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द्वारा लिखित आलेख:
लोहिया के शिष्यों की औकात नहीं कि उनका सही मूल्यांकन करें
,लेखक: सुशांत झा | March 23, 2010 | ब्लॉग | 3 Comments
इस देश में गुरू-शिष्य परंपरा रही है। महान गुरुओं से सैकड़ों-हज़ारों शिष्य बाज़ार में घूम रहे हैं। ऐसे ही महान गुरुओं में एक हैं राम मनोहर लोहिया। बीते तीन दशक में उनके शिष्यों को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के जितने मौके मिले उतने कम ही लोगों को मिले होंगे। कुछ ने तो लोहिया को एक ब्रांड की तरह पेश करके बेचने की कोशिश भी की। लेकिन यह भी एक बहुत बड़ा सत्य है कि लोहिया के विचारधारा को उनके इन स्वघोषित शिष्यों ने जितना नुकसान पहुंचाया है उतना शायद ही किसी ने पहुंचाया हो। इसी संदर्भ में युवा पत्रकार सुशांत झा का यह लेख काफी प्रासंगिक है। उनका कहना है कि लोहिया का सही मूल्यांकन अभी तक नहीं हुआ है और सही मूल्यांकन करने की हिम्मत और ईमानदारी उनके शिष्यों में नहीं है। – मॉडरेटर
कांग्रेस चाहती है निपटाना, पवार भी यही चाहते हैं…
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शरद पवार ने एक-एक कर अपने मंत्रालय से ताल्लुक रखनेवाली चीजों के बारे में जनता को बता दिया कि भैया अंटी अभी और ढ़ीली करनी पड़ेगी-दाम बढ़ने वाले हैं। मीडिया तलवार लेकर दौड़ा। फिर पवार साहब ने कह दिया कि वे अकेले थोड़े ही जिम्मेदार हैं, इसमें तो पीएम की मर्जी भी शामिल है। उधर कांग्रेस ‘शातिर’ तरीके से मौन है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री चाहते हैं कि आईपीएल विवाद को लेकर पवार और बीसीसीआई से बात करें ताकि ललित मोदी को दंडित किया जा सके। खबर है कि सरकार को ऐसा लगता है कि ललित मोदी, बीजेपी का एजेंडा चला रहे हैं और देश की विदेश नीति को आईपीएल की भेंट चढ़ा रहे हैं। इसका एक मतलब ये भी हो सकता है कि मोदी, पवार के इशारे पर ही तो ऐसा नहीं कर रहे ? Read more
दिग्गजों की मौजूदगी में प्रभाष जोशी पर पुस्तक का लोकार्पण
,लेखक: सुशांत झा | January 29, 2010 | पहरेदार | 2 Comments
गुरुवार को दिल्ली ने हिंदी पत्रकारिता के युगपुरुष प्रभाष जोशी को एक बार फिर दिल से याद किया। मौका था प्रभाष जोशी पर लिखे गए किताब हद से अनहद गए के लोकार्पण का और जगह थी गांधी शांति प्रतिष्ठान का सभागार। इस किताब का लोकार्पण कुलदीप नैय्यर ने किया जबकि समारोह की अध्यक्षता की जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने। इस मौके पर नित्यानंद तिवारी, मंगलेश डबराल, अशोक वाजपेयी, अनुपम मिश्र, पुण्य प्रसून वाजपेयी, पुष्पराज और प्रभाष जोशी के बेटे सोपान जोशी ने प्रभाष जोशी के बारे में अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन किया रवीन्द्र त्रिपाठी ने। Read more
बिहार में तेज़ी से पनप रहा है तेलंगाना
,लेखक: सुशांत झा | January 9, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 17 Comments
नीतीश राज में 11 फीसदी विकास के डंके का शोर अब कर्कश लगने लगा है। कर्कश सिर्फ़ इसलिए नहीं कि राज्य और नेशनल मीडिया उसे करीने से छाप रहा है, कर्कश इसलिए कि इस विकास में ख़तरनाक किस्म की क्षेत्रीय असामनता के बीज छुपे हैं जिन्हें नीतीश सरकार पल्लवित करने में दिन-रात एक कर रही है।
नीतीश सरकार विकास के उसी मॉडल पर आगे बढ़ रही है जिस पर कभी चंद्रबाबू नायडू काम करते थे। पटना में बिहार का पूरा भ्रष्ट पैसा जमा हो गया है। कुछ आंकड़े आंखें खोल देने के लिए काफी है। पटना में एक फ्लैट की कीमत 25 लाख से लेकर 65 लाख रुपये तक पहुंच गई है जो दिल्ली-एनसीआर के बराबर है। पटना उन शहरों में शुमार हुआ है जहां से हवाई यात्रियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इंडिया टुडे के एक सर्वे के मुताबिक पटना में इंटरनेट की पहुंच (प्रतिव्यक्ति फीसदी में) दिल्ली से थोड़ी ही कम है! ये विकास की भयावह तस्वीर है, जो बताती है कि विकास कहां केंद्रित हो रहा है। Read more
क्यों न दर्ज हो तिवारी के ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमा?
