनाश और जनतंत्र की तरफ़ से समरेंद्र ने उनसे बात की। विभूति नारायण राय ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में तीनों को इंटरव्यू दिया। सभी सवालों का उन्होंने कभी शांत भाव से तो कभी गुस्से में जवाब दिया। बीच-बीच में वो यह भी जताते रहे कि वो किसी को जवाब देना ज़रूरी नहीं समझते हैं। वो दलित विरोधी नहीं हैं। और यह साबित करने के लिए उन्हें किसी के सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं। मगर यह पूछने पर कि उनके कार्यकाल में जितनी भी अस्थाई नियुक्तियां हुईं हैं, क्या उनमें एक भी दलित है… वो कहते हैं कि उन्हें याद नहीं।
इसी बातचीत में उन्होंने बताया कि अनिल चमड़िया बेहद अनैतिक प्रोफेसर हैं। यह भी कि अनिल राय अंकित को चोर गुरू के तौर पर उनके दुश्मनों ने प्रचारित किया है। यह पूछने पर कि क्या अंकित अनैतिक नहीं? वह कहते हैं कि जांच के बाद ही तस्वीर साफ़ होगी। इसी इंटरव्यू में वो यह वादा भी करते हैं कि अगले कुछ दिनों में अंकित की जालसाजियों पर फैसला आ जाएगा। मगर कुछ पलों बाद यह भी दोहराते हैं कि फैसला जांच कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही होगा और कमेटी अभी तक गठित नहीं हुई है।
विभूति नारायण राय का दावा है कि अनिल चमड़िया को हटाने में उनका कोई हाथ नहीं। मगर वह यह भी कबूल करते हैं कि उन्होंने ईसी के मेम्बरों से कहा था कि यूनिवर्सिटी से एक ग़लती (अनिल चमड़िया की नियुक्ति) हो गई है और वो इस ग़लती को दुरुस्त करना चाहते हैं। विभूति नारायण राय से यह बातचीत काफी लंबी है। करीब 36 मिनट लंबी। उसी के एक हिस्से को हम आज प्रकाशित कर रहे हैं। बाकी हिस्से अगले कुछ दिनों में आपके सामने रख दिए जाएंगे। ताकि आप सही ग़लत का फ़ैसला खुद कर सकें। – मॉडरेटर



इन सभी आरोपों पर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल, मोहल्लालाइव के संपादक अविनाश और जनतंत्र की तरफ़ से समरेंद्र ने उनसे बात की। विभूति नारायण राय ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में तीनों को इंटरव्यू दिया। सभी सवालों का उन्होंने कभी शांत भाव से तो कभी गुस्से में जवाब दिया। बीच-बीच में वो यह भी जताते रहे कि वो किसी को जवाब देना ज़रूरी नहीं समझते हैं। वो दलित विरोधी नहीं हैं। और यह साबित करने के लिए उन्हें किसी के सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं। मगर यह पूछने पर कि उनके कार्यकाल में जितनी भी अस्थाई नियुक्तियां हुईं हैं, क्या उनमें एक भी दलित है… वो कहते हैं कि उन्हें याद नहीं। 