,लेखक: सुशांत झा | January 1, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment
किसी बड़े बुद्धिजीवी की उक्ति है- हम कई औरतों से इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि दुनिया में बुद्धिमान लोगों की भारी कमी है…और ईश्वर ने हमें इस विशेष काम के लिए भेजा है कि बुद्धिमान लोगों की आपूर्ति बनी रहे। एन डी तिवारी को बुद्धिजीवी के खांचे में रखने से बहुतों को एतराज होगा लेकिन एन डी ने इस उम्र में युवाओं को जरूर चुनौती दे दी है। वे उनकी उर्जा और प्रतिभा का मुकाबला करें। यूं हमारी जनता शासक वर्ग के ऐसे मामलों को ‘देवलोक’ का मामला मानती रही है और उनके किसी कृत्य के लिए किसी ‘खाप’ पंचायत का इंतजाम अभी तक नहीं किया गया है। लेकिन सवाल ये है कि क्या एन डी तिवारी को महज उम्र और ‘सार्वजनिक जीवन’ में उनके ‘योगदान’(!) की वजह से छोड़ देना चाहिए? Read more
सच में बहुत जातिवादी है मीडिया
,लेखक: सुशांत झा | August 29, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
एसपी का साक्षात्कार जब छपा था (13 साल पहले) तबसे लेकर अब तक हालात में कोई बड़ी तब्दीली नहीं आई है। मुझे याद है साल 2004 में आईआईएमसी के मेरे बैच में – जब सिर्फ एससी-एसटी को ही आरक्षण मिला हुआ था – बमुश्किल एक ओबीसी लड़का (यादव) जेनेरल कैटेगरी में चुना गया था। ये तब के हालत थे जब देश के कई सूबों में दशक भर से ज्यादा से पिछड़ों की सरकार थी। मुझे आश्चर्य इस बात का था कि दक्षिण के कई सूबों में जहां समाजिक सशक्तिकरण कई दशक पुराना है – वहां के पिछड़े-दलित भी नहीं आ पाए थे। हमने देखा था कि 30 के हमारे बैच में 6 सीटें एससी-एसटी के लिए थी और बचे 24 सीटों पर लगभग 18 ब्राह्मण थे। इसका सीधा मतलब ये था कि महज सत्ता में भागीदारी से किसी समुदाय का सर्वांगीण विकास तत्काल नहीं दिख सकता-खासकर तब जब हजारों सालों की वंचना पृष्ठभूमि में हो। जाहिर है, बीमारी गंभीर है। Read more
क्यों सिर्फ़ “राजनीतिक” पत्रकार ही बनते हैं सांसद?
,लेखक: सुशांत झा | August 14, 2009 | ब्लॉग, स्पेशल रिपोर्ट | 2 Comments
अब ये बात तो लगभग साफ है कि जो संपादक जितना बड़ा लाइजनर होगा उसके राज्यसभा में जाने की संभावना उतनी ही अच्छी होगी। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ वर्तमान संपादकों की ही जमात ऐसी है, मेरे दादाजी के जमाने में भी ऐसा ही होता होगा इसका यकीन हो चला है। लेकिन कमाल का है अपना शासक वर्ग भी। इस तबके ने आजादी के वक्त ही भांफ लिया था कि घपला-घोटाला-तीन-पांच और व्यवस्था को नरक बनाना है तो संपादकों को पटा लो नहीं तो ये बड़बोला तबका जीने नहीं देगा। अगर सारी मलाई खुद खा गए तो गांधीजी की तरह ये ससुरा गांव-गांव तक पदयात्रा भी निकाल सकता है। इसीलिए राज्यसभा और तमाम तरह के संस्थान में नोमिनेटेड (मनोनीत) सीटों की व्यवस्था की गई। जो नोमिनेटेड में नहीं आ सके उनके लिए जीते हुए विधायकों का वोट हलाल किया जाता है और पार्टी के आजीवन वर्कर की सेवा को एक झटके में कुर्बान कर दिया जाता है। मजे की बात ये कि इसमें सिर्फ पत्रकार ही नहीं हैं जो वे तमाम बुद्धिजीवी हो सकते हैं जो जनता के सरोकारों पर कभी जुबान खोल सकते हैं- लेकिन राज्यसभा जाते ही उनके जुबान पर ताला लग जाता है। Read more




